क्रिकेट: मनोरंजन में फिक्सिंग


 

 

इस देश में धर्म, भ्रष्टाचार और शराब की तरह ही लोंगो को क्रिकेट की लत हैं| बल्कि शायद क्रिकेट कहीं ज्यादा खतरनाक है| मुझे याद है कि बचपन में अगर कोई सहपाठी घर से पढाई पूरी करके नहीं जाता था और कहता था कि उसने कल फलां फलां क्रिकेट मैच की रिकॉर्डिंग देखी थी तो कई बार शिक्षक उस पर सख्ती नहीं दिखाते थे|

मैंने भी रेडिओ पर क्रिकेट कमेन्ट्री शायद अपने अक्षरज्ञान शुरू होने से पहले ही शुरू कर दी थी| जिस दिन क्रिकेट का मैच होता था तो मेरे पिता अपना ट्रांजिस्टर उस दिन अपने साथ चिपकाये रखते थे और वो उनके साथ कार्यालय भी जाता था| जब मैं थोडा बड़ा हुआ, तब मैंने मोहल्ले के लोगों से किस्से सुने कि किसी ज़माने में मोहल्ले का अकेला ट्रांजिस्टर मेरे पिता के पास ही था और बिजली गुल होने की दशा में हमारे घर में बैठक जमा करती थी| बाद में, जिन घरों में टीवी था वहां भी यही हाल था|

मुझे भी क्रिकेट की बीमारी बुरी तरह से थी और बाद में मुझे यह महसूस हुआ कि यह अफीम मेरे भविष्य को खराब कर देने के लिए काफी है| मेरे कई सहपाठी कहा करते थे बोर्ड परीक्षा तो हर साल आतीं है और क्रिकेट का विश्व कप  चार साल में एक बार| मेरा क्रिकेट से मोह भंग होने में सट्टेबाजी का कोई हाथ नहीं है वरन मेरे एक सहपाठी का हाथ है जो गणित और सांख्यकी की मदद और “सामान्य अनुभूति” से न सिर्फ मैच का सही भविष्य बताता था बल्कि एक मुख्य भारतीय बल्लेबाज का स्कोर में दहाई का अंक बिल्कुल सही बताता था| उसके साथ छः महीने रहकर मैंने क्रिकेट का नशा छोड़ दिया| दुर्भाग्य से मेरा वह मित्र क्रिकेट, गणित और अनुभूति की भेट चढ़ गया| पिछले पंद्रह वर्षों से मेरा उसके साथ संपर्क नहीं बल्कि मुझे उसका नाम भी नहीं याद|

जब क्रिकेट में सट्टेबाजी और फिक्सिंग के आरोप सामने आने लगे तब मुझे लगा की “क्रिकेट की सह्सेवाओं” ने मेरे मित्र के रूप में हीरा खो दिया|

मुझे या शायद किसी भी दर्शक को इस देश में क्रिकेट मैच की फिक्सिंग से कोई परेशानी नहीं है| जब तक आपको खुद मैच का परिणाम पहले से न पता हो तो क्रिकेट का हर मैच एक बढ़िया उपन्यास और फिल्म की तरह अंत तक मनोरंजन करता है| अगर फिल्म मनोरंजक हो तो किसे फर्क पड़ता है कि उसका प्लाट किसने कब कहाँ और क्यों लिखा था| हर गेंद का रोमांच बना रहना चाहिए| हर गेंद पर बल्ला वास्तविक तरीके से घूमना चाहिए|

अन्य खेलों के मुकाबले, क्रिकेट में हर खिलाडी के निजी विचारों और तकनीकि का अधिक स्थान है| क्रिकेट की एक टीम में कम से कम ११ सब – टीम खेल रही होतीं है| उनके अपने निजी लक्ष्य आसानी से निर्धारित किये जा सकते हैं| अगर मैच फिक्स न भी हो तो कोई  भी बढ़िया खिलाडी अपने दम पर अपनी निजी सब – टीम के लक्ष्य तक पहुँच सकता है| टीम में बने रहना और जनता की निगाह में चढ़े रहने से अधिक कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है| आपने देखा होगा कि अधिकतर बल्लेबाज एक मैच में अपने कार्य – प्रदर्शन पर निर्भर रहने की जगह अपना औसत बनाये रखने में अधिक ध्यान देते हैं|

भारत पाकिस्तान के मैच तो हमेशा ही फिक्सिंग के लिए अपना एक स्थान बनाये रहे हैं| दक्षिण भारत की सामरिक समझ रखने का दावा करने वाला हर व्यक्ति मैच शुरू होने के हफ्ते भर पहले से ही उसका परिणाम घोषित कर ने  लगता है| इस तरह के व्यक्ति मैच इसलिए नहीं देखते कि खेल में क्या हो रहा है बल्कि इसलिए देखते हैं कि उनकी सामरिक समझ कितनी सही थी और दोनों टीम उन्हें दी गयी स्क्रिप्ट पर किस प्रकार खरी उतरीं|

हाँ! सट्टेबाजी पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है और यह उस पर प्रतिबन्ध लगाने से नहीं बल्कि अवैध सट्टेबाजी का उचित वैध विकल्प देने पर ही किया जा सकता है| किसी भी कार्य को खुले रूप में अवैध बनाये रखने का अर्थ है कि हम उसे कानूनी नियंत्रण से बाहर रखकर खुली छुट दे रहे हैं| अवैध अवैध सट्टेबाजी से कई बार लोग जरूरत से अधिक निवेश कर देते है और घर बार लुटा बैठते हैं| सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को राजस्व की बड़ी हनी होती है| जो पैसा कर के रूप में सरकारी खजाने में जाना चाहिए था वो नेता, पुलिस और माफिया के हाथ में बाँट जाता है|

मेरी इस साधारण सी बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि जिन स्थानों पर शराब कानूनी  रूप से सहज उपलब्ध है वहां पर अवैध और/या नकली शराब का धंधा बेहद कम है, नशे की बुरे पहलू पर खुल कर बात होती है, नशा मुक्ति की तमाम व्यवस्था मौजूद है, सरकारी आय भी होती है|

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रेलवे की साजिशाना लूट


 

 

जी हाँ| मैं यही कह रहा हूँ कि हमारी प्यारी “भारतीय रेल” हमें साजिश कर कर लूटती है| और मेरे पास ये कहने की पर्याप्त आंकड़े है, जो मैंने खुद रेलवे से सूचना के अधिकार का प्रयोग कर कर प्राप्त किये है| मैंने अपनी आँखों से इस लूट को देखा जिसका विस्तृत ब्यौरा आप यहाँ पढ़ सकते है|

आइये देखें, ये लूट किस प्रकार हो रही है| अपने अध्ययन के लिए मैंने अपने गृहनगर अलीगढ़ और दिल्ली के बीच की रेल सेवा को चुना|

मैंने रेलवे से दो अलग अलग प्रार्थना पत्र भेज कर पूछा:

१.       अलीगढ़ पर दिल्ली और नई दिल्ली जाने के लिए रुकने वाली सभी ट्रेनों में कुल मिला कर सामान्य अनारक्षित श्रेणी की कितनी यात्री क्षमता है? कृपया ई.ऍम.यु.,एक्सप्रेस, सुपरफास्ट, शताब्दी, सभी श्रेणियों का अलग अलग ब्यौरा दें|

२.       अलीगढ़ जंक्शन से दिल्ली जंक्शन और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए टिकटों की बिक्री का ब्योरा दें|

रेलवे ने अपने जबाबों में कहा:

१.       अलीगढ़ से दिल्ली और नई दिल्ली के लिए तीन ई.ऍम.यु. ट्रेन चलती हैं| जिनमे से एडी १ और एदी ३ दिल्ली और एअनडी – १ नई दिल्ली के लिए जाती हैं| इन में से पहली ट्रेन में १३ और अन्य दो में १५ डिब्बे रहते हैं| हर डिब्बे में ८० यात्रियों के बैठने की सुविधा है|

२.       टिकटों के बारे में उन्होंने मुझे एक चार्ट संलग्न कर कर भेजा| इन आंकड़ों का मैंने अध्ययन किया\

अनारक्षित डिब्बा

अनारक्षित डिब्बा

एक वर्ष में भारतीय रेल के पास अलीगढ़ से दिल्ली के बीच कुल ४३८,००० सीटें हैं| इन सीटों ४३८००० सीटों के बदले में रेलवे में २००९ – १० में ५२०५२२, २०१० – ११ में ५२७,५८९ और २०११ – १२ में ५५१०६२ टिकटों की बिक्री की| और इन सभी यात्रियों को या तो खड़े हो कर यात्रा करनी पड़ी या फिर उन्हें मजबूरी में आरक्षित डिब्बों में जाकर दूसरों की सीट पर बैठना पड़ा|

जब ये यात्री उन डिब्बों में पहुंचे तो रेलवे में अर्थ – दंड के नाम पर कमाई की या उसके कर्मचारियों में इन यात्रियों से अवैध वसूली की|

क्या रेलवे को उपलब्ध सीटों से अधिक सीटें बेचने का अधिकार है?

क्या रेलवे को सीट उपलब्ध न होने पर टिकट बेचते समय यात्री को इस बाबत सूचना नहीं देनी चाहिए थी?

क्या सीट न उपलब्ध होने की स्तिथि में यात्री के उपर अर्थ – दंड लगाया जाना चाहिए?

अगर इस तरह का अर्थ – दंड लगता है तो इसका पैसा रेलवे को मिलना चाहिए? क्या वह सहयात्री जो इस पीड़ित यात्री को अपनी सीट पर यात्रा करने देता है उसे इस रकम से कुछ हिस्सा नहीं मिलना चाहिए?

क्या कहते है आप? कृपया अपनी टिप्पणियों में लिखे!!

(हिंदी में अपने विचार लिखने में आपकी सहायता के लिए इस पृष्ट पर एक लिंक दिया गया है जहाँ से आप सम्बंधित सॉफ्टवेयर प्राप्त कर और अपने यन्त्र पर उतार सकते हैं|)

बलात्कार क्यों??


 

परिवार

* स्त्री ने अपनी पांच साल की बेटी को कहा; “अपने कपड़े ठीक कर कर बैठा कर, लड़कों की निगाह खराब हो जाती है|”

      बेटी कुछ नहीं समझी, डर गयी| बेटा समझा अगर मेरी निगाह खराब होने में लड़की का दोष होगा|

* स्त्री ने बेटे को बादाम दूध देकर बोला; “पी ले बेटा तुझे बड़े होकर मर्द बनना है|”

      बेटा मर्द बनने में लग गया|

* स्त्री ने स्कूल से बेटी से कहा; “बड़ी हो रही है कुछ शर्म लिहाज सीख ले| लड़कों का क्या? ये तो खुले सांड होते है|

एक इंसान को पता लगा कि उसकी असली जात खुले सांड है|

* पुरुष ने सड़क पर किसी नन्ही बच्ची को छेड़ते हुए बेटे को देख कर घर आकर स्त्री से कहा; “तुम्हारा बेटा अब बड़ा हो रहा है|” स्त्री हँस दी; “हाँ, अब उसकी शिकायतें आने लगीं है|

      बेटा बड़ा होनेलगा|

* पुरुष ने बेटी से कहा; तू उन लोगों की बातों पर ध्यान देगी तो वो ऐसा तो करेंगे ही|

* पुरुष में बेटी को बोला; “बेटा! तुम अपनी तरफ भी ध्यान दो, ताली एक हाथ से नहीं बजती|”

* स्त्री में पड़ोसन से कहा; “तुम्हारी बेटी कुछ कम है क्या? और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती|”

* पुरुष में अपनी बेटी को घर में घुसते ही पीट दिया; “साली हरामजादी’ क्या कर कर आई थी कि पान की दूकान पर लड़के तुझ पर छींटे उछाल रहे थे|”

* स्त्री में लड़कियां छेडकर घर आए बेटे को बिना डांटे, खाने खाने को दे दिया|

* स्त्री ने बेटी से कहा; “सुन अगर किसी लड़के में तेरी तरफ देखा भी तो मैं तुझे दीवार में चिनवा दूंगी|”

      बेटी ने समझा नहीं समझा, “मर्द” बेटे ने जरूर समझ लिया|

 

देश और समाज

  • सभी लड़कियां तय की गयी वर्दी पहन कर आएँगी; लड़के ….. कोई बात नहीं|
  • लड़कियों को सभ्य कपड़े पहनने चाहिए, वर्ना लड़कों का ईमान खराब होता है|
  • जब उन गालियों को समाज में स्वीकृति होती है, जिनमें स्त्री, माँ बहन बेटी, के साथ बलात्कार की बात होती है|
  • जब स्त्री का अस्तित्व समाज में मात्र योनि और स्तन तक सिमटा दिया जाता है| अधिक दुर्भाग्य यह है कि कोई उन पवित्र अंगों को जन्मदाता और बचपन में दूध पिलाने वाले अंग के रूप में आदर नहीं देना चाहता|
  • जब अपने भाई या पुरुष-मित्र से साथ घुमती लड़की को कमेन्ट किया जाता है; “हमें भी देख लो हम में क्या कांटे लगे है” कोई भी इस कमेन्ट पर कुछ नहीं कहता|
  • जब पिता अपने बेटों को ये नहीं कहता कि मर्द होने का मतलब लड़की का दिल जीतना है, शरीर पर जोर दिखाना नहीं|
  • जब लड़कियों को पर्दा करना पड़ता है कि किसी की बुरी नजर न पड़े|
  • जब लड़कियां खुद को बाजार में बिकने वाली चीज बनाने लगती है|
  • जब देश में क़ानून नेता जी के घर की पहरेदारी करता है और आम जनता को रात में घर में छिप जाने के लिए कहा जाता है|
  • जब समाज बलात्कार को “लड़की कि इज्जत लूटना” कहता है| उन दरिंदों का “ईमान-इज्जत-इंसानियत” खोना नहीं|
  • जब अदालत में लड़की को अपने बलात्कार का गवाह बनना पड़ता है जबकि किसी मुर्दे को अपनी मौत की गवाही नहीं देती पड़ती|
  • जब देश में मुक़दमे दसियों साल तक अदालत में झूलते रहते है|
  • जब देश की आम जनता पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी संगठन मानती है और एक अदने से जेब कतरे से भी पंगा नहीं लेना चाहती क्योंकि वो पुलिस का सगा छोटा भाई है|
  • जब देश में कड़े क़ानून किताबों में शोभा बढ़ाते है और उनका पालन नहीं होता|
  • जब किसी के शक की बिना पर बलात्कारी को छोड़ा जाता है और उसी शक की बिना पर पीडिता को अपराधी मान लिया जाता है|
  • जब हम बलात्कार में पीड़ित और अपराधी का देश, धर्म, जाति, काम, देखते है|
  • जब हम अपनी सेना या अपने प्रिय जन द्वारा किये बलात्कार को देख सुन कर चुप रहते है या चुपचाप सहते हैं|
  • जब हम बलात्कारी और पीडिता की शादी करने के बारे में एक पल भी सोचते हैं|
  • जब हम बलात्कारी को देश के आम नागरिक जैसे सभी अधिकार देते है; जबकि किसी और दिवालिया या पागल को ऐसे अधिकार नहीं होते|


देश और देवता

 

  • जब “देवराज” इन्द्र तपस्वी गौतम की सती पत्नी अहिल्या का बलात्कार करते है; अहिल्या से दुश्मनी के लिए नहीं वरण गौतम से इर्ष्या के कारण; शायद कोई इन्द्र के इस कुकृत्य की निंदा नहीं करता|
  • जब अहिल्या के बलात्कार का शिकार हो जाने पर पति गौतम अहिल्या को श्राप देते है| जो श्राप अहिल्या को पत्थर बना सकता है वो इंद्र को नाली का कीड़ा क्यों नहीं बनाता|
  • जब राम अहिल्या को सम्मान देकर पत्थर से वापस स्त्री बनाते है और उन्ही राम का भक्त हम इस देश के वासी बलात्कार पीडिता को पत्थर बनाने में लगे रहते हैं|
  • देश में राम राज्य का सपना स्त्री को अहिल्या / शबरी जैसा आदर देने के लिए नहीं वरन स्त्री को सीता जैसा वनवास देने के लिए देखा जाता है|
  • जब हर साल रावण को जलाने वाला समाज/देश ये भूल जाता है की रावण ने राक्षस होकर भी अपहृत सीता के साथ कोई बलात्कार या छेड़खानी जैसी कोई घटिया हरकत नहीं की थी|

अंत में मैं कहना कहता हूँ; जब समाज में कोई भी गलत बात होती है तो मुझे भी देखना चाहिए क्या मैंने तो इस समाज में ये गलत बात होने में कोई योगदान नहीं दिया| कोई गलत बात कहकर, सहकर||

मैं आज खुद के होने पर शर्मिंदा हूँ||