हिन्दुस्तानी शादी में फूफा होना


हिन्दुस्तानी शादी में फूफ़ा हो जाना एक मुहावरा बन चुका है| फूफ़ा होना कई मायनों में महत्वपूर्ण होता है| फूफ़ा होने का मुहावरेदार अर्थ है कि यह व्यक्ति रायता फैलाएगा ही फैलाएगा|

फूफ़ा परिवार का भूतपूर्व दामाद होता है – जी हाँ, यह अर्ध सत्य है परन्तु सत्य के थोड़ा अधिक करीब है| शादी में किसी नए दामाद का पर्दापरण होना लगभग तय हो चुका होता है| पुराने दामाद की कुर्सी खिसकने लगती है| (अगर लड़के की शादी हो तब भी फूफ़ा के सिंहासन में कम्पन तो आते ही हैं|) यह पुराना दामाद अब न चाहते समझते हुए भी फूफ़ा की शक्ल में फूफा ससुर में बदलने लगता है| मगर पुरानी आदतें एक पल में तो नहीं बदलतीं| जिसे दामाद-देवता की तरह पूजा गया हो उसे अचानक अर्धदेवता बनना होता है| फूफा के मन में पददलित हो जाने का भाव उत्पन्न होता है|

साथ ही फूफा जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती है| अर्धदेवता को ससुराल रुपी मंदिर के एक सुनसान कोने में एक पवित्र स्थान के साथ जिम्मेदारियां भी पकड़ा दी जातीं है| खर्चबरदार के रूप में उसे खजांची बना दिया जाता है| धन-दौलत की पोटली बांधे फूफा ससुराल में पहली बार वो जिम्म्मेदारी निभाता है जिस में उसे सलाह देने का भी अधिकार न हो| फूफा की उम्मीद के के विपरीत उसके साले उसे बस हुक्म देते हैं – पंडितजी को इतना दीजिये, हलवाई को इतना देना है, माली को अभी तक क्यों नहीं दिया| हुक्म देने वाला हुक्म की तामील करने लगता है|

हिन्दुस्तानी दामाद कोई मजाक तो होता नहीं है| उसके गाल स्वभावतः फूले हैं – दामाद के रूप में गर्व ख़ुशी और अधिकार भाव से| उसके गाल फूफा बनने के बाद भी फूले रहते हैं – मगर ससुराल को लगता है – फूफा जी फूल गए हैं| फूफा के फूलने और फूलकर फटने का इन्तजार हिन्दुस्तानी शादी में सारी ससुराल क्या खुद फूफा की औलादें भी करतीं हैं| फूफा की औलादों को इंतजार रहता है कि कब फूफा फूलें और वो रायता फैलाएं, फूफी को फुला कर हवेली के उस पुराने कमरे में कमरें को कोप बनाने भेजें जहाँ फूफी बचपन में कभी रहा करतीं थीं|

फूफा ग्राम देवता की तरह निश्छल होते हैं- अधिकतर पत्रं-पुष्पम् में मान जाते हैं| कभी कभार उन्हें काल-भैरव का प्रसाद चढ़ाना होता है तो का बार उनका लक्ष्मीपूजन करना पड़ता है| असली फूफा मगर वह है जो पत्रं-पुष्पं, लक्ष्मीपूजन के बाद भी काल भैरव का अंश-अवतार बना रहे| ऐसा फूफा अक्सर फूफी का उचित सम्मान आदि प्राप्त कर अपने बुढ़ापे को सुखद बनाता है| यह फूफा अक्सर नये दामाद को अपना चेला बनाने में कामयाब रहते हैं| दरअसल फूफा बनना भारतीय रिश्ते-नाते से अधिक गुरु-शिष्य परंपरा का अंग है| आएं नष्ट होती इस परंपरा का सम्मान करें|

तीन घंटा बनाम मेरी मर्जी


फिल्म और टेलिविज़न कम या कहें कि नहीं देखने की आदत का मेरे जीवन में बड़ा योगदान रहा है| मगर ऐसा भी तो नहीं है कि मुझे दृश्य साहित्य पसंद नहीं है| टेलिविज़न का नारदीय रूप यानि देशी समाचार चैनल कभी पसंद नहीं आये| परन्तु शुद्ध दूरदर्शन के शुद्ध ज़माने में वृत्तचित्र देख लेता था| वर्ना रेडियो कहीं बेहतर उपाय है| कहीं भी बैठ उठ कर सुन लिया| बीबीसी, दुयुचे वैले, वॉयस ऑव अमेरिका से लेकर रेडियो पाकिस्तान तक दुनिया भर के दोनों तीनों पक्ष से समाचार सुन लिए जाते थे| टेलीविज़न समाचार में नाटकीयता अधिक और गंभीरता कम है|

दृश्य साहित्य के तौर पर मैं कभी कुछेक टेलिविज़न नाटकों और गिने चुने सीरियल से आगे नहीं बढ़ पाया| फिल्मों का हाल यह कि तीन घंटे बैठना हमेशा भारी पड़ता था| मैं टिक कर नहीं बैठ सकता| हर आधा घंटे के भीतर अन्दर का ऊदबिलाब ऊलने लगता है| कोई फिल्म टीवी पर दो-तीन बार आ गई या किसी वजह से लेटे पड़े हैं तो साल दो साल में फिल्म पूरी हो गई| हॉल में फिल्म देखने का यह हाल रहा कि सिनेमा हॉल में देखी गई फिल्मों की संख्या अभी तक दर्जन नहीं पकड़ती| लगता है घुट कर मर जाऊँगा इस कैद में|

फिर सूचना क्रांति हुई| आपको कभी भी फ़िल्म रोकने चलाने की सुविधा हो गई| जब जिनता मन आये देख लो| मगर उसमें भी कई हाल में आपका मोबाइल आपके समय और आपकी जगह पर फ़िल्म सीरियल और समूचा दृश्य साहित्य उपलब्ध कराने लगा है| कई बार एक दृश्य देख कर रुके और ढेर सारा मनन चिन्तन और विश्लेषण कर लिया| मन हुआ तो प्यारी सी दोस्ताना किताब की तरह लगे रहे|

जिस प्रकार अच्छी किताब यह करती है कि वह कब तक आपको पढ़वाती जाएगी, ये फ़िल्में और सीरियल भी खुद तय करते हैं| मगर आपको कैद में नहीं बंधना पड़ता|

फिर भी मैं किताबों को पसंद करता हूँ, भले ही वह किन्दल, मोबाइल या लेपटॉप पर क्यों न हो| किताबें आपसे अधिक बात करती हैं और आपकी समझ को खुला वितान देतीं हैं| दृश्य माध्यम में आप शांत निर्लिप्त प्रेक्षक होते हैं जिन्हें निर्देशक और अभिनेता की निगाह से दुनिया देखनी होती है|

सुना है, कुछ इंटरैक्टिव कहानियों पर काम हो रहा हैं| परन्तु… शरद पूणिमा की पीली गुलाबी सी बेलाई ठंडक को निर्देशक की निगाह से समझने की जो मजबूरी इन माध्यम में है वह किताब में नहीं है|

फिर भी जो है, स्वागत योग्य है|

अच्छी फिल्मों और सीरियल के बाद उनकी मूल कहानी पढ़ी जाए तो नए सोपान अब भी खुलते हैं और शायद आगे भी खुलते रहेंगे|

बेरोजगारी – निजी समस्या


“आजकल क्या कर रहे हो?” जब भी रिश्तेदार यह सवाल पूछते हैं तो भारत का हर जवान जानता है कि वांछित उत्तर है – “बेरोजगार हूँ” और देय उत्तर है – “तैयारी कर रहा हूँ”| वास्तव में देश में कोई बेरोजगार नहीं है – नालायक, अच्छा  निकल गया, प्रतियोगी, प्रतिभागी, हतोत्साहित, कुछ तो करना ही है, कुछ तो कर ही रहे हैं, और आत्महत्यारे|

हमारी मानसिकता ही ऐसे बनी हुई है – कोई शिक्षक नहीं पढ़ता, खुद पढ़ना होता है|कोई नौकरी नहीं देता – खुद ढूंढनी पड़ती है| कोई रोजगार नहीं देगा, खुद अपने लिए रोजगार पैदा करो|

रोजगार की अर्थशास्त्रीय परिभाषा से भी हमें कुछ नहीं करना| हमारे यहाँ गड्ढा खोदता लंगड़ा लूला और नाला साफ करता हुआ स्नातक अभियंता रोजगार में ही माने जाते हैं| जबकि यह साफ़ है कि पहला उदहारण सामाजिक शोषण है और दूसरा बेरोजगारी या छद्म रोजगार| बेरोजगारी की सामाजिक स्वीकृति पढ़ना शुरू करते ही शुरू हो जाती है|

शिक्षा का बुरा हाल, शिक्षक और विद्यालयों से अधिक हमारे अभिभावकों के कारण है| दस अभिभावक विद्यालय या शिक्षक से जाकर नहीं भिड़ते की पढ़ाते क्यों नहीं|स्कूल से तो हमें हमें केवल पढ़े होने का ठप्पा चाहिए| विद्यलय में हम बच्चे के लिए वातानुकूलन, आदि सुविधाएँ देखते हैं| पढाई के स्तर जानने के लिए उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या /प्रतिशत और स्नातक होने पर पहली नौकरी देखते हैं| हम निजी विद्यालय जाना पसंद करते हैं मगर यह नहीं देखते कि उनके पास कैसा पुस्तकालय है, कैसी प्रयोगशाला है| यह निजी विद्यालय भी विद्यार्थियों को वाणिज्य और कला आदि विषय लेने ले लिए प्रेरित करते हैं| उदहारण के लिए निजी विद्यालयों में विज्ञान विषयों का घटता स्तर देख सकते हैं| यही बात निजी महाविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों के बारे में है| उसके बाद भी हम निजी कोचिंग में रटने का अभ्यास और महत्वपूर्ण प्रश्नों का तोतारटंत करते हैं| मगर जिन समाचारतन्त्र  में बिहार के प्रथम आये छात्रों का ज्ञान टटोला जाता है, वह निजी क्षेत्र के विद्यालयों पर तफ्सीश करने की हिम्मत भी नहीं करते| निजी विद्यालयों में शिक्षक अभिभावक बैठकों में अभिभावक मात्र उपदेश सुनने जाता है या अधिक हिम्मत करने पर उसे मात्र आश्वासन मिलता है| मगर सरकारी शिक्षकों पर लानत भेजने वाले हम निजी विद्यालय के अधपढ़ शिक्षक से प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|

यहाँ से ही बेरोजगारी की स्वीकृति शुरू हो जाती है| हमारा बच्चा नालायक है, क्या पढ़ना है यह तय नहीं कर पाता और हमें इसे पैसा फैंक और दो लट्ठ मार कर किसी भी लायक बनाना है|

यहाँ से प्रतियोगिता और साक्षात्कार की तैयारी का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है| सरकारी नौकरियां अस्वीकार्य तर्कों के साथ कम की जा रहीं है, मगर हम राजकोषीय घाटे के घटिया बहाने से बहला दिए गए हैं| क्या सरकार बिना संसाधन – मानव संसाधन के काम कर पायेगी| लगभग हर सरकारी विभाग कर्मचारियों की कमी का शिकार है| अधिकतर विभाग अनुबंध यानि गुलामीपत्र यानि संविदा पर अप्रशिक्षित कर्मचारी भर्ती कर रहे हैं| सरकार को अपने सचिव तक बाहर से अनुबंध पर लाने पड़ रहे हैं| मगर अगर सरकारी नौकरियां कम नहीं होंगी तो निजी क्षेत्र के सस्ती सेवा में कौन जाएगा| ध्यान दें कि जब सरकारी नौकरियां थीं तब लोग दोगुने वेतन में भी निजी क्षेत्र में नौकरी करने से कतराते थे| जब सरकारी नौकरियां नहीं है तो आरक्षण तो खैर बेमानी नाटकबाजी ही है|आरक्षण के समर्थन में मूर्ख और विरोध में महामूर्ख ही बात कर सकते हैं|

इस सब के बाद हमारे पास तर्क होता है कि क्या नौकरियां पेड़ पर उग रहीं हैं?  हमारे छात्र पढाई पूरी करने के बाद या तो घर पर बैठ कर तैयारी का प्रपंच करते हैं या फिर अपनी लिखित योग्यता से कमतर कोई भी रोजगार पकड़ लेते हैं| किसी शिकायत का न होना यह स्पष्ट करता है कि उन्हें पता है कि उनके कागज़ की असली कीमत क्या है|

कुछ समय पहले मैं एक कंपनी के लिए साक्षात्कार ले रहा था| मानव संसाधन विभाग की तरफ से सीधा संकेत था कि सरकारी डिप्लोमा होल्डर को निजी विद्यालय के स्नातक अभियंता से अधिक तरजीह देनी है| उनके तर्क साधारण थे| लाटसाहब ने पैसा फैंक कर कागज खरीदा है| यह बात हर अभिभावक और प्रतिभागी जानता है| किसी स्नातक ने अपने से कम पढ़े व्यक्ति के आधीन काम करने से मना नहीं किया|वह अनुभव और वास्तविक ज्ञान को समझते थे|

पिछले तीस वर्ष में सरकारें जनता को यह समझा पाने में कामयाब रहीं है कि शिक्षा और रोजगार सरकारी “खैरात” नहीं हैं, यह आपका निजी प्रश्न है|हमारे सरकारों के पास कोई नक्शा नहीं कि यह बता सकें कि अगले तीन पांच साल में कौन से और कितने रोजगार मिलने की सम्भावना हो सकती है| क्या पढाई की जाये, क्या नहीं? दूसरा इस जनसंख्या बहुल देश में भी हमने अपने कर्मचारियों को बारह घंटे काम करने की प्रेरणा दी है, जबकि अगर सब लोग केवल आठ घंटे काम करें तो डेढ़ गुना लोगों को रोजगार मिल जाये| संविदा आदि के चलते कर्मचारियों की गुणवत्ता घटी है| यह सब छद्म रोजगार और आधुनिक गुलामी या बंधुआ मजदूरी है|

देश में कश्मीरी पंडितों के पलायन से भी अधिक भयाभय तरीके से रोजगार सम्बन्धी पलायन हो रहा है| किसी भी योग्य युवा को अपने घर के आसपास उचित रोजगार अवसर नहीं मिल रहे| दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगर पलायन से भरे पड़े हैं| सब जानते हैं कि असंतुलित विकास इस रोजगारी पलायन का कारण है| मगर न हम विकास पर प्रश्न उठा रहे हैं, न बेरोजगारी पर| विकास के नाम पर दो चार चिकनी सड़के हमारा दिल खुश कर देतीं हैं| हम पलायन कर रहे हैं, विस्थापित हो रहे हैं, हम पढ़ लिख कर अग्रीमेंट मजदूर बन रहे हैं जैसे कभी अनपढ़ गिरमिटिया मजदूर बनते थे|(अग्रीमेंट और गिरमिट एक ही अंग्रेजी शब्द के रूप हैं)

कोई प्रश्न नहीं है| प्रश्न तब ही नहीं था जब सत्तर साल पहले आरक्षण घोषित करते हुए सरकार ने ऐलान किया था कि सबको रोजगार नहीं हो पायेगा| प्रश्न तब भी नहीं है जब बेरोजगारी की सबसे भयाभय स्तिथि की सरकारी सूचना आती है| प्रश्न तब भी नहीं जब बेरोजगारी की बढ़ती संख्या देखकर सरकार पकौड़े तलने की सलाह देने लगती है

आखिर हतोत्साहित, शिकायतहीन और सस्ता मजदूर किस मालिक को अच्छा नहीं लगता – मालिक सरकार हो या बनिया|

कृपया, इस पोस्ट पर सकारात्मक आलोचना करें – नकारात्मक आलोचना हमें सुधरने पर विवश कर सकती है|