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घुमक्कड़ी
वह भी कोई देस है महराज
जब मैंने इस पुस्तक के बारे में पहली सुना था तो शीर्षक से लगा था कि हिंदी पट्टी का कोई आंचलिक यात्रा – वृतांत है| यह भारत के छोटे से अंचल मुख्यभूमि की निगाह से उस उत्तर पूर्व का शोध – विवेचन है, जिसे भारतीय देशप्रेम चीन समझने की हठ करता रहता है| पुस्तक खुद को बिना विराम और लघु विराम के पढ़ाती है| आपको “चिकेन नेक कॉरिडोर” (जलपाईगुड़ी) से आगे ले जाने के बाद सरल बारीक़ विस्तृत रोचक विवरण के साथ यह पुस्तक आपकी गर्दन पकड़ कर रखती है और बार बार पढ़े जाने के आग्रह रखती है| यह मेरे जैसे अधजल गगरी मुख्यभूमि वालों के लिए सन्दर्भ ग्रन्थ का काम कर सकती है मगर लेखक कहीं भी इस प्रकार का कोई आग्रह करता हुआ प्रतीत नहीं होता| पुस्तक के पीछे छपे ज्ञानरंजन के शब्द मुझसे यह आग्रह जरूर करते प्रतीत होते हैं मगर दुर्भाग्य से आधुनिक भारत तो ज्ञानरंजन को भी नहीं जानता|
आप कब दिल्ली से चलते चलते उत्तरपूर्व के दूरदराज में पहुँचते जाते है पता ही नहीं लगता| पुस्तक का प्रताप है कि जब अभी नागालैंड में एक आरोपी को जेल से बाहर कर क़त्ल कर दिया गया तो मैं मीडिया में दिए गए सारे दृष्टिकोण आसानी से समझ पाया|
“लघु राज्यों के राजा अपने लोगों को समझा रहे थे की १५ जनवरी १९४७ को असं के राज्यपाल अकबर हैदरी और खासी राज्यों के बीच जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक रक्षा, मुद्रा और विदेश मसलों को छोड़कर बाकी सारे मामले उनके अधीन होने चाहिए| बाद में धोखे से इन राज्यों को संविधान की छठी अनुसूची में डालकर पारंपरिक ढंग से प्रशासन चलाने के लिए खासी, गारो और जयंतिया जिलों में स्वायत्तशासी परिषदों की स्थापना की गई| इस कारण सीयेम नाम के राजा रह गए हैं| अब परिषदें उन्हें मोहरों की तरह हटाती और बिठाती रहती हैं|”
यह सुचना पुस्तक में बहुत साधारण तरीके से दी गई है| परन्तु जब मैं इसे जोधपुर समेत कई रियासतों के विरोध के भारत में विलय के सेकड़ों समझौतों, और बाद में इंदिरा गाँधी द्वारा संविधान संशोधन के साथ भूतपूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स ख़त्म करने के लोकप्रिय और अदूरदर्शी निर्णय के साथ पढ़ता हूँ तो चिंता होने लगती है| शुक्र है कि वह मामला अभी क़ानूनी विश्लेषणों में ही फंसा हुआ है|
“ज्यादातर असमिया हिन्दू गाँव किसी न किसी मठ से सम्बद्ध हैं और वहाँ के सामाजिक जीवन में नामघर की केन्द्रीय भूमिका होती है|… … इधर हिन्दू कट्टरपंथ के प्रभाव में कुछ इलाकों में महिलाओं के महीने में पाँच दिन नामघर आने पर रोक लगा दी गई है, जिसका विरोध शहरों के नारीवादी संगठन कर रहे है|”
“ये फुल बिरले ही खिलते हैं लेकिन जब आते हैं तो प्रकृति नया असंतुलन पैदा करती है|… … इन्हीं फूलों ने मिजोरम में उग्रवाद की नींव रखी थी और पूर्वोत्तर का इतिहास, भूगोल दोनों बदल दिया था| तब मिजोरम असम का एक जिला हुआ करता था जिसे लुसाई हिल्स कहा जाता था|”
“सब्जी मंडी का हर्बल देखकर समझ आ गया कि दीमापुर से यहाँ के रास्ते में इतना सन्नाटा क्यों था| जानवर और पक्षी पीढ़ियों के अनुभव से जानते हैं, वन्यजीवप्रेमियों और पर्यावरणविदों के चिकने काग़ज वाले दस्तावेज़ों से पुकार कितनी ही काव्यात्मक क्यों न हो, इक बार छेमोकेडिमा का इनरलाइन बैरियर पार करने के बाद वे जिन्दा वापस नहीं लौट पाएँगे|”
इसी तरह की कुछ साधारण सी सूचनाएं इस पुस्तक में लगभग हर पृष्ठ पर अंकित है जिन्हें समझने के लिए समय, सुविधा, संस्कार और समृद्धि की आवश्यकता नहीं है| बहुत कुछ है जिसे पढ़ा जाना चाहिए| सब कुछ यहाँ बता देना पुस्तक की रोचकता को समाप्त कर देगा| पुस्तक किसी पुस्तकालय में बैठ कर नहीं लिखी गई है, सामान्य जन जीवन की वह कहानी है जिसे हम अक्सर नहीं देख पाते| हर दिन को आँख कान नाक खोल कर जिया गया है, बंदूकों और मौत के साये में| जहाँ सेना और ढेर सारे उग्रवादी दिन के हिसाब से लड़ रहे है, आकड़ों के हिसाब से मर रहे है, बयानों के हिसाब से नकारे जा रहे है, राजनीति के हिसाब से प्रयोग हो रहे है और वक्त के हिसाब से काटे जा रहे है| इस किताब को पढ़ने से पहले और बाद, मैं अक्सर पूछता रहा हूँ, चम्बल के डकैत और भारत भर के उग्रवादियों में कितना अंतर हैं, जबाब आसन तो नहीं है, मगर मैंने उसे इस पुस्तक में भी ढूंडा है|
जीवन और भारतीयता के बहुत सारे जबाब प्रश्न बनकर यहाँ खड़े हुए हैं| अनिल यादव पढ़े जाने योग्य नहीं लिखकर लाये हैं वरन वो खुद को पढ़ा लिए जाने का माद्दा रखते हैं| अमृतलाल बेगड़ जिस श्रृद्धा से नर्मदा यात्रा करते हैं शायद अनिल यादव ने उस तरह का ही कोई विचार रख कर उस देस की यात्रा की है|
पुस्तक: वह भी कोई देस है महराज
लेखक: अनिल यादव
प्रकाशन: अंतिका प्रकाशन
वर्ष: २०१२
श्रेणी: यात्रा – वृतांत,
मूल्य: रुपये १५०
देशी नाश्ता
आज कहाँ नाश्ता होता है| एक वक़्त था जब हम सुबह का नाश्ता और शाम का नाश्ता दोनों करते थे| किसी परिचित, अपरिचित और सदा – उपस्तिथ को बिना “चाय” – नाश्ता वापस नहीं जाने दिया जाता था| नाश्ता उत्तर भारतीय जनमानस के दैनिक जन जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना होती है| अगर किसी घर में जाकर आपको चाय – नाश्ता न मिले तो लोग उस घर में आर्थिक और सामाजिक स्टार के अनुसार उसे असभ्य, घमंडी, असामाजिक, गरीब, खस्ताहाल, गंवार, और ऐसा ही कुछ कहते थे| कई भारतीय शहरों में अगर आप किसी के घर जाएं और मेजबान को यह वक्त न दें कि वो आपको नाश्ता करा सके तो आपकी हाजिरी नहीं लगाई जाती है| कई बार मिलने का समय लेते हुए कहते है “बहुत कम देर के लिए आ पाएंगे, नाश्ते का समय नहीं दे पाएंगे, अभी से माफ़ कर दीजियेगा”| अगर यह जरूरी सभ्यता न दिखाई जाए तो आपके शिष्टाचार पर प्रश्न लगना लाजमी है|
यहाँ दिल्ली जैसे महानगरों में तो चाय – नाश्ता का मतलब चाय ही होता है मगर बाकी भारत में “चाय” की जगह पानी, शरबत, दूध, छाछ, लस्सी, कॉफ़ी, आदि आदि पेय हो सकते हैं मगर नाश्ता, हमेशा नाश्ता ही होता है| आजकल नाश्ता भारी भरकर होने लगा है जैसे परांठा, पूरी, कचौरी, सेंडविच आदि| यह सब ब्रेकफास्ट तो हो सकता है कि जल्दी जल्दी किया और काम पर निकल पड़े; राम जाने दिनभर एक निवाला नसीब हो न हो|
देशी भारतीय नाश्ता हमेशा “चना – चबैना” ही रहा है| देशी नाश्ता जब मन करे तब किया जा सकता है| भुना चना, मूंगफली, भुनी मटर, मक्का के फूले, मुरमुरा, खील, कौमरी, और न जाने क्या क्या| आज भी आप इलाहाबाद की किसी भी सड़क पर इसका एकदम ताजा लुफ्त उठा सकते है| और घरों में तो यह अमूमन रहता ही है| यह देशी नाश्ता वसामुक्त (नो-फैट) होता है साथ ही प्रोटीन और फाइबर से पूरी तरह से भरा हुआ| यानि सोलह आना देशी ताकत, पूरी तंदरुस्ती| फिर भी अफ़सोस है कि हम अपने देश की इन अच्छी बातों को भूलते रहे है|
आज भूमंडलीकरण (ग्लोबलाइजेशन) का दौर है| देशी विदेशी कंपनी जब देश में आ रहीं है तो अपने देश की ख़राब और अच्छी बातें अगर ला रहीं है तो हमारे देश की भी भूली बिसरी ख़राब और अच्छी बातें अपना भी रहीं हैं| एक साम्य उत्पन्न हो रहा है| अभी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का फेसबुकिया परिचय पढ़ रहा था:
More than 100 years ago, W.K. Kellogg saw the promise in a single grain. Standing true to this promise, Kellogg brings you ‘Anaaj ka Nashta’ made from the choicest Indian wheat, corn and rice for a breakfast that is as Indian as you are.
यह परिचय अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है| जब में इस पेज को देख रहा था तो पाया कि कई तरह के प्रयोग, कुछ नए कुछ पुराने, आजकल खाने को लेकर हो रहे हैं| एक प्रयोग देख कर तुक गया, जिसने मुझे लाई के लड्डू, मुरमुरे के लड्डू, और ऐसे ही कई पुराने भारतीय नाश्तों का स्मरण करा दिया|
इसे नाम दिया गया है “मूवी वाला नाश्ता: कॉर्नफ्लेक्स पॉपकॉर्न क्लस्टर”, शायद उन्हें पता है कि युवा भारत आजकल मूवी देखते समय ही इस तरह के प्रयोग कर पाता है| इसमें कॉर्नफ्लेक्स, पॉपकॉर्न, मेवा – मखाने, शक्कर, मख्खन, शहद, आदि का प्रयोग है| इसे हम शायद कहीं घूमते, टहलते हुए भी खा सकते है| अगर आपको देखकर और सुनकर ही खाने का लुफ्त उठाना है तो यह स्थान भी अच्छा है|







