चिकुनगुनिया की रात


गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

तेरे प्यार की टूटन की तरह टूटता तन बदन,

पोर पोर से दर्द – दर्द से रिसता हुआ गगन,

मेरे अंतर उतरती प्यार की पहली पहली चुभन,

हौले हौले चुभती तेरी साँसों की बहकी पवन|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

तंदूर की तलहटी में भुनता तंदूरी चिकन,

छिटक छिटक जाता चरमराता अंतर्मन,

इश्क़ की कड़ाही के जलते तेल में तलते

आखिरी उम्मीद का चढ़ता इश्क़न बुखार|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

चौपड़ की बिसात पर शकुनि का पासा,

धृतराष्ट्र की धूर्तसभा में विदुर की भाषा,

अंधे भीष्म का जोशीला सांस्कृतिक प्रलाप,

अस्पताल में दम तोडती मरीज की मुनिया|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

विक्रम नायक के लोग


विक्रम नायक से बात करते समय आपको जिन्दगी के किरमिच (canvas)  का वो हिस्सा दिखाई देता है, जिसे आप जिन्दगी भर ‘अर्जुन की आँख’ बनने के फेर में नजरअंदाज कर देते हैं| विक्रम जिन्दगी को कितना करीब से बारीकी से और ‘दोनों आँखों’ से देखते हैं, उसकी बानगी आपको उन रेखाचित्रों में मिल जाएगी जिन्हें तमाम ‘लप्रेकों’ में मूल पाठ से दो कदम आगे या पीछे रचा गया है|

मेरे हाथ में विक्रम नायक की वो पुस्तिका है, जो ‘बिन मांगे मोती मिले’ की तर्ज पर मुझे उपहार में दी थी| मैं आज लेखक, चित्रकार, फिल्मकार, अभिनेता, निर्देशक, और मित्र को भूल कर उस कार्टूनिस्ट की बात करना चाहता हूँ जो इस संग्रह में है|

संग्रह के मुखपृष्ठ पर हाथी देश का नक्शा है, जिसे आँख पर पट्टी बांधे लोग महसूस कर रहे हैं| किताब के अन्दर एक पन्ने पर गाँधीजी की मूर्ति के नीचे एक बच्चा सेब खाने की कोशिश कर रहा है – वही आई-फ़ोन वाला|

‘सेव टाइगर’ के वक्त में ‘सेव फार्मर’ की बात भी हैं| लोग उस अर्थतंत्र को भी देखते है जिसमें आम जनता के दिनभर परिश्रम करने से खास जनता के घर में दौलत आती है| यह वो देश है जिसमें हम सबको हजारों अधिकार हैं, उन अधिकारों को प्राप्त करने के लाखों तरीकें हैं और अधिकारों का हनन करने वाले कर्तव्य का पाठ पढ़ाते मिलते हैं|

मैं एक पन्ने पर रुक गया हूँ, आंकड़ों में एक भूख कम हो गई है, सरकार भुखमरी मिटा रही है न| जी हाँ, एक भूख मर गई है – भुखमरी से|

एक सरकारी नहर हैं, नेताजी को उसमें तैराकी का मन किया तो लव लश्कर के साथ पहुंचे| देखा तो एक चरवाहे की भेड़ें नहर में चर रहीं हैं| अब, जब गाँव में बाढ़  आएगी तभी तो नहर में पानी आएगा न| चरवाहा कुछ ऐसा ही नेताजी को समझाने की कोशिश कर रहा है|

अरे, इस पन्ने पर कुछ कुत्ते बैठे हैं, बीच में रखी हड्डी को लेकर चर्चा हो रही है| जब आम सहमति बन जाएगी तो हड्डी पर कार्यवाही होगी| विक्रम तो नहीं बताते मगर लगता है, इन कुत्तों ने कुछ दिन पहले ‘किसी’ को काट लिया होगा|

अरे याद आया, गांधीजी के तीन बन्दर थे न| वही जो कहीं गायब हो गए थे| अब नया बन्दर आया है, जिसके कानों पर एअर-फ़ोन, आँखों पर चमकीला चश्मा और मूँह में ड्रिंक लगा हुआ है| उसे अब अच्छा दीखता हैं, अच्छा ही सुनाई देता है और अच्छा ही स्वाद आता है|

एक जमाना था जब जनता राशन की लाइन में घंटों खड़ी रहती थी और राशन नहीं मिलता था, अब अच्छे दिन आ गए हैं| जनता अब कुर्सियों पर बैठ कर इन्तजार करती है|

यह सब एक बानगी है, विक्रम नायक के लोगों की|

आरक्षण और कुशलता


आरक्षण के विरोध में सबसे अधिक मजबूत तर्क है कि आरक्षण योग्य लोगों को योग्य लोगों से अधिक तरजीह देता है| हाल में कोलकाता में पुल ढ़हने के बाद भी आरक्षण को सोशल मीडिया में कोसा गया| क्या यह तर्क सत्य है?

आरक्षण का समर्थन या विरोध इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि संसाधन, अवसर या विकास की कमी आरक्षण को जन्म देती है| जब समाज के सभी लोगों में संसाधन नहीं बांटे जा सकें तब उनको किसी न किसी अनुपात में सभी लोगों को मुहैया कराया जाना होता है| अन्यथा ताकतवर तबका कमजोर तबके तक संसाधन नहीं पहुँचने देता| इस से कमजोर तबका या तो हीनता से ग्रस्त पस्त होकर पशु तुल्य हो जाता है या अपनी पूरी ताकत से उठकर संसाधन की लूट में शामिल हो जाता है| आरक्षण या राशनिंग न होने से ताकतवर तबका सफेदपोश तरीकों से सीमित संसाधन पर कब्ज़ा करता है तो कमजोर स्याह तरीकों से|

आरक्षण के बाबजूद मध्यप्रदेश में ताकतवर माने जाने वाले तबकों के बीच भी व्यापम घोटाले जैसे सफेदपोश तरीके सामने आयें हैं तो बहुत से लोग मानते हैं कि नक्सलवाद आदि कमजोर तबके का संसाधन के लिए संघर्ष है| आरक्षण या संसाधन की कमी के कारण उत्पन्न समस्याओं का हल संसाधन की उपलब्धता को सभी प्राकृतिक नियमों के अन्दर रहकर यथा – संभव पूरा करना ही हो सकता है|

आईये मूल प्रश्न पर लौटें| भारत में शिक्षा और रोजगार के अधिकतर क्षेत्रों में गिरावट को आरक्षण से जोड़कर देखा जाता है| भारत में आरक्षण तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा पिछड़े और आती पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिए जाने से पहले काफी कम था और “योग्य” लोगों के बहुमत का सरकार और संस्थानों पर कब्ज़ा था| परन्तु, उस से पहले विकास की दर बहुत कम थी| पिछले बीस सालों में आरक्षित पदों पर आये लोग अब आकर महत्वपूर्ण पदों पर आना शुरू हुए हैं|

मैं इस सन्दर्भ में चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी के पेशेवर क्षेत्रों का उदाहरण दूंगा| यह दोनों व्यवसाय आरक्षण विहीन हैं और आरक्षण के अधिकारी लोग इन व्यवसायों में बहुत कम संख्या में हैं| यह पेशेवर लोग उद्यमों के सही रास्ता दिखाने और गलत कार्य करने से रोकने के लिए तैयार किये जाते हैं| मगर इन व्यवसायों से इनका उपभोक्ता वर्ग संतुष्ट नहीं माना जाता| सरकार, विनियामक संस्थाएं, निवेशक आदि इनके कार्यों को सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की तरह देखते हैं| इन पेशों में लगे पुराने लोग, लगातार गिरते स्तर पर जोर देते हैं, जबकि आरक्षण का इसमें दूर तक कोई हाथ नहीं है|

एक दूसरा सवाल भी है| सभी मानते हैं कि सरकारी विद्यालयों में पढाई और अस्पताल में ईलाज ठीक से नहीं होता| इसके लिए आरक्षित तबके तो दोषी मान कर चला जाता है| मगर उन क्या इन सरकारी विद्यालयों और अस्पतालों में ५०% संख्या “योग्य” गैर आरक्षित लोगों की नहीं होती| वो लोग क्यों काम या कहें अच्छा काम नहीं करते| मेरे विचार से यह सिर्फ सर्वव्यापी मुफ़्तखोरी की समस्या है|

आरक्षण का मुद्दा और मांग करते हुए केवल उन लोगों देखा जाता है, जो न तो आरक्षण ख़त्म होने पर और न ही उनकी जाति को आरक्षण मिलने पर प्रतियोगिता में सफल हो सकते हैं| कर्मठ और योग्य लोग अपने लिए गिनी चुनी सरकारी नौकरियों के बाहर भी रोजगार खोज लेते हैं, शेष सरकारी नौकरी न मिलने का दोष आरक्षण को देते हैं|