उत्तर भारत खोज-चित्रमाला


[पिछले महीने ११ अप्रैल के दिन ख्यातिप्राप्त चिट्ठाकार जिओ पार्किन ने अपने भारत भ्रमण के दौरान बनाये गए रेखाचित्र “North India explorer Sketchbook” प्रकाशित किए| रुचिपूर्ण लगने के कारण उनकी अनुमति के साथ मैं इस आलेख को यहाँ हिंदी में प्रस्तुत कर रहा हूँ, साथ में रेखाचित्र भी उपलब्ध हैं – आनन्द लीजिये, टिप्पणियों का स्वागत है|   

 

हम इस बार गर्मियों की छुट्टियों पर जल्दी ही निकल पड़े, यह गंतव्य ही कुछ ऐसा था कि अजीब सा समय चुनना पड़ा| हम बहुत समय से भारत जाना चाहते थे, परन्तु अगर आपको भीषण मानसूनी बारिश के प्रति विशेष रूचि नहीं है तो अगस्त में दो सप्ताह के लिए भारत जाने की सम्भावना नगण्य है|

 

हमारा यह भ्रमण जाँची – परखी साहसिक यात्रा कंपनी Exploreने आयोजित किया था, जिसने हमें अभी तक निराश नहीं किया है| हमारा १५ दिन का “उत्तर भारत खोज’ यात्रा कार्यक्रम राजधानी दिल्ली से प्रारंभ हुआ और हमने उदयपुर, पुष्कर, जयपुर, आगरा, वाराणसी, और अंत में कोलकाता को यात्रा की|

 

इस यात्रा में ग्रहण करने के लिए काफी चीजें थीं, हमें वापस आये एक सप्ताह हो गया है पर मेरे दिमाग में यह अनुभव अभी तक घूम रहा है| इस तरह की जगह मैंने पहले कभी नहीं देखी, सर्वथा वास्तविक से लेकर उत्कृष्ट अपरिचित और असाधारण छवियाँ लगातार बिना रुके इस सामने आ रहीं हैं कि आप पहले देखी हुई को इतनी जल्दी समझ ही नहीं पाते| यदि आप थोडा भी दृश्यपरक व्यक्ति है तो यह आपके लिए छवियों का विस्फ़ोट है|

 

कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारत छाविकारों के लिए सुनहरा सपना है और मैं अपने मेमोरी कार्ड को भर कर लाया हूँ| मैं अभी भी इनका संपादन कर रहा हूँ, अभी समय लेगा| हमेशा की तरह, मैंने रेखाचित्र पुस्तिका भी साथ रख ली थी –  जब भी मुझे अवसर मिला मैंने इसका प्रयोग किया|

 

हमारे यात्रा की गति काफी तेज थी और ज्यादातर जगह तो बैठ कर कुछ रेखाएं खींचने का भी समय नहीं मिल पाया| फिर भी, इस चक्कर में बहुत यात्रा की – ट्रेन से (तीन – तख्ती ट्रेन सहित, जो कि अपने में खास है), बस, नाव —  और इन सभी मौकों पर मैंने अपने सामने से कुछ न कुछ उकेर लेने का प्रयास किया| साधारणतः, इनमें मेरे साथी यात्री हैं जो किताबों और मोबाइल फ़ोन पर समय बर्बाद कर रहे हैं|

हाँ, भारतीय सड़कें भी ऐसी हैं, कि उन पर यात्रा करते हुए रेखाचित्र बनाना भी किसी रोलर कोस्टर राइड जैसा है न कि किसी आर्ट स्टूडियो जैसा शांत – सुशील माहौल| कोई फर्क नहीं पड़ता – सारे टेढ़े – मेढ़े अपूर्ण और विषय के दुहराव वाले रेखा चित्रों से उन स्तिथियों और माहौल का सही सही पता चल जाता है जिसमें यह बनाये गएँ हैं और एक ही विषय बने रेखाचित्र विभाजित प्रौस्तैन छायाचित्रकारी की तमाम विविधता के बाद भी नहीं लुभाते हैं|

जिन पृष्ठों में मैं आपको खालीपन दिखाई दे वहां मैंने अपने नोट्स मिटाए हैं – आपको उन्हें झेलने की कोई इच्छा नहीं होती – और मैंने स्कैनिंग के बाद फोटोशोप के द्वारा फ्लैट टोन जोड़ दी है|

नमस्ते!

ट्रॉफी, टॉफी और लड़कियाँ


 

लड़कियाँ ट्रोफ़ियां होतीं हैं

शानदार रंगबिरंगी सजावटी|

 

जीत ली जातीं हैं;

प्रेम से, मुहब्बत से,

जंग से, रंग से,

पैसे से, परम्परा से,

जोर से, जमीन से,

चटपटी मीठी बातों से|

 

दांव चढ़ जाती है;

प्रेम की, परंपरा की,

परिवार की, पैसे की,

दान की, दहेज़ की,

मायके की, सुख की,

दुहाई की, दुःख की|

 

सजाई जातीं है;

अगल में, बगल में,

सगाई में, ससुराल में,

बैठक में, बिस्तर में,

चौके में, चूल्हे में,

सजावट में, समारोह में|

 

लडकियाँ टोफियाँ होतीं हैं

शानदार रंगबिरंगी सजावटी|

 

बाँट दी जातीं है;

पुरुषों में, पत्थरों में,

प्रसाद में, पुरुस्कार में,

महलों में, मंदिरों में,

रिश्ते में, नाते में,

कोठिओं में, कोठों में|

 

चूस लीं जातीं हैं;

गंध में, सुगंध में,

रंग में, बिरंग में,

संवाद में, स्वाद में,

प्रकाश में, अंधकार में,

मन में, मंदिर में|

 

लड़कियाँ

ट्रॉफी होतीं है, टॉफी होतीं हैं|

 

लड़कियाँ

नहीं जानतीं जिन्दा होना|

 

लड़कियाँ

जानतीं है लड़कियाँ होना|

 

हर पल मेरी बातें


 

हर पल

मेरी बातें करता|

 

सुबह शाम

मोबाइल मचलता|

 

जागना, सोना, खाना, पीना,

बिन मेरे न जीना|

 

चल दीं, पहुँचीं,

हर जगह पर क्यों होती हो,

बारिश धूप में क्यों रोती हो|

 

चिंता, हर दम हर पल,

नींद उड़ा बैठा है|

 

सुबह छोड़ना दफ्तर तक,

लेने आना रोज,

हरपल उसकी आँखें

करती मुझको खोज|

 

न चिंता खुद के खाने की

न अपने दफ्तर जाने की|

 

कितना ही अच्छा है,

कितना ही भोला है,

कितना प्यार भरा है,

कितना ध्यान धरा है||

 

न पूछो उसकी बातें,

सोचती हूँ,

क्या होगा जब पाऊँगी,

उसने जीवन में सिर्फ प्यार करा है,

मुझको पाने की खातिर,

सोंप सका क्या मुझको,

अपने जीवन की थाती?

 

क्या माता की आशा,

क्या पिता का तप,

क्या भाई के बल,

क्या बहन का स्नेह,

कुछ मान रख पाया है?

 

पढ़ न सके तुम मेरी खातिर,

कर न सके तुम मेरी खातिर,

उन्नति के पथ की बातें?

 

प्रेम की पोथी बांची थी जब,

ज्ञान की पोथी क्यों छोड़ी?

करते थे आने जाने का क्रम,

कर न सके तुम थोड़ा श्रम?

 

मैं प्रेम तुम्हारा हूँ,

जीवन का धिक्कार नहीं,

जो उन्नति को रोके,

वो सच्चा प्यार नहीं||