कार्ड भुगतान का खर्च


विमुद्रीकरण के बाद जन सामान्य को नगद भुगतान न करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| पुरानी दिल्ली की एक दुकान पर भुगतान करने के लिए जब हमारे मित्र ने भुगतान करने के डेबिट कार्ड निकला तब दुकानदार ने कहा, साढ़े छः प्रतिशत अतिरिक्त देना होगा| ध्यान रहे मॉल में भुगतान करते समय इस प्रकार का अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता| आइये, मुद्दे की पड़ताल करते हैं|

पुरानी दिल्ली के दूकानदार प्रायः कम सकल लाभ (gross profit) पर सामान बेचते हैं| उनके द्वारा कमाया जाने वाला सकल लाभ मॉल वालों के सकल लाभ से बहुत कम होता है| कम सकल लाभ कमाने के कारण, इनके पास अतिरिक्त खर्चों की गुंजायश बहुत कम होती है| इस लिए हर अतिरिक्त खर्चे को टाला जाता है| नगद भुगतान लेने के बाद यह लोग अपने  सारे खर्च नगद में करते हैं, घर में ले जाये जाने वाला शुद्ध लाभ भी नगद होता है और बैंक में केवल घरेलू बचत ही जमा की जाती है| इस प्रकार इन्हें नगदी प्रबंधन में समय और पैसा नहीं खर्च करना पड़ता|

जब किसी व्यापार प्रणाली को कार्ड से भुगतान लेना होता है तब उसे एक महंगी सुविधा अपने साथ जोड़नी होती है| इसमें कार्ड प्रदाता कंपनी, भुगतान प्रक्रिया कंपनी, इन्टरनेट सेवा कंपनी, बैंकिंग कंपनी सब उस व्यापार प्रक्रिया में जुड़ते हैं| अतिरिक्त खर्चे इस प्रकार हैं –

  • कार्ड धारक का वार्षिक शुल्क,
  • गेटवे चार्जेज – प्रायः कार्ड रीडर मशीन, उनका प्रबंधन, और बैंक आदि से मशीन का संपर्क एक महँगी प्रक्रिया है| कोई न कोई इस कीमत को अदा करता हैं और बाद में ग्राहक से वसूलता है|
  • हर भुगतान पर शुल्क – जो डेबिट कार्ड के मामले में आधा से डेढ़ प्रतिशत और क्रेडिट कार्ड के मामले में डेढ़ से तीन प्रतिशत तक होता है| सरकारी भुगतान जैसे स्टाम्प ड्यूटी, सरकार समर्थित सेवा जैसे रेलवे आरक्षण, आदि के मामले में भुगतान करने वाला इस कीमत को अदा करता है, जबकि मॉल आदि अपने लाभ में से इसे भुगतते हैं| ध्यान रहे कि मॉल के बड़े दुकानदारों के लिए नगदी का प्रबंधन भी उतना ही महंगा होता है| भुगतान प्रक्रिया भुगतान कर्ता, कंपनी कार्ड कंपनी, भुगतानकर्ता के बैंक, विक्रेता के बैंक और विक्रेता, आदि को जोड़ती है| इसका खर्च दूकानदार को, या कहें कि ग्राहक को ही देना होता है|
  • दोनों बैंक अपने अपने ग्राहक से बैंक चार्ज के नाम पर वसूली करतीं हैं| डेबिट कार्ड के मामले में यह चार्ज सीधे ही वसूला जा सकता है| क्रेडिट कार्ड के मामले में अगर आप समय पर पैसा नहीं दे पाते तो कंपनी को लाभ होता है| इस प्रकार की उधारी पर कंपनी 24 से 48 प्रतिशत तक बार्षिक ब्याज़ वसूलती है| इस प्रकार के लापरवाह ग्राहक कंपनी के लिए कीमती होते हैं, न कि समय पर पैसा लौटाने वाले|
  • इन सभी सेवा प्रदाताओं को संपर्क में लेन के लिए इन्टरनेट सेवा का प्रयोग होता है|

आपको ऐसे दुकानदार भी मिलेंगे जिनके पास कार्ड रीडर मशीन बंद पड़ी होंगी| कई बार छोटे दुकानदार डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड के इस प्रबंधन को अपने निकट के बड़े दुकानदार की मदद से अंजाम (आउटसोर्सिंग) देते हैं| यह बड़ा दुकानदार इस सुविधा के लिए कुछ रकम चार्ज करता है| यह चार्ज सामान्य चार्ज से लगभग ढाई – तीन गुना होता है| इसमें बड़े दुकानदार के सारे खर्चे और लाभ शामिल होते हैं| मूल रकम बड़े दुकानदार को सेवा मांगने वाले बड़े दुकानदार को देनी होती है| यह व्यापर की दुनिया में, तमाम सरकारी निमयों और वैट के बीच, जटिल और खर्चीली प्रकिर्या है|

इस प्रकार मुझे उस छोटे दुकानदार द्वारा डेबिट कार्ड के लिए साढ़े छः प्रतिशत मांगना गलत नहीं लगता|

पुनःश्च – मोबाइल वॉलेट में भी छिपी हुई कीमत होती है, जो फिलहाल आपके निजी आंकड़े के रूप में वसूली जा रही हैं|

पुनः पुनःश्च – नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और आपके अपने बैंक द्वारा शुरू किया गया यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस एक बेहतर विकल्प हो सकता है| अज्ञात कारणों से बैंक अपनी इस सुविधा का व्यापक प्रचार नहीं कर रहीं|

मोदी मुद्राकाण्ड के मर्मबिंदु


मुद्रा-विमुद्रीकरण प्रधानमंत्री मोदी की उच्च निर्णय क्षमता और कमजोर प्रशासनिक समझ का प्रतीक बन कर उभरा है| जिस समय आप इसे पढेंगे, सरकार दो दिन की परेशानी के दस दिन पूरे होने पर अपनी वैकल्पिक योजना -२० लागू कर चुकी होगी| यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उच्च प्रशानिक क्षमता और कमजोर नेतृत्वक्षमता के कारण सत्ता से बाहर हो गए|

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि विमुद्रीकरण नकली नोट और उनसे चलने वाले अपराधों और आतंकवाद पर कड़ा प्रहार है| परन्तु इसे काले धन पर प्रहार कहा जाना, वित्तीय समझ की कमी है| हालांकि सही प्रकार से लागू होने पर यह वर्तमान काले धन में कमी ला सकता था|

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार के अब तक के कार्यकाल में कोई मौलिक निर्णय नहीं लिया था| अभी तक उन्होंने पिछली सरकारों के बकाया कामों को ही पूरा किया है| ऐसे में उन्हें किसी बड़े निर्णय से अपनी छाप देश पर छोड़ने की आवश्यकता थी| विमुद्रीकरण का निर्णय यदि सही रूप से लागू होता तो यह मोदी सरकार के लिए बहुत बढ़ी उपलब्धि होता|

समय

समय की दृष्टि से यह इस निर्णय का सर्वोत्तम समय था| भली प्रकार लागू होने पर यह निर्णय अगले आम चुनावों से ठीक पहले आम जन में अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ता| बैंक के बाहर कतार में खड़े होने के लिए न ज्यादा गर्मी है न सर्दी| हालांकि त्यौहार, विवाह और निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण समय होने के कारण इस प्रक्रिया में थोड़ी सावधानी की जरूरत थी|

उद्घोषणा

इस प्रकार के फैसले के लिए रिज़र्व बैंक के गवर्नर द्वारा की गई घोषणा काफी होती| विमुद्रीकरण की घोषणा प्रधानमंत्री द्वारा किया जाना बहुत बड़ी बात है| उनके शब्दों को सुनते ही स्वभाविक रूप से गंभीर प्रतिक्रिया होनी ही थी| हर किसी को तुरंत ही अपने बड़े नोट के छुट्टे कराने की जरूरत थी और छोटे मोटे कालाधन धारक (जैसे रिश्वत्त या दहेज़ का पैसा) को उस धन को ठिकाने लगाने की| बड़े लोग शांत थे क्योकिं उनके पास संसाधन, समय, क्षमता तो थी ही साथ में वो लोग नगद में धन नहीं रखते| उन्हें अपने काये के लिए पचास दिन भी मिले हैं| जिस देश में कई एटीएम के सामने सामान्य रूप से लम्बी कतार लगती हों, वहां सबके लिए परेशान होना स्वाभाविक था|

सतही आकलन

दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री आम जनता के स्तर पर अर्थव्यवस्था का सही आकलन नहीं कर पाए| निश्चित रूप से आम जनता हजार के नोट का अधिक प्रयोग नहीं करती और माना जा सकता था कि उसका प्रयोग कालेधन के संचयन में हो रहा है| परन्तु, पांच सौ का नोट!! जब एक दिहाड़ी मजदूर की एक दिन की मजदूरी साढ़े तीन सौ रुपये हो तब यह मानने का कोई आधार नहीं कि उसके पास बचत का पांच सौ का नोट न हो| मंडी, गन्ना मिल आदि में किसान को भी पांच सौ के नोट में भुगतान होता है|

मगर सत्ता केवल यह देख पाई की पांच सौ के नोट बार बार बैंकिंग चैनल में नहीं आ रहे, इसलिए उसके हिसाब से कहीं न कहीं दबे हुए हैं| यह माँ कर गलती की गई कि पांच सौ का नोट केवल काले तहखानों में बंद है|

मुल्ला दो हजारी

दो हजारी नोट सत्ता की समझ प्रश्न लगाता है| हजार और पांच सौ के नोट के अभाव में दो हजार के नोट को चला पाना मुश्किल है| जो दूकानदार एक हजार के नोट पर न न न करता था, उसे आप दो हजार कैसे देंगे? क्या उसके पास छुट्टा होगा| कुछ लोग दो हजारी नोट के आने से काले धन को बाहर निकलता देख रहे है, परन्तु बड़े नोट हमेशा काले धन को सहारा देते हैं| यदि सरकार हजार और पांच सौ के नोट बंद कर केवल सौ के नोट छाप देती, तो काला धन संकट में आ जाता| कला धन संचयन करने वालों के लिए बड़े नोटों के स्थान पर इन छोटे नोटों को रखना मुश्किल हो जाता हैं|

उचित प्रक्रिया

सरकार के पास अपनी घोषणा को अमल में लाने की कोई भी कारगर योजना नहीं थी| दो दिन की परेशानी के दस दिन पूरे होने पर सरकार वैकल्पिक-योजना-२० लागू कर चुकी है| उन सब पर बात करने लगेंगे तो चुनाव का समय आ जायगा| आइये उस प्लान-अ पर बात करें जो कभी बनाया नहीं गया|

  • जनता को बैंकों द्वारा शुरू की गई यूपीआई (यूनाइटेड पेमेंट इंटरफ़ेस) के बारे में बताया जाता| {नोट – निजी कंपनियां इस कमी का लाभ उठा रहीं हैं}

  • सौ के नोट बिना किसी बड़ी घोषणा के बहुतायत में छापे जाते|
  • बैंकें हजार और पांच सौ के नोट का एक सप्ताह पहले वितरण बंद कर देतीं|
  • एक सप्ताह के नोटिस पर हजार और पांच सौ के नोट का विमुद्रीकरण होता|
  • यह घोषणा शुक्रवार शाम को होती, क्योकिं अधिकतर लोग शुक्रवार से पहले सप्ताहांत के दो दिनों के लिए पैसा निकाल लेते हैं| उन्हें और पैसे की जरूरत नहीं होती|
  • डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, कैशलेस पेमेंट पर सभी प्रकार के चार्ज और कर कम से कम कुछ समय के लिए समाप्त किये जाते|
  • लोगों को अपने बैंक खाते से अधिक रकम निकलवाने की सुविधा पहले दी जाती, परन्तु बंद किये गए नोट पहले ही एटीएम और बैंक से हटा लिए जाते|
  • रकम बदलवाने का काम एक हफ्ते बाद शुरू किया जाता|
  • किसी भी व्यक्ति को अपनी पूरी रकम एक बार में ही जमा करने (बिना धन सीमा मगर आयकर संख्या के साथ) या (धन सीमा और किसी के पहचान पत्र के साथ) बदलवाने की सुविधा होती|
  • रकम जमा करने और बदलवाने के लिए हर व्यक्ति को आयकर संख्या और आधार संख्या के आधार पर सरकार दिन तय करती और समाचार पत्र, रिज़र्व बैंक और टेलीविजन पर सूचना दी जाती| जैसे किसी संख्या विशेष से शुरू होने वाले व्यक्ति और संस्थान एक विशेष दिन बुलाये जाते और अपनी अपनी बैंक में पैसा जमा करने या निकट की बैंक में पैसे बदलवाने जाते|
  • किसी व्यक्ति का दोबारा धन बदलने के लिए एक शपथपत्र यानि हलफ़नामा देने की जरूरत होती की यह धन पहली बार में क्यों नहीं बदला या जमा किया जा सका|

काले धन के सफ़ेदपोश स्रोत


सुनकर हँसी आती है, मगर काले धन के अधिकतर स्रोत सफ़ेदपोश हैं और समाज में अपनी इज्जत रखते हैं| काले धन की सरकारी और लोकप्रिय परिभाषा में जमीन आसमान का अंतर है| जनसामान्य में काले धन का अर्थ है भ्रष्टाचार यानि रिश्वत का पैसा| जनसामान्य की अवधारणा में सरकारी घोटाले का अर्थ भी सिर्फ रिश्वत होता है| काले धन की सरकारी परिभाषा बहुत व्यापक है इसमें वह सभी धन आता है जिसका हिसाब किताब सरकार के पास न हो| भले ही सरकारें मानें या नहीं; ऐसा धन जिसका हिसाब किताब सरकार के बस में न हो, वो भी काला धन मान लिया जाता है|

इस पोस्ट में इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे|

काला धन

सरकार जिस धन को अघोषित धन कहती है उसका सामान्य अनुवाद काला धन किया जाता है|

काला धन वास्तव में वह धन है जिसका हिसाब किताब सरकार को न दिया गया हो और हिसाब किताब देने की कानूनी जरूरत न होने पर जिसका हिसाब किताब सरकार ने न लगाया हो| इसमें शामिल धन इस प्रकार होता है (पढ़ते समय सफ़ेदपोश स्रोतों की पहचान आप खुद कर पाएंगे| कृपया धनात्मक और ऋणात्मक चिन्ह पर भी ध्यान देते रहें|) –

+ भ्रष्टाचार/रिश्वत, जिसे हम सब जानते हैं| परन्तु रिश्वत या उपहार लेने के ऐसे तरीके भी विकसित हुए हैं, जिसमें रिश्वत का धन सफ़ेद रहता है| जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी की पत्नी/बेटी को सलाहकार के रूप में वेतन या कीमत दे| भ्रष्टाचार के बड़े हिस्से में सरकारी क्षेत्र शामिल नहीं होता मगर यह छोटा सरकारी हिस्सा आम जनता को बेहद परेशान करता है| निजी क्षेत्र में खरीदफरोख्त के लाभ में हिस्सेदारी का व्यापक चलन है, मगर… भगवान मूंह न खुलवाए| निजी स्कूल, निजी चिकित्सालय, बिजली कम्पनियां, आदि समय समय पर जनता के साथ कालेधन वाला लेनदेन करने ले लिए चर्चा में आते हैं|

– घोटाला, बोफोर्स घोटाले में कथित रूप से खाया गया कमीशन भ्रष्टाचार की श्रेणी में है| टूजी घोटाले में अधिक दाम की चीज स्पेक्ट्रम को कम दाम पर बेचने का आरोप है, ऐसा करना गलत परन्तु कालाधन नहीं पैदा करता| हाँ, ऐसा करने के लिए रिश्वत दिए जाने में भ्रष्टाचारजन्य कालाधन पैदा होगा|

+ गोलगप्पा, जी हाँ स्ट्रीट फ़ूड या ढ़ाबे कालेधन का सबसे बड़ा स्रोत है| यहाँ होने वाली आय आयकर के लिए रिपोर्ट नहीं होती| अगर कोई स्टाल केवल हर दिन १०० प्लेट मात्र बीस रुपये प्लेट की दर से मात्र गोलगप्पे बेचती है तो भी आयकर की सीमा में आने लायक धन प्राप्त कर लेती है| परन्तु यह धन काले धन में बदल जाता है|

– बड़े भोजनालय जिनमें आपको बिल मिलता है वहां पर दिया गया नगद धन बहुत बार कालाधन होता है, मगर यहाँ खर्च होने के बाद यह कालाधन सफ़ेद हो सकता है, बशर्ते यह भोजनालय सरकार को ठीक से सभी कर दे| इस क्षेत्र में अगर मगर बहुत है|

+ किराना आदि दुकान, कोई भी दुकान जहाँ आप बिल नहीं लेते देते काला धन पैदा करती है| भले ही दुकानदार कुछ भी कहे, कर चोरी के कारण यह कालाधन पैदा करती हैं| मजे की बात है, यह व्यापारी वर्ग भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाला प्रमुख तबका है| यह लोग अपनी कर चोरी को कठिन प्रक्रियाओं के हवाले से जायज बताते रहे हैं| बिक्रीकर से जीएसटी का वर्तमान सफ़र इन सभी लोगों द्वारा पैदा किये जाने वाले कालेधन को ख़त्म करने का कठिन प्रयास है| प्रक्रिया का सरलीकरण कहीं अधिक सुरक्षित समाधान हो सकता था और जीएसटी की प्रस्तावित कठिन प्रणाली अभी रोड़ा बनी रहेगी| अगर आपने बिल नहीं लिया है, बैंक भुगतान नहीं किया है, तो काला धन यहाँ पैदा होता है|

+ दहेज़, जी हाँ, दहेज़ भारत में काले धन के प्रमुख सोत में से एक है| जब भी दहेज़ में नगद धनराशि स्वीकार की जाती है तब काले धन का उत्पादन होता है| सामान्य घरों में बहुत सारा नगद धन भ्रष्टाचार से नहीं दहेज़ से आता है| दहेज़ में बेटी के नाम की पासबुक, फिक्स्ड डिपाजिट आदि कालेधन को भी रोकते हैं और बेटी का भविष्य भी बचाते हैं|

+ घरेलू बचत, यह सोचना हास्यास्पद लगता है परन्तु नगद बचतें अल्प मात्रा में ही सही मगर काले धन को जन्म देती हैं| जब हम इन बचतों को बैंक में नहीं जमा करते तो दो खतरे रहते हैं – पहला, मुद्रास्फीति इस नगद धन को क्रयशक्ति कम कर देती है| दूसरा, लम्बी अवधि के बाद आज इस प्रकार की बचत को आयकर विभाग को समझा पाना मुश्किल और महंगा कार्य है|

+ मकान किराया, जब इस वर्ष सरकार ने आयकर सम्बंधित आंकड़े प्रकाशित किये थे| उन्हें देखकर प्रहले दृष्टि में प्रतीत होता था कि यह देश में किराये से आय की संख्या न होकर देश भर में किराये पर उठाये गए मकानों की संख्या है| जी हाँ, अगर किराया आयकर रिटर्न में न दिखाया जाए तो काला धन है| आप हाउस रेंट अलाउंस और किराये से आय के आंकड़े देखकर हँसी नहीं रोक पाएंगे|

+रियल एस्टेट, जब भी आप मकान खरीदें तब अधिकतर विक्रेता आयकर और क्रेता स्टाम्प ड्यूटी बचने के लिए कम कर कर मूल्य लिखाते हैं और काले धन पैदा होता है| कई मामलों में क्रेता बैंक लोन लेने के लिए पूरा मूल्य चुकाना चाहें तो विक्रेता कर-राशि की अतिरिक्त मांग करते हैं| रियल एस्टेट काला धन खपाने का सबसे प्रचलित तरीका है| रियल एस्टेट में काले धन का दुष्प्रभाव दिल्ली के आसपास खाली पड़े आवासीय इकाइयों के रूप में दिखता है जिसे कोई अब नहीं खरीद पा रहा है|

– सोना – चांदी, काले धन का अधिकतम निवेश कालाधन माना जाता है| सोने ने दाउद इब्राहीम से लेकर सर्राफ़ा सरताजों की जिन्दगी चमकदार काली करने में मदद की है| इनमें से आज कोई देशद्रोही और कोई देशप्रेमी कहलाता है, मगर बड़ी मात्रा में धन काला है| काली सम्पत्ति की खरीद फरोख्त काला धन पैदा करती है|

+ अवैध धंधे, वैश्यावृत्ति, ड्रग; जब धंधा अवैध है तब कमाई कानून को कैसे दिखाई जाए? कुछ लोग एक हिस्सा बैंक में डालते हैं मगर बड़ा हिस्सा काला रहता है|

– शराब; कुछ भी कहिये, कितनी घृणा करें| शराब काले को सफ़ेद करती है| अधिकतर इसकी खरीद काले धन से होती है| मेहनत की कमाई स्वाद के दीवाने ही बरबाद करते हैं, बाकि लोग काला पैसा दुकान पर देते हैं| जो बिक्री के बाद अकाउंट में जाने के कारण सफ़ेद हो जाता है|

+ विदेशों से तस्करी; इस प्रकार के तस्करों से भारत घृणा करता है| सीमाशुल्क की चोरी से लाया गया माल बिक्रीकर और आयकर वालों को कौन बताएगा? पैसे के लेनदेन में अन्तराष्ट्रीय हवाला का प्रयोग होता है|

+ करखानों से तस्करी (कच्चे का काम); यह सफ़ेदपोश तस्करी है| इज्जत का नाम है – कच्चा काम| इसमें उत्पादशुल्क, बिक्रीकर, आयकर सब बच जाते हैं| लेनदेन में सफेदपोश हवाला की सेवाएं ली जातीं है|

  • उपरोक्त दोनों तस्करियों में अन्तराष्ट्रीय हवाला और सफेदपोश हवाला में वही अंतर है जो पाकिस्तान सरकार अफगानी तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान में बताती है|

+ सरकारी शिक्षकों की निजी कोचिंग; हम शिक्षकों का सम्मान करते हैं इसलिए इस मुद्दे को रहने देते हैं|

+ सरकारी डॉक्टर, सरकारी वकील की निजी सेवाएं; यह लोग परे पेशेवर भाई हैं इसलिए यहाँ भी माफ़ किया जाये|

+ कृषि आय; यह से सरकारी सफ़ेद गाय| क्या कहें, बालीवुड वाले लम्बू मोटू सब तो किसान भाई हैं| वैसे मामला यह है कि कृषि अर्थव्यवस्था नगद आधारित है, इस कारण गांव – देहात के अन्य कार्य भी नगद आधारित होते हैं| नगद की इस कृषि अर्थव्यवस्था को नगद की काली अर्थव्यवस्था से जुड़ने में जरा सहूलियत होती है| अगर यह सरकारी आयकर व्यवस्था से जुड़ने के प्रयास करे तो किसान भाई का गैर – कृषि आयकर दोगुना या तीन गुना हो जाता है|

क्या कुछ छूट गया? हो सकता है| भारतीय शादी – ब्याह, चुनाव, और होली – दिवाली – ईद काले धन के सबसे बड़े उत्सव हैं| ईमानदार लोग यहाँ सोच समझ कर तंग हाथ पैसा खर्च करते हैं, कई बार होश में बिक्रीकर बचा जाते हैं|