उलूक उत्सव


 

इस बार का उलूक उत्सव बहुत लम्बा चलेगा| पृथ्वी पर इस तरह के सबसे बड़े समारोह की घोषणा हाल ही में हो गयी| अनोपचारिक रूप से यह उत्सव पिछले दो साल से चल रहा है|

जनता को उल्लू बनाने का यह उत्सव पूरे जोर पर आ गया है| इस उत्सव को, कहते हैं प्राचीन भारत में भी कई स्थानों पर मनाया जाता था| परन्तु हाल में इस उत्सव की शुरुआत समस्त विश्व को उल्लू बना चुके बरतानिया में हुई| उसके बाद इस उत्सव को मनाने का प्रचलन चल पड़ा है| इस उत्सव को न मनाने वालों को असभ्य गंवार जंगली माना जाता है और उन के ऊपर अक्ल के बम्ब गिराए हा सकते हैं| ये बात अलग है कि दुनिया में ऐसे ऐसे मूर्ख भरे पड़े हैं कि अक्ल के आधुनिक बम्ब से भी वो मर जाते हैं पर अक्ल आती नहीं| अफगानिस्तान, लीबिया, मिस्र, इराक़ ऐसे ही भोंदू बक्से हैं|

खैर, हमारे पुरखे उतने बड़े वाले ढक्कन नहीं थे, इसलिए उन्होंने बाकायदा अपनी वसीयत लिख छोड़ी है; हमें कम से कम हर पांच साल बाद ये उत्सव, जश्न जलसा जलूस मनाना होता है| इस तरह से छोटे मोटे उत्सव हमारे देश में कहीं न कहीं चलते रहते हैं|

इस उत्सव में दो कुछ समझदार लोग बाकी बचे लोगों को उल्लू बनाते हैं| बाकायदा उल्लू पत्र छापे जाते हैं; जगह जगह उल्लू सभाएं होती हैं| इस सभाओं को समय अनुसार रंगा सियार सभा, गीदड़ भबकी सभा, मगरमछी आंसू सभा, लोमड़ी चाल सभा, कुत्ता पूँछ सभा भी कहा जाता हैं| कई बार लोगों लो इन सभाओं में आने, बुलाने और बहलाने के लिए पैसे, खाना, शराब, कबाब और शबाब का इंतजाम किया जाता है| कई बार इन लोगों इस मनोरंजन में आने ले लिए टिकट भी खरीदना पड़ता है जिसका पैसा बड़ा मालिक पहले से बाँट दिया करता है|

कुछ लोग तो पैदायशी उल्लू होते है, उन्हें कार्यकर्ता कहा जाता है| जो लोग अपनी मर्जी से उल्लू बनते है उन्हें वालेंटियर कहा जाता है| इन लोगों के ऊपर सबसे ज्यादा लफड़ा रहता है| इन्हें लाठी, कुर्सी, चाकू, छुरा चलाने का भी काम रहता है| जब यह अस्पताल जाते है तो इनके घर वाले दिवाली मानते है और मर जाते है तो दीवाला| शहीदों में इनका नाम विश्वयुद्ध में मरने खपने वालों से भी ऊपर लिखा जाता है और बाद में मिटा दिया जाता है|

जो सबसे ज्यादा लोगों को उल्लू बनता है, उसको इस बात का हक़ मिलता है कि अपने इलाके के हर जाहिल गंवार जंगली के ऊपर राज करे| इन लोगों की मेहनत ऐसे ही खत्म नहीं होती बल्कि पांच साल तक देश का बेड़ा गर्क करने में इनका जूता भी दर्द कर जाता है|

आप उनके जूते की चिंता न करें| वर्ना वो आपकी चमड़ी उधार मांग ले जायेंगे|

 

वैश्या का बलात्कार


 

किसी भी पीडिता स्त्री को वैश्या साबित किया जाना, भारतीय न्यायालयों में बलात्कार के आरोप के बचाव के रूप में देखा जाता है| प्रायः स्त्री को चिकित्सकीय जाँच में यह बताया जाता है कि “यह आदतन” है| परन्तु, विवाहिता स्त्री अथवा लम्बे समय से शोषण का शिकार रही स्त्री को यह जाँच क्या बताती है? मैं दो प्रश्नों पर विचार का आग्रह करूँगा|

लेकिन क्या किसी वैश्या से “जबरन यौन सम्बन्ध” बनाना अपराध नहीं हैं? किसी भी वैश्या की सहमति लेना शायद समाज में सबसे आसान होता होगा; परन्तु जो पुरुष यह आसान सी सहमति भी नहीं ले सकते…|

मेरे विचार से यदि किसी भी स्त्री को वैश्या साबित किया जाता है तो आरोपी पर बलात्कार के साथ साथ धन वसूली का मुकदमा भी चलना| उसे साबित करना चाहिए कि उसने धन दिया था और पैसे लेने के बाद भी यह वैश्या पूर्व सहमति से मुकर गई|

मेरी पूरी सहानुभूति उस समाज के साथ है जो उस पुरुष को हेय दृष्टि से नहीं देखता जिसका पुरुषार्थ इतना भी नहीं है कि वह एक वैश्या की सहमति भी हासिल कर सके|

जिस समाज में वैश्या भी अपने को असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस करतीं हैं उस समाज में एक घरेलू स्त्री का तो घर से बाहर निकलना ही बहुत असुरक्षित है| क्योंकि वैश्याएँ जितने अच्छे से पुरुष वासना को समझती है उतना और कौन समझता होगा|

समाज को सुरक्षित बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अंग्रेजों द्वारा लादे गए धर्म और क़ानून को छोड़ें और उस पुराने भारतीय समाज की और लौटें जहाँ वेश्याओं का भी सम्मान और सुरक्षा थी| निश्चित रूप से यौनकर्म का सुरक्षित, नियंत्रित, और नियमित होना सुरक्षित होना, सारे समाज में सुरक्षा का मानदंड है|

 

 

 

सहमति और अपराध


पिछले एक वर्ष में हमारे देश में सामाजिक सुरक्षा परिदृश्य में जिस शब्द की सबसे अधिक कमी खली वह है: “सहमति”|

वर्ष के प्रारंभ में बलात्कार के सन्दर्भ में सहमति शब्द की कमी दिखाई दी और अंत में “समलैंगिक संबंधों” के सन्दर्भ में|

कानूनी दावपेंच के बाहर, बलात्कार की परिभाषा बहुत ही सरल है|

किसी एक व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के साथ उसकी सहमति के बिना यौन सम्बन्ध बनाना बलात्कार है|

किसी एक व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के साथ उसकी सहमति के बिना यौन सम्बन्धी आचरण या व्यवहार करना यौन शोषण है|

हमारा भारतीय पुरुषसत्तात्मक समाज, स्त्री की सहमति को आवश्यक नहीं मानता| स्त्री की “न में भी हाँ”, “सदा समर्पण”, और “सतीत्व की शक्ति” जैसे अवास्तविक मुहावरे गढ़ लिए गए हैं| दुर्भाग्य से हम विवाह संबंधों में भी सहमति की जबरन कल्पना कर रहे हैं, भले ही पत्नी बीमार, परेशां अथवा थकी हुई हो|

एक और मुहावरे का गलत प्रयोग किया जाता है: “ताली एक हाथ से नहीं बजती”| मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ मगर मेरी समझ से पूरा मुहवरा यह है:

“ताली एक हाथ से नहीं बजती, एक हाथ से धक्का लगता है”

“सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” में बारे में एक बात और है| हम लोग बलात्कार को तो आज तक पूरी तरह से रोक नहीं पाए हैं और विश्वभर में होने वालें “सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” के अनैतिक होने का ढोल पीटने से नहीं थकते हैं| स्वयम हमारे देश में “सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” और “सहमति पूर्ण वैवाहिक संबंधो” को पूरी मान्यता नहीं है| ऐसा कहते हुए मैं बहुत सारे संबंधों की बात करता हूँ: अंतरजातीय प्रेम विवाह, सजातीय सगोत्र विवाह, अंतर्धार्मिक विवाह|

उसी प्रकार से ‘समलैंगिक यौन संबंधों” की भी बात है| सभी इस बात से सहमत हैं कि किसी भी प्रकार का यौन सम्बन्ध जबरन नहीं होना चाहिए| परन्तु सहमतिपूर्ण समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध ठहराने की विक्टोरियन सोच मेरी समझ से बाहर है|