शाहजी पकौड़े वाले


कल बहुत दिनों बाद, फिर वो पकौड़ेवाला दिखाई दिया| मैंने उसे काफी इज्ज़त से अपने पास बुलाकर हालचाल पूछा और हालत – ए – हाजिरा पर उसका ख्याल जानना चाहा| कहने लगा, धंधे में पैसा तो कभी भी ज्यादा न था, रुपया कभी इस धंधे में देखा नहीं; मगर कुछ दिन से धंधे में इज्ज़त आ गई है| मैंने कहा, क्या पहले इज्ज़त नहीं थी| बोला, पहले केवल इज्जतदार लोग ही इज्ज़त दिया करते थे या फिर छोटे छोटे बच्चे| आजकल तो गली-कूचे में घूमते आवारा गुंडे मावली भी इज्ज़त देने लगे हैं| कहने लगा कि छठी गली का छुट्टा सांड बजरंगी भैया तो कभी कभी प्यार से बात करते करते पकौड़े बनाने के गुर सीखने लगा है| ख़ुशी से चहककर बोला भैया इस बार स्वतंत्र दिवस पर हम आपको गरम गरम जलेबी खिलाएंगे| मैंने पुछा, क्यों भाई? क्या अगस्त में बिटिया की शादी कर रहे हो| बोला नहीं भैया जी, सुना हैं मोदी सरकार उस दिन पकौड़े बेचने को भारत का राष्ट्रीय रोजगार घोषित कर देंगे| उस दिन से सब डाक्टर इंजीनियर डॉक्टर साइंटिस्ट सब लोग अपनी बेरोजगारी के दिनों में पकौड़े बेचा करेंगे| आप तो भैया, दिल्ली है कोर्ट के बाहर ही पकौड़े बेचना – वकील साहब पकौड़े वाले| और चिंता न करना, आपको गर्म गर्म पकौड़े हम बनवा कर भिजबा देंगे| आखिर इसने सारे लोग जब पकौड़े बेचेंगे तो कोई तो उन्हें पकौड़े बना बना कर सप्लाई करेगा|

अचानक, पुराने दिन याद करने लगा| बोला, जब अपने शहर के सरस्वती शिशु मंदिर में जब पढ़ते थे तो वहां के गुरूजी जलेबी बंटवाते थे गणतंत्र दिवस पर| इसबार गणतंत्र दिवस पर अपने शहर में था तो गुरूजी ढूंढते हुए आ पहुंचे| कहने लगे शाह जी, चलो.. बच्चों के लिए बीस किलो पकौड़े बना दो और पच्चीस किलो का बिल दे दो| मैंने कहा, गुरूजी पकौड़े चाहे पचास किलो बनवा लो मगर बिल की न कहो, एक तो हमको सात साल शिशु मंदिर रहकर नाम लिखना न आया तो बिल बनाने में तो ससुर हमको हाथरस जाकर ग्रेजुएशन करना पड़ेगा| गुरूजी बड़े प्यार से बोले, नालायक कितना कहा कि बात समझा करो| ये लो, बिल तो हम कम्पूटर से बना कर लाये हैं तुम इसपर अपनी चिड़िया मारो|

मैंने कहा, कि इस किस्से से एक फायदा हुआ कि तुम्हारा नाम हमें पता चल गया – शाह जी| कहने लगा… नाम तो अपना घासीलाल फौलादी है सरकार| वो तो आजकल हम सबको कहने लगे हैं कि जब मोदी जी अपने पापा की बनाई चाय लेकर स्टेशन पर चाय गरम चाय गरम चिल्लाते थे तो उनके पीछे पीछे हमारे बड़े भाई ताजा गरम पकौड़े का जोर लगाते घुमा करते थे| इसलिए आजलक लोग हमें अध्यक्ष जी का छोटा भाई समझने लगे हैं|

प्रदूषण का साल


दिल्ली में साल २०१७ प्रदूषण का साल रहा| हर साल बढ़ते प्रदूषण के लिए दिल्ली वाले नई नई दलीलें पेश करते हैं| इस दलीलों का कुल जमा मतलब यह होता है कि प्रदूषण का कारण दूसरे हैं, वो नहीं| इन दलीलों में दिल्ली वाले यह भूल जाते हैं कि प्रदूषण से बीमार पड़ना और मरना उनको है; दूसरों को नहीं|

मुझे साल २००५ में पहली बार बोला गया कि दिल्ली छोड़ कर किसी प्राकृतिक जगह में चले जाओ| मगर बहुत से कारण रहे, यह नहीं हो पाया| उस समय मुझे लाइलाज खाँसी का मरीज बताया गया| खैर, खाँसी का होमियोपैथी में इलाज हुआ और जो थोड़ा बहुत बचा था उसे देशी नुस्खे ने दूर कर दिया| दिल्ली में रहना आजकल एक अग्नि परीक्षा है| आज सुबह रोज इस उम्मीद में मोबाइल पर प्रदूषण का स्तर देखता हूँ कि शायद कम हो, मगर होता नहीं|

दशहरा के साथ जो ठंडक, उत्सव, मौज-मस्ती के जो दिन शुरू होते हैं वो मेरे लिए पस्ती के दिन बनने लगते हैं| नाक ढंकने के लिए कपड़े से लेकर मास्क तक का इंतजाम शुरू होने लगता है| फिर भी कुछ न कुछ चूक होती है| फ़िजाओं में फैला जहर कहीं न कहीं फेफड़ों तक पहुँचता ही है|

पिछले तीन हफ्ते से खाँसी से हाल बुरा रहा| बिना मास्क के घर से निकलने पर गले में खारिश और सीने में जलन होने लगती है| खाँसी से कमर टूट जाती है कई बार| इस दिसंबर में कमर में दर्द रहा| आज भी है| आँखों में जलन तो अब कहने की बात नहीं| यह सब शायद अकेले मुझे होता है| अगर बाकी लोगों को होता तो वो भी आवाज उठाते| अगर वो लोग गूंगे हैं, तो अपने बुढ़ापे तक बहरे और अंधे होने से कोई नहीं रोक सकता|

आप किसी भी राजनीतिक पार्टी से हों, पूछें तो सही पार्टी से क्या कर रहे हो उस देश या राज्य में जहाँ सत्ता में हो| अगर भाजपाई हो तो पूछो कि अगर सारा दोष राज्य का है तो उनकी दिल्ली सरकार बर्खास्त क्यों नहीं हो रही| अगर आप-पार्टी से हैं तो पूछे कि क्या कदम उठे| अगर राजनीति में गधे हो तो पूछो सब सरकारों से कि क्या कर रहे हो? कांग्रेस और कम्युनिस्ट से भी पूछो की सत्ता और विपक्ष में रहकर पर्यावरण पर तुम्हारे सरोकार क्या थे और हैं?

मगर मरने तक हम अपनी अपनी पार्टी को बचायेंगे, अपने अपने त्योहारों की कुरीतियों को बचायेंगे, अपने अपने धंधे के गंद छिपाएंगे| और किसी दिन खांसते खांसते एक गूंगी बहरी मौत मर जायेंगे|

जी तो पा नहीं रहे, आइये मिलकर मरें|

शरणार्थी और भारत


भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|