चरण स्पर्श


चरण स्पर्श या पैर छूना छुलाना भी हमारे भारतीय समाज में बड़ा मुद्दा हो जाता है| मगर मेरे माता-पिता की बात मानें तो मैंने मात्र चार वर्ष की आयु में इसपर विद्रोह कर दिया था| हुआ यूँ कि मेरे नानाजी के कई भाई एक साथ खड़े थे और उनके पीछे उनमें से एक का अर्दली| मैंने नानाओं के साथ अर्दली के पैर छूए और इसका मजाक बन गया| फिर बाद में मेरे बाबा ने निर्णय दिया जब जिसके प्रति इसके मन में सम्मान जागेगा, यह अपने आप पैर छू लेगा| मुझपर पैर छूने का कभी दबाब नहीं रहा| हाँ, कुछ वर्षों के बाद मैंने उस अर्दली के पैर अपने मन से दोबारा छुए|

हमारे ब्रज में पैर छूने छुलाने में बड़े झंझट भी हैं| बड़ों के पैर छूओ, मगर मामा मामी के पैर नहीं छूने| लडकियाँ पैर नहीं छूतीं बड़ों को उनके पैर छूने होते हैं| दामाद तो खैर पूज्य है ही| मेरे ननसाल में बहुएं घर के बड़े पुरुषों को पैर छूना कहलवा देतीं हैं, पैर छूने की क्रिया मात्र शाब्दिक है| हर परिवार में ऐसे ही अलग अलग विचार हैं| यह सब संस्कृति का सम्मानित हिस्सा है|

मैंने किशोर अवस्था में आकर पैर छूना पुनः शुरू किया मगर मेरी अपनी पसंद रही| मन में सम्मान या प्रेम जगा तो स्वतःस्फूर्त पैर छू लिए| हुआ यूँ भी है कि किसी के प्रति इतना सम्मान जग गया कि मुझे पैर छूना भी पर्याप्त नहीं लगा और कर्तव्यविमूढ़ खड़ा रहा| मेरे जितने भी शिक्षक बढ़िया पढ़ाते रहे मैंने उनके पैर छूए जिनमें दो मुस्लिम शिक्षक भी रहे, जिनके विचार से उनका किसी इंसान से पैर छुलवाना ठीक नहीं था| साथ ही एक शिक्षक को गुरु पूर्णिमा पर पैर से उठाकर भी पटका| ब्रज के नियमों के विरूद्ध अपनी एक मामी के पैर नियमबद्ध सम्मानपूर्वक छूए| ऐसे कई रिश्ते हैं जहाँ मैंने नियम विरुद्ध जाकर पैर छूए हैं और बहुत से रिश्तों में नियमपरक होने पर भी मैंने उस व्यक्ति को सम्मान योग्य नहीं पाया| एक व्यक्ति ऐसे भी हैं जिन्होंने मुझे धमकी दी थी कि टेसू अगर ठीक से पढ़े नहीं तो हम तुमसे पैर नहीं छुलवायेंगे| उनकी धमकी के असर से ही आज मैं कुछ बना हूँ|

मुझे सबसे अधिक दिक्कत उन लोगों से होती रही जो पैर आगे बढ़ा कर पैर छूने का दबाब बनाते हैं| उन्हें मैं नमस्ते करने की काबिल भी नहीं समझ पाता| कई बार मैंने खुल कर मना करने जैसी असामाजिक हरकत भी की तो टालमटोल करने की तो गिनती नहीं रही|

पैर छुलवाने में तो मेरी अजीब हालात हो जाती है| मुझे स्त्रियों से पैर छुलवाना समझ नहीं आता खासकर तब जब उनके पति सिर्फ खानापूर्ति के लिए पैर छूकर गए हों| ऐसे ढीठ पुरुषों की पत्नियों से पैर छुलवा लेना मुझे उस बेचारी स्त्री का अपमान लगता है| घुटना छूने वालों से भी मुझे हमेशा परहेज रहा और खुद भी मैंने किसी का घुटना नहीं छूआ|

मेरे बेटे ने एक बार पूछा कि हमें किसको नमस्ते करनी चाहिए और किसके पैर छूने है| मैंने कहा, दुआ सलाम (आज की भाषा में हाय-हेलो) सबको करो| जिसके लिए मन में सम्मान का भाव आये तो मन की भावना के हिसाब से नमस्ते और पैर छूना अपने आप हो जाएगा| मेरी तरफ से उसपर किसी के भी पैर छूने का दबाब नहीं है| संस्कार और संस्कृति थोपी नहीं जाती|

पुनःच – अयोग्य को दान नहीं देना चाहिए, सम्मान तो बड़ी बात है|

जेल घर


कभी सोचा है आपने – जेल में कौन रहता है? आतंकवादी, नक्सलवादी, घोटालेबाज, अपराधी??

अक्सर नहीं| जेल में आम तौर पर परिवारी लोग रहते हैं| मेरे और आपके जैसे|

जेल हम सब का घर हो सकता है – कभी भी कहीं भी| यह कुछ हद तक हमारे प्रिय परिवार पर निर्भर करता है तो कुछ पुलिस और समाज पर| हम में से कोई भी कभी भी अपराधी करार हो सकता है| अक्सर विश्वास किया जाता है, एक बार पकड़े जायेंगे तो पुलिस कूट कूट कर किसी का भी अपराधी तत्त्व बाहर निकाल ही लाएगी| पुलिस यह करे न करे, समाज जेल जाने पर अपराधी होने का हो पक्का वाला ठप्पा लगाएगा| उसके लिए किसी का आतंकवादी होना जरूरी नहीं| भले ही हम किसी भी अपराधी को देखते ही या पकड़ते ही गोली मार देने की बात करें, मगर अगला जेल में अगला निवास किसी का भी हो सकता है|

कभी सोचा है – जेल बाकि के जीवन का आपका घर|

“ऐसे बहुत से प्रकरण देखे जहाँ भाई खेत के छोटे से टुकड़े के लिए खून के प्यासे हो गए, कितनी बीवियों ने अपने प्रेमियों के लिए अपने पति का खून कर दिया , कितने पतियों ने अपनी बीवी को शंका के आधार पर जिन्दा जला दिया, कितनी बहुओं ने केवल अपने अहंकार की तुष्टि और पैसों के लिए वृद्ध सास ससुर, दूर दूर की ननद, देवरानी, जेठानियों को झूठे दहेज़ के केस में जेल भेजकर आनंद मनाया|”

– जेल अधीक्षक, मध्य प्रदेश

लालच में आप देश नहीं, वह सपना बेचते और तोड़ते हैं, जिसे हम और आप घर कहते हैं| या तो खुद जेल पहुँच जाते हैं या अपने किसी सगे को जेल भेज देते हैं| दोनों में से कुछ भी बात हो, सबको मिलता है – थाना कचहरी अदालत और मकान की सूनी दीवारें| फिर ज्यादा जोर चला तो पारिवारिक रंजिश शुरू हो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है, तब भी जब गाँव, शहर, मजहब सब बदल जाते हैं|

आपका घर और आपका पास पड़ौस दुनिया की सबसे खौफ़नाक जगह हैं| यहाँ से सीधा रास्ता उस घर जाता है जिसे आम हिन्दुस्तानी मजाक में ससुराल कहता है| यह तभी तक स्वर्ग हैं, जब तक यहाँ सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है|

ध्यान रहे पारिवारिक झगड़ों में विजय नहीं होती – कौरव या पाण्डव – किसी का वंश नहीं बचता|

कम लिखा ज्यादा समझना|

एक थैले वाला मुकदमा


विज्ञापन का सबसे बेहतर तरीका है – समाचार में छा जाना| अभी हाल में जूता कंपनी बाटा पर एक थैले के लिए हुआ मुकदमा बाटा के लिए इसी प्रकार का समाचार साबित हो रहा है| सामान के साथ थैला देने के लिए दाम वसूलने का काम पहली बार नहीं हुआ| दिल्ली में मदर डेरी भी बिना पैसे वसूले आपको थैला नहीं देती| इसी प्रकार के अन्य और भी संस्थान हैं| मगर इन सभी मामलों में ग्राहक के पास यह थैला खरीदने या न खरीदने का विकल्प रहता है| अगर वह अपने हाथ में अपना खरीदा हुआ सामान ले जाना चाहे तो उसकी मर्जी पर निर्भर करता है| दुर्भाग्य से आजकल ग्राहक मुफ्त के थैले को अपना अधिकार समझते हैं| कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ ग्राहक थैला न देने पर भद्दी भाषा का प्रयोग करते हैं| मुफ्त के यह थैले प्रायः घर और बाहर कूड़े का एक प्रमुख कारण बन रहे हैं| इन दिनों कूड़ादान और कूड़ाघरों में सबसे अधिक कूड़ा थैलों और अन्य बारदाने (पैकिंग मटेरियल) का ही है|

दिनेश प्रसाद रतूरी बनाम बाटा इंडिया लिमिटेड मजेदार मुकदमा है| जहाँ तक मुझे लगता है, इस फैसले पर जल्दी ही अपील होनी चाहिए| इस प्रकार यह लम्बे समय तक बाटा को खबर में रख सकता है|

ग्राहक ने शिकायत की है कि बिना बताए या पूछे थैला उन्हें बेचा गया| मामला साधारण था| ग्राहक थैले की यह बिक्री स्वीकार करने से मना कर सकता था और जूता या जूते का डिब्बा साथ ले जा सकता था| उस पर थैला ले जाने की कोई जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए थी| क्योंकि थैला बेचने का कोई करार नहीं हुआ, कोई बात नहीं हुई तो यह बिक्री तुरंत निरस्त करने योग्य थी| निर्णय में लिखे गए तथ्य यह नहीं बताते कि ग्राहक ने थैले की यह बिक्री रद्द करने का प्रयास किया या नहीं किया| क्या ग्राहक मात्र मुफ्त थैले की मांग करता रहा और बाद में बिक्री स्वीकार कर कर वहां से चल दिया? जी, उसने थैले को स्वीकार किया मगर उसका मानना था कि मुफ्त थैला उसका अधिकार था, खासकर जब कि उस थैले पर कंपनी का लोगो ब्रांड आदि लगे हुए थे|

इस मुक़दमे में यह दावा किया गया है कि दुकानदार मुफ्त में ग्राहकों को थैला देने के लिए बाध्य है| मुझे यह दावा बिल्कुल गलत लगता है| इस समय बाटा को छोड़कर किसी भी अन्य दुकानदार के लिए मेरी तत्काल सलाह है कि तुरंत अपनी दूकान में सूचना लिखवा दें – थैला घर से लायें या खरीदें, मुफ्त नहीं मिलेगा|

दूसरी बात ग्राहक का कहना है कि इस थैले पर विज्ञापन लिखा हुआ है और उस थैले को दे कर बाटा कंपनी उनसे बिना पारिश्रमिक दिए विज्ञापन करवा रही थी| अब आपकी कार, फ्रिज, टेलिविज़न, चश्मे, कमीज कुरता सब पर कोई न कोई ब्रांड या लोगो लगा हुआ है| क्या यह विज्ञापन है, या आपके घर की ब्रांड वैल्यू? आप सब अब स्वीकार कर लें कि आप बेगारी की माडलिंग और विज्ञापन सेवा कर रहे हैं| वास्तव में होता उल्टा है, हम उस ब्रांड को घर लाने और दुनिया को दिखाने में गर्व कर रहे होते हैं| विक्रेता हमें यहीं गर्व बेचता है और उसके दाम वसूलता है|

बाटा का दावा है कि उसने पर्यावरण हित का ध्यान रखकर यह थैला बेचा| यह अपने आप में बचकाना बचाव था|

अगर पर्यावरण हित का ध्यान था तो ग्राहक को बार बार प्रयोग करने वाला थैला बेचना चाहिए था या उपहार में देना चाहिए था| सबसे बेहतर था कि कंपनी अपने ग्राहकों पर अपने घर से मजबूत कपड़े का बार बार प्रयोग हो सकने वाला थैला लाने के लिए दबाव बनाती|

वास्तव में यह गलत बचाव बाटा के विरुद्ध जाता है| ऐसा लगता है कि वह गलत और जबरन बिक्री को जायज ठहराने का कमजोर प्रयास कर रही है| इस गलत बचाव से यह महसूस होता है कि यह थैले की गलत तरीके से की गई बिक्री का मामला बनता है| इस प्रकार के बचाव से उसने इस थैले की जबरन बिक्री स्वीकार कर ली| अगर आप गलत तरीक से बिक्री करते हैं तो यह कानूनन गलत है|

होना यह चाहिए था कि कंपनी कहती कि वह पर्यावरण हित में ग्राहकों को अपने घर से बार बार प्रयोग हो सकते वाला थैला लाने के लिए प्रोत्साहित करती है और विशेष मामलों में ग्राहक की मांग पर उन्हें थैला बेचती है| क्योंकि यह ग्राहक अपने साथ अपना थैला नहीं लाया था, इसलिए यह थैला उसने खुद खरीदा| थैले पर कंपनी का कोई भी विज्ञापन इस थैले को सस्ता रखने का प्रयास है और कागज का अधिक बेहतर उपयोग भी है|

दुर्भाग्य से इस मुक़दमे के फ़ैसले में विक्रेता को अपने सभी ग्राहकों को आगे से मुफ्त में थैले देने का आदेश दिया गया है| वास्तव में यह अपने आप में गलत होगा| कम्पनी यह थैले अपने लाभ में से नहीं देगी वरन अपनी लागत में वह इसे जोड़ेंगे और जूतों के दाम बढ़ जायंगे| हो सकता है, ३९९ रूपए का जूता आधिकारिक रूप से ४०२ रुपए का हो जाए| एक साथ दो जोड़ी जूते खरीदने ओर ग्राहक को ८०१ रूपए की जगह ८०४ रुपए खर्च करने पड़े|

साथ ही इस निर्णय से हमेशा अपना थैला लेकर चलने वले जागरूक पर्यावरण प्रेमी ग्राहकों को हताशा होगी|

तुरंत आवश्यकता है कि जागरूक कंपनियां अपने ग्राहकों की कपड़े के मजबूत थैले साथ लाने के लिए प्रेरित करें| पोलीथिन, प्लास्टिक, कागज़ और महीन कपड़े के कमज़ोर एकल प्रयोग थैलों को देना तुरन और पूरी कड़ाई से बंद करें| अपने साथ थैला न लाने वाले ग्राहकों को पच्चीस पचास रुपये का मजबूत खादी का थैला खरीदने का विकल्प दें|

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