हिन्दू मुस्लिम विवाह


“लव जिहाद” चर्चा में है| लव जिहाद का मुद्दा उठाने वालों को मात्र और मात्र हिन्दू लड़कियों की चिंता है| लवजिहाद्वादियों को लगता है कि मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़कियों को फंसाते हैं| यह अलग बात है कि जब हिन्दू लड़कियों से बलात्कारों की ख़बरें आतीं हैं तो यह लोग मानते हैं कि हिन्दू लड़कियां ही सीधे साधे हिन्दू लड़कों को फँसातीं है और बलात्कार का आरोप लगातीं हैं| हाल में तो एक हिन्दू लड़की पर इनका आरोप था कि उसने एक बड़े नामधारी अभिनेता को प्रेम, वासना और नशे में फंसा कर मरने के लिए मजबूर कर दिया|

सरलता के लिए यह मान सकते हैं कि हिन्दू लडकियाँ अपने बलात्कारी हिन्दू लड़कों को फँसातीं फंसाती हैं परन्तु मुस्लिम लड़कों को नहीं फंसाती बल्कि उनके प्रेम में फंस जाती हैं| इस दोहरी प्रक्रिया को स्त्रीवाद और लव जिहाद के नाम से जाना जाता है|

इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि हिन्दू लड़के मुस्लिम लड़कियों से सच्चा प्रेम करते हैं| पिछले साल जब जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के विशेष संवैधानिक अधिकार समाप्त किय गए तो सोशल मीडिया पर विशेष प्रकार के विवाह संबंधों के प्रस्ताव हिन्दू लड़कों ने प्रस्तुत किये थे –  जिन्हें हिन्दू धर्म में पिशाच विवाह कहा जाता है|

खैर, हिन्दू मुस्लिम विवाह कोई नई बात नहीं| यह आम राय है कि हिन्दू लड़कियों और मुस्लिम लड़कों के विवाह आम है, जिसका एक कारण मुस्लिम लड़कियों पर कड़े सामाजिक नियंत्रण माना जाता है|

परिवार वधु को स्वीकार करने का कितना भी दावा करें, हिन्दू या मुस्लिम, उसे सांस्कृतिक विविधता के साथ खुद को ढालने में संघर्ष करना होता है| पीठ पीछे हिन्दूड़ी या मुल्ली जैसे अपशब्दों को सुनना आम बात होती है| इसके मुकाबले, यदि कन्या पक्ष ने विवाह को स्वीकार कर लिया हो तो लड़के मात्र सामान्य अभिवादन और लगभग किताबी बातों से अपनी ससुराल को प्रसन्न करने में सफल रहते हैं| लड़कियों में पारिवारिक समारोह में कई वर्षों तक अकेलेपन का सामना करना रहता है| सबसे अधिक संघर्ष इस बात का होता है कि उन्हें ससुराल की संस्कृति ही बच्चों को सिखानी होती है| यह समस्या सजातीय विवाह में भी होती है, परन्तु हिन्दू मुस्लिम विवाह में सम्बन्ध यह विकराल रूप लेती है| बच्चों को माता के धर्म संस्कृति के बारे में उन प्रश्नों का सामना करना होता है जिनके बारे में उन्हें नहीं पता होता|
माता या पिता का धर्म कुछ भी हो, एक प्रश्न का उत्तर हर बच्चे को देना ही होता है – झटका या हलाल? नहीं, यह हमेशा मांसाहारी भोजन के बारे में नहीं होता| एक बच्चे को स्पष्ट पूछा गया था – झटके की औलाद हो या हलाल की| यह प्रश्न करने वालों के मानसिक दिवालियापन की ही नहीं, समाज के दिवालियेपन का संकेत है| यह बलात्कार और सम्भोग में विभेद न कर सकने वाले समाज का प्रतिबिम्ब है|

मुस्लिम लड़की और हिन्दू लड़कों का विवाह कट्टर हिंदुत्व वादियों की प्रमुख चाहत की तरह उभर कर सामने आती रही है| मगर क्या होता है, जब इस प्रकार के हिन्दूमुस्लिम विवाह होते हैं? अक्सर सांस्कृतिक शुद्धता समाप्त होती है, मिश्र भारतीय संस्कृति का विकास होता है| यह किसी कट्टरपंथी को पसंद नहीं आता – हिन्दू हो या मुस्लिम|   

ऐश्वर्य मोहन गहराना

नए ब्लॉग पोस्ट की अद्यतन सूचना के लिए t.me/gahrana पर जाएँ या ईमेल अनुसरण करें:

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

कोविड की अफ़वाह


दिन प्रतिदिन मुझे इस बात का विश्वास होता जा रहा है कि कोविड की बीमारी एक अफवाह से अधिक कुछ नहीं| हमारे थाली थाली ढोल नगाड़ों के चलते यह बहरा होकर बहुत पहले ही पाताललोक जाकर छिप गया है अथवा जनता कर्फ्यू के समय ही यह बेमौत मारा जा चुका है|

हम अर्थ-व्यवस्था के नाम पर सड़कों पर दौड़ रहे हैं| निजी और सरकारी कार्यालय से लेकर दुकान मकान तक सब अपने अपने कर्मचारियों को काम पर आने के लिए विवश कर रहे हैं| इन में से मैं भी एक हूँ| आखिर आप अर्थतंत्र में सबसे नीचे पायदान पर मौजूद घरेलू नौकरानी को तो बिना काम के लम्बे समय तक पैसा नहीं दे सकते| खासकर अगर आप घर से काम करते हैं, उसका होना जरूरी है| आप कारखाने दुकान मकान भी बंद नहीं कर सकते| परन्तु लिपिक को कार्यालय बुलाने की जरूरत नहीं है|

मैं तालाबंदी का कोई प्रसंशक नहीं रहा, परन्तु उसका सीमित समर्थन किया था| मुझे लगता था कि हमारी केंद्र और राज्य सरकारें बेहतर योजना बनाने के लिए समय लेना चाहती हैं| छः महीने के बाद आजतक हमारे पास न चिकित्सालय का तंत्र बना, न कोई दवा है, न कोई वैकल्पिक अर्थतंत्र| परन्तु सरकार के साथ साथ मुझे पढ़े लिखे तबके ने भी मुझे बहुत निराश किया है| हम अपनी जड़े काटने वाले समाज के रूप में सदा ही जाने जाते रहे हैं| 

हम कार्यालयों में अवांछनीय उपस्तिथि को कम करने के स्थान पर सभी को कार्यालय आने ले किये विवश कर रहे हैं| बहुत से लोग जो घर से काम करने की स्थिति में हैं, उन्हें भी कार्यालय आने को कहा जा रहा है| कार्यालयों में लिपिकों और बहुत से अधिकारीयों को उपस्तिथि आवश्यक नहीं होती – वो अपनी जरूरी कागजात घर ले जाकर काम कर सकते हैं| गैर जरूरी व्यवसायों को खोला गया है जबकि इनमें से बहुतों को खोलने का खर्च आय से बहुत कम हैं| बड़े भोजनालय, केशसज्जा केंद्र, आदि कई धंधे अभी तक लाभ-बिंदु तक नहीं पहुँच पाए परन्तु सामूहिक घाटे के साथ काम करने के लिए विवश है|

दुःख है कि शपथ जैसे नाटकों को हम पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं, परन्तु अपने सुरक्षापर्दे (मास्क) को अपनी नाक पर नहीं बिठा पा रहे| सामाजिक या व्यक्तिगत दूरी को तो मैं दिल्ली में अवांछनीय मानता हूँ – बड़े शहरों का जनसँख्या घनत्व इस प्रकार की दूरी को अव्यवहारिक बनाता है| राजधानी दिल्ली तक में बैंको, डाकघरों से लेकर हाट बाजारों तक लोग अपने सुरक्षा परदे का प्रयोग ठीक से नहीं कर पा रहे|

मैं कई बार सोचता हूँ यदि प्रधानमंत्री जी ताली बजाने, दिए जलाने और फूल बरसाने जैसे प्रतीकों से आगे बढ़ पाते तो आज उनकी बात मानकर हर नाक पर सुरक्षापर्दा होता| पर भारत का मध्यवर्ग शायद ऐसा न होने देता – उसे तो भक्ति आती हैं, समझ नहीं|

ऐश्वर्य मोहन गहराना

नए ब्लॉग पोस्ट की अद्यतन सूचना के लिए t.me/gahrana पर जाएँ या ईमेल अनुसरण करें:

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

चलचित्रमयदूरवार्ता


चलचित्रमयदूरवार्ता – कितना अच्छा शब्द है? विडियोकॉल को शायद यही कहना चाहिए| मुझे विडियोकॉल शब्द से कोई कष्ट नहीं है परन्तु विडियोकॉल अनजाने में ही एक नई समस्या बन रही है| करोना काल ने इस का बहुत प्रचार-प्रसार किया है| परन्तु जब भी कोई नई सुविधा हमारे सामने आती है तो अतिशय उपयोग एक अनजान समस्या के तौर पर सामने आता है|
इन समय हमारे बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं में पढ़ रहे हैं जिस कारण उनका अतिआवश्यक स्क्रीन टाइम दो घंटे (सरकारी विद्यालय) से लेकर छः घंटे (निजी विद्यालय) है| इसके अतिरिक्त खेलकूद के बढ़िया विकल्पों पर लगे आत्मप्रतिबन्ध के चलते उन्हें कम से कम एक से दो घंटा टेलीविजन देखने का अधिकार होना ही चाहिए| इसके अतिरिक्त परिवार, पारिवारिक संबंधियों, मित्रों आदि में वीडियोकॉल का चलन अचानक बढ़ गया है| कितना अच्छा है कि करोनाकालीन अकेलेपन में हम आमने सामने होने का आभास पा लेते हैं| परन्तु इस सब से बच्चों का स्क्रीन समय बढ़ रहा है| बाल्यचिकित्सकों की अमेरिकी अकादमी के अनुसार बच्चों का दैनिक स्क्रीन समय दो घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए| सभी समझदार है इस लिए मुझे इस बाबत अपने सुझाब आप पर थोपने की जरूरत नहीं है|
बड़ों के लिए सही स्क्रीन समय को लेकर कोई सुनिश्चित राय वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के पास नहीं है परन्तु हर घड़ी में कुछ पल का अल्पविराम आवश्यक माना जाता है और लगातार एक प्रहर से अधिक स्क्रीन समय नहीं होना चाहिए| क्योंकि जीवन की अन्य आवश्यकताओं पर भी ध्यान देना है तो काम, मनोरंजन और गप्पबाजी मिलाकर भी यह समय बारह घंटे से अधिक का तो नहीं होना चाहिए|
वैज्ञानिकता से हटकर भी बात करते हैं| हमारे वीडियो द्वि-आयामी होते हैं| हो सकता है की जल्दी ही त्रि-आयामी वीडियो भी हमारे सामने हों| परन्तु वीडियो की यह दुनिया आभासी है| आप वास्तव में एक दूसरे के साथ नहीं है| यह आभासी दुनिया हमें आसपास होने का सुखद आभास तो दे रही है परन्तु जल्द हो हमारी स्वस्थ्य आँखों के अतिरिक्त भी बहुत कुछ छीन सकती है जैसे महीनों बाद किसी समारोह में एक साथ मिलने जुलने की बहुत बड़ी ख़ुशी|
ऐश्वर्य मोहन गहराना
नए ब्लॉग पोस्ट की अद्यतन सूचना के लिए t.me/gahrana पर जाएँ या ईमेल अनुसरण करें:

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.