घूम घुमक्कड़ घूम


घूमना भी अजब शौक है| घूमने वाला रास्तों पर घूमने से पहले अपने घूमने का रास्ता खुद बनाता है| आप कब घूमने चल देंगे यह खुद को भी दो दिन पहले तक नहीं पता होता| यह अचानक होने वाली घुमक्कड़ी ही जिन्दगी की असल मौज है|

चंडीगढ़ में अपने मित्र से बात करते करते अचानक तय हुआ कि कल चंडीगढ़ पहुंचा जाये| वैसे भी शनिवार मुझे घुमने फिरने के लिए शानदार दिन लगता है| आप अगर रविवार को आराम करते हैं तो हफ्ते भर का काम और घुमने फिरने की थकान सब मिट जाता है और आप पूरी तरह तरोताजा होते हैं| वरना घूमना भी अगर आपके टन – मन को आराम न दे और काम बन जाये तो आप इसका आनंद नहीं उठा सकते|

बस लैपटॉप उठाया,  ट्रेवल साईट देखी, फ्लाइट बुक| अब टैक्सी बुक करने की बारी है, यह भी तो तो चार क्लिक का काम है| लगता है तकनीकि हम घुमक्कड़ों के लिए वरदान बन कर आई है| घूमने का सबसे साधारण और सबसे महत्वपूर्ण नियम – सामान कम| तो एक हैण्डबैग में जरूरी सामान और कपड़े डालो और चल दो| इस से फायदा यह है कि आप वेब चेक – इन भी आसानी से करवा सकते हैं|

सुबह सुबह की फ्लाइट मुझे बेहद शानदार लगती है| आखिर आप दिन निकलते ही आसमां के ऊपर होते हैं| बादलों के ऊपर उड़ने का अपना मजा है| कम दूरी की हवाई यात्रा में बस यही शिकायत है, सफ़र शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाता है|

जाकिर हुसैन रोज गार्डन , चंडीगढ़   चित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

जाकिर हुसैन रोज गार्डन , चंडीगढ़
चित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

केवल हैण्ड बैग लेकर चलने का एक फायदा यह भी है कि आपको गंतव्य पर अपने सामान का इन्तजार नहीं करना पड़ता| मेरा अगला कदम था चंडीगढ़ का प्रसिद्ध रोज़ गार्डन| सुबह सुबह हजारों गुलाबों के बीच घंटा भर बिताना तो बनता है| मेरे मेजबान भी वहीँ पास में रहते हैं| तो उन्हें भी वही आना था| हमने गुलाबों के बीच चहल कदमी की, नाश्ता किया और फिर रॉक गार्डन का रुख किया| मैं सोचता हूँ, हजारों गुलाबों के बीच से निकाल कर हजारों मूर्तियों के बीच पहुँच रहा हूँ|

गजब की जगह है| ध्यान से देखो तो कबाड़ और पुरानी टूटी फूटी चीजों से रची गई एक सृष्टि| एक रूहानी सी दुनियाँ में एक रोमानी सा भटकाव| मैं विस्मृत हूँ| शायद किसी ने परीकथा लिखी है| नहीं, यह परीलोक ही है, जिसे सुला दिया गया है| वक़्त रुक गया है, घड़ी चल रही है, पता नहीं चलता कब चार घंटे बीत गए| जैसे ही बाहर आये तो तेज भूख सताने लगी|

हम अब सुखना झील की तरफ जा रहे थे| वही सबने अपनी अपनी पसंद का कुछ न कुछ खाया| और इसके बाद एक घंटा नौकायन| झील में नाव चलाने का अपना आनंद है, अगर मित्र या परिवार साथ हो तो यह आनंद कई गुना बढ़ जाता है| बाद में थोड़ी देर झील के किनारे किनारे दूर तक चलते गए|

वैसे आनंद तो बाजार में घूमने में भी आता है| शाम को हम सुखना झील से हम बाजार के लिए चल दिए| चंडीगढ़ का सेक्टर 17 का बाजार तफ़रीह और घूमने फिरने के लिए बहुत शानदार जगह है| यहाँ भीड़ कितनी भी हो सब आपको किसी बाजार में नहीं पार्क में घूमने जैसा अहसास होता है| देर शाम तक यूँ ही घूमते फिरते गाते – गुनगुनाते रहे| खाने पीने के बाद थोड़ी देर मेजबान के घर गए| यह एक शगल था| जिसके बुलाने पर आये हों उसका घर देखना तो बनता है|

मेरा अब चंडीगढ़ रुकने का मन था| मगर रविवार को मेरा आराम करने का दिन है| काम –  शौक  -आराम और घर – परिवार में एक संतुलन होना चाहिए| सामने से टैक्सी ली और चल दिए| मुझे यहाँ से दिल्ली में अपने घर तक बहुत समय नहीं लगेगा| एक दिन के लिए इस तरह घूमने जाना कोई मुश्किल काम नहीं है:

सुबह 4.30 घर से एअरपोर्ट के लिए प्रस्थान

सुबह 6.00 (जेट एयरवेज) विमान चंडीगढ़ के लिए रवाना

सुबह 7.15 विमान चंडीगढ़ पहुंचा

सुबह 8.00 ज़ाकिर हुसैन रोज़ गार्डन

सुबह 10.00 रॉक गार्डन

दोपहर 14.30 भोजन

दोपहर 15.30 सुखना झील नौकायन

शाम 17.30 सेक्टर 17 मार्किट

शाम 22.00 खाना – पीना और पुरानी यादें – नई गप्पें

रात 00.00 रेलवे स्टेशन प्रस्थान और भारतीय तरीके से खूब सारी विदा

रात 01.10 कालका हावड़ा मेल से दिल्ली

सुबह 5.30 दिल्ली

मणिराम हरिराम का चीला


जब भी अलीगढ़ जाना होता है तो ट्रेन से उतरने के बाद चीला खाना मेरा पसंदीदा शगल है| बचपन में चीला मेरे लिए अचरज था, क्योंकि मेरे सभी साथी अंडे वाला चीला पसंद करते थे, बल्कि कहें तो उसके दीवाने थे| घर पर माँ बेसन के चीले बनती थी जो इतने शानदार नहीं लगते थे कि उनके लिए दीवाना हुआ जाये| बाद में जब “स्ट्रीट फ़ूड” के लिए स्वाद विकसित हुआ तो उसे समझने के दौरान बेसन, मूंग दाल और अंडे का चीला और उनका अंतर समझ में आया|

बहुत से लोग चीले को उत्तर भारत का डोसा मानते हैं| मगर चीला चटनी के साथ खाने की चीज है| बेसन (साथ में कभी कभी रवा/सूजी भी) का चीला खाने में पतला मगर पेट में थोड़ा भारी होता है| अंडे का चीला मूल रूप से मूंग दाल का ही चीला है, मगर उसमें अंडा फैंट कर डाला जाता है|

अलीगढ़ में बेसन और अंडे के चीले में कटा हुआ उबला आलू, प्याज आदि भरकर थोड़ा सेका जाता है और बाद में इस तरह ग्यारह बारह टुकड़े कर दिए जाते हैं, जैसे भुर्जी बनाना चाह रहे हों| यह चीला सिकते समय देखने वाले को मसाला डोसा लगता है तो परोसे जाते समय आलू चाट जैसा| इसके उप्पर चटनी डालकर चम्मच से खाते हैं| (वैसे कुछ अलीगढ़ी लोग आमलेट चीले की भी मांग करते हैं)

मूंग की दाल का चीला, चीलों की दुनिया का बादशाह है| मूंग की दाल के चीलों में भी मुझे पहले अलीगढ़ में राजू का चीला पसंद था तो आज मनीराम – हरीराम का चीला|

सुदामापुरी क्रासिंग (अब सुदामापुरी पुल के नीचे) दो भाई अपनी अपनी ठेलों के एक साथ मिलकर खड़ी करते हैं, जिससे भाइयों का प्यार दीखता है| पहली ठेल पर मूंग दाल और दूसरी ठेल पर अंडे का चीला|

मेरी पसंद मूंग दाल का चीला|

आज अंडे का चीला बनाने वाला भाई बीमार है, मेरी दो मूंग दाल चीले की इच्छा रखी है| खुराक से हिसाब से दो चीले पांच रोटी के बराबर का मामला है| पांच चीले पहले हैं – मुझे बताया जाता है| मुझे छटवां और नवां चीला दिया जायेगा| अब हम गप्पे मारेंगे या बीस मिनिट टहल सकते हैं|

पीसी हुई मूंग की दाल को कटोरी भरकर लिया जाता है| और तवे पर फुर्ती से फैलाया जाता है, डोसे की तरह पतला नहीं करते, थोड़ा मोटा रहता है| बात चलती है, चीले को फ़ैलाने का समय और चक्कर दोनों एकदम पक्के हैं, कम या ज्यादा में वो मजा नहीं रहता| जो लोग फ़ैलाने को आसान बनाने के लिए दाल में पानी डालते हैं, वो अपने चीले और यश दोनों में पानी डाल लेते हैं|

जिस समय यह सिक रहा होता है, उसी समय इस पर अदरक, प्याज, मिर्च लगा कर हाथ से थपथपा और दुलार देते हैं| इसके बाद सीधे इसके ऊपर ही पनीर को कद्दूकस कर कर उसकी परत बनाते हैं| पहले से पनीर को घिसकर नहीं रखा जाता| इससे एक समान पर्त बनती है| वह इस को फिर से हाथ से थपथाकर दुलार देता है| यही दुलार तो चीले में जान डालता है| इसके बाद ५० ग्राम मक्कन की टिकिया सिकते हुए चीले के नीचे सरकी जाती है|

दो मिनिट के बाद चीला थोड़ी देर के लिए पलट दिया जाता है| यह भूख को जगा लेने का समय है| चीले के ठीक आठ बराबर हिस्से होते हैं, जी हैं पूरे सात कट| चीला आपकी थाली में परोसा जाता है| आपके सामने खट्टी (हरी) और मीठी (सौंठ) चटनी हैं|

मगर मैं पुराना ग्राहक हूँ| मैं शिकायत करता हूँ| अगर चटनी ग्राहक को अपने हाथ से लेनी पड़े तो वो प्यार मोहब्बत वाला स्वाद नहीं आता|

खाने की हर चीज कला और विज्ञान से भले ही बनती हो, जबतक दुलार न हो वो खाना बन सकती है, स्वाद नहीं| बेसन और अंडे के चीले अगर चम्मच से चाट की तरह खाए जाते हैं तो मूंग दाल चीला हाथ से खाने में स्वाद देता हैं| अगर मूंग दाल चीले के आठ की जगह बारह हिस्से हो तो बेहतर हो, मगर कहीं स्वाद न बदल जाए|

और इस प्यार और दुलार भरे एक चीले का मूल्य 60 रुपये| समय शाम दिन छिपने के बाद| अलीगढ़ की सुदामापुरी रेलवे फाटक (अब पुल)|

पुनः – किसी ज़माने में सुदामापुरी फाटक को खूनी फाटक कहते थे, मगर अब कुछ साल से पुल बन गया है|

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सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

साइकिल की हमारी सवारी


स्कूल में जिन दिनों पंडित सुदर्शन (मूलनाम बद्रीनाथ भट्ट)  की कहानी “साइकिल की सवारी” पढ़ी थी तब मुझे साइकिल चलानी नहीं आती थी| मुझे लगता था कि अगर साइकिल बहुत बचपन में में सीख लेने की चीज है, वर्ना किसी मुसीबत से कम नहीं है| पापा की साइकिल मोहल्ले में सबसे ऊँची और भारी साइकिल थी और उस पर हमसे लठ्ठा साइकिल नहीं चलती थी| दस पैसे रोज पर छोटी साइकिल किराये पर लाने का मतलब जेबखर्च सीधा सीधा नुक्सान था|

खैर दसवीं क्लास के बाद मैनें साइकिल जैसे तैसे सीख ली क्योंकि बारहवीं में हमारा सेंटर घर से चार किलोमीटर दूसरे कस्बे में (सिकंदराराऊ से पुरदिलनगर) था और माँ नहीं चाहतीं थी  कि मैं पैदल जाऊं|

बारहवीं के बाद मैं कभी दोबारा साइकिल चलाई हो, ऐसा याद नहीं|

अभी पिछले महीने, पत्नी जी ने साइकिल खरीदी और दिल्ली जैसे शहर में वो उसे एक दो बार दफ्तर भी ले गई, तो सोचा यार कुछ तो किया जाए| मैं बेटे तो स्कूल छोड़ने और लाने के लिए साइकिल लेकर जाने लगा| दिल्ली के भीष्म पितामह मार्ग पर साइकिल लेन तो बनी हुई है मगर उसके हालत नाजुक हैं| लगता है किसी नाले ले ऊपर कमजोर कंक्रीट से इसे बनाया गया है| जगह जगह टूटा फूटा भ्रष्टाचार दिखाई देता है| बकाया जगह पर घरविहीन लोगों की रिहायश और बैठकें हैं|

मगर पिछले हफ्ते सुबह सुबह पांच बजे घर से साइकिल पर निकले| अरविंदो मार्ग पर ट्रैफिक कम था| सुबह की ठंडक तारी थी| चिड़ियों के करलव की सुरताल कान में शहद घोलने लगी थी| लोदी रोड पर चहलकदमी करने वालों की रोनक होने लगी थी| गर्मीं की सुबह शीतल पवन, चिड़ियों की चहचाहट, आसमान में उड़ते पक्षियों की रौनक ये वो इनाम हैं जो जल्दी उठने वालों को नसीब होते हैं|

पंडारा रोड होकर मैं इण्डिया गेट पहुँचता हूँ| बहुत से तेज रफ़्तार गाड़ियाँ हैं| कई साइकिल सवार भी आये हुए हैं| बढ़िया बढ़िया साइकिल और सवार की सुरक्षा के सारे इंतजामात देख कर हैरान हूँ| साइकिल भी कोई ग़रीबी का खेल नहीं है| वैसे भी तेज रफ़्तार गाड़ियों के बीच दिल्ली में साइकिल चलाना दुष्कर कार्य है| सोचता हूँ दिल्ली के सबसे बड़े पिकनिक स्पॉट, दिल्ली के गौरव इन्डिया गेट पर साइकिल चलाना खतरनाक मगर मजेदार काम है|

तभी, तेज रफ़्तार साइकिल से एक सत्तर साला जवान मुझे पीछे छोड़ देते हैं| मैं इण्डिया गेट को चारों तरफ से देख रहा हूँ| शानदार नजारा है| तेज रफ़्तार गाड़ियाँ मुझे रास्ता दे रहीं हैं|