क़ानून पर आम भारतीय नजरिया


क़ानून के हाथ लम्बे होते हों या न हों उसका डंडा बहुत लम्बा, मजबूत, कंटीला और कठोर होना चाहिए, जिस से कि पडौसी का सिर एक बार में फूट जाये| आज डंडे का जमाना नहीं है तो आप रिवाल्वर या रायफल कर लीजिये| मगर यह एक आम भारतीय नजरिया है|

दूसरा फ़लसफा खास भारतीय यह है कि क़ानून एक भैंस है जिसे कोई भी अपनी लाठी से हांक सकता है बशर्ते उसकी लाठी उस चौकी, थाने, जिले या सूबे में सब पर भारी होनी चाहिए| इस फ़लसफ़े का दूसरा तर्जुमा है, क़ानून एक ऐसी रांड है जिसे कोई भी अपनी रखैल बना कर उसका मजा मार सकता है|[i]

तीसरा और सबसे खास भारतीय क़ानूनी फ़लसफा ये है कि अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए| इसलिए हम भारतीय ऊपर लिखे सभी फ़लसफ़ों को दिल से लगाकर रखते है और तब तक ज़ुबान पर नहीं लाते| इसीलिए भारतीय पडौसी का सिर और अपना पिछवाड़ा फूटने तक चुप रहते है और हाकिमों के तलवों ने सिर छिपाए रखते हैं|

अब साहब अगर इन सादा सरल फ़लसफ़ों को समझने में कोई दिक्क़त तो तो कुछ वाकये सुनते हैं, जो कुछ दूर पास का ताल्लुक इन फ़लसफ़ों से रखते हैं| क़ानूनन आपको को बता दे कि सभी वाकयात एकदम बेहूदा और वाहियात हैं और उनका किसी सच से कोई ताल्लुक नहीं है| अगर आपको सच लगें तो ऊपर लिखा तीसरा फ़लसफ़ा दोबारा पढ़ें|

जब क़ानून किसी किसी कुर्ता- पायजामा को जूते पहना रहा हो या कुर्ता – पायजामा क़ानून के जूते बजा रहा हो तो आपके पास दूसरा फ़लसफ़ा पढने का वक़्त नहीं है| आप अगर शरीफ़ हैं तो चुपचाप घर जाकर बच्चों को कबीरदास का “सांच बराबर तप नहीं” वाला दोहा सुनाएँ| अगर आप झाड़ पौंछ शरीफ़ हैं तो कुर्ता – पायजामे का रंग देखें| अगर आपका और उसका रंग एक है तो भारत माता की जय बोलें और अगर रंग अलग है तो उसका फ़ोटो और फोटोशॉप सामाजिक क्रांति के लिए प्रयोग कर दें|

अगर क़ानून किसी अदालत में गोल गोल घूम रहा है तो दूसरा फ़लसफ़ा जेहन में आता है| अदालतें लाठी वालों का पिकनिक स्पॉट हैं जहाँ क़ानून की भैंस हर कोई दुहता है|

सूट बूट हिंदुस्तान में सबसे ताकतवर होता है| सूट बूट का दिमाग उतना ही वातानुकूलित रहता है जितना उसके फार्महाउस का अय्याशखाना| यह हमेशा तफ़रीह के सीरियस मूड में रहता है और क़ानून खुद-ब-खुद इसकी बाँहों में| क़ानून इसके भाव – भंगिमा को खूब पहचानता हैं और हमेशा एक खास तरह में मूड में रहता है| अब, दूसरा फ़लसफ़ा का दोबारा न पढ़े|

अब बात आती है इस पूरी बकवास से मतलब क्या निकल रहा है| हमारे मुल्क में जो बात सबको पता हो, उसे बताना बकवास ही तो है| रे भाई, बताया था न, अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए|

बाकि जो मतलब जो बकबास है वो अगली बार बताई जाएगी| तब तक क़ानून से बचकर रहें| सलामत रहें और हमेशा की तरह ऑफिस में सूट – बूट और सोशल मीडिया पर कुर्ता – पायजामा के सामने नतमस्तक रहे| अपने ईश्वर और ईमान को औक़ात में बनाये रखें|

[i] सुसंस्कृत अनुवाद:- “भारत की सर्वमान्य नगरवधु विधि, समस्त योग्यजन के लिए प्रसन्नताकारक होती है|”

गुनाहों का दैत्य


पता नहीं क्या कारण रहा कि कई सालों से मैं धर्मवीर भारती का लोकप्रिय उपन्यास “गुनाहों का देवता” पूरा नहीं पढ़ पाया| एक कारण शायद रहा कि जब भी मैं इसे पढ़ना या पुनः पढ़ना शुरू करता, अपने को सुकोमल भावनाओं के भंवर में पाता| मगर इसका फायदा यह भी है कि अब जब गुनाहों का देवता पूरी तरह ख़त्म करने का दृढ निश्चय किया तो माहौल अलग था|

भारत सरकार ने पिछले दिनों पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन यौन सम्बन्ध बनाने के कृत्य  को अपराध की श्रेणी में लाने से मना कर दिया| राष्ट्र के सभी प्रबुद्ध जन इसे अपराध की श्रेणी में लाने की मांग कर रहे है मगर देश में पुरुषवाद उसी तरह हावी है जिस प्रकार महिला आंदोलनों पर महिलावाद| क़ानून के दुरूपयोग, व्यावहारिक कठिनाइयाँ, एकतरफ़ा अपराध, और परंपरा के नाम पर घिनौने अपराध को प्रश्रय देने का जो प्रयास हाल में हुआ उतना तो शायद भारत में कभी नहीं हुआ हो|

ऐसे समय में गुनाहों के देवता का पाठ मुझे उस पड़ाव पर ले गया जहाँ शायद में अन्यथा नहीं पहुँच पाता| यह कालजई उपन्यास सालों पहले लिखी गई मध्यवर्गीय जीवन की एक पवित्र प्रेम कथा है| इसमें आदर्श का दामन थामने वाले पात्र घुटन का जीवन जीने हुए अपने जमीर को मारते और खुद मरने लगते है| प्रेम वास्तविकता की वेदी पर बलि हो जाता है| मगर यह उपन्यास वैवाहिक बलात्कार को हाशिये से उठाकर कथानक के मध्य में लेकर आता है|

“हाथों में चूड़े अब भी थे, पाँव में बिछिया और माँग में सिन्दूर – चेहरा बहुत पीला पड़ गया था सुधा का; चेहरे की हड्डियाँ निकल आयीं थीं और आँखों की रौशनी भी मैली पड़ गयी थी| वह जाने क्यों कमजोर भी हो गयी थी|”

यह तो वर्णन की शुरुवात है| भारती जी उपन्यास को लिखते समय वैवाहिक बलात्कार पर नहीं लिख रहे है इसलिए बहुत साधारण और तटस्थ वर्णन मिलता है मगर स्तिथि कि गंभीरता को समझा जा सकता है| यह उपन्यास उस लेखक ने लिखा है जो गहराई और गंभीरता से लिखता है मगर ग्राफ़िक डिटेल्स में नहीं जाता|

“हाँ सब यही समझते हैं, लेकिन जो तकलीफ है व मैं जानतीं हूँ या बिनती जानती है|” सुधा ने गहरी साँस लेकर कहा – “वहाँ आदमी भी बने रहने का अधिकार नहीं|”

एक भारतीय लड़की और कितना कह सकती है| शायद उसे दब कर बोलना ही सिखाया गया है| अगर वो बोलती भी है तो उसे क्या जबाब मिलता है वह और भी निंदनीय है|

“और जहाँ तक मेरा ख्याल है वैवाहिक जीवन के प्रथम चरण में ही यह नशा रहता है फिर किसको यह सूझता है| आओ, चलो चाय पीयें|”

मुझे इस बात की प्रसन्नता हो रही है कि इस बात में “मेरा ख्याल है” जोड़ा गया है| आज कल के सामाजिक धीर-वीर तो सीधे फ़तवा ही दे देते हैं| मगर ख्याल हक़ीकत नहीं होते| हक़ीकत कुछ और होती है| स्तिथि की भयाभयता का बयान करना कई बार बहुत कठिन होता है|

“मैं क्या करूँ, मेरा अंग – अंग मुझी पर व्यंग कर रहा है, आँखों की नींद ख़तम है| पाँवों में इतना तीखा दर्द है कि कुछ कह नहीं सकती| उठते बैठते चक्कर आने लगा है| कभी – कभी बदन काँपने लगता है| आज वह बरेली गए हैं तो लगता है मैं आदमी हूँ|”

वैसे तो उपरोक्त वर्णन पढ़ने में बहुत कुछ कहता है मगर हमारा पुरुषवाद “मार लेने”, “फाड़ देने” और “ऐसी – तैसी करने” की मर्दवादी परंपरा से बंधा होने के कारण इस वर्णन में मात्र पुरुष की मर्दानगी का गौरव ही देख सकता है| लेकिन एक बहुत महत्वपूर्ण टिपण्णी इस उपन्यास में सुधा करती है| यह टिपण्णी हिन्दू धर्म की आड़ लेकर देश भर में इस कृत्य को बढ़ावा देने वालों के मूंह पर तमाचा है|

“हिन्दू – गृह तो एक ऐसा जेल होता है जहाँ कैदी को उपवास करके प्राण त्यागने की भी इजाजत नहीं रहती, अगर धर्म का बहाना न हो|”

हमारे सामाजिक धीर – वीर कह सकते है कि अलां और फलां के बारे में कुछ क्यों नहीं कहा| उत्तर सिर्फ इतना है कि पात्र हिन्दू है और अपने धर्म के बारे में ही तो बोल सकते हैं| अगर किसी को इस से संतोष नहीं होता तो उनसे विनती है कि सरकार ने हिन्दू धर्म की आड़ लेकर ही तो इस कृत्य को अपराध घोषित करने से मना किया है| क्या हम सरकार से कहेंगे कि हिन्दू धर्म की आड़ लेकर ग़लत कार्यों को बढ़ावा न दें?

उपन्यास में इस बात की भी बानगी मिलती है कि इंसान जब इंसानियत से गिरना शुरू करता है तो कितना गिरता चला जाता है| सुधा का गर्भपात हो गया है| बचने की उम्मीद नहीं है| बार बार बेहोशी आ रही है| इसी क्रम में उसके मूंह से निकलता है|

“अब क्या चाहिए? इतना कहा, तुमसे हाथ जोड़ा, मेरी क्या हालत है? लेकिन तुम्हे क्या? जाओ यहाँ से वरना मैं अभी सर पटक दूँगी…”

पता नहीं वैवाहिक बलात्कार इस उपन्यास के केंद्र में क्यूँ नहीं दिखाई पड़ता| मुझे एक बार लगा कि भारती जी एक बहुत ही बड़ी टिपण्णी इस उपन्यास के माध्यम से वैवाहिक बलात्कार पर करना चाहते होंगे मगर उस समय उन्हें यह बात सामाजिक और राजनितिक रूप से समय से सदियों पहले की बात लगी होगी| अगर “गुनाहों का देवता” “गुनाहों के दैत्य” को केंद्र में रख कर लिखा गया होता तो शायद प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची में कहीं पड़ा होता| उन्हें मंटो और चुगताई की तरह कोसा जाता| मगर यह उपन्यास बताता है कि वैवाहिक बलात्कार की बात भारत में कोई आयातित बात नहीं है| बार बार उठती रही है और तब तक उठेगी, उठती रहेगी  जब तक यह अपने अंजाम तक नहीं पहुँचती|

 

बदनामी बंद है


बदनामी बंद है

 

 

बदनामी बंद है|
जो भी कुछ कहा सुना गया, सुना गया है कि बदनामी है|
किसी को नहीं पता किसने क्या कहा, किसने क्या सुना|
सबको पता है, खलनायक ने क्या कहा, अपराधी ने क्या कहा, बलात्कारी ने क्या कहा|
हमें नहीं सुनना है कि बलात्कारी के अलावा किसी और ने क्या कहा, क्या समझा, क्या सोचा|
देश के ऊपर अपनी बदनामी देखने पर प्रतिबन्ध है, हम नहीं देखना चाहते|
दुनिया जहाँ सब देखें, “कैसे है हम”, या मर्जी हो तो न देखे|
हम वैसे नहीं है जैसा वो खलनायक, अपराधी है, बलात्कारी है|
मगर हम अपनी तरफदारी नहीं कर सकते|
हमें नहीं पता; हमें बदनाम किया गया है या नहीं|

नहीं पूछना मुझे सवाल किसने किसको जेल में घुसने दिया|
नहीं पूछना मुझे सवाल टीवी यूट्यूब पर कौन देख रहा है|
नहीं पूछना मुझे यह सवाल वह सवाल|

बंद है, प्रतिबन्ध है| बदनामी बंद है|

 

 

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