बेवफ़ा


मेरी बेवफ़ा ने मुझे छोड़ा न था, दिल तोड़ा न था|

मेरी जिन्दगी से रूह निकाली न थी|

मेरी जिन्दगी में न जलजले आये, न सूखी आँखों में सैलाब, न बिवाई फटे पाँवों तले धरती फटी|

जिन्दगी यूँ ही सी घिसटती सी थी, नीरस, बंजर, लम्बी ख़ुश्क सड़क बिना मंज़िल चलती चली जाती हो|

उस के बिना कल दो हजार एक सौ सतासीवीं यूं ही सी उदास शाम थी|

कहवाखाने के उस दूर धुंधले कोने में उसका शौहर कड़वे घूँट पीता था|

काँगड़ा की उस कड़क चाय की चुस्की के आख़िरी घूँट पर ख़याल आया|

इश्क़ मेरे दिल से रिस रिस के तेरे हुज़ूर में सज़दे करता है, मिरे महबूब!

मेरे माशूक किस कहर से बचाया था तूने मुझे|

जलियांवाला वाला बाग़


कौन याद करेगा तुम्हे, ऐ मरने वालो| कोई दस पांच बरस तुम्हारा नाम जिएगा| कुछ बीस चालीस बरस तुम्हारी याद आएगी| क्या कोई मंजर होगा कि तुम याद आओगे? याद आओगे किसी तारीख़ की तरह और उस दिन के ढलते सूरज के साथ बीत जाओगे| कोई, शायद कोई, तुम्हारी क़ब्र पर चिराग़ रोशन करेगा, मगर तुम्हे याद कौन करेगा? चिराग़ रोशन करने वाले दुआ से वास्ता रखते हैं, उन्हें तुम्हारे सलाम का क्या काम? तुम्हें भी क्या पता था कि उस शाम तुम ढल जाओगे? वो गुनगुनी शाम तुम्हारी आखिरी शाम होगी|

सौ बरस बीत गए| तुम्हारा कौन नाम लेवा है? तुम लाशों का वो ढेर हो जिस पर राजनीति के अघोरी अपनी साधना करते है| राजनीति की देवी जो बलि मांगती है, उस बलि का पवित्र बकरा तुम हो| तुम्हारा नाम बलि के प्रसाद की तरह टुकड़े टुकड़े बाँट दिया जायगा| ये मुल्क तुम्हारे नाम की बोटियाँ चबाकर तुम्हे याद करेगा|

तुम्हें याद करना एक रस्मी कवायद है| नेता तुम्हारी इन यादों को हर चुनाव में वोट के बदले बेच देगा| खरीदेगा कुछ जज़्बात, कुछ वोट, कुछ कुर्सियाँ और कुछ दिनों की सत्ता|

तुम्हारे नाम पर रोज नई तख्तियां लगेंगी| कुछ इमारतों में तुम्हारे नाम की कुछ इबारतें धूल खाया करेंगी| तुम्हारे नाम की कुछ सड़कों को सरकार अपने जूतों से और सरकारी गाड़ियाँ अपने पहियों से रौंदा करेंगी| तुम्हारे नाम पर नाम वाले पुल अपनी सरकारी रेत के साथ ढह जाया करेंगे, मानों नश्वर संसार का सार उन्हीं में निहित है|

नहीं, मैं रोता नहीं हूँ ओ मरने वाले| मैं हँसता भीं नहीं हूँ ओ जाने वाले| तुम्हारे नाम पर में अपने आंसुओं के कुछ जाम पीता हूँ| मैं तुम्हारी कब्र पर सोना चाहता हूँ| आओ, मुझे अपनी बाहों में ले लो|

मैं सो जाऊं, जब वो तुम्हें पुकारे, तुम्हारे नाम पर शोक गीत गायें, तुम्हारे नाम पर सदका करें| मैं सो जाऊं जब तुम उठो और बेचैनी से अपनी कब्र के ऊपर बैठ कर रोने लगो| मैं सो जाऊं जब तुम्हारा नाम झूठी जुबान पर आये| मैं सो जाऊं जब मैं तुम्हारी कब्र पर झूठा चिराग़ रोशन करूँ|

मैं सो जाऊं जब बैसाखी आये|

चुनावी खच्चर


चुनावी खच्चर वह निरुद्देश्य निष्क्रिय प्राणी है जिसके होने न होने से चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ता और वह चुनाव से बहुत कुछ प्राप्त करने की आशा करने से निराश रहता है| यह प्रायः मध्यवर्गीय मानसिकता से त्रस्त आयकरदाता होता है जिसके अनुसार देश का सारा सरकारी काम खासकर कर्ज माफ़ी और घोटाला उस के आयकर पैसे से चलता है| इसे प्रायः बिना बिल का सामान खरीदने की जुगाड़ करते, अनावश्यक रूप से रिश्वत देते, जुगाड़ भिड़ा कर मंहगे विद्यालयों में बच्चों का दाखिला कराने के बाद उन्हें लठ्ठ मार मार कर कोचिंग क्लास जाने के लिए विवश करते देखा जा सकता है| यह सड़क किनारे मूतते हुए नारा लगाता है – इस देश का कुछ नहीं हो सकता| अपनी बहन बेटी की सहेलियों के संग अश्लील हरकतें करने या करने के हसीन सपने देखते हुए यह अपनी माँ बहन की इज्जत बचाने की आशा में उन्हें ताले में बंद करने कोशिश करता है|

चुनावी खच्चर दुनिया भर की बड़ी बड़ी बातें बनाने के बाद, चाय और पान तम्बाकू की दुकान और अपने दफ़्तर की कोफी मशीन के किनारे पर खड़ा होकर घंटो बेमतलब बहस करने के बाद बड़े लीचड़ तरीके से घोषणा करता है – सब एक जैसे हैं, मैं तो इसलिए वोट डालने नहीं जाता|

चुनावी खच्चरों की तादाद देश की आबादी में लगभग तीस से चालीस फ़ीसदी मानी जाती है| हर चुनाव में मतदान केंद्र से अनुपस्तिथ रहे लोगों ने इनकी संख्या ९५ प्रतिशत तक होती है| चुनाव के दिन आसपास के इलाकों में तफ़रीह पर चले जाना पक्के चुनावी खच्चरों का विशिष्ठ लक्षण माना जाता है| हाँ, यह सामाजिक माध्यमों पर करें मतदान – देश महान जैसे नारे जरूर प्रेषित कर देता है| इन्हें चुनावी क़ानून के नाम पर सिंगापुर की याद आती रहती है कि वहां मतदान न करने पर सजा मिल सकती हैं|

चुनावी खच्चर को देशप्रेम से प्रेम होता है| चुनावी खच्चरों की औलादें अक्सर आस्ट्रेलिया कनाडा आदि देशों की वीज़ा कतारों में खड़े होकर और बाद में उन देशों में भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाकर देशप्रेम का अनूठा परिचय देते हैं| यहूदियों का देश इस्रायल इनका स्वर्ग और यहूदियों का दुश्मन हिटलर इन के बहुमत का इष्टदेव माना जाता हैं|

चुनावी खच्चर को कभी पता नहीं होता कि वह और उसके जैसे दूसरे चुनावी खच्चर अगर किसी ईमानदार निर्दलीय उम्मीदवार को अपना मत दे दें तो वह ईमानदार कर्मठ आदमी देश के काम आ सके|

चुनावी खच्चर खुद भी चुनाव नहीं लड़ता – उसे पता है उसके साथ के दूसरे चुनावी खच्चर उसे अपना मत नहीं देंगे|

चुनावी खच्चर को विशवास रहता है कि उसका मालिक, अधिकारी, शिक्षक, और बाप गधा है और अक्सर किसी असली गधे यानि बाहुबली, धर्मगुरु, फिल्म अभिनेता को यह अपना असली घोड़ा मान लेता है|