बहुत दिन हुए
दिवाली हुए
चलो
किसी गैर मुल्क का
दिवाला पीटा जाए
कुछ तलवार दिमागों को
जंग लगाया जाए
मोर्चा सजाएं
जवान दहलीजों पर|
बहुत दिन हुए,
हथियारों की
दलाली खाए||
बहुत दिन हुए
दिवाली हुए
चलो
किसी गैर मुल्क का
दिवाला पीटा जाए
कुछ तलवार दिमागों को
जंग लगाया जाए
मोर्चा सजाएं
जवान दहलीजों पर|
बहुत दिन हुए,
हथियारों की
दलाली खाए||
तुम्हारे हर न के लिए
मेरा प्रतिशोध होगा
चिर अनंत तक झूल जाना
पौरुष के भग्नावशेष के साथ |
क्योंकि टूटा पुरुष भारतीय
निराशा के क्षीरसागर से
निकलता हुआ तिमिर है |
और तुम असमर्पित!
गलबहियां डालना
नागवेणी बनकर |
मेरी माँ ने भी कदाचित
न नहीं कहा था निश्चित
मुझे धारण करने से पहले|
गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,
बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,
बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|
तेरे प्यार की टूटन की तरह टूटता तन बदन,
पोर पोर से दर्द – दर्द से रिसता हुआ गगन,
मेरे अंतर उतरती प्यार की पहली पहली चुभन,
हौले हौले चुभती तेरी साँसों की बहकी पवन|
गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,
बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,
बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|
तंदूर की तलहटी में भुनता तंदूरी चिकन,
छिटक छिटक जाता चरमराता अंतर्मन,
इश्क़ की कड़ाही के जलते तेल में तलते
आखिरी उम्मीद का चढ़ता इश्क़न बुखार|
गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,
बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,
बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|
चौपड़ की बिसात पर शकुनि का पासा,
धृतराष्ट्र की धूर्तसभा में विदुर की भाषा,
अंधे भीष्म का जोशीला सांस्कृतिक प्रलाप,
अस्पताल में दम तोडती मरीज की मुनिया|
गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,
बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,
बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|