बचत और महंगाई


निवेशक जागरूकता श्रंखला १

हम कमाते किस लिए हैं; खर्च करने के लिए| मगर हम सारी जिन्दगी कभी नहीं कमाते| जीवन के पहले बीस पच्चीस साल हम कमाने लायक नहीं होते और बाद के पंद्रह बीस साल कमाने लायक नहीं रहते|

कुछ खर्चे रोज होते है, कुछ हर महीने तो कुछ हर साल.. कुछ कब हो जाये पता ही नहीं चलता.. शादी – ब्याह, हारी – बीमारी|

हमारी कमाई और महंगाई लगभग थोडा आगे पीछे बढ़ते रहते है|

कहते हैं कि जितनी चादर हो उतने पैर पसारो| हम सबकी यही कोशिश होती है| ज्यादातर तो हमारी कमाई से जरूरी खर्च पूरे हो जाते हैं, मगर कई बार खर्चे हमारी कमाई से ज्यादा होते है| इसी तरह के खर्चों के लिए हमें बचत करनी होती है|

अगर हम पिछले साल १०,००० रूपये की बचत की पैसे घर में रख लिए तो आज भी हमारे घर में वो १०,००० रुपए पड़े है जो वक्त जरूरत काम आयेंगे| मगर पिछले साल १०,००० रुपए में ८.५० कुंतल गेंहू ख़रीदा जा सकता था मगर इस बार तो घर में रखे उन १०,००० रुपए से ७.५० कुंतल गेंहू ही आ पा रहा है|

यही है बचत और महंगाई का खेल जिसमे महंगाई हमें खेल खिलाती है|

पहली जरूरत तो यही है कि हम बचत को घर में न रखें; कुछ ऐसा करें की घर में रखा पैसा भी बढ़ता रहे|

मगर यहीं दिक्कत शुरू होती है, कई पीर – फ़कीर – गुरु – बाबा हैं जो पैसा दुगना या दस गुना कर देते है| उधर बहुत सारे लोग है जिनके पास पैसा बढ़ाने के नए नए बढाया तरीके है, जिसमे वो एक दिन हमारा सारा पैसा लेकर गायब हो जाते है| कहा जाता है, कंपनी भाग गई|

हमारी मेहनत की कमाई और उस से भी ज्यादा मेहनत से की गई बचत की दुश्मन ये महंगाई नहीं है, उस से भी बड़ा दुश्मन है हमारा लालच|

गिन लीजिये हर साल कितनी कंपनी लोगों का पैसा लेकर भाग जातीं है| और मजे की बात है हम लोग जो टाटा – बिडला, सरकारी बैंक – पोस्ट ऑफिस को दस रुपए भी आसानी से नहीं देते इन भागने वाली कंपनी को दे देते हैं|

इन्द्रप्रस्थ का राजतिलक


 

बार बार.. हर युग में.. युद्ध होते हैं| अधर्म के सहारे, धर्म युद्ध लड़ें जाते हैं|

प्रत्येक मानव को देवराज इंद्र का आसन चाहिए| निर्विवाद, अपराजेय आसन.. भोग, विलास और अप्सराएं|

इन्द्रासन तक पहुँचने का मार्ग, इन्द्रप्रस्थ होकर जाता है| इन्द्रप्रस्थ का राजमुकुट भी तो स्वर्ण आभासित पुरुस्कार है|

अहा! पुरस्कार के लिए प्रतियोगिताएं रचीं जातीं हैं|

ओह!! प्रतियोगितायें नहीं; युद्ध, गृहयुद्ध, महायुद्ध, धर्मयुद्ध, रचे जाते हैं| युद्ध तो योद्धा का खेल है, जिसे रचा, खेला और लड़ा जाता है|

पल बदलता है, काल बदलता है, युग बदल जाते हैं| प्रतियोगी बदलते हैं, प्रतिभागी बदलते हैं, योद्धा बदल जाते हैं| मानव बदल जाता है…| अरे..!! मानव तो कभी नहीं बदलता… |

अरे भाई! इंद्रप्रस्थ की सत्ता.., प्रजा की प्रसन्नता का संधान नहीं है| ये तो चौसर की बिसात है, चतुरंग का चतुर चक्रव्यूह है|

सत्ता के हर चरण में दाँव पर दाँव लगाये जाते है| चारण, चाटुकार.., मित्र, मंत्री.., माया, मदिरा और मूर्ख सजाये जाते हैं| माता, बहन, पुत्री, पत्नी, स्व – स्त्री, पर – स्त्री, भेंट चढ़ाये जाते हैं|

सत्ता में भाई नहीं होता; पिता, पितामह, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, नहीं होते| सत्ता के शिखर की सीढियाँ प्राणविहीन नश्वर शरीरों से बनायी जातीं हैं| सत्ता की पताकाएं मृत – आत्माएँ लहरातीं हैं|

नर बलियों से ही तो सत्ता के देव प्रसन्न होते हैं|

सत्ता का सारथि ही योद्धा का एकमात्र मित्र, सखा, भाई, पिता, गुरु, देव, हृदय और आत्मा होता है| उस सारथि का हर कथन, वेद – गीता, गीत – संगीत, स्वर – स्वाहा होता है; उन्ही से तो सत्ता के महाकाव्य रचे, गढ़े, पढ़े, कहे, सुने, समझे जाते हैं|

हाय!! हाय!! आज तो घोर कलियुग है| न राजा, न राजतन्त्र.., न राजगुरु, न राजमाता.., न राजमहल, न रनिवास.., न रानी, न पटरानी.., न राजकवि, न राज दरबार.., न ही राजगायक, न राजनर्तकी|

अहा! हा हा!! राजा कभी नहीं मरा करते| इस भूलोक पर राजा ही तो देव का साक्षात अवतार है| अवतार हर युग में आते हैं| राजा, सम्राट, शहंशाह, सुल्तान, गवर्नर जनरल, लाट साहब, मंत्री, प्रधानमंत्री| असंख्य – अनंत अवतार|

अवतारी पुरुषों का पुरुषार्थ.., अवतारी स्त्रियों की आभा…, बात ही कुछ और है| सत्ता उनकी रखैल रहती है|

दंगे – फसाद, खून – खराबे, गृहयुद्ध – विद्रोह, आतंकवाद – नक्सलवाद, चाकू – बल्लम – भाले, बम – धमाके, वैश्या  – बलात्कार… अरे बस नाम ही तो बदले हैं|

सत्ता के शास्त्र में, त्रेता, द्वापर, कलियुग… सब एक हैं|

उन्माद का शंखनाद है… रुदन का संगीत है|

इन्द्रप्रस्थ के राजतिलक में आज भी नरमुण्ड हैं.. नर बलि है.. नग्न नृत्य है…||

नरमुण्ड हैं.. नर बलि है.. नग्न नृत्य है…||

घर मजदूरी


अभी पिछले दिनों खबर पढ़ी कि एक चाय की दूकान पर काम करने वाले ग्यारह साल के बाल मजदूर को चाय पीने आये दो ग्राहकों ने ठीक से आर्डर न ले पाने करण गोली मार दी|

मुझे अपने बचपन की कुछ बातें याद आ गयीं| उन दिनों हम सिकंदराराऊ के नौरंगाबाद पश्चिमी मोहल्ले में रहते थे| पड़ोस में एक परिवार उन्हीं दिनों रहने आया जिसमे चार पांच छोटी छोटी लड़कियां और साल भर का एक लड़का था| जाड़ों के दिन थे| बच्चों की माताजी सुबह धूप निकलते ही छत पर आ जातीं थीं और दिन ढलने तक वही रहती थीं|

पुरे मोहल्ले में उस जल्लाद माँ का जिक्र होने लगा| दस और बारह साल की दोनों बड़ी लड़कियां बारी से खाना बनती थी| तीसरी आठ लड़की अपने छोटी बहन और भाई को नहलाती धुलाती थी| उसकी छोटी बहन रोज जब भी उसकी माँ का मन होता, पिटती रहती थी| साल भर का राजकुंवर दिन भर माँ की गोद से चिपका रहता था| हमें लगता की ये उन लड़कियों की सौतेली माँ है|

एक दिन, माँ ने उनके घर जाने का निर्णय लिया| उस औरत के पिता जिलाधिकारी कार्यालय में काम करते थे| उसे हाई स्कूल के बाद पढाई बंद करनी पड़ी थी और उसे घर के काम में लगा दिया गया था|

उसके अनुसार पंद्रह साल की उम्र से काम करते करते थक गयी थी और फिर ये “नाश-पीटियाँ” आ गयीं| सारा शरीर बिगाड़ कर रख दिया इन्होने| अब काम करना सीखेगी तो इनका ही तो भला होगा| मुझे क्या, दिनभर इनके बारे में सोच सोच कर ही परेशान रहती हूँ|

ऐसे कितने बच्चे हैं जो अपने घर में अपने ही माँ बाप के शोषण का शिकार होते हैं| लड़कियों को घर का काम करना होता है| लड़कों को ज्यादा लाड प्यार तो शायद मिलता है मगर वो भी अछूते नहीं है अपने घर में काम काज से| बाजार हाट, उठा-धराई|

मगर कब तक?