मैं और मिच्छामि दुक्कडम्


सभी के जीवन में कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद आते हैं| उनके आवृत्ति और अन्तराल भिन्न हो सकते हैं| मेरे और आपके जीवन में भी आये हैं| सबको अपने दुःख प्यारे होते हैं| मैं और आप – हम सब उनके साथ जीते हैं| मैं क्या जानूं, दुःख क्यों आये| जब सोचता हूँ, तो हर दुःख के पीछे कोई न कोई मिल जाता है – पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, देश-विदेश, नेता-अभिनेता, अपराधी-आतंकवादी| कई बार किसी संत-महात्मा, धर्म-गुरु या प्रेरक वक्ता को पढ़ता-सुनता हूँ, लगता हैं – दुःख का कारण तो मैं ही हूँ| ध्यान के प्रारंभ में लगता हैं – मैं स्वयं दुःख हूँ| मैं दुःखी नहीं हूँ – स्वयं दुःख हूँ| मैं दुःख हूँ – अपने पर भी क्रोध आता हैं|

उन दुःखों को कितना याद करूं, जो भुलाये नहीं जाते| मैं दुःख नहीं भूलता| दुःख हमारी वास्तविकता होते हैं – भोगा हुआ यथार्थ|

प्रकृति और परिस्तिथि तो कठिन बनीं हीं रहतीं हैं| जीवन में कोई न कोई हमें कष्ट देता रहता है| कुछ मित्र-नातेदार तो बड़े ही प्रेम से कष्ट दे देते हैं| घृणा आती हैं उनसे और उनकी कष्टकारी प्रकृति से| ईश्वर भी कष्ट देता है| ईश्वर के पास तो कष्ट देने के अनोखे कारण है – भक्ति करवाना और परीक्षा लेना| मैं ईश्वर पर भी क्रोधित होता रहा हूँ| मैं किसी को अब मुझे दुःख देने का मौका नहीं देता| मैं अब क्रोध नहीं करता| पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, और ईश्वर को मेरे क्रोध से कोई फर्क नहीं पड़ता| तनाव और अवसाद तो मुझे होता है, मुझे हुआ था|

एक सज्जन मिले थे, उन्हें नहीं जानता| उन्होंने कहा था, क्रोध दान कर दे| मैंने कहा, क्रोध वस्तु है क्या? उन्होंने कहा, हाँ| किसे दूं दान? उन्होंने पास पड़े पत्थर की ओर इशारा किया| वो पत्थर अब कभी कभी तीव्र क्रोध करता होगा|

मगर फिर भी, अवसाद भी हुआ| अवसाद, समाज इसे पागलपन की तरह देखता है| मगर मुझे पता था, क्या करना है| मेडिकल कॉलेज में प्रोफ़ेसर ने कहा, यहाँ आये तो तो पागल कैसे हो सकते हो? दवा दे सकता हूँ| मगर दवा नहीं दूंगा, इलाज करूँगा| छोटी मोटी मगर गंभीर बातें हैं, यहाँ नहीं बताऊंगा| लोग गंभीर चीजों को घरेलू नुस्खा बना लेते हैं| बहरहाल मुझे लाभ हुआ|

अब मैं क्रोध नहीं करता| क्रोध दान कर दिया तो उसे कैसे प्रयोग करूं| कभी कभी खीज आती है और क्षोभ भी होता है| दो एक साल में क्रोध आता है, तो मैं उसे पल दो पल में वापिस कर देता हूँ| कई बार गलत लोगों को, गलत बात तो तीव्रता और गंभीरता से गलत कहता हूँ, तो क्रोध पास आ जाता हैं| मैं क्रोध का निरादर नहीं करता, क्षमा मांग लेता हूँ – मिच्छामि दुक्कडम्|

खामेमी सव्व जीवे, (khāmemi savva jīve)
सव्वे जीवा खमंतु मे, (savve jīvā khamaṃtu me)
मित्ती मे सव्व भुएसु, (mittī me savva-bhūesu)
वेंर मज्झं न केणई, (veraṃ majjha na keṇa:i)

मिच्छामी दुक्कडम (micchāmi dukkaḍaṃ)

सब जीवों को मै क्षमा करता हूं, सब जीव मुझे क्षमा करे सब जीवो से मेरा मैत्री भाव रहे, किसी से वैर-भाव नही रहे| मैं जीवों से ही नहीं निर्जीव, मृत, साकार, निराकार, सापेक्ष, निरपेक्ष, भावना और विकार सबसे क्षमा मांगता हूँ|

मैं दिन नहीं देखता, जब मन आता है, स्वयं से क्षमा मांग लेता हूँ, क्षमा कर देता हूँ, | अपने कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद के लिए मैं स्वयं को क्षमा कर देता हूँ| अगर मैं इन्हें ग्रहण नहीं करता तो यह मुझ तक नहीं आते|

मैं पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, और ईश्वर को, दिन नहीं देखता, क्षमा कर देता हूँ सबसे मन ही मन क्षमा मांग लेता हूँ| जैन नहीं हूँ, धार्मिक, आस्तिक, आसक्त और शायद निरासक्त भी नहीं हूँ| मगर संवत्सरी अवश्य मना लेता हूँ| भाद्प्रद माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी से प्रारंभ पर्युषण पर्व का अंतिम दिन – संवत्सरी| दसलाक्षाना का अंतिम दिन संवत्सरी| यह ही है क्षमावाणी का दिन| क्षमावाणी का यह दिन भारतीयता का जीवंत प्रमाण है|

पर्युषण पर्व के दौरान शाकाहार और जबरन शाकाहार का आजकल अधिक जोर हैं| मैं जीव-हत्या करने वाले मांसाहारी और कड़की खीरा कच्चा चबा जाने वाले शाकाहारी सबसे क्षमा मांग लेता हूँ|

मुझे संवत्सरी/क्षमावाणी आकर्षित करता है| भारतीय जैन ग्रंथों में, दिवाली और महावीर जयंती से अधिक महत्वपूर्ण जैन त्यौहार| अधिकतर भारतियों की तरह मुझे भी खान-पान से ही त्यौहार समझ आते हैं| परन्तु, मुझे यह त्यौहार भोजन से नहीं वचन से शक्ति देता है| मुझे दुःख, क्रोध, घृणा, तनाव और अवसाद से मुक्ति देता है|

अक्रोध और क्षमा ही तो भारतीय संस्कृति का मूल है| जुगाड़ और चलता है जैसी भारतीय भावनाओं के पीछे भी कहीं न कहीं यह ही है| ऐसा नहीं, हम भारतीय गलत को गलत नहीं मानते समझते और कहते| मगर अक्रोध और क्षमा को अधिकतर अपने साथ रखते हैं| अक्रोध और क्षमा हमारी जड़ों में इतना गहरा है कि हम इसे कई बार स्वप्रद्दत (for granted) मान लेते हैं| गुण दोष होते रहते हैं| फिर भी, समग्र रूप में, मैं आज जितना भी सफल हूँ, उसमें अक्रोध और क्षमा का बड़ा योगदान है|

ऐसा नहीं है कि अक्रोध और क्षमा पर केवल भारतियों का अधिकार हैं| बहुत से अन्य लोग भारतियों सोच से अधिक भारतीय हो सकते हैं| हो सकता है, मानवता हमारी सोच से परे जाकर भारतीयता को अपना ले| भारतीय आदर-सत्कार, भोजन, योग, मनोरंजन, बोलीवुड, अक्रोध और क्षमा विश्व अपना रहा है|

मिच्छामी दुक्कडम|

काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी


काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह नहीं रही होगी| इसमें बैठने की जगह हो न हो, यह जगह खास तो है और हर खाने वाले के दिल्ली दिल में खास जगह बना लेती है| पहली बार जब गया तो अजीब से सवाल से उमड़ रहे थे| पुराने दुकान की पुरानी डाट की छत से लटके पुराने पंखे, पुराने तंदूर से निकलती नान की महक, आप की साँसों से होते हुए पेट में पुकारने लगती है|

आप मेनू देखते है तो धुआंधार शब्द बार बार दिखता है – धुआंधार नान, धुआंधार लच्छा परांठा, धुआंधार पनीर मख्खन मसाला| यूँ है तो यह लज़ीज, मगर आपको चेतावनी देता हूँ – न खाएं| अगर खाते हैं तो छोड़ नहीं पाएंगे और हफ्तेभर तन-मन-धन से याद करेंगें|

यह परिवार और दोस्ती में प्रेम बढ़ाने वाला भोजनालय है – यहाँ एक नान में से “हम दो – हमारे दो” खा लेते हैं, कोई मनाही नहीं| आप पहले एक नान मंगा लें, लुफ्त उठायें और बाद में जरूरत के मुताबिक दूसरा – तीसरा मंगा सकते हैं| जब आप यहाँ कोई भारी-भरकम आर्डर देते हैं तो वेटर बेहद शीघ्र-शांत सलीके से आपको ये सलाह देंगें|

मेरे बेटे को यहाँ की लस्सी और रायता पसंद है, साथ में आलू प्याज  नान| उसके लिए यहाँ कुछ और मंगाने का मतलब नहीं| मैं यहाँ के नान का मुलाज़िम हुआ जाता हूँ, किसी सब्जी- दाल की न पूछिए|

दाल और सब्जी ज्यादातर कम मसालेदार और उम्दा हैं, मगर नान का ज़ायका आपके दिल में जो घर करता है, तो बाकि चीज़ो के लिए जगह नहीं| अमृतसरी थाली भी बहुत पसंद की जाती है| यह शाकाहारी भोजनालय है, जिसके पुराने बोर्ड पर “शुद्ध वैष्णव” लिखा हुआ है| अलबत्ता, प्याज लहसुन मिल जाता है| सलाद में बिना मांगे ढेर से प्याज मिलती है|

यह जगह है, पुरानी दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के पास| आप खारी बावली से बेहद उम्दा मेवे – मखानों की ख़रीददारी करने के बाद यहाँ आयें| आप दुकान में बाहर ढेर ग्राहक खड़े पाएंगे और दो बड़े तंदूर| परिवार वाले ग्राहक दूसरी मंजिल (first floor) पर बिठाये जाते हैं और उनके लिए अलग तंदूर वहां लगा है| तीनों तंदूर पर लगातार काम होता रहता है|

स्थान: काले – दी – हट्टी, निकट फ़तेहपुरी, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नान, धुआंधार नान,

पांच: साढ़े चार

देहरादून शताब्दी


रेलगाड़ियाँ घुमक्कड़ों की पहली पसंद हुआ करतीं हैं| मितव्ययता, समय-प्रबंधन, सुरक्षा और आराम, का सही संतुलन रेलगाड़ियाँ प्रदान करतीं हैं| अगर यात्रा दिन की है तो भारतीय रेलगाड़ियों में शताब्दी गाड़ियाँ बेहतर मानीं जा सकतीं हैं| नई दिल्ली देहरादून शताब्दी मुझे कई कारणों से पसंद है| यह आने और जाने दोनों बार सही समय पर पहाड़ों और वादियों में होती है| यह डीजल इंजन से चलने वाली महत्वपूर्ण गाड़ियों में से एक है|

अगर आप जाड़ों की सुबह नई दिल्ली देहरादून शताब्दी में बैठे हैं तो आपको पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लहलहाते सरसों के पीले खेत में उगते हुए सूर्य के दर्शन होते हैं| बड़े बड़े हरे भरे खेत यहाँ की विशेषता हैं| वैसे जब दिल्ली में कड़ाके की ठण्ड हो तो आप हाथ को हाथ ने सुझाई दे, ऐसे घने कोहरे का आनंद भी के सकते हैं| जाड़ों में यह रेलगाड़ी आपको पहाड़ों की रानी मसूरी के बर्फ भरे पहाड़ों तक पहुँचने का माध्यम हो सकती है|

यह ट्रेन गन्ने के खेतों, गुड़ बनाने के लघु-उद्योगिक इकाइयों, बड़ी चीनी मीलों के पास से गुजरती है| कई बार आप इस गंध का आनंद लेते हैं तो कभी कभी आपको यह बहुत अच्छी नहीं लगती|

आते जाते देहरादून शताब्दी इंजन के दिशा परिवर्तन के लिए सहारनपुर में आधे घंटे रूकती है| मुझे यह आकर्षक लगता है| बच्चे इसे देखकर रेलगाड़ियों के बारे में बहुत कुछ समझ बूझते हैं और पहुत प्रश्न करते हैं| बहुत सी ट्रेन अपने इंजन की दिशा परिवर्तन के लिए रुकतीं हैं परन्तु यह कम लम्बी गाड़ी हैं इसलिए बच्चे इंजन का निकलना और लगना दोनों देखने चाव से कर सकते हैं| साथ ही प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ भी कम होती है|

इसके बाद यह ट्रेन एक भारत के महत्वपूर्ण शैक्षिक शहर रूड़की और महत्वपूर्ण धार्मिक शहर हरिद्वार में रूकती है| हरिद्वार से गुजरते हुए यह थोड़े समय के लिए आपको धार्मिक बना देती है| इस रेलगाड़ी की अधिकतर सवारियां हरिद्वार से चढ़ती उतरतीं हैं|

हरिद्वार के बाद यह गाड़ी राजाजी राष्ट्रीय उद्यान (राजाजी नेशनल पार्क) से होकर गुजरती है| यहाँ इसकी गति अपेक्षागत धीमी रहती है| यह एक बाघ आरक्षित (टाइगर रिज़र्व) क्षेत्र है| रेलगाड़ी में बैठकर बाघ और अन्य जंगली जानवर देखना तो मुश्किल है, मगर आप यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य को निहार सकते हैं| शाम को जब रेलगाड़ी देहरादून से नई दिल्ली के लिए लौटती है तब यहाँ का सौन्दर्य देखते बनता है| इस रेलगाड़ी में लौटते हुए हरिद्वार से पहले का यह समय बहुत शांत होता हैं| यह उचित समय हैं, जब सूर्यास्त के समय आप शांत रहकर खिड़की के बाहर मोहक सौंदर्य का आनंद लेते हैं| कई बार लगता है खिड़कियाँ छोटी पड़तीं हैं|राजाजी राष्ट्रीय उद्यान से गुजरते हुए यह गाड़ी एकल ट्रैक होती है, अर्थात आने -जाने के लिए एक ही ट्रैक से गाड़ियाँ गुजरतीं हैं| कुछेक स्थान पर पहाड़ काटने से बनी दीवार आपकी खिड़की से  हाथ भर ही दूर होती है| बहरहाल, दूसरी रेल लाइन का काम चल रहा है|

मार्च के पहले सप्ताह की शाम, देहरादून से लौटते हुए जब मैं अपने दोनों ओर संध्याकालीन सौंदर्य को निहार रहा हूँ, अधिकांश यात्री देहरादून और मसूरी की अपनी थकान उतारना चाहते हैं| मैं शांतिपूर्वक चाय की चुस्कियों के साथ सुरमई शाम का आनंद लेता हूँ| हरि के द्वार पहुँचने से पहले प्रकृति के मायावी सौन्दर्य का आनंद अलौकिक है|