बेवफ़ा


मेरी बेवफ़ा ने मुझे छोड़ा न था, दिल तोड़ा न था|

मेरी जिन्दगी से रूह निकाली न थी|

मेरी जिन्दगी में न जलजले आये, न सूखी आँखों में सैलाब, न बिवाई फटे पाँवों तले धरती फटी|

जिन्दगी यूँ ही सी घिसटती सी थी, नीरस, बंजर, लम्बी ख़ुश्क सड़क बिना मंज़िल चलती चली जाती हो|

उस के बिना कल दो हजार एक सौ सतासीवीं यूं ही सी उदास शाम थी|

कहवाखाने के उस दूर धुंधले कोने में उसका शौहर कड़वे घूँट पीता था|

काँगड़ा की उस कड़क चाय की चुस्की के आख़िरी घूँट पर ख़याल आया|

इश्क़ मेरे दिल से रिस रिस के तेरे हुज़ूर में सज़दे करता है, मिरे महबूब!

मेरे माशूक किस कहर से बचाया था तूने मुझे|

वो रात गुजरी थी


वो रात गुजरी थी खड़ामा खड़ामा
किसी चोर पुराने की तरह गुपचुप,
उम्मीद में लौ ए चराग़ शमा ए सुब
दिल बैठे बैठे जाता रहा जाता रहा।

चुपचुप चीखते चटखते तलवे तले
जमीन थी भी कुछ बोझिल बोझिल
उम्मीद के लम्बे साये से डरता हुआ
हौसला हमसाया बैठा रहा बैठा रहा।

दूर सितारे की गर्मी से भरमता हुआ
धड़कन भर धड़कते हुए धधकता रहा
नाउम्मीदियों में रात कुछ बाकी रही
यूँ गुजर रही जागता रहा जागता रहा।

आज की रात सोने दो


मैं तुमसे कहता हूँ

फिर की बातें फिर ही करना,

क्या पता, कल सुबह काली हो,

क्या पता, कल की सुबह काली हो|

आज की रात सोने दो||

 

नींद की क्यारी में

सपनों के बीज बोने दो,

क्या पता, उन्नीदी बंजर हो,

क्या पता, समय की गोद सूनी हो|

आज की रात सोने दो||

 

बिखरा हुआ सपना मेरा,

नींद में तो खिलने दो|

क्या पता, आँखों में मंदी हो,

क्या पता, आँखों पर हदबंदी हो,

आज की रात सोने दो||

 

कल की झूठी आशा में,

ये मंजर धुंधला न खोने दो|

क्या पता, कल घोर निराशा हो,

क्या पता, कल उन्नत आशा हो,

आज की रात सोने दो||