दो ऑटोरिक्शा चालक


अभी गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में अपना पर्चा प्रस्तुत करने के लिए जाना हुआ| जाते समय अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से विश्वविद्यालय तक और लौटते समय दिल्ली कैंट से लोदी रोड तक ऑटो रिक्शा की सवारी का लुफ्त उठाया और सामायिक विषयों पर चर्चा हुई| दोनों रिक्शा चालकों की समाज और देश के प्रति जागरूकता और उस पर चर्चा करने की उत्कंठा ने मुझे प्रभावित किया|

गुजरात:

मुझे नियत समय पर पहुंचना कठिन लग रहा था और रास्ता भी लम्बा था| बहुत थोड़े से मोलभाव के बाद, मैं अपनी दाढ़ी और पहनावे से मुस्लिम प्रतीत होने वाले चालक के साथ चल दिया| मैंने सामान्य शिष्टाचार के बाद सीधे ही प्रश्न दाग दिया. अगले चुनावों में वोट किसे दोगे| बिना किसी लाग लपेट के उत्तर था, मोदी| मैंने दोबारा पूछा, भाजपा या मोदी? मोदी सर| मैंने कहा, वो तो कसाई है, उसे वोट दोगे| चालक ने शीशे में मेरी शक्ल देखी, आप कहाँ से आये है? मैंने कहा दिल्ली से, अलीगढ़ का रहने वाला हूँ| उसने लम्बी सांस ली और शीशे में दोबारा देखा| मैंने उचित समझा कि बता दूँ कि हिन्दू हूँ|

“हिन्दुओं से डर नहीं लगता सर, सब इंसान हैं|” थोड़ी देर रुका, सर ये गुजरात है, “जिन हिन्दुओं ने बहुत सारे मुसलामानों की जान बचाई थी वो भी सबके सामने मोदी ही बोलते है| बोलना पड़ता है सर| वोट का पता नहीं, अगर दिया तो मोदी को नहीं देंगे और कांग्रेस या और कोई हैं ही नहीं तो देंगे किसे?” अब मेरे चुप रहने की बारी थी|

काफी देर हम लोग चुप रहे, फिर उसने शुरू किया, “सरकार बड़े लोगों की होती है और हम तो बस वोट देते हैं| अगर वोट भी न दें तो ये लोग तो हमें कभी याद न करें| इस देश में वोट बैंक और नोट बैंक दो ही कुछ पकड़ रखते हैं| हम कोशिश कर रहे हैं, वोट बैंक बने रहें| इसलिए वोट देंगे|”

Drive thru

Drive thru (Photo credit: Nataraj Metz)

दिल्ली:

दिल्ली कैंट स्टेशन पर उतरने ऑटो रिक्शा दलाल से मीटर किराये से ऊपर पचास रुपया तय हुआ| ऑटो चालक सिख था| उसने बताया कि ज्यादातर जगहों पर अवैध पार्किंग ठेके है और ये लोग पचास रुपया लेते है| पुलिस इन ठेके वालों से हफ्ता वसूलती है और ये बिना रोकटोक ऑटो खड़ा करने की जगह देते हैं| दिल्ली एअरपोर्ट पर ऑटो के लिए कोई वैध – अवैध पार्किंग नहीं है क्योंकि ऑटो रिक्शा देश की शान के खिलाफ हैं| ऑटो पर विज्ञापन से लेकर पुलिस भ्रष्टाचार तक लम्बी चर्चा हुई| उसने भाजपा और कांग्रेस को सगा भाई बताया| “हिस्सा तय है जी सारे देश में इनका ७० – ३० का|” “कॉमनवेल्थ की समिति में दोनों के लोग थे साहब|” “क्रिकेट का रंडीखाना तो दाउद चलाता है साहब और भाजपा – कांग्रेस के लोग उसमें नोट बटोरने जाते हैं|” उसके मन और जुबान की कडुवाहट बढती रही और मेरे लिए सुनना कठिन हो गया|

अंत में उसने कहा, “साहब हमें नहीं पता कि केजरीवाल कैसा करेगा, क्या करेगा और उसके पास मंत्री बनाने लायक अच्छे समझदार लोग हैं या नहीं; मगर हम उसे वोट देकर जरूर देखेंगे|”

मैं सोचता हूँ, अगर देश की आम जनता के मन में लोकतंत्र की भावना मजबूत हैं, यही अच्छी बात दिखती है| वरना तो लोग हथियार उठाने के लिए भी तैयार ही जाएँ| कहीं पढ़ा था न इन्ही दो चार साल में “शहरी नक्सलाईट”| 

नकली दोस्त


निवेशक जागरूकता श्रंखला ३ 

कहते है खराब या नकली दोस्तों से तो एक अच्छा दुश्मन बेहतर है| साथ ही सच्चाई यह है कि आज बिना मतलब के कोई दोस्ती भी नहीं करता|

सबकी बात ध्यान से सुनें, समझें, मगर अपना दिमाग जरूर लगाएं| अगर बात आपकी समझ के परे है तो उसे समझने की फालतू मेहनत न करें न ही दुसरे की बात पर बिना समझे भरोसा करें|

पुरानी कहावत है जिस गली जाना नहीं उसका रास्ता क्या पूछना|

दूसरी एक बात और है| अगर आधी बात समझ में आ जाये तो वो और खतरनाक होती है| हमें जोश तो पूरा आ जाता है, मगर होता क्या है, नुकसान| महाभारत में अभिमन्यु की कहानी तो सबने सुनी है| चक्रव्यूह की आधी जानकारी थी| जोश में जा पहुंचा चक्रव्यूह में| जान चली गयी| तो भाई किसी ऐसे चक्रव्यूह में अपना हाथ न डालें कि उस से बाहर आन एक रास्ता न पता हो|

हर कोई चक्रव्यूह के अन्दर जाने का रास्ता तो बता देता है, चक्रव्यूह से बाहर आने का नहीं|

कहीं ऐसा न हो कि जिन्दगी भर की जेल जैसा हो जाये; पहुँच तो गए, मगर अब निकलें कैसे|

अगर आपको नहीं पता कि जहां पैसा लगवाया जा रहा है, वहां से पैसा किस तरह से निकलेगा तो पैसा न डालें|

आप कहीं भी पैसा लगाते है तो वो आपके पैसे को अपने घर नहीं रखता, आगे किसी न किसी काम में लगाता है| चाहे वो पोस्ट ऑफिस हो, बैंक ही, बीमा हो, कोई कंपनी हो या और कोई हो| कोई घर से ब्याज नहीं देता, कोई घर से मुनाफा नहीं देता| इसलिए सब ये चाहते हैं कि आप बस पैसा लगा दें, मगर निकालें नहीं|

ये आपका काम है कि सारी जानकारी लें, सब कुछ अच्छे से समझ लें| पैसा लगेगा कैसे और निकलेगा कैसे| आखिर आपका पैसा है|

ये पैसे का मामला है, पैसे का| जब आज की दुनिया में पैसे के लिए भाई भाई नहीं रहता; तो अनजान या कोई दोस्त, रिश्तेदार भाई कैसे बन सकता है|

आपकी कमाई है, आपकी बचत है| दस बार सोचें, कहीं आपका कोई नुकसान न हो जाये| 

दोगुना पैसा


निवेशक जागरूकता श्रंखला २

 

क्या कोई पैसा दुगना कर सकता है? जादू से या किसी और तरह से?

मुझे तो आजतक कोई ऐसा इंसान या भगवान् नहीं मिला|

क्या रामायण में भगवान् राम में अपने लिए जादू से, तंत्र – मंत्र से कंद मूल फल या पैसा पैदा किया? कहते हैं वो तो भगवान् थे, अगर चाहते तो कर सकते थे| मगर उन्होंने नहीं किया| न ही भगवान् कृष्ण ने ऐसा किया| न ही किसी और ने| सृष्टि का नियम है मेहनत कर कर पैसा कमाना| अगर भगवान् भी धरती पर आते हैं तो मेहनत करते है, जैसे सारे इंसान करते हैं|

तो जादू से तो पैसा दुगना नहीं होता|

रही बात साल दो साल में दुगना पैसा कर देने वाले किसी धंधे की| अगर ऐसा कोई धंधा होता तो हम सभी वही धंधा कर रहे होते| दुनिया भर के राजे महाराजे सारा लड़ाई – झगड़ा छोड़ कर उसी धंधे में लग जाते| टाटा बिड़ला भी क्यों इतनी बड़ी मिल – कारखाने लगाते| इतने पढ़े लिखे लोग पागल हैं क्या जो दिन रात मेहनत करते चार पैसे कमाने के लिए|

लोग रोज नई नई स्कीम लेकर आ जाते हैं| इसमें पैसा लगाओ, उसमे लगाओ; घना मुनाफा है| मैं उनसे कहता हूँ; भाई अगर है तो जाओ पहले खुद लगा दो, अपने घर का सारा पैसा लगा लो, पडोसी से और दोस्तों से भी लेकर लगा तो जब अमीर हो जाओ तो आना| तब हम भी इस स्कीम में पैसा लगा देंगे| एक साहब ने कहा, कि ये मौका दुबारा नहीं आएगा; मैंने कहा हर साल कोई न कोई भला आदमी आ जाता है इन मौकों को लेकर; अभी तुम अपना भला करो|

सोचिये; कायदे के एक साल में ज्यादा से ज्यादा कितने कमाए जा सकते है| अगर माने तो एक साल में पैसे दोगुने तो हो सकते हैं, मगर साल भर उस पैसे के साथ मेहनत करने के बाद| जैसे किसी रिक्शा मालिक को लीजिये| एक नया रिक्शा बाजार में ५००० रुपए से भी कम में आ जाता है, अगर रिक्शा मालिक, रिक्शा चालक से ३० रुपए रोज किराया लेता है तो उसे पूरे साल में १०००० रूपये की कमाई होती है| मगर इस सब में किराया बसूलने और सरकारी भाग दौड़ की मेहनत भी करनी होती है, घर बैठ कर पैसे दोगुने नहीं होते| बिना मेहनत के नहीं हो सकते| [1]