असफलता


असफलता का अपना एक नशा और मजा होता है| आप या तो किसी गन्दी नाली में पड़े होते हैं या दार्शनिक बन जाते हैं| आपको असफल होने का शौक नहीं होता| आपको पता रहता है, आप की सफलता अभी कितनी फ़ीकी है| कभी रंग तो कभी रंगत में सुधार करने का चाव लगा होता है|

असफलता का सबसे बड़ा फायदा है लोग आप को पागल और झक्की समझते हैं| आप अकेले छोड़ दिए जाते हैं| असफल इंसान जानता है, किस तरह माँ की ममता और बाप का दुलार  अज्ञातवास पर चले जाते हैं| भाभियाँ और बहनें सामने परोसी गई थालियाँ उठा ले जातीं हैं| यह सब वक्त की मार नहीं, प्रेरणा है| भूखे पेट विचार बहुत आते हैं, और संकल्प भी| जितना भूखा पेट, उतनी लम्बी मजबूत जिद – उतना भरोसा| एक ही शर्त – टूटना नहीं है| झुकना और फिर फिर खड़े हो जाना आप सीख जाते हैं| आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बनाकर रखना और शांत रहना – यही परीक्षा है|

खूब सारी असफलता के बाद जब सफलता आती है तो उसकी मस्ती अलग है| वो सारे नाते रिश्तेदार जो आपको पहचानते नहीं थे – उन्हें अचानक सारे रिश्ते याद आ जाते| वो लाड़ दुलार जो कभी देने का सपना भी उन्हें आया होता है उनका भी हिसाब किताब होने लगता है| समझ नहीं आता कि कितना मुस्कराएँ| पर मुस्कराएँ जरूर|

असफलता का एक और फायदा है, हर परिस्तिथि में आप ढलना सीख जाते हैं| कोई भी नई असफलता आपको बेचैन नहीं करती| आप जानते हैं, यह कुछ दिन की बात है| आप संघर्ष कर सकते हैं| लोगों की कुटिल मुस्कान आपको नहीं डराती|
इस नशे से बाहर न आयें| क्योंकि असफलता में कमाया गया नशा आपको सकारात्मक बनाये रखने में मदद देता है| आपको संभाल कर रखता है|

असफलता का नशा आपको सफलता के जहरीले नशे से दूर रखता है|

मनभेद की नीति


कई बार सोचता हूँ, क्या राजनीति तुच्छ बात है? कम से कम इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए| राजनीति का यह नकार हमारे लोकतंत्र की खूबी है| कोई राजनीति पसंद नहीं करता – राजनीतिज्ञ तो बिलकुल ही नहीं| संसद में हल्ला मचा रहता है – राजनीति न करो| राजनीति यानि विचार-विमर्श, शब्द संघर्ष – शास्त्रार्थ|

कैसे तय हो क्या सही है| बिना विचार –विमर्श के| मतदान मुद्दे नहीं तय करता| बिना विमर्श के होने वाला मतदान सिर्फ भाई-भतीजावाद है| विमर्श से भागना भीड़तन्त्र को मजबूत करना है – लोकतंत्र को नहीं| लेकिन बात विमर्श की नहीं ही रही| सड़क का संघर्ष आज विचार को जन-जन तक पहुँचाने का संघर्ष नहीं है, सब जोर-जबरदस्ती का मामला है| हिंसक संघर्ष स्वीकार्य होने लगे हैं और अनशन और प्रदर्शन को कोई नहीं पूछता|

लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि पहले मुद्दा हो, उसपर विचार हो, विमर्श हो उसको जनजन तक पहुँचाने की बात हो और फिर जिसका विचार पसंद आये उसे मत दे दिया जाए| आज पहले नेता चुन जाता है बाद में उसका विचार खोजा जाता है| विचार का भी क्या है, सत्ता के बाहर रहकर जिसका विरोध हो, वही सत्ता में आते ही प्रिय विचार हो जाता है| जब विचार के यह हाल हैं तो विमर्श के लिए अवसर ही कहाँ है?

विचार अगर लोकतंत्र का मूल न हो तब लोकतंत्र का नष्ट होना तय ही है| पहले यह भीड़तंत्र बनेगा और बाद में तंत्रहीनता|

आज भले ही सूचना तकनीकि अपने चरम पर हो मगर हम सूचनाएं हमारे हाथ में नहीं हैं|उनका नियंत्रण कोई और कर रहा है| सूचना बिक रही हैं| असुविधाजनक सूचना उपलब्ध नहीं होती| आप जिस पक्ष को एक बार हल्का सा भी समर्थन देते हैं, आपका सूचना तंत्र आपके पास विरोधी या विपक्षी सूचना नहीं आने देता| भ्रम का मायाजाल बन रहा है| जब तक सूचना के दुसरे पक्ष तक पहुँच नहीं होगी, लोकतंत्र समृद्ध नहीं होगा|

राजनीति में मतभेद होने अच्छी बात है, मनभेद नहीं होने चाहिए| मतभेद के लिए मत होना चाहिए| मनभेद के लिए मन| मन का क्या है, किसी पर भी आ जाता है और बाकि सब शत्रु लगने लगते हैं| बस यही नहीं होना चाहिए|

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

बिंदी तेरे बिन


हर साल हमारे समाचार पत्रों में एक खबर छपती है – इस साल ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी ने फलां फलां भारतीय शब्द को अंग्रेजी में शामिल किया| हम खुश हो जाते हैं| हम अपने शब्द की महानता समझते हैं मगर यह भूल जाते हैं कि उन्हें अपने में शामिल करने वाली जुबान दिल कितना बड़ा होगा| अंग्रेजी की इस तारीफ पर हम असहमत हो सकते हैं मगर अंग्रेजी एक बेहद छोटी छोटी जुबान से दुनिया में सबसे बड़ी जुबान में तब्दील हुई है| साम्राज्यवाद के पतन के बाद भी आज अंग्रेजी लगातार बढ़ रही है|

हर कुछ महीनों में हमारे समाचार – पत्रों में एक और खबर छपती है जिसमें उर्दू का नाम निशान मिटाने की बात होती है| यह जो उर्दू की बात होती है, ये दरअसल फ़ारसी की बात होती है| अगर सही कहे तो उस फ़ारसी की बात होती है, जिसपर अरबी प्रभाव पड़ा है| पुरानी फ़ारसी और संस्कृत एक परिवार की भाषाएँ है, अवेस्ता फ़ारसी और वैदिक संस्कृत के तमाम शब्द एक ही मूल से निकले हैं| यह निष्कासनवाद हिंदी को कमजोर करता है| आज निष्कासनवाद हिंदी की दुखद पहचान बन रहा है|एक वक्त हिंदी-उर्दू से बड़ी भाषाएँ रहीं ब्रज और अवधी को हिंदी वाले आज तिरस्कार और निष्कासन के भाव से देखते हैं वह हास्यास्पद है| हिंदी के इस तिरस्कार से पल-बढ़कर भोजपुरी एक बोली से बढ़कर विकसित भाषा का रूप लेने लगी है| जब भी हिंदी भाषा क्षेत्र की कोई पुरानी या नहीं भाषा या बोली आगे बढती हैं, हिंदी वालों की हिराकत बढ़ने लगती है| जहाँ अंग्रेजी दुनिया भर के शब्दों के साथ अपने को समृद्ध कर रहीं है, हिंदी अपने प्रभाव क्षेत्र में झुइमुई बन रही है|

आम बोलचाल हिंदी और उर्दू में फिलहाल कोई खास फर्क नहीं दिखता , मगर हिंदी से उर्दू या कहिये फ़ारसी शब्दों को निष्काषित करने के मुहिम चल रही है| हिंदी के ऊपर कठोर तत्सम भाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| आज की हिंदी को बिंदी से बड़ी नफ़रत होती है| हालत तो यह हैं कि  क़, ज़, फ़, ख़ की बिंदियाँ ही नहीं ढ़, ङ, ड़, बिंदियाँ भी गायब हो रहीं है| दुःख का विसर्ग कब और कहाँ जा उड़ा, यह तो हिन्दी वाले खुद भी नहीं बता सकते| यह निष्कासन भाषा के विकास के नाम पर हो रहा है| क्या भाषा को छोटा करते जाना उसका विकास है?

होना यह चाहिए था कि हिंदी वाले अपने बड़े बड़े शब्द कोष बनाते| हिंदी शब्द कोशों में ब्रज, अवधी भोजपुरी के सभी कामकाजी शब्द शामिल किये जाते| क्या हिंदी परिवार की सभी भाषाएँ मिलकर हिंदी को बड़ा नहीं कर देतीं|

जो लोग हिंदी में स्नेह शब्द का सही प्रयोग नहीं कर सकते, वो लोग मोहब्बत मिटाने में लगे हैं|