शेर-हिरण की पहेली


अगर आप भूखे शेर को हिरण का पीछा करते देखें तो क्या करेंगे? पुरानी पहेली है| अगर आप कुछ नहीं करते तो कायर, नाकारा, मांसाहारी, हिंसक, शोषक, और मूर्ख मान लिए जाते हैं| मजे की बात हैं जो लोग हत्यारे अपराधी या बलात्कारी को छोड़िए जेबकतरे से भी किसी को बचाने का प्रयास नहीं करते, इस कल्पित पहेली के शेर के सामने कूद मरने के लिए आमादा रहते हैं|

यदि आपको हिरण के जीवन की चिंता है तो शेर का मुक़ाबला करने की जगह उसके लिए प्राकृतिक दुर्घटना में कुछ ही पल पहले मृत किसी जानवर का इंतजाम करना होगा| उसे हिरण या कोई और जानवर चाहिए, उसे ताज़ा मांस चाहिए होता है| यह श्रमसाध्य या लगभग असाध्य काम हम आप तो नहीं ही करेंगे| हम नहीं सोचेंगे कि शेर भूखा है और उसका भोजन घास नहीं मांस है| अगर आप शेर का सामना कर कर हिरण को बचा लेते हैं तो अपने आप को कई प्राकृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक प्रश्नव्यूह में फंसा लेते हैं| क्या आप अन्जाने में शेर की हत्या करना चाहते हैं? क्या आप हिरण के कार्मिक चक्र में हस्तक्षेप करना चाहते हैं? क्या आप ईश्वर निर्धारित प्राकृतिक भोजन श्रेणी को बदल देना चाहते हैं?

हिरण का जन्म किसी कार्मिक चक्र के कारण हुआ है और उसके जीवनचक्र के अनुसार उसका मरण होना ही है| जंगल की प्राकृतिक सम्भावना उसके शिकार होने में ही है| हम कुछ भी करें उनकी मृत्यु निश्चित है| हिरण के लिए हिरण योनि से मुक्ति का समय है| क्या हम इसमें हस्तक्षेप करेंगे?

शेर या कोई भी शिकारी जानवर भूख से अधिक शिकार नहीं करता और इस एक शिकार पर कई जानवरों और उसके उपरांत सैकड़ों क्षुद्र कीटों का उदर पोषण होता है| शेर यदि मात्र मनमौज के लिए भूख से अधिक शिकार करता है तो उसके लिए पाप होता है| यह पाप तो तब भी होता है जब हम शाकाहारी या सात्विक भोजन भी भूख से अधिक खाते हैं और उदररोग का दण्ड पाते हैं जो मोटापे से लेकर कई कष्टों तक जाता है|

शेर और हिरण की इस पहेली में हमें मात्र प्रेक्षक ही बनना है| यह हमारा दण्ड या पुरस्कार हो सकता है| निर्लिप्त प्रेक्षक बनकर आप ईश्वर और ईश्वरीय नियम में आस्था रखते हैं| सबसे बड़ी बात आप अपने आप को हत्या करने से बचा लेते हैं|

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भीषण लू-लपट और करोना


विश्व-बंदी २६ मई – भीषण लू-लपट और करोना

जब आप यह पढ़ रहे होंगे तब भारत में करोना के डेढ़ लाख मामलों की पुष्टि हो चुकी होगी| कोई बुरी खबर नहीं सुनना चाहता| मुझे कई बार लगता है कि लोग यह मान चुके हैं कि यह सिर्फ़ दूसरे धर्म, जाति, वर्ग, रंग, राज्य में होगा| सरकार के आँकड़े कोई नहीं देखता न किसी को उसके सच्चे या झूठे होने का कोई सरोकार है| आँकड़ों को कलाबाजी में हर राजनैतिक दल शामिल है हर किसी की किसी न किसी राज्य में सरकार है| कलाबाजी ने सरकार से अधिक समाचार विक्रेता शामिल हैं जो मांग के आधार पर ख़बर बना रहे हैं| जनता शामिल है जो विशेष प्रकार कि स्वसकरात्मक और परनकारात्मक समाचार चाहती है|

इधर गर्मी का दिल्ली में बुरा हाल है| हार मान कर कल घर का वातानुकूलन दुरुस्त कराया गया| चालीस के ऊपर का तापमान मकान की सबसे ऊपरी मंजिल में सहन करना कठिन होता है| खुली छत पर सोने का सुख उठाया जा सकता है परन्तु सबको इससे अलग अलग चिंताएं हैं|

मेरा मोबाइल पिछले एक महीने से ख़राब चल रहा है परन्तु काम चलाया जा रहा है – इसी मैं भलाई है| तीन दिन पहले एक लैपटॉप भी धोखा दे गया| आज मजबूरन उसे ठीक कराया गया| उस के ख़राब होने में गर्मी का भी दोष बताया गया|

इस सप्ताह घर में गृह सहायिका को भी आने के लिए कहा गया है| क्योंकि पत्नी को उनके कार्यालय ने सप्ताह में तीन दिन कार्यालय आने का आदेश जारी किया है|

यह एक ऐसा समय है कि धर्म और अर्थ में सामंजस्य बैठना कठिन है – धर्म है कि जीवन की रक्षा की जाए अर्थ विवश करता है कि जीवन को संकट मैं डाला जाए| मुझे सदा से घर में कार्यालय रखने का विचार रहा इसलिए मैं थोड़ा सुरक्षित महसूस करता हूँ| मैं चाहता हूँ कि जबतक बहुत आवश्यक न हो घर से बाहर न निकला जाए| मैं अति नहीं कर रहा चाहता हूँ कोई भी अति न करे| न असुरक्षित समझने की न सुरक्षित समझने की| गर्मी और करोना से बचें – भीषण लू-लपट और करोना का मिला जुला संकट बहुत गंभीर हो सकता है|

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विश्व-बंदी २४ मई


उपशीर्षक –  पिनाराई विजयन

केरल – ईश्वर का अपना देश| पर साम्यवाद का बहुमत| वर्तमान में हिन्दू धर्मं के सर्वसुलभ रूप के संस्थापक आदि शंकराचार्य की भूमि – परन्तु शेष भारत और उत्तर भारतीय हिन्दुओं  में गोमांस भक्षण के कारण निन्दित| जब केरल जाएँ तो हर कण में संस्कृति के दर्शन – परन्तु कट्टरता और उदारवाद का सम्पूर्ण समिश्रण| केरल के आधा दर्जन यात्राओं में मुझे कभी केरल के सामान्य जीवन में कट्टरता नहीं मिली| केरल में मुझे हिन्दू, मुस्लिम और ईसाईयों के बीच आपसी समझ अधिक दिखाई देती हैं| सभी लोग अपनी साँझा संस्कृति के प्रति विशेष लगाव रखते हैं|

उत्तर और पश्चिम भारत में सांप्रदायिक तनाव के पीछे भारत विभाजन की याद जुड़ी हुई है| जिन मुस्लिमों ने पाकिस्तान की मांग की, उनमें से कई गए नहीं| कई मुस्लिम जिनके पुरखों को पाकिस्तान का पता नहीं मालूम वो सोचते हैं कि गलती हुई कि नहीं गए| हिन्दू खासकर शरणार्थी हिन्दू सोचते हैं कि यह लोग क्यों नहीं गए| मगर दक्षिण भारत खासकर केरल में यह सोच प्रायः नहीं है| केरल का हिन्दू- मुस्लिम कट्टरपंथ पाकिस्तान से अधिक अरब से प्रभावित है|

इस सब के बीच केरल भारत के आदर्श राज्यों में है| बंगाल और केरल भारतीय वामपंथ की प्रयोगशाला हैं – बंगाल असफल और केरल सफल| केरल में विकास और राष्ट्रीय जुड़ाव (राष्ट्रवाद नहीं) बंगाल ही नहीं किसी अन्य राज्य से बेहतर है| केरल में आप मलयालम हिंदी या अंग्रेजी का झगड़ा नहीं झेलते| यहाँ हिंदी प्रयोग बहुत सरल है|

केरल के सबसे बड़ी बात यह है कि यहाँ शिकायतें कम हैं| यह राज्य अपने बूते उठ खड़ा होने का माद्दा रखता है| २०१८ की बाढ़ की दुःखद याद को मैंने २०१९ की अपनी कई यात्राओं में देखा| सब जानते हैं कि केंद्र सरकार से केरल को वांछित मदद नहीं मिल पाई| परन्तु मुझे आम बातचीत में इसका मामूली उल्लेख मात्र ही मिला| इस से अधिक शिकायत तो उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग तब करते हैं जब केंद्र और राज्य दोनों में एक दल की सरकार हो और पर्याप्त मदद मिली हो|

हभी हाल में केरल ने बिना किसी परेशानी और मदद के कोविड-१९ से लड़ने की शुरुआत की थी| जिस समय उत्तर भारतीय करोना के लिए गौमांस और शूकरमांस भक्षण के लिए केरल को कोस रहे थे और बीमारी को पाप का फल बता रहे थे – केरल शांति से लड़ रहा था| यह लड़ाई पूरे भारत की सबसे सफल लड़ाई थी|

२०१८ की बाढ़ हो या २०२० का करोना, पिनाराई विजयन का नेतृत्व उल्लेखनीय है| आज उनका जन्मदिन है| भले ही यह असंभव हो, परन्तु मुझे लगता है कि उन्हें केरल के मुख्मंत्री पद से आगे बढ़कर भारत का प्रधानमंत्री बनना चाहिए| ऐसा न होगा, भारतीय लोकतंत्र का गणितीय दुर्भाग्य है|जन्मदिन की शुभकामनाएं|

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विश्व-बंदी २३ मई


उपशीर्षक –  तर्कपूर्ण और समझदारी वाले पूर्वाग्रह

मेरे मित्र हैं जिन्हें विश्वास था कि उनका महान और समझदार नेता लॉकडाउन-४ को बहुत सख्त रखेगा क्योंकि मुस्लिम समुदाय के त्यौहार के समय कोई समझदार आदमी मूर्खता पूर्ण जोखिम नहीं उठाएगा| मैं उस समय जोर से हंसा और उन्हें वादा किया कि सरकार लॉकडाउन-४ को मॉक-डाउन बनाने जा रही हैं| इसके बाद जैसा कि हमेशा होता हैं तो मुझे तर्कपूर्ण और समझदारी की बात करने की सलाह देने लगे| मजे की बात यह है कि जब भी यह इस प्रकार के मित्र तर्कपूर्ण और समझदारी की बात काम धंधे से इतर प्रयोग करते हैं तो मेरा विश्वास प्रबल रहता है कि अपने पूर्वाग्रह को थोपने का प्रयास हो रहा है|

खैर उनकी तर्कपूर्ण और समझदारी वाली बातें न मैं सुनता न कोई और|

इस बार तो एक मजे की बात भी हुई| उन्होंने के वास्तविक तार्किक विचार रखा| मैंने सूचित किया कि कांग्रेस नेता चिदंबरम पहले ही इस आशय का ट्वीट कर चुके हैं| वो परेशान होकर बोले – अरे, अब इस विचार को कोई नहीं सुनेगा| इस प्रकार उनके तर्क-संगत विचार को उनके समझदार नेताओं के मस्तिष्क में जगह नहीं मिली|

वैसे वह प्रधानमंत्री मोदी को बहुत तर्कपूर्ण और समझदार मानते हैं परन्तु जिस बातों के लिए मोदीजी को वह धन्यवाद कर देते हैं वह खुद उल्टी पड़ जातीं हैं| उनका परम विश्वास था कि मोदी जी आधार और वस्तुसेवाकर जैसे कुत्सित कांग्रेसी विचारों को प्रधानमंत्री बनते ही दमित कर देंगे| उस दिन मजे लेने के लिए मैंने कहा कि कांग्रेस जिनकी दुकान हैं मोदी जी उनके पुराने ग्राहक हैं| आधार और वस्तुसेवाकर ऐसा आया कि मित्र प्रवर को उसके समर्थन में बहुत तीव्र श्रम कर कर ज्ञान प्राप्त करना पड़ा| हाल में यही हाल मनरेगा मामले में भी हुआ – इस कांग्रेसी घोटाले के भांडाफोड़ करने की उम्मीद में वो मई २०२० में निर्मला जी का भाषण देख रहे थे| पता चला निर्मला जी ने खुद बाबा मनरेगा की शरण ली| दरअसल मित्र महोदय को लगता था कि मजदूरों के पलायन में मनरेगा का हाथ है|

खैर थाली बजाने मोमबत्ती जलाने और गाल बजाने के सभी काम करने के बाद आजकल उन्हें किसी नए टास्क की तलाश है|

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विश्व-बंदी २० मई


उपशीर्षक –  ज़रा हलके गाड़ी हांको

क्या यह संभव है कि आज के करोना काल को ध्यान रखकर पाँच सौ साल पहले लिखा गया कोई पद बिलकुल सटीक बैठता हो?

क्या यह संभव है कि कबीर आज के स्तिथि को पूरी तरह  ध्यान में रखकर धीरज धैर्य रखने की सलाह दे दें?

परन्तु हम कालजयी रचनाओं की बात करते हैं तो ऐसा हो सकता है|

ज़रा हल्के गाड़ी हांको, मेरे राम गाड़ी वाले…

अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों को संभलकर चलाने का पूरा सुस्पष्ट सन्देश है|

गाड़ी अटकी रेत में, और मजल पड़ी है दूर…

वह हमारी वर्तमान स्तिथि को पूरी तरह से जानते और लम्बे संघर्ष के बारे में आगाह करते हैं|

कबीर जानते हैं कि वर्तमान असफलता का क्या कारण है:

देस देस का वैद बुलाया, लाया जड़ी और बूटी;

वा जड़ी बूटी तेरे काम न आईजद राम के घर से छूटी, रे भईया

मैं हैरान हूँ यह देख कर कि कबीर मृत देहों के साथ सगे सम्बन्धियों और बाल-बच्चों द्वारा किये जा रहे व्यवहार को पाँच सौ वर्ष पहले स्पष्ट वर्णित करते हैं:

चार जना मिल मतो उठायो, बांधी काठ की घोड़ी

लेजा के मरघट पे रखिया, फूंक दीन्ही जैसे होली, रे भईया

मैं जानता हूँ कि यह सिर्फ़ एक संयोग है| परन्तु उनका न तो वर्णन गलत है, न सलाह| पूरा पद आपके पढ़ने के लिए नीचे दे रहा हूँ|

सुप्रसिद्ध गायिका रश्मि अगरवाल ने इसे बहुत सच्चे और अच्छे से अपने गायन में ढाला है:

 

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विश्व-बंदी १३ मई


उपशीर्षक – गाँव की ओर

भले ही इस वक़्त की हर सरकार बार बार करोना को मानव इतिहास की सबसे ख़तरनाक बीमारी कहे, मगर प्लेग और स्पेनिश फ्लू एक बड़ा कहर ढा चुके हैं| इन बीमारियों के समय में एक आम विचार पनपा था – गाँव की ओर पलायन| प्लेग के समय लोग बड़े गाँवों से निकल कर खेतों में रहने चले गए थे|

कारण: सामान्य बुद्धि कहती है, कम जनसँख्या घनत्व के इलाकों में बीमारी का फैलाव धीरे होगा – या शायद बीमारी वहाँ तक देरी से पहुँचे| दूसरा, शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में रहने का खर्च बहुत कम होता है| अपेक्षागत सुरक्षित पर्यावरण आपके स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता के लिए उचित है| सबसे महत्वपूर्ण कितनी भी ख़राब स्तिथि हो – कुछ न कुछ आप अपनी क्यारी या खेत में उगा लेंगे – जबकि बड़े शहरों को गांवों से आने वाले खाने पर ही निर्भर रहना है| कुल जमा, कठिन समय में शहरी जीवन के मुकाबले ग्रामीण जीवन सरल रहता है| हालाँकि आजकल के दिनों में गांवों और शहरों के विकास की जो खाई पैदा हुई है उसके चलते ग्रामीण जीवन उतना भी सरल नहीं है|

पिछले एक माह में में प्रवासी मजदूरों का अपने जन्मस्थानों की तरफ़ लौटने की बातें सामने आई हैं| न सड़कों पर पैदल जाने वालों की भीड़ कम हुई हैं न रेल गाड़ियों का इन्तजार करने वालों की| अब जब गाड़ियाँ चलने लगीं हैं – रेलवे स्टेशन के बाहर बहुत भीड़ है| परन्तु विशेष बात यह है कि पैसे वाले जो लोग अपने ग्रीष्मकालीन घरों और फार्म हाउस में पैसा लगा रहे थे वह भी खेती और अन्य कृषिपरक कार्यकलापों के बारे में बात कर रहे हैं| शहरों में घटते वेतन, कम न होते खर्च, तंगहाल अर्थव्यवस्था कुछ कारक हैं ही| साथ ही अगर गाँव और पुराने शहर वापिस साल दो साल के लिए भी आबाद होते हैं तो वहां का आर्थिक पर्यावरण सुधर सकता है और जन प्रदत्त विकास हो सकता है| पढ़े लिखे लोगों का वापिस पहुंचना और विकास की चाह स्थानीय प्रशासन पर भी विकास के लिए दबाब बनाएगी| किसी भी सरकार के लिए घटती जनसँख्या और अर्थव्यवस्था वाले इलाके के मुकाबले बढ़ते इलाके में धन लगाना सरल ही नहीं बल्कि परिणाम देने वाला है| मोर अगर जंगल में नाचेगा तो कौन देखेगा?

इस सब कारणों से बहुत से मध्यवर्गीय लोग भी गाँवों और छोटे शहरों की ओर लौटने पर विचार कर रहे हैं|

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विश्व-बंदी ११ मई


उपशीर्षक – मौत का मार्ग

हमेशा से पक्का विचार रहा है है कि मजदूर किसान को सड़क या सार्वजनिक जगहों पर नज़र नहीं आना चाहिए| वास्तव में, इनको दिन में नज़र ही नहीं आना चाहिए| पहले ज़माने में निपट मजदूरों के एक तबके को फटा हुआ बाँस लेकर चलना होता था जो इंसानों को बताता कि फलां तबके का मजदूर आ रहा है| उस व्यवस्था की निंदा होनी चाहिए| उन्हें दिन में निकलने की जरूरत ही क्या थी?

चलिए महान राज्य आ गया है| सरकार ने आदेश दिया है – श्रमिकों को  सड़क और पटरियों पर चलने से रोकें| कितनी मज़ेदार बात है| माफ़ कीजिए – सरकार ट्रेन चला दी हैं – मजदूर अब घर जा सकते हैं| यह अलग बात है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए भी कुछ लोगों के पास पैसे नहीं हैं और उन्हें शौक लगा है कि मरेंगे मगर पैदल ही घर पहुचेंगे|

आज से तो और भी ट्रेन चलाई गई हैं – वातानुकूलित| और अगले छः दिन की वातानुकूलित ट्रेन पहले आधा घंटे में पूरी बुक हो चुकी है| ट्रेन में न खाना, न कम्बल, न चादर – मगर लोग जा रहे हैं| और वो लोग जा रहे हैं जो लॉक डाउन हो या न हो, जहाँ हो वहीँ रुको का उपदेश दे रहे थे| यह उच्च मध्य वर्ग है – वह वर्ग जो धर्म जाति के भेदभाव के बिना देश में करोना फ़ैलाने के लिए बेहिचक जिम्मेदार है| जाने की शर्त भी तो सामान्य है – लक्षण न दिखाई दें तो चले जाइएगा|

कई लोग पूछते हैं आखिर इतने सारे सरकारी, खैराती, निजी अस्पतालों, मकानों, दुकानों और जमीन ज़ायदाद के बाद भी सरकार बहादुर ने वातानुकूलित ट्रेनों को ही एकांतवास केंद्र में क्यों बदला? यह अंदाज लगाना अब कठिन नहीं रहा| ट्रेन उन्हें हवा खाने ले जाया करेगी – सरसों के खेत, नारियल के पेड़, चम्बल को बीहड़, हिमालय के हिमयोगी सब धाम के दर्शन होंगे|

वक्त आ गया है कि वसीयतें लिख ली जाएँ – त्रियोदशी कर कर निपटा दी जाए| पितृपक्ष छोडिए – आए न आए!!

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विश्व-बंदी १० मई


उपशीर्षक – श्रमिकविरोधी पूंजीपशुवाद  

देश के कथित पूंजीवादी शासक एक एक कर लगातार श्रमिक कानूनों को रद्द कर रहे हैं| एक विधि-सलाहकार होने के नाते मैं वर्तमान कानूनों का समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस प्रकार रद्द किए जाने का स्पष्ट नुक्सान देखता हूँ| पूंजीवादी दुर्भाग्य से यह गलत कदम उस समय उठाया जा रहा है, जिस समय उद्योगों के लिए श्रमिकों की जरूरत बढ़ रही है और जिन स्थानों पर उद्योगों की भीड़ हैं वहां श्रमिकों की भारी कमी है| ऊपर से देखने में लग सकता है कि अगर ऐसे में मजदूरों को रोका जाता है तो उद्योग को लाभ होगा| परन्तु दुर्भाग्य से रूकने के लिए मजदूर हैं ही नहीं| हर बीतते हुए दिन या तो वो लौट कर अपने गाँव घर जा रहे हैं, या असुरक्षित स्तिथियों में संक्रमण का बढ़ता ख़तरा उठा रहे हैं| साथ में महामारी और मृत्यु के नृत्य को पूँजीपशुओं की मानसिकता तांडव में बदल रही है|

यह सभी कानून इस लिए गलत नहीं हैं कि यह मजदूरों को कोई खास लाभ दे रहे हैं, न इसलिए कि मजदूर संगठनों पर कमुनिस्ट का कब्ज़ा है, यह इसलिए गलत हैं कि इनको न उद्योगपति समझ पाते हैं और न श्रमिक| ये पुराने श्रमिक कानून उस तरह का धर्म हैं जिसमें समस्त निष्ठा  ईश्वर को भुला कर कर्मकाण्डों पर टिका दी गई ही| यह क़ानून सिर्फ़ नौकरशाही के कागज़ों का पुलंदा मोटा करते हैं| इनमें सुधार के लिए, इन्हें सरल, समझने योग्य, पालन योग्य बनाने की आवश्यकता थी, न कि रद्द करने की|

वर्तमान में उद्योगों के वेतनदेय क्षमता नगण्य है, साथ ही वो मजदूरों को कोई अन्य लाभ – इज्जत, सुरक्षा, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य सुविधा या बीमा – कुछ देने के लिए न तो बाध्य हैं और न देने जा रहे हैं| पूँजीपशुओं की पूरी ताकत उन्हें गुलाम की तरह रखने में लगी हुई है| मगर गुलाम बनने के लिए आएगा कौन?

अगर मजदूरों का रोजगार प्रदाता उद्योग के आसपास रहने- खाने के बाद घर भेजने लायक बचत न हो, इज्जत न मिले और अगर उसे अपने गाँव के छोटे मोटे रोजगार में जीवन यापन संभव रहे और कम ख़तरा उठाना पड़े तो वो वापिस क्यों लौटेंगे|

हर बात का उचित लाभ भी होता है, अगर श्रमिक कानूनों के रद्द किए जाने के बाद भी यदि श्रमिक नहीं मिलते तो उद्योगों के लिए पूंजीपति के घर से दूर श्रमिक के द्वार पहुंचना होगा और महाराष्ट्र गुजरात की जगह अवध-मगध आना होगा

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विश्व-बंदी २ मई


उपशीर्षक – अनिच्छा आशंका अनिश्चय

सब दो जानू (घुटनों पर) बैठे हैं, अनिष्ट के आगे सिर झुके हुए हैं, दो हाथ दुआ में उठे हैं, आज जीने से आगे कोई नहीं सोचता, कल एक उम्मीद नहीं आशंका है| बारह घंटे काम करने का आग्रह करते पूँजीपशु हों या एक एक घंटे के काम की भीख मांगते कोल्हू के बैल, सब अपनी रोटी का पता पूछते हैं – रूखी, चुपड़ी, तंदूरी, घी-तली|

खैराती रोटी के इन्तजार में मजदूर, घरेलू नौकर चाकर, दुकानों के कारिंदे, भिखारी, कुत्ते, और साथ में सिपाही, सफाईकर्मी सिर झुकाए खड़े हैं – एक दूसरे से नज़रें चुराए| ईश्वर की माया के आगे बेबस हैं| भीड़ में खड़े होकर मिल रही इस सरकारी खैराती रोटी से आज भिखारी को भी डर लगता है – भीड़ में कौन करोना वाला निकल जाए| खैरात इतनी बुरी कभी न लगी थी|

सरकारी खर्रे आते जाते हैं| निजी कार्यालय खोल दिए गए हैं| छोटे से दफ्तर की इकलौती कुर्सी पर एक कमर एक जोड़ा पैरों के साथ बैठी है – दफ्तर का इकलौता मुलाज़िम बाअदब कहें दफ्तर मालिक| मालूम होता था, हुक्म-सरकार के मुताबिक एक तिहाई आया है| नहीं, मैं निजी दफ़्तर में एक तिहाई आमद के सरकारी हुक्मनामे का मजाक नहीं उड़ा रहा हुजुर, दिलोदिमाग़ तमाम चिंताओं के हवाले है, दिल और फेफड़े बाल-बच्चों के लिए बैठे जाते थे, हाथ काम की चिंता में ढीले पड़े हैं – बचा ख़ुचा कर खुद पूरा ही आया हूँ|

बड़े बड़े हुजुर हाकिम कहते हैं कि भूख लाखों को मार देगी| हमारे नए नए खैरख्वाह कहते हैं रोजगार के तलाश छोड़कर ग़रीब को घर की याद सताती है और पैदल चल पड़ा हूँ मैं| हिन्दू मुस्लिम का मसला मामला मार देगा| करोना का पता नहीं किसी को| अगर घर का दरवाज़ा हवा भी हिला दे तो तो लगता है फ़रिश्ते यमदूत को लेकर आ गए| सफ़ेद कोट देखकर चहरे डर से फ़क पड़ जाता है – खाकी कपड़ा देख चूतड़ चटकने लगते हैं| सब्ज़ी ख़रीदने के बाद दो बार धोता हूँ| ये बीमारी नहीं ख़ुदा ये डर है जो आपने फैला दिया है – डरना जरूरी हैं इतना नहीं कि हम लकड़बग्गे हो जाए|

भले खुल जाये लॉक डाउन, मगर हिम्मत तो खुले|

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विश्व-बंदी १ मई


उपशीर्षक – करोना काल में पूंजीपतिवाद का दबाब

मेरे मन में कभी भी इनफ़ोसिस के किसी भी संस्थापक सदस्य के लिए कोई विशेष सम्मान नहीं रहा| यह लोग पूँजीपतिवाद (न कि पूंजीवाद) का उचित उदहारण मालूम देते हैं| जिस देश में बेरोजगारी व्याप्त हो और कर्मचारियों पर पहले से ही १२ घंटे काम करने का पूंजीपतिवादी दबाब हो वहां यह महोदय और अधिक काम करने का प्रवचन दे रहे हैं|

वास्तव में मैं पिछले कई दिनों में सरकार का इस बात के लिए ही धन्यवाद कर रहा हूँ कि सरकार पूंजीपतिवाद के दबाब में आकर लॉक डाउन को न लागू करने या उठाने पर आमादा नहीं हुई| प्रकृति ने पूंजीपतिवादी समझी जाने वाली सरकार से लोकहितकारी राष्ट्र का पालन करवाने ने कुछ हद तक सफलता प्राप्त की है| करोना काल की सबसे बड़ी सीख अर्थव्यवस्था को सकल उत्पाद से नहीं बल्कि सकल प्रसन्नता से नापने में है|

शाम तक इस आशय की ख़बरें आ गई कि लॉकडाउन को दो हफ्ते के लिए बढ़ाते हुए इस में जबरदस्त परिवर्तन किए गए हैं| सरकारी अधिसूचनाओं को पढ़ना इतना सरल नहीं होता|  तमाम दबाब के बीच सरकार लोकहित, सकल प्रसन्नता, सकल स्वास्थ्य, सकल उत्पाद जैसी अवधारणाओं में उचित समन्वय बैठाने का देर दुरुस्त प्रयास कर रही है|

देश को पहले से ही लाल, संतरी, हरे मुख्य ज़ोन में बाँट दिया गया है| इन के अतिरिक्त राज्य सरकारों के आधीन कन्टेनमेंट ज़ोन भी है, जो सबसे गंभीर है| अब कुल मिला कर पूर्ण लॉक डाउन केवल कन्टेनमेंट ज़ोन में ही रह जाएगा| देश का हर बड़ा शहर नक्शे पर लाल रंग से रंगा हुआ दिखता है| अब कम महत्त्व के समझे जाने वाले पिछड़े इलाके हरे रंग में रंगते हुए ग्रामीण भारत के साथ देश की अर्थव्यवस्था संभालेंगे| विकास इस समय उत्तर नहीं प्रश्न है|

करोना काल कतई सरल नहीं| कोई आश्चर्य नहीं कि लॉक डाउन के टोन डाउन होते समय श्रेय लेने के लिए श्रेय-सुखी प्रधानमंत्री जनता के सामने नहीं आ रहे|

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विश्व-बंदी २८ अप्रैल


उपशीर्षक – करोना काल का भोजन उत्सव

ग़लतफ़हमी है कि धर्म भारतियों को जोड़ता और लड़ाता है| हमारी पहली शिकायत दूसरों से भोजन को लेकर होती है| इसी तरह भोजन हमें जोड़ता भी है| करोना काल में भारतीयों को भोजन सर्वाधिक जोड़ रहा है| यहाँ तक कि रोज़ेदार भी भोजन और पाक-विधियों पर चर्चा में मशगूल हैं| पारिवारिक समूहों से लेकर मित्रों के समूह तक पाक विधियों की चर्चा है|

मैं परिवार में भोजन रसिक के रूप में जाना जाता हूँ, परन्तु इस समय देखता हूँ कि जिन्हें बैंगन पुलाव और बैगन बिरियानी का अंतर नहीं पता वह भी उबला-बैंगन बिरियानी और भुना-बैंगन बिरियानी के अंतर पर चिंतन कर रहे हैं| जिसे देखिये नई विधियाँ खोज रहा है और पारिवारिक और निजी स्वाद के अनुसार|

अभी पिछले सप्ताह परवल की चटनी बनाई थी तो मित्रों, सम्बन्धियों और रिश्तेदारों ने उसके तीन अलग अलग परिवर्धित संस्करण बनाकर उनके चित्र प्रस्तुत कर दिए| मैं गलत हो सकता हूँ, मगर स्वाद के हिसाब से लॉक डाउन के पहले ७-१० दिन साधारण घरेलू खाने के रहे, उसके बाद नए नाश्तों ने ७-१० दिन रसोई सजाई| उसके बाद भारतीय रसोइयों में दोपहर और शाम के पकवानों की धूम मची – मुगलई, पंजाबी, कायस्थ, लखनवी, बंगाली, उड़िया, गुजरती, मराठी, बिहारी, आन्ध्र, उडुपी, चेत्तिनाड, केरल, आदि अलग अलग पाक परम्पराओं को खोजा और समझा गया है| मगर गूगल बाबा जरूर सही जानकारी दे पाएंगे| अगर कोई सही दिशा निर्देशक जनता को सर्व-भारतीय पाक विधियों के बारे में बताने लगे तो राष्ट्रीय एकता को मजबूत होने में एक अधिक समय नहीं लगे| अब हम मिठाइयों की और बढ़ रहे हैं| मैं अगले महीने इटालियन, मेक्सिकन, थाई, जापानी आदि पाक-विधियों के भारत में प्रयोग की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकता|

भोजन प्रेमी भारतीयों के लिए सबसे बड़ी कठिनाई पाक सामिग्री की कम उपलब्धता है तो सबसे बड़ा प्रेरक भी यही है – उपलब्ध सामिग्री के नए नवेले प्रयोग, नए स्वाद, नया आपसी रिश्ता|

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विश्व-बंदी २७ अप्रैल


उपशीर्षक – प्रकृति का पुनर्निर्माण

करोना के फैलाव के साथ साथ प्रकृति का विजयघोष स्पष्ट रूप से सुना गया है| दुनिया में हर व्यक्ति इसे अनुभव कर रहा है| सबसे बड़ी घोषणा प्रकृति ने ओज़ोनसुरक्षाकवच का पुनर्निर्माण के साथ की है| दुर्भाग्य से मानवता अभी भी प्रकृति के विजयघोष पर गंभीर नहीं है| अगर वर्ष २०२० में मानवता डायनासोर की तरह प्रकृति विलुप्ति का आदेश दे दे तो शायद पृथ्वी के नए सम्राट शायद १० लाख साल बाद मूर्ख मानवों की आत्मविलुप्ति को सहज ही पढ़ा रहे होंगे| यह ठीक वैसा ही है जैसे हम डायनासोर की विलुप्ति पढ़ते हैं| आज हम प्रकृति की यह चेतावनी स्पष्ट सुन सकते हैं: अगर मानव नहीं सुधरे तो पृथ्वी पर सबसे कब समय तक विचरण करने वाली प्राणी प्रजाति में मानव की गिनती की जाएगी|

ओज़ोन सुरक्षा कवच में अभी और भी छेद हैं और यह वाला सुराख़ इसी साल देखा गया था और इसे भरने में प्रकृति को मात्र दो या तीन महीने लगे| यह कार्य शायद करोना जन्य लॉक डाउन के कारण जल्दी संपन्न हो गया| इसके बनने और बिगड़ने का कारण जो भी रहा हो, दोनों घटना प्रकृति का स्पष्ट शक्ति प्रदर्शन हैं| यदि मानव अपनी बिगड़ीं हरकतें करने से कुछ और दिन रोका जा सका तो प्रकृति चाहे तो शेष ओज़ोन सुरक्षा कवच की मरम्मत भी कर सकती है|

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद यह स्पष्ट लगता है कि लॉकडाउन प्रतीकात्मक ढील के साथ बढ़ने जा रहा है| शहरी मध्यवर्ग आर्थिक दबाब के बाद भी डरा हुआ है और मुझे नहीं लगता कि स्तिथि जल्दी सामान्य होगी| गाँव और वन क्षेत्र को कदाचित इतनी चिंता न हो या फिर उनपर दबाब बहुत अधिक होगा| किसी मामूली इलाज के लिए भी अस्पताल जाने से लोग बचना पसंद करेंगे| इसका कारण मात्र भय नहीं बल्कि अस्पतालों को करोना के प्रति ध्यान केन्द्रित करने की भावना है| आश्चर्यजनक रूप से लोग अस्पतालों की कम जरूरत महसूस कर रहे हैं| स्वस्थ पर्यावरण, समुचित शारीरिक व मानसिक आराम और घर का ताजा खाना अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी बनकर उभरे हैं|

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विश्व-बंदी २६ अप्रैल


उपशीर्षक – घरेलू नौकर चाकर

लॉक डाउन कब खुलेगा? इस प्रश्न के पीछे अपने अटके हुए काम निबटाने से अधिक यह चिंता है कि हम अपनी घरेलू नौकरानी को कब वापिस काम पर बुला सकते हैं| जो लोग घर से काम कर रहे हैं उनके लिए यह जीवन-मरण जैसा प्रश्न है| हमें अपनी लम्बी चौड़ी गृहस्थी सँभालने के लिए सहायक की जरूरत रहती है: कुछ तो गृहस्थी का आकार बड़ा है कुछ हमें उसे सँभालने की आदत नहीं मगर सबसे बड़ी बात दोनों पति-पत्नी कार्यालय के काम में जुटे हुए हैं| एक औसत गृहस्थी के रोजाना के कार्य कम से कम चार पांच घंटे का समय ले ही जाते हैं| मगर घर में रहते हुए बहुत से काम बढ़ भी तो गए हैं – तीन बार चाय कॉफ़ी, प्रतिदिन कुछ नया बनाने का दीर्घ राष्ट्रीय त्यौहार, कुछ नई किताबें, फ़िल्में और सॉप ऑपेरा, पारवारिक समय की बढ़ी हुई माँग, और बच्चों की पढ़ाई|

हम सबका समय-प्रबंधन बिगड़ा हुआ है| अगर समय प्रबंधन को नियंत्रित नहीं किया जाए तो शायद घरेलू नौकर चाकर इसे न सुधार भी न पाएं| परन्तु यह भी सच है कि काम का दबाब और उस से अधिक माहौल का तनाव सिर चढ़ने लगा है| फिर भी मुझे रोज अपने समय प्रबंधन पर विचार करना पड़ रहा है| भविष्य-प्रबंधन की परियोजना भी बनानी और पूरी करनी है| क्या भविष्य में घरेलू चाकरों की चौबीस घंटे घर रखने के की परिपाटी पुनः शुरू करनी चाहिए?

इस छोटा छिपा हुआ प्रश्न यह भी है कि अगर नौकर चाकर को वेतन भी देना है तो काम तो करा सकें वरना काम करने और वेतन देने की दोहरी मार भी गले पड़ी है| कुछ भले लोग तो पहले ही वेतन मनाही कर चुके हैं| कुछ उसमें कटौती पर विचार कर रहे हैं| धन का दबाब तो हम सब पर है| अगर केंद्र सरकार मंहगाई भत्ता कर कर रही है तो आम जनता क्यों न करे? सरकार अनजाने ही ग़रीबों को पूरा वेतन देने के आग्रह का नैतिक अधिकार खो बैठी है| यह चौतरफ़ा वेतन कटौती सेवा क्षेत्र में देश के सकल घरेलू उत्पाद में १०-१५ फ़ीसदी की कमी दर्ज़ कराने जा रही है|

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विश्व-बंदी २१ अप्रैल


उपशीर्षक – प्रतिरोधक क्षमता का दुःख

यह लगभग सुखद परन्तु अत्यंत दुःखद समाचार था| भारत में ८० फ़ीसदी लोगों में करोना के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे| यह शायद वैसा ही है कि जैसा एचाईवी पॉजिटिव होना एड्स होना नहीं होता, पर संवाहक होना हो सकता है| सुखद यह है कि आप शायद विषाणु का मुकाबला करने में अभी तक सफल हैं या आप जीत चुके हैं या विषाणु को शांत तो कर ही सके हैं| हो सकता है, विषाणु शांत रहकर पुनः हमला करे या आपके शरीर को छोड़ जाए| परन्तु एड्स के मुकाबले यह मामला इसलिए अधिक ख़तरनाक है कि उसमें विषाणु का प्रसार यूँ ही नहीं हो जाता, जैसा कि करोना विषाणु के मामले में हो सकता है| बिना किसी लक्षण के आपको नहीं पता लगता कि आप के शरीर में विषाणु का घर या युद्ध स्थल है| आप अनजाने ही बीमारी फैला सकते हैं या आपके अपने शरीर में ही बाद के लिए यह बाद के लिए रुक सकता है|

क्या अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना नुक्सान तो नहीं कर जाएगा? रोज सुबह साबित लहसुन के साथ समभाग अदरक चबाने के बाद चाय पीने से फ्लू का ख़तरा कम रहता है यह मेरे परिवार का पुराना अनुभव है| भारत में तो फ्लू से बचने के लिए तुलसी-अदरक-काढ़ा चाय है ही| फेंफड़ों की मजबूती के लिए मैं हर जाड़ों में ५०० ग्राम शहद २५ ग्राम छोटी पिप्पली मिलाकर उसकी माशा भर लेता ही हूँ| अन्य भारतवासियों के पास भी अलग अलग बहुत से उपाय हैं – हल्दी सौंठ का दूध से लेकर कबूतर का शोरबा तक| आजकल के साफ पर्यावरण में जब वायु प्रदूषणजन्य बीमारियाँ नहीं हैं, पता कैसे चले कि श्वास या फेफड़ों को पुराना कष्ट है या नया करोना? शायद सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता का विकास होने तक हमें लम्बी और धीमी लड़ाई लड़नी होगी| यह थकाऊ और उबाऊ नहीं होना चाहिए|

अब द्रुत जाँच किट को भी बेअसर पाया जा रहा है| राजस्थान सरकार के बाद अब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद ने इनके प्रयोग को दो दिन के लिए रोक दिया है| कई बार लगता है काम पर वापिस जाएँ शेष सब भाग्य पर छोड़ दिया जाए|

खैर हम भारतीय हैं तो घर पर नए नए खाने पीने के प्रयोग चल रहे हैं| कुछ किताबें, कुछ फ़िल्में, कुछ गाने और बचे हुए बहुत से काम धाम|

विश्व-बंदी १८ अप्रैल


उपशीर्षक – नए ध्रुव 

कल शाम हल्की बारिश हुई थी आज तेज हवाओं के साथ वैसी ही बारिश जैसी अक्सर फ़सल करने के दिनों में उत्तर भारत में आती रहती है| हवाएं गर्मी से राहत लेकर आईं| सूरज छिपने के साथ बादल भी कम हो गए|

दिल्ली में कुल ७६ कन्टेनमेंट ज़ोन घोषित हो चुके हैं| बीमारी नियंत्रण में महसूस होती है| सोमवार के कार्यालय और बहुत से कारोबार के खुलने को लेकर घरों में चिंता का माहौल है| जिन घरों के अकेले कमाने वाले – चिकित्सकीय कर्मचारी, पुलिस, आदि लोगों के परिवार को तिहरा संकट है – काम छोड़ नहीं सकते, नाते-रिश्तेदार-पास-पड़ोसी साथ छोड़ रहे हैं, भविष्य की चिंता तो है ही|

भारत्त के शेयर बाजार की खस्ता हालात के चलते हाल में चीन के पीपल’स बैंक ऑफ़ चाइना ने भारत की बेहद बड़ी कम्पनी एचडीऍफ़सी में एक फ़ीसदी से अधिक के शेयर खरीदे थे| जिसके बाद देश में चिंता का माहौल था| आज सरकार ने प्रत्यक्ष पूँजी निवेश के नियम के कड़ा परिवर्तन किया है जिसे चीन के आर्थिक आक्रांत को रोकने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है|

अभी तक भारत में बांग्लादेश और पाकिस्तान के नागरिक और कंपनियां को छोड़कर कोई भी विदेशी या विदेशी संस्था बिना किसी पूर्वानुमति के भी निवेश कर सकती थी| बांग्लादेश और पाकिस्तान के नागरिक और कंपनियां सरकारी अनुमति के बाद निवेश कर सकती हैं जिनमें से पाकिस्तान के लोगों के लिए कुछ विशेष क्षेत्र में निवेश मना था|

आज के बाद भारत के किसी भी भूमि- पडौसी देश के नागरिक और संस्थाएं बिना पूर्व अनुमति के निवेश नहीं कर पाएंगी, जिनमें से पाकिस्तान के लोगों के लिए कुछ विशेष क्षेत्र में निवेश मना रहेगा| पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, म्यानमार और बांग्लादेश आदि भारत के भूमि-पड़ौसी हैं|

चिंता यह हो सकती है कि यह क़दम चीन विरोधी नए अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीकरण में भारत की स्तिथि को एक तरफ़ खड़ा करता है| साथ ही सस्ता निवेश करने के लिए अन्य अमित्रों को भी खुला मैदान मिल सकता है| मेरी चिंता सऊदी अरब और इस्रायल से लेकर रूस और अमेरिका से आने वाला निवेश भी है खासकर तब जब यह निवेश उनके हाथ में नियंत्रण सोंप दे| खैर भी सब अटकलें हैं और सरकार चौकस लगती है|

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विश्व-बंदी ११ अप्रैल


उपशीर्षक –  कॉर्पोरेट असामाजिक गैरजिम्मेदारी 

मुझ से पिछले एक महीने में पूछे गए करोना सम्बन्धी जिस प्रश्न ने सबसे अधिक कष्ट दिया वह कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पर पूछा गया बेहद गैर-जिम्मेदार प्रश्न था:

“क्या कंपनी द्वारा अपने कार्यालय में रखे गए और अपने कर्मचारियों को घर में प्रयोग कराए गए साबुन, हैण्डवाश आदि के खर्च को कंपनी कानून के तहत माना जाएगा?”

मेरा उत्तर स्पष्टतः नकारात्मक रहा है|

यहाँ तक कि इस प्रकार के प्रश्न सरकार तक पहुँचे| आज सरकार ने कल जनरल सर्कुलर जारी कर देने योग्य उत्तर दिए हैं| सरकार ने सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तरों में उत्तर संख्या ५ में लिखा:

Payment of salary/ wages to employees and workers during the lockdown period (including imposition of other social distancing requirements) shall not qualify as admissible CSR expenditure.

लॉक डाउन समयावधि में दिए गए कर्मचारियों और मजदूरों के वेतन या मजदूरी, (और सामाजिक दूरी नियमों के पालन में लिए गए खर्च) कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नहीं माने जायेंगे| (भावानुवाद)

उत्तर संख्या ६ में लिखा:

Payment of wages to temporary or casual or daily wage workers during the lockdown period shall not count towards CSR expenditure.

लॉक डाउन समयावधि अस्थाई, अल्पावधि और दैनिक मजदूरों की मजदूरी के खर्च कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नहीं माने जायेंगे| (भावानुवाद)

सरकार ने बहुत ही उचित रूप से उत्तर संख्या ७ में लिखा:

If any ex-gratia payment is made to temporary / casual workers/ daily wage workers over and above the disbursement of wages, specifically for the purpose of fighting COVID 19, the same shall be admissible towards CSR expenditure as a onetime exception provided there is an explicit declaration to that effect by the Board of the company, which is duly certified by the statutory auditor.

लॉक डाउन समयावधि अस्थाई, अल्पावधि और दैनिक मजदूरों को मजदूरी के अतिरिक्त दी गई कोई भी सहायता के खर्च केवल इस बार एक बार के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी माने जायेंगे| (भावानुवाद)

मैं सरकार से इस से अधिक स्पष्टीकरण की आशा नहीं करता| कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मदारी का स्थापित नियम है कि ऐसा कोई भी खर्च जो एक व्यवसाय के सामान्य आवश्यकता का भाग हो या जो अंशधारकों, अधिकारीयों, कर्मचारियों और मजदूरों को लाभ पहुँचाने के लिए हो, वह सामाजिक जिम्मदारी की सीमा को छूता भी नहीं है|

दुर्भाग्यपूर्ण प्रश्न का मामला यहीं रुक जाता तो ठीक होता, मगर कल तुरंत ही एक सवाल प्राप्त हुआ कि क्या कंपनी उत्तर संख्या ४ का लाभ लेकर उपरोक्त खर्च को सामाजिक जिम्मदारी का खर्च बता सकती है? जब तक आप कंपनी के और अंशधारकों, अधिकारीयों, कर्मचारियों और मजदूरों के इतर समाज के लिए कुछ नहीं करते अपनी सामाजिक जिम्मदारी को पूरा नहीं करते|

मुझे याद आता है जब कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के प्रावधानों पर शुरूआती चर्चा हो रही थी तो एक बड़ी कंपनी की और से कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदरी की दर के दो प्रतिशत होने को बहुत ही अधिक बताया गया था| उस समय उका ध्यान इस बात पर दिलाया गया कि इस्लाम हर व्यक्ति से शुद्ध आय के ढाई प्रतिशत सामाजिक जिम्मेदारी पर खर्च करते की प्रेरणा देता है| कंपनियां सामाजिक जिम्मेदारी निर्वाहन के लिए इस दर को ध्यान में रखकर प्रेरणा ले सकतीं है| हिन्दू धर्म भी दान की बात करता है|

जिस समय मैं उपरोक्त प्रश्न से दुःख का अनुभव कर रहा था, मुझे बीबीसी की एक रिपोर्ट पाकिस्तान के बारे में देखने को मिली| पाकिस्तानी लॉक डाउन के समय में जगह जगह खाना, पैसा और अन्य सामिग्री बाँट रहे हैं| कुछ भारतीय खासकर सिख भी ऐसा कर रहे हैं, परन्तु इस तरह के मामलों में पाकिस्तानी भारतीयों से आगे बताये गए हैं| बीबीसी रिपोर्ट स्टेनफ़ोर्ड सोशल इनोवेशन रिव्यु के हवाले से कहती है कि ९८% पाकिस्तानी सामाजिक कार्यों के लिए ज़कात करते हैं, और इस तरह वह पाकिस्तान के जीडीपी के १% से अधिक के बराबर की रकम सामाजिक ज़िम्मेदारी ओअर खर्च करते हैं| यह पढ़ते हुए मुझे शर्मिंदा महसूस करना पड़ा कि भारतियों द्वारा सामाजिक ज़िम्मेदारी पर अपने जीडीपी का आधा प्रतिशत भी खर्च नहीं किया जाता|

मुझे यह महसूस करते हुए दुःख होता है कि भारतीय कंपनियां अपने अंशधारकों, कर्मचारियों और अधिकारियों आदि पर खर्च को सामाजिक जिम्मेदारी दिखाना चाहतीं हैं और भारतीय अपने मित्रों और रिश्तेदारों पर हुए खर्च को|

यह एक ऐसा विषय है जहाँ मेरे भारतीय अहम् को ठेस लगी है और सामाजिक जिम्मदारी के विषय पर मैं अपने देश और देशवासियों को उनसे आगे देखना चाहता हूँ|

कृपया, किसी गैर सरकारी संगठन को रकम देकर उससे अस्सी प्रतिशत वापिस लेने वाले नीचता पूर्ण विचार को न दोहराएँ| मुझे छोड़िये भारत सरकार भी इस से बहुत दुःख महसूस कर रही है| जल्दी ही कानून आपके नकेल डालेगा|

पुनश्च: – यहाँ यह स्पष्ट करता चलूँ चलूँ कि मैं सरकार द्वारा मुख्यमंत्री सहायता कोष में दी गई राशि को सामाजिक जिम्मेदारी निर्वहन न मानने को उचित नहीं मानता रहा हूँ परन्तु यह पुरानी नीति है और इसके सन्दर्भ में निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार स्वतंत्र भी है|

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विश्व-बंदी ८ अप्रैल


उपशीर्षक – अर्धस्नान की पुनः स्मरण 

अपनी किशोर अवस्था में मुझे बार बार हाथ धोने की आदत थी| पूजा करने, योग ध्यान करने, खाने पीने, पढ़ने बैठने, घुमने जाने आने से लेकर सोने से पहले भी हाथ मुँह धोता था| मेरे एक मित्र थे जिनको कार्यालय में हर आधा घंटे बाद उठकर हाथ धोने की सनक थी| उनके हाथ धोकर आने के बाद झागों से भरा वाश-बेसिन एक सामान्य बात थी| बाद में मैंने अपनी आदत को थोड़ा सुधार लिया यानि कमी की| पिछले कई दिनों में बचपन की अपनी आदत को मैंने वापिस पाने का उपक्रम किया है| फिलहाल दिन में तीन बार मुँह और चार बार पैर भी धोये जा रहे हैं|

स्वास्थ्य के सन्दर्भ में चल रही सब चर्चाओं में पैर धोने के ऊपर कोई खास बात नहीं हो रही| परन्तु भारत में दिशा-मैदान, घुमने फिरने, दफ्तर बाजार, शमशान, कब्रिस्तान, मित्र सम्बन्धी कहीं से भी आने के तुरंत बाद पैर धोने की परंपरा रही है| रीति रिवाज़ों में आने पर सम्मान देने के लिए पैर धोने का जिक्र आता है| केवट द्वारा सीता राम के और कृष्ण द्वारा सुदामा के पैर धोने के प्रसंग भारत में कौन नहीं सुनता| मगर सुनने के बाद भी हम पैर धोने को नहीं जानते इसलिए शायद अपनाने पर कोई बात नहीं हो रही| अस्पतालों में जूते के गिलाफ़ (shoe cover) पैर धोने से बचने का ही आधा अधुरा विकल्प है|

सामान्य रूप से भी पैर धोने के लिए पानी उड़ेल लेना पर्याप्त नहीं है| मैं अक्सर शेम्पू (जैसा के पार्लर में सुझाया गया था) या कपड़े धोने के साबुन (जैसा की कस्बाई तरीका है) का प्रयोग करता हूँ| अगर लम्बी यात्रा, कटी-फटी बिबाई यानि एड़ियाँ है तो उबले पानी में हल्दी या नीम का प्रयोग हो सकता है| हल्दी के पानी से पैर धोना सांस्कृतिक परंपरा है जिसे विवाह आदि के समय आज भी अपनाया जाता है| अगर आप अंतिम क्रिया, चिकित्सालय असुरक्षित स्थान से आ रहे हैं तो गृह द्वार पर ही हाथ मुँह पैर धोने का पुराना विधान रहा है जिसे मुझे स्वयं भी पुनः अपनाना है| अगर द्वार पर ही गुसल लगाना संभव रहे तो मन बुद्धि की प्रेरणा से नहा लेना उचित है|

आज सब्ज़ी और गल्ला सब आ गया| दिन लॉक डाउन बढ़ने की अटकल लगाने में बीत गया|

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विश्व- बंदी ४ अप्रैल


उपशीर्षक – निशानदेही 

आज लोदी रोड पुलिस थाने से फ़ोन आया| पति-पत्नी से पिछले एक महीने आने जाने का पूरा हिसाब पूछा गया| पूछताछ का तरीका बहुत मुलायम होने के बाद भी तोड़ा पुलिसिया ही था| कुछ चीज़े शायद स्वाभाव से नहीं निकलतीं या शायद मेरे मन में पुलिस कॉल की बात रही हो तो ऐसा महसूस हुआ| मेरा अनुभव है कि दिल्ली पुलिस शेष उत्तर भारत की पुलिस से कहीं अधिक जन सहयोगी है| मेरे जबाब में बस्ती निज़ामुद्दीन का ज़िक्र तक नहीं था तो उसने सीधे ही मुझ से पूछ लिया| मैंने अपना आवागमन मार्ग समझा दिया तो उसे थोड़ी संतुष्टि हुई| मगर फिर भी शंका के साथ उसने हालचाल और अतापता पूछ लिया| फिर भी उसे चिंता थी कि मेरा मोबाइल उस टावर की जद में कैसे आया तो तकनीकि और भौगोलिक जानकारी के साथ संतुष्ट करना पड़ा|

वैसे परिवार में सब पंद्रह दिन से घर में ही बंद हैं| मेरे अलावा कोई भी दूध सब्जी लेने के लिए भी सीढ़ियाँ नहीं उतरा| मोहल्ले के बाहर मेरी अंतिम यात्रा भी २० मार्च को हुई थीं| वह तारीख भी पुलिस वाले के रिकॉर्ड में भी थी| ऐसा इसलिए हुआ कि मैं बस्ती निज़ामुद्दीन से मात्र कुछ सौ मीटर से ही तो गुजरा था| मोबाइल टावर आपकी मौजूदगी तो दर्ज करते ही हैं| घर भी तो बहुत दूर नहीं है निजामुद्दीन से|

मोबाइल फोटोग्राफी का एक वेबीनार देखा| जोश में दो तीन फ़ोटो खींचे गए और विडियो बनाए गए| तो

मकान मालिक रोज हालचाल के लिए फ़ोन करते हैं| आज बैंक तक गए थे| पूछा तो कहने लगे बहुत जरूरी काम था| क्या दिन आए हैं – बैंक जाने के लिए भी सफाई देनी पड़ती है| वो घर के प्रांगण में ही टहलने का उपक्रम करते हैं वर्ना रोज लोदी गार्डन जाते थे|

घर में लिट्टी-चोखा बनाया गया| यहीं समय है कि नए नए पकवान बनाए खाए जाएँ| परन्तु घुमने फिरने की कमी के कारण अतिरिक्त व्यायाम का भी ध्यान रखना पड़ रहा है|

इन दिनों आसमान का नीलापन दिल चुरा लेने वाला है| चाँद पूरे रंग ढंग में चमकता है| तारों ने भी अपनी महफ़िल मजबूती से जमा ली है| हल्की ठंडक में बाहर ही सो जाने का मन करता है| बचपन के वो दिन याद आते है जब हम छत पर सोते थे| अभी समझ नहीं आता कि छत पर सोना उचित हैं या नहीं| अजीब सी बेचैनी महसूस होती है|

विश्व- बंदी ३ अप्रैल


उपशीर्षक – मोमबत्ती 

मुग़ल काल में एक प्रथा थी जो सल्तनत में ज्यादा उत्पात मचाता था उसे जबरन हज पर भेज देते थे| अगर औरंगज़ेब भी जिन्दा होता तो तब्लिग़ वालों को किसी जहाज में चढ़ा कर हज के लिए भेज देता और कहता कि जब मक्का और हज खुलें तब पूरा करकर ही लौटना|

जिन्हें इलाज़ नहीं कराना उनके लिए आम समाज से दूर अलग मरकज़ खोल देने चाहिए| वहीं रहें, अपना बनायें खाएं, मरें या ठीक हो जाएँ| सरकार, चिकित्सकों, समाज सेवियों, मिडिया और गैर मुस्लिमों को उनकी चिंता से अपने आप को अलग कर लेना चाहिए| ईश्वर का दिया कष्ट भोगने से शायद उनके इस जन्म के अलाल्ही कर्त्तव्य और अगर गलती से पिछला जन्म रहा हो तो पिछले जन्म के पाप का प्रायश्चित हो जाएगा| अन्य धर्मों में भी जिन्हें अपने इस या उस जन्म के पाप का प्रायश्चित करना हो उन्हें भी यह सुविधा मिलनी चाहिए| धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यही है कि हर किसी को दूसरों को परेशां किए बिना अपनी समझ के अनुसार अपने धर्म का पालन करने की छूट होनी चाहिए|

इधर प्रधानमंत्री जी ने फिर नीरो साम्राज्य के दिनों को याद लिया| अब इटली की तर्ज पर मोमबत्ती जलेगी रविवार को| भारतीय कारण करने के लिए दीपक और लॉक डाउन में कहाँ खरीदने जाओगे इसके लिए मोबाइल की लाइट का विकल्प दिया गया है| मोदी जी का यह घटना प्रबंधन प्रायः चिंतित करता है कि असली समस्या से ध्यान हटाया तो नहीं जा रहा| परन्तु जनता का हौसला बनाये रखना जरूरी है|

 वैसे प्रधानमंत्री ने दूरी बनाए रखने की बात कहकर भक्तों को मूर्खता न करने का सन्देश भी दिया है|

घर को बच्चों को लग रहा है कि दुनिया भर की छुट्टी चल रहीं हैं| वैसे यह भी ठीक है कि अगर घर में दो एक लोग साफ सफाई, रसोई और बच्चे संभाल लें तो बाकि दस लोग घर से आराम से काम कर सकते हैं| दफ्तर, आवागमन, और ऐसे ही तमाम खर्च बच सकते हैं| अर्थव्यवस्था के आंकड़े में जरूर कमी आएगी परन्तु पर्यावरण, सड़कों की भीड़ भाड़ कम हो जाएगी|

शायद प्रकृति हमारे धर्मों और अर्थव्यवस्थाओं को सुधरने का मार्ग स्पष्ट कर रही है|

विश्व-बंदी २८ मार्च


उपशीर्षक – प्रसन्न प्रकृति के दुःख 

कौन कहता है कि यह दुःखभरा समय है? प्रकृति प्रसन्न है| दिल्ली के इतिहास में मार्च में कभी इतनी बारिश दर्ज नहीं दर्ज़ की गई| बसंत और वर्षा की प्रणय लीला चल रही है| यति और रति दोनों के लिए उचित समय है| इन्हीं फुर्सत के रात-दिन ढूंढने के लिए पिछली सात पुश्तें परेशां थीं|

पर्यावरण प्रदूषण का स्तर विनाशकारी चार सौ से घट कर चालीस पर आ चुका है| मेरे फैफड़े पिछले तीस साल ने पहली बार इतना प्रसन्न हैं| बार बार बदलते मौसम के बाद भी शायद ही कोई प्रदूषण से खांस रहा है|

परन्तु सावधानी हटने का ख़तरा हर घर के दरवाज़े पर खड़ा है| आजकल सब्ज़ी तरकारी भी घर के दरवाज़े पर ही शुद्ध की जा रही है – गंगाजल का स्थान एंटीसेप्टिक सेनिटाइजर ने ले लिया है| कुछ घरों में दरवाजे पर नहाने का भी इंतजाम है – जैसे शव-यात्रा से लौटने के समय होता है|

लोग भूले-बिसरों को फ़ोन कर कर हालचाल पूछ रहे हैं| चिंता नहीं भी है, कोई मलाल नहीं रखना चाहता|

बीमारी का आंकड़ा बढ़ रहा हैं| सरकार भी तो धर्मग्रन्थ के सहारे आ टिकी है| सरकारी दूरदर्शन “रामायण” “महाभारत” से सहारे जनता को घर में रोकना चाहती है| क्या पता गीता-पाठ (क़ुरान और बाइबिल) भी शुरू हो जाए? सब जिन्दा सलीब पर लटके हैं| देश भर के भूखे प्यासे गरीब अपने घरों के बड़े बूढों की चिंता में पैदल ही घर की दिशा में बढ़ रहे हैं| आजादी के बाद, कश्मीर के बाहर यह सबसे दुःख भरा पलायन है|

धृतराष्ट्र ने राज्य सरकारों से कहा है कि पलायन करने वालों को भोजन – पानी देकर रोका जाय| मगर उस बूढ़ी माँ – पिता का क्या जो आसराहीन गाँव में बैठे हैं| रोकेंगे कहाँ, कैम्पों में?? अगर अनहोनी हुई तो यह हिटलर के कैंप साबित होंगे|

सामान से भरे ट्रकों को लिए लाखों ट्रकचालक भूखें प्यासे सड़कों पर पड़े हैं? क्या मगर अमीरों और मध्यवर्ग को अपने गाल फुर्सत नहीं| पहले सत्ता नाकारा और  निकम्मी हुआ करती थी| अब जनता भी ऐसी ही है – सत्तर साल में यथा राजा, तथा प्रजा का चक्र पूरा हुआ|

शाम देश के सबसे बड़े टैक्सी ऑपरेटर ओला का सन्देश मिला, उनके ड्राइवर बिना काम के घर में बैठे हैं, सिर पर कार लोन भी है| उनके खाने का इंतजाम करने के लिए दान का अनुरोध किया जा रहा है|

विश्व-बंदी २७ मार्च


उपशीर्षक – नीला आकाश और बिलखती सड़कें 

तनाव को मुखमंडल की आभा बनने से रोकना मेरे लिए कठिन है| ७५ मिनिट की परीक्षा ५५ मिनिट में पूरी हुई| अब मैं किसी भी कंपनी में निर्देशक बन सकता हूँ| समयाभाव में अटका पड़ा यह काम पूरा हुआ|

कुछ और रुके पड़े काम पूरे किए जाने है| मृत्यु और काल आपके सबसे बड़े साथी हैं|

बारिश रुकने के बाद दोपहर में इतना नीला आसमान पहली बार दिखा| सोचता हूँ कहाँ होंगे वो लोग जो प्रदूषण के लिए किसान को कोसते थे? प्रकृति अंधपूंजीवाद पर भरी पड़ रही है| दुनिया की शानोशौकत बड़ी बड़ी गाड़ियाँ मूँह लटकाए घरों के बाहर धूल खाने लगी हैं|  प्रकृति ने पढ़े लिए समझदार आकाशगामी पैसे वालों को बीमारी फ़ैलाने के लिए अपना वाहन चुना है – माता शीतला का वाहन भी तो गधा ही है|

बड़े शहरों से जो लोग पैदल हजार पाँच सौ किलीमीटर जा रहे हैं क्या उनकी आने वाली पीढ़ियाँ वापिस बड़े शहरों की तरफ आसानी से रुख कर पाएंगीं? क्या विकास को मजबूर होकर छोटे मझोले शहरों की तरफ रुख करना पड़ेगा? क्या हानिकारक उद्योगों को बंद रखने पर जोर दिया जाने लगेगा? सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हमें अच्छे पर्यावरण की कितनी आदत पड़ती है|

शाम तक गोल मोल सरकार ने माना कि विदेशों भ्रमण से लौटे वाले सभी यात्रियों नहीं खोजा सा सका है| हैरानी की बात यह है कि इतना खतरा उठाकर भी लोग क्यों छिपे पड़े हैं? उड़ीसा बालासोर में सरकार को एक क्लिनिक का लाइसेंस बंद करवाना पड़ा क्योंकि उस में विदेश भ्रमण से लौटे एक यात्री का अनिधिकृत रूप से इलाज किया गया था|

शाम तेज बारिश हुई और शानदार चाँद तारे दिखाई दिए| शायद यमुना का गन्दा काला पानी वापिस पारदर्शी श्यामल रंग में बदलने लगा हो|

क्या, हमें पूंजीवाद के सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा से इतर सकल घरेलू प्रसन्नता की और देखना होगा?

भविष्य बहुत कुछ कह सकता है|

विश्व-बंदी २६ मार्च


उपशीर्षक – कुछ नवारम्भ 

होली पर ही बहुत दिनों से छूटा हुआ योगाभ्यास पुनः प्रारंभ कर दिया था| आसन प्राणायाम के मौसम भी अच्छा हैं चैत्र का महिना भी|

सुबह से शरीर के बारे में सोच रहा हूँ| किसी भी प्रकार के फ़्लू-जुखाम-खाँसी के लिए गहराना परिवार का अजमाया नुस्खा है – एक कली लहसुन बराबर मात्रा के अदरक के साथ बढ़िया से चबाइए और मुँह चाय के घूँट लेने के लिए खोलिए| क्या इसे अजमाना चाहिए? आदतन हमारे घर में चैत्र नवरात्र से शरद नवरात्र के बीच कच्चा लहसुन खाने की परंपरा नहीं हैं|

दो दिन से सब्जी भी साबुन के गोल में धोकर रसोई में जा रही है| रसोई को चौका इसीलिए कहते हैं कि इसे बाकि दुनिया की गंदगी से क्वॉरंटीन (चौकस एकांतवास) रखा जाता है| आज नाश्ते रमास के चीले बनाये गए|

दोपहर वित्त मंत्रालय द्वारा गरीबों के लिए बनाई गई बकवास घोषणा को सुनकर दुःख हुआ| स्वयं सहायता समूह के लिए बिना गिरवी कर्ज की मात्रा दुगनी करने पर हँसी आई| यह कर्ज बड़ा नहीं सरल होना चाहिए| कर्मचारी बीमा राशि से अधिक धन निकालने की अनुमति से सिर्फ क्रोध आया| सरकार ने जिम्मेदारी की टोपी गरीब के सिर पहना दी है|मोदी सरकार मनरेगा की पुरानी विरोधी होने के बाद भी उसकी शरण में गई है मगर मुझे कोई आशा नहीं – कारण लॉक डाउन के दौरान मनरेगा रोजगार संभव नहीं| योजना पर हँस ने में भी बहुत रोना आया| ज़मीनी मुद्दों तक सरकार की पहुँच नहीं है|

दिन के तीसरे पहर आसमान में एक ड्रोन दिखाई दिया – मेरा अनुमान है कि निगरानी करने ले लिए पुलिस का नया तरीका रहा होगा| इस नकारात्मक समय में सकारत्मक लोगों को सड़कों पर बेफ़िक्र घूमने से रोकना होगा|

मुझे नकारात्मकता को सूंघ लेने और उसको हराते रहने की पुरानी आदत है| जीवन के समस्त नकारात्मक समय का उपयोग किया है| आज दिवेश से बात हुई| उसका आग्रह था कि कल मुझे कंपनियों स्वतंत्र निर्देशक की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेनी चाहिए| मैं सोचने लगा तो उसने कहा, मैं आपको जानता हूँ आप आज शाम या कल सुबह इसे उत्तीर्ण का लें| पढ़ने और तनाव लेने से मना किया है| कल सुबह आठ बजे का समय तय रहा| फिर भी ,अगर मैं तनाव न लूँ तो धरती न डोलने लगे|

बारिश होने लगी है| बदलता मौसम भी स्वस्थ के लिए अच्छा नहीं| दौज का पतला सा चाँद और थोड़ा दूर तेज चमकदार शुक्र तारा दिखाई दिए| तनाव मुक्त करने के लिए प्रकृति के पास अपने तरीके हैं|

Janta Curfew


मैं रविवार २२ मार्च २०२० को जनता कर्फु के पालन की घोषणा करता हूँ और स्वैक्षिक रूप से २१ मार्च २०२० को भी जनता कर्फु का पालन करूंगा|
क्या आप इसका पालन करेंगे?

आप इस मीम को शेयर कर सकते हैं:

I m participating in #JanataCurfew on Sunday. Are you_ I will observe it on Saturday also. (1)

भय और सूचना


अगर दुनिया में मरने वालों को गिना जाए तो आतंक से अधिक लोग भय का शिकार हैं| भयाक्रांत मैं भी हूँ और आप भी|

भय और आतंक दुनिया के सबसे बड़े व्यवसाय हैं| आतंक अपराध के रूप में आता है और भय सूचना के रूप में| दुनिया में सबसे कम डरे हुए लोग सूचना के अभाव में जीते हैं, और बहादुर इन सूचनाओं के बाद भी भय पर विजय पाते हैं| भय से अधिक भयानक क्या होगा, भय का फैलाया जाना, भय को फ़ैलाने वाला? मगर भय जारी है|

भय फ़ैलाने की प्रक्रिया सरल होती है – आपका हित, हित चिंतन, हित हानि की सूचना और हित साधन का आग्रह| हमें सही और गलत सूचनाओं की परख करनी होती है| परन्तु अधिकांश सूचनाओं की परख करने का कोई तरीका नहीं होता|

आज सामाजिक प्रचार माध्यम बहुत तीव्रता से सूचना का प्रसार करते हैं| सूचनाओं का आवागमन इतनी तीव्रता से हो रहा है कि उनकी पुष्टि का समय नहीं है| हम सूचना माध्यम भी निर्भर नहीं कर पा रहे कि वह स्वविवेक का प्रयोग करकर सही सूचना ही पंहुचायेंगे| ऐसे में एक अतिरिक्त भय अधिक बढ़ता है – अगर सूचना सही निकली तो क्या होगा?

सूचना देने के लिए प्रयोग की गई भाषा का भी बड़ा असर होता है| शब्द चयन किसी भी सूचना को भयानक बना देता है| अधिकांशतः मीठे शब्द खतरनाक होते हैं और डरावने शब्द गीदड़ भभकी| उदहारण के लिए रंग निखारने की क्रीम अक्सर मीठे शब्दों में डर फैलातीं हैं और समाज को अरबों की चपत लगतीं हैं| दूसरी ओर हफ्ता और महिना वसूल करने वाले अपराधी भारी भरकम भाषा के बाद भी मीठे रिश्वतखोरों का मुकाबला करने में असमर्थ रहते हैं|

हाल में सारी दुनिया को भयभीत करने के पीछे भी सरकारों और अन्तराष्ट्रीय संस्थाओं की मीठी बातें हैं| कोरोना विषाणु से दुनिया भयाक्रांत है, अगर किसी को भी अधिक खतरनाक प्रदूषण की चिंता नहीं है| मैं इस भय को गलत और अनावश्यक नहीं कहता परन्तु प्रदूषण दुनिया को अधिक बीमार करता रहा है और लाखों की मृत्यु का कारण बना है|

अच्छा यह है कि इस भय के चलते शायद समय पर इस विषाणु के प्रसार को रोक लिया जाए|

ख़ुद हराम दिल्ली


प्रदूषण की मारी दिल्ली से बाहर निकलते समय आपके फेफड़े ख़ुशी से चीख चीख कर आपको धन्यवाद करने लगते हैं| कान आसपास आँख फाड़कर देखने लगते हैं – क्या जगह है कि सन्नाटे में शांति है? आँख हवा को सूंघने लगती है – क्या हुआ हवा को कि जलन नहीं हो रही? आती हुई उबास बंद होते ही नाक खुलकर जीने लगती है| त्वचा फिर एक बार साँस लेने लगती है| शहर बदलते ही स्वाद तो खैर बदल ही जाता है|

उत्तर भारत में नीला असमान देखना जीते जी स्वर्ग देखने का साकार सपना लगता है| दिल्ली को फर्क नहीं पड़ता| किसने पीछे पांच साल में ध्रुवतारा देखा? किसने पिछले बीस साल में रात के सन्नाटे में झींगुर का गान सुना? कौन धरती की सौंध को दो रात सूंघ पाया? हर कोई धीमी मर रहा है – खुद अपनी चुनी हुई हत्या – आत्महत्या नहीं कहूँगा| आत्महत्या में कम से कम दुस्साहस तो लगता है| हमारी मौत एक नाकारा मौत है| दिल्ली वाली मौत उधार का (की नहीं) वैश्या है जिसे हम सब बाप का माल समझकर भोगना चाहते हैं|

धर्म के नाम पर पांच – ग्यारह – इक्कीस दीपक नहीं जलाते – हर दिवाली हम पटाखे फोड़कर अपने धर्म से ज्यादा अपना गुरूर बचाते हैं| बात किसी धर्म की नहीं है हमारे गुरूर की है- हठधर्मिता की है| हमारी दलील हैं, हम क्या सब कूंए में कूद रहे हैं? मुझे मत रोको|

किसान को दोष देना अच्छा लगता है न| मान लिया किसान दोषी है – मगर साल के दो महीन  के लिए न| बाकि दस महीने के लिए एक बार अपनी आत्मा को ज़बाव तो दे कर तो देखो| मन और आत्मा का सम-विषम तो करो| दस महीने का दोष किसे दें – पाकिस्तान को, चीन को या अमेरिका को|

हमें अपनी आँख में धूल झोंकना अच्छा लगता है| सम-विषम अनुलोम-वियोम करेंगे| घर के अन्दर जो कार्बन मोनो ऑक्साइड रोज पैदा होता है – सोचा कभी? सीशा (लेड) वाला पुताई करवाई है दीवार पर कभी देखा कि बच्चे के पेट में और फैफड़ों में कब चला गया? दिन भर कान घौंस कर रखी गई गानों की आवाज कब दिमाग में ध्वनि-प्रदूषण कर गई – पूछा? दूध, दूध-मिठाई पीते वक़्त कभी सोचा कि आपको और आपके बच्चे को नकली दूध का वीडियो क्यों देखना पड़ता है? आप ने रेस्टोरंट में कभी बोला भैया ये वाले चार प्रदूषक मेरे खाने में मत डालना – कम स्वाद के लिए नहीं लडूंगा?

आइए सरकार को दोष दें| आइए किसान को दोष दें| बावर्ची को दोष दें| पड़ौसी को दोष दें|

नोट: इस बार दिल्ली से त्रिवेंद्रम आते समय सोचा नहीं था कि मैं दोनों शहरों में कोई तुलना करूंगा मगर…

बाबरी दिवाली


राम और बाबर का पांच सौ साल पुराना रिश्ता लगभग अटूट है| किसी भी अदालत का कोई फैसला इस रिश्ते को नहीं तोड़ सकता| यह रिश्ता मंदिर मस्जिद का मोहताज नहीं है| यह रिश्ता दिवाली का है|

दिवाली उद्गम भले ही भगवान राम के अयोध्या वापिस आने से जुड़ा हो परन्तु किसी न किसी दिन भारतीय दिवाली को आधुनिक बनाने का श्रेय ज़हीर-उड़-दीन बाबर को जरूर दिया जायेगा| वैसे तो दिवाली को अति-आधुनिक प्रकाश-प्रदूषित बनाने का जिम्मा भी चंगेज़ी इलाकों के बाशिंदों को दिया जाना चाहिए|

जब राम अयोध्या वापिस लौटे – लगभग सभी ग्रन्थ – गाथाएं – गवैये सहमत हैं – नागरिकों ने दीवले जलाकर उन का स्वागत किया| दिवाली से जुड़े सारे शब्द दीवलों से जाकर जुड़ते हैं| चाहे किसी का दीवाला निकलना हो या किसी की दिवाली होनी हो; दीवले चुपचाप अपनी उपस्तिथि का अहसास करा देते हैं| यह अलग बात है कि बाबरी और चीनी दिवाली में दीवलों की सदेह उपस्तिथि कम होती जा रही है|

बाबर समरकंद से जब भारत आया तो अपने साथ हिंदुस्तान के लिए वो नायब तोहफ़ा लाया जिसके खिलाफ कोई शब्द सुनना किसी कट्टर हिंदूवादी या इस्लामवादी को शायद ही गवारा हो| यह बेशकीमती तोहफा है – बारूद और उसकी औलाद आतिशबाजी| बाबर या उसके दिखावापसंद वंशजों ने दिवाली के दीयों की रौशनी से मुकाबला करने के लिए आतिशबाजी के जौहर दिखाने शुरू किये| धीरे धीरे आज यह आतिशबाजी दिवाली का सबसे दुखद पर्याय बन गई है| अदालती फरमानों के बाद भी दिवाली पर आतिशबाजी होती है| राम से सहज सच्चे सुन्दर दीवलों का मजाक बाबर की आतिशबाजी आजतक उड़ाती है|

बाबर के खानदानी मंगोलों की कृपा से आजकल उनके मूल देश चीन से आने वाली प्रकाशलड़ियाँ भी तो कुछ कम नहीं| झूठीं चमक-दमक प्रकाश प्रदूषण – लाभ कोई नहीं|

पढेलिखे कहे जाने वाले लोग आतिशबाजी कर कर मलेरिया और डेंगू तो रोकने का दावा करने में नहीं चूकते| बेचारे भूल जाते हैं हमारे सीधे सादे राम जी की कृपा से मिट्टी का सस्ता सा दिया भी मच्छर मार लेता हैं और आबोहवा भी ख़राब नहीं करता|

मगर माटी के दिया कोई क्यों ले – उससे दिखावा कहाँ हो पाता है? उसकी धमक कहाँ पड़ोसी के कान में जाती है, उसकी रौशनी से कौन नातेदार चौंधियाता है? चुपचाप पड़ा रहता है – तेल की धार देखते देखते सो जाता है|

जाने कब राम जी की दिवाली वापिस आएगी|

दिवाली पर पहले लिखे गए आलेख:

रंगीन दीवले 

अहोई कथा – दीवाली व्यथा

दिवाली अब भी मानती है

प्लेटफ़ॉर्म का पेड़


कौन बड़ा कलाकार है, ईश्वर या मानव?

किसकी कलाकृति में अधिक नैसर्गिक सौंदर्य है? मानव सदा ईश्वरीय सुंदर में अपनी कांट छांट करता रहता है| मानवीय हस्तक्षेप बेहतर मालूम होता है तो गंभीर प्रश्न भी छोड़ जाता है| आखिर मानव को हर बात में अपना हस्तक्षेप करने की क्या आवश्यकता है? मानव नैसर्गिक सौन्दर्य में अपनी सुविधा के हिसाब से सुन्दरता और कुरूपता देखता है|

चंडीगढ़ का रेलवे स्टेशन, प्लेटफ़ॉर्म एक का दिल्ली छोर| इंजन से लगभग तीन चार डिब्बे की दूरी पर एक सुंदर सा पेड़ है जो स्टेशन के बाहर दूर से देखने पर बड़ा सुन्दर, छायादार, प्रेममय हरा भरा दिखाई देता है| मगर जब हम प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचते हैं तो आधुनिक छत और उसकी अत्याधुनिक उपछत के चलते उसका तना ही दिखाई देता है|

अच्छी बात यह है कि मानवीय सौन्दर्यकारों ने इस पेड़ में महत्ता को स्वीकार और अंगीकार किया| उन्होंने हमारे कथित आधुनिक सुविधा भोगी समाज की प्रकृति से दूरी को भी अपने सौन्दर्य कार्य में समाहित किया| पेड़ की प्लेटफ़ॉर्म पर उपस्तिथि को सीमित किया गया है|

इस पेड़ का तना तीन रंगों से रंगा गया है, शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग अच्छा न लगा हो| शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग उन कीट पतंगों को आकर्षित करता हो जिन्हें मानव पसंद न करता हो| पेड़ के चारो उसकी सुरक्षा के लिए और उनकी जड़ों और तनों  के सहारे मौजूद मिट्टी से प्लेटफ़ॉर्म गन्दा होने से बचाने के लिए सुरक्षा बाड़ा भी बनाया गया है| पेड़ का मनोहर हरापन क्रूर आधुनिक की निगाह से बचा लिया गया है| मेरे मन के इस मरोड़ से बेख़बर पेड़ अपने में मगन है| पेड़ प्लेटफ़ॉर्म को आज भी छाया देता है| पेड़ पेड़ है – पिता की भूमिका में बना रहता है| मैं उसके पास बैठकर बोधिसत्व होने की प्रतीक्षा में हूँ|

 

मरती हुई नदी अम्मा


क्या आप एक पात्र में गंद या गन्दा पानी लेकर अपनी माँ के सिर पर डाल सकते हैं?

अगर आपका उत्तर नकार में है तो आप घटिया किस्म के झूठे हैं| अगर आप एक भारतीय हिन्दू हैं तो आप झूठे ही नहीं महापापी भी हैं| ईश्वर अनजाने में किये गए पाप को तो माफ़ कर भी दे मगर जानते बूझते अनजान बनने से तो काम नहीं चलेगा| ईश्वर के माफ़ करने से क्या माँ दिल से माफ़ करेगी|

नदियाँ, जिन्हें सारा भारत माँ कहता है और जिनका देवी कहकर मंदिरों में पूजन हो रहा है, उनके माथे ऊपर कूड़ा करकट कौन डाल रहा है?

माँ के दुर्भाग्य से यह सब उसकी अपनी धर्म संताने कर रही हैं| हभी हाल में माँ यमुना के किनारे पर उनके पूजन के नाम पर प्रदूषण करने वाले एक स्वनामधन्य हिन्दू धर्मगुरु ने तो अपनी गलती मानने और अदालत द्वारा लगाये गए जुर्माने को देने से इंकार कर दिया| सुबह सुबह नदियों में आचमन करने जाते पूंजीपति अपने कारखानों में प्रदुषण पैदा करते हैं और उसे बिना साफ़ सफाई के नदियों की गोद में डाल देते हैं| बहुत से तो इनता अच्छा करते हैं कि कारखाने में या उसके पास धरती की कोख में अपनी पैदा की गई गंद डाल देते हैं|

अगर किसी माँ का इतना अपमान होगा तो उनका मन मलिन न होगा| क्या वो माँ ये न कहने लगेगी कि ईश्वर उसे ऐसे संतान से मुक्ति दे? क्या वो अपने लिए मृत्यु की कामना न करने लगेगी?

शायद अब नदियाँ ईश्वर से प्रार्थना कर रहीं हैं, हमें पानी मत देना मौला|

तेरी प्यास मेरी प्यास


तेरी प्यास तू जाने, जब मैं प्यास से मरूँगा अपना पानी ढूँढ लूँगा| जाने अनजाने हम सभ्य शहरी यही कहते आए हैं अपने जंगली जाहिल और गंवारों से| अब…

अब पानी जा रहा है| बहुत लूट लिया हमने जंगली जाहिल और गंवारों का पानी| खेती किसानी और सिचाई के नाम पर बने बांध शहरों को पानी देते रहे| कुछ पैसे का बूता था तो कुछ प्रचार तंत्र पर मजबूत पकड़| आज भी हम उन्हें पानी के लिए दोष दे देते हैं| मगर कब तक…

जिन लोगों के लालच ने गाँवों और जंगलों के ताल तालाब तलैया लूट लिए थे वो कब से शहरों में आ बसे| उनके साथ उनका पाप भी| हमेशा पानी का घड़ा नहीं भरा करता पाप का घड़ा भी भरता है|

जंगली जाहिल और गंवारों के पास पानी दस बीस किलोमीटर में पानी तो था जो उनकी औरतें ढो ढो कर ले आतीं थीं| हम और हमारी औरतें… बाजार से खरीदोगे… हा हा हा… कितनी कीमत दे पाओगे?

जो साफ पानी कभी प्रकृति मुफ़्त देती थी आज बीस रुपये बोतल में खरीदते हो… कल… परसों… आज भी एक साल का हमारा पीने का पानी बाजार में पंद्रह हजार साल का पड़ता है| अब परिवार का सोचो…

दिल्ली शहर… इस किनारे से उस किनारे तक कंक्रीट से मड़ा हुआ… यहाँ सड़क किनारे की हरियाली को खोदो तो  नीचे पुरानी सड़क निकल आती है… कुछ तो प्रकृति प्रदत्त भी छोड़ देते| मगर अब वर्षा जल संचयन की भी मशीन लगाओ…|

वर्षा… सुनकर तुम्हें कीचड़ और सड़क पर भरा पानी याद आता है| पुराण में एक कथा आती है.. अमृत जब दैत्यों के गले में उतरा तो तामसिक हो गया… हम वही दैत्य हैं… हमारे नगर महानगर दैत्य का वह गला हैं| जहाँ वर्षा का जल बिना बाढ़ के भी प्रलय बनता है, बीमारी लाता है|

जब एक करोड़ पढ़े लिखे सभ्य लोग पानी के लिए दुकानों पर चीख रहे होंगे… गुहार लगा रहे होंगे… और पानी की कंपनी पानी लाने की कीमत बढ़ा रही होगी… तब एक दिन पैसे ख़त्म होंगे और हमें मरना होगा|

हमें मरना होगा एक साथ प्यासा, तड़पता हुआ, बिना अर्पण के, बिना तर्पण के| मरते हुए सोचना होगा… उन जंगली जाहिल गंवारों को तर्पण तो मिला था… हमारे पास तो मरने वक़्त आंसू भी नहीं होंगे तर्पण के लिए|

पानी रखिये

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एक थैले वाला मुकदमा


विज्ञापन का सबसे बेहतर तरीका है – समाचार में छा जाना| अभी हाल में जूता कंपनी बाटा पर एक थैले के लिए हुआ मुकदमा बाटा के लिए इसी प्रकार का समाचार साबित हो रहा है| सामान के साथ थैला देने के लिए दाम वसूलने का काम पहली बार नहीं हुआ| दिल्ली में मदर डेरी भी बिना पैसे वसूले आपको थैला नहीं देती| इसी प्रकार के अन्य और भी संस्थान हैं| मगर इन सभी मामलों में ग्राहक के पास यह थैला खरीदने या न खरीदने का विकल्प रहता है| अगर वह अपने हाथ में अपना खरीदा हुआ सामान ले जाना चाहे तो उसकी मर्जी पर निर्भर करता है| दुर्भाग्य से आजकल ग्राहक मुफ्त के थैले को अपना अधिकार समझते हैं| कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ ग्राहक थैला न देने पर भद्दी भाषा का प्रयोग करते हैं| मुफ्त के यह थैले प्रायः घर और बाहर कूड़े का एक प्रमुख कारण बन रहे हैं| इन दिनों कूड़ादान और कूड़ाघरों में सबसे अधिक कूड़ा थैलों और अन्य बारदाने (पैकिंग मटेरियल) का ही है|

दिनेश प्रसाद रतूरी बनाम बाटा इंडिया लिमिटेड मजेदार मुकदमा है| जहाँ तक मुझे लगता है, इस फैसले पर जल्दी ही अपील होनी चाहिए| इस प्रकार यह लम्बे समय तक बाटा को खबर में रख सकता है|

ग्राहक ने शिकायत की है कि बिना बताए या पूछे थैला उन्हें बेचा गया| मामला साधारण था| ग्राहक थैले की यह बिक्री स्वीकार करने से मना कर सकता था और जूता या जूते का डिब्बा साथ ले जा सकता था| उस पर थैला ले जाने की कोई जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए थी| क्योंकि थैला बेचने का कोई करार नहीं हुआ, कोई बात नहीं हुई तो यह बिक्री तुरंत निरस्त करने योग्य थी| निर्णय में लिखे गए तथ्य यह नहीं बताते कि ग्राहक ने थैले की यह बिक्री रद्द करने का प्रयास किया या नहीं किया| क्या ग्राहक मात्र मुफ्त थैले की मांग करता रहा और बाद में बिक्री स्वीकार कर कर वहां से चल दिया? जी, उसने थैले को स्वीकार किया मगर उसका मानना था कि मुफ्त थैला उसका अधिकार था, खासकर जब कि उस थैले पर कंपनी का लोगो ब्रांड आदि लगे हुए थे|

इस मुक़दमे में यह दावा किया गया है कि दुकानदार मुफ्त में ग्राहकों को थैला देने के लिए बाध्य है| मुझे यह दावा बिल्कुल गलत लगता है| इस समय बाटा को छोड़कर किसी भी अन्य दुकानदार के लिए मेरी तत्काल सलाह है कि तुरंत अपनी दूकान में सूचना लिखवा दें – थैला घर से लायें या खरीदें, मुफ्त नहीं मिलेगा|

दूसरी बात ग्राहक का कहना है कि इस थैले पर विज्ञापन लिखा हुआ है और उस थैले को दे कर बाटा कंपनी उनसे बिना पारिश्रमिक दिए विज्ञापन करवा रही थी| अब आपकी कार, फ्रिज, टेलिविज़न, चश्मे, कमीज कुरता सब पर कोई न कोई ब्रांड या लोगो लगा हुआ है| क्या यह विज्ञापन है, या आपके घर की ब्रांड वैल्यू? आप सब अब स्वीकार कर लें कि आप बेगारी की माडलिंग और विज्ञापन सेवा कर रहे हैं| वास्तव में होता उल्टा है, हम उस ब्रांड को घर लाने और दुनिया को दिखाने में गर्व कर रहे होते हैं| विक्रेता हमें यहीं गर्व बेचता है और उसके दाम वसूलता है|

बाटा का दावा है कि उसने पर्यावरण हित का ध्यान रखकर यह थैला बेचा| यह अपने आप में बचकाना बचाव था|

अगर पर्यावरण हित का ध्यान था तो ग्राहक को बार बार प्रयोग करने वाला थैला बेचना चाहिए था या उपहार में देना चाहिए था| सबसे बेहतर था कि कंपनी अपने ग्राहकों पर अपने घर से मजबूत कपड़े का बार बार प्रयोग हो सकने वाला थैला लाने के लिए दबाव बनाती|

वास्तव में यह गलत बचाव बाटा के विरुद्ध जाता है| ऐसा लगता है कि वह गलत और जबरन बिक्री को जायज ठहराने का कमजोर प्रयास कर रही है| इस गलत बचाव से यह महसूस होता है कि यह थैले की गलत तरीके से की गई बिक्री का मामला बनता है| इस प्रकार के बचाव से उसने इस थैले की जबरन बिक्री स्वीकार कर ली| अगर आप गलत तरीक से बिक्री करते हैं तो यह कानूनन गलत है|

होना यह चाहिए था कि कंपनी कहती कि वह पर्यावरण हित में ग्राहकों को अपने घर से बार बार प्रयोग हो सकते वाला थैला लाने के लिए प्रोत्साहित करती है और विशेष मामलों में ग्राहक की मांग पर उन्हें थैला बेचती है| क्योंकि यह ग्राहक अपने साथ अपना थैला नहीं लाया था, इसलिए यह थैला उसने खुद खरीदा| थैले पर कंपनी का कोई भी विज्ञापन इस थैले को सस्ता रखने का प्रयास है और कागज का अधिक बेहतर उपयोग भी है|

दुर्भाग्य से इस मुक़दमे के फ़ैसले में विक्रेता को अपने सभी ग्राहकों को आगे से मुफ्त में थैले देने का आदेश दिया गया है| वास्तव में यह अपने आप में गलत होगा| कम्पनी यह थैले अपने लाभ में से नहीं देगी वरन अपनी लागत में वह इसे जोड़ेंगे और जूतों के दाम बढ़ जायंगे| हो सकता है, ३९९ रूपए का जूता आधिकारिक रूप से ४०२ रुपए का हो जाए| एक साथ दो जोड़ी जूते खरीदने ओर ग्राहक को ८०१ रूपए की जगह ८०४ रुपए खर्च करने पड़े|

साथ ही इस निर्णय से हमेशा अपना थैला लेकर चलने वले जागरूक पर्यावरण प्रेमी ग्राहकों को हताशा होगी|

तुरंत आवश्यकता है कि जागरूक कंपनियां अपने ग्राहकों की कपड़े के मजबूत थैले साथ लाने के लिए प्रेरित करें| पोलीथिन, प्लास्टिक, कागज़ और महीन कपड़े के कमज़ोर एकल प्रयोग थैलों को देना तुरन और पूरी कड़ाई से बंद करें| अपने साथ थैला न लाने वाले ग्राहकों को पच्चीस पचास रुपये का मजबूत खादी का थैला खरीदने का विकल्प दें|

कृपया इस पोस्ट को सामाजिक संचार माध्यमों में शेयर करें और जागरूकता लायें|

होली में भरें रंग


जब कोई पटाखों के बहिष्कार की बात करे और होली पर पानी की बर्बादी की बात करे, तो सारे हिंदुस्तान का सोशल मीडिया अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए पगला जाता है| कुछ तो गली गलौज की अपनी दबी छिपी दादलाई संस्कृति का प्रदर्शन करने लगते हैं|

मगर हमारी दिवाली में दिये और होली में रंग गायब होते जा रहे हैं| बहुत से त्यौहार अब उस जोश खरोश से नहीं मनाये जाते जो पहले दिखाई देता था, तो कुछ ऐशोआराम (रोजीरोटी का रोना न रोयें) कमाने के दबाब में गायब हो रहे हैं| समय के साथ कुछ परिवर्तन आते हैं, परन्तु उन परिवर्तनों के पीछे हमारी कंजूसी, लालच, दिखावा और उदासीनता नहीं होने चाहिए|

दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबन्ध के विरोध में पिछली दिवाली इतना हल्ला हुआ कि लक्ष्मी पूजन और दिए आदि जैसे मूल तत्व हम भूल गए| मैं दिवाली पर दिवाली पर जूए, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण का विरोधी हूँ| प्रसन्नता की बात है कि रंगोली, लक्ष्मी पूजन, मिठाइयाँ, दिये (और मोमबत्ती), मधुर संगीत, आदि मूल तत्व वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण नहीं फैलाते| पटाखों और बिजली के अनावश्यक प्रकाश की तरह यह सब हमारी जेब पर भारी भी पड़ते|

यही हाल होली का है| पानी की बर्बादी पर हमें क्रोध हैं| पानी की बर्बादी क्या है? मुझे सबसे अधिक क्रोध तब आता है जब मुझे बच्चे पिचकारियों में पतला रंग और फिर बिना रंग का पानी फैंकते दिखाई देते हैं| अच्छा हो की इस पानी में रंग की मात्रा कम से कम इतनी हो कि जिसके कपड़ों पर पड़े उसपर अपना रंग छोड़ें| इस से कम पानी में भी अच्छा असर और प्रसन्नता मिलेगी| टेसू आदि पारंपरिक रंग का प्रयोग करें| इसमें महंगा या अजीब क्या हैं?

होली मेरा पसंदीदा त्यौहार हैं| पिचकारी लिए बच्चे देखकर मैं रुक जाता हूँ और बच्चों से रंग डालने का आग्रह करता हूँ| अधिकतर निराश होता हूँ| बच्चों को भी अपना फ़ीका रंग छोड़ने में निराशा होती है|

दुःख यह है कि जो माँ बाप दिवाली के पटाखों पर हजारों खर्च करते हैं, हजारों की पिचकारी दिलाते हैं, वो होली पर दस पचास रुपये का रंग दिलाने में दिवालिया जैसा बर्ताव करते हैं|

मेरे लिए उड़ता हुआ गुलाल और रंग गीले रंग से अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकी यह सांस में जाकर कई  दिन तक परेशान करता हैं| गीले रंग से मुझे दिक्कत तो होती है, परन्तु चाय कॉफ़ी पीने से इसमें जल्दी आराम आ जाता है| हर व्यक्ति को गीले और सूखे रंग में से चुनाव करने की सुविधा रहनी चाहिए| बच्चों के पास गीले रंग हो मगर सूखे रंग गुलाल भी उनकी पहुँच में हों, जिस से हर किसी के साथ वो प्रेमपूर्ण होली खेल सकें|

हाँ, कांजी बड़े, गुजिया, पापड़, वरक, नमकीन आदि पर भी ठीक ठाक खर्च करें| हफ्ते भर पहले से हफ्ते भर बाद तक नाश्ते की थाली में त्यौहार रहना चाहिए| व्यायाम और श्रम कम करने की अपनी आदत का दण्ड त्यौहार और स्वादेंद्रिय को न दें|

दिवाली अब भी मनती है


वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

पानी की पहली लड़ाई


धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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पानी रखिये…


 

 

रहिमन पानी राखिये,

बिन पानी सब सून।

पानी गये न ऊबरे,

मोती, मानुष, चून॥

सोलहवीं सदी में महाकवि अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने जब यह दोहा कहा था, शायद सोचा भी न होगा कि इसके मायने विशेष होने की जगह साधारण हो जायेंगे और वह साधारण मायने अतिविशेष माने जायेंगे| इस दोहे में पानी शब्द का कोई भी अर्थ शाब्दिक नहीं है|[i] परन्तु तब से लगभग पांच सौ वर्ष के बाद पानी (water) का शाब्दिक अर्थ बहुत महत्वपूर्ण हो चुका है|

पानी अर्थात जल के बिना मोती, मनुष्य और आटा (यानि खाद्य पदार्थ) अपना अस्तित्व नहीं बचाए रख सकते| पानी को बचाए रखिये| बिना पानी दुनिया बंजर उजाड़ हो जाएगी| लगता है रहीमदास इक्कीसवीं सदी की इस आशंका की चेतावनी दे रहे हैं|

पानी कैसे बचे? इसके कई उपाय सुझाये जा रहे हैं| उनमें से बहुत से सुझाव अपनाये भी जा रहे हैं| दशक – दो दशक पहले तक पानी की साफ़ बनाये रखने पर जोर था| आजकल पानी बचाने पर सारा ध्यान है| अब पानी की कमी पहली दुश्वारी है, पानी को साफ़ रखना बाद की बात है|

किस काम में और किस उत्पाद में पानी कितना बर्बाद हो रहा है, यह आँका जा रहा है| औद्योगिक जगत इस समस्या पर कितना गंभीर है कोई नहीं जानता| शायद विकास और रोजगार की मांग देश और दुनिया की हर सरकार पर हावी है| ऐसे में पानी बचाने के ज़िम्मा साधारण घर-गृहस्थी पर ही है| पानी का पहला संकट घर में झेलना ही होगा –- वह भी अचानक दिन के पहले पल में|

पुराने समय में जब कूएं से पानी निकालना होता था तो सोच समझ कर खर्च होता था| पांच लीटर पानी की जरूरत हो तब दस लीटर पानी खर्च करने का अर्थ था दुगनी मेहनत, दुगना समय| मशीनी युग में पानी बर्बाद करने से पहले हम कम ही सोचते हैं| बटन दबाकर पानी पा जाने वाले हम लोग नहीं जानते पानी का वो महत्व; जो घर से दूर किसी ताल-पोखर से पानी वाली बूढ़ी माँ जानती है|

क्या यह जरूरी है कि एक बाल्टी पानी से नहाने की जगह दस बाल्टी पानी बाथटब में बर्बाद की जाएँ? यह नहीं कहता में कि आप कभी भी बाथटब का प्रयोग न करें, मगर उसे सीमित किया जा सकता है| ऐसे बहुत से उदहारण हो सकते हैं| नहाना, कपड़ा धोना, हाथ-मूँह धोना, खाना बनाना और खाना-पीना सब काम में पानी की जरूरत है|

जब भी मेहमान आते हैं, तो चाय-पानी पूछना हमारी पहली सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी होती है| शायद ही हम कभी आधे ग्लास पानी से उनका स्वागत करते हों| अगर मेहमान पानी को ग्रहण करने से मना कर दें, तो यह मेजबान के अपमान के तौर पर देखा जाता रहा है| इसीलिए आजकल मेहमान पानी की जरूरत न होने पर पहले ही बोल देते हैं| मगर शायद ही मेहमान के सामने लाये गए पानी का कुछ प्रयोग होता हो| यह पानी फैंक दिया जाता है|

आजकल दावतों, सभाओं, समाजों, जलसे, मजलिसों और शादी – ब्याह में पानी की बोतल देने का चलन बढ़ रहा है| अधिकतर मेहमान अपनी जरूरत जितना पानी पीकर बोतल या बचा पानी फैंक देते हैं| अगर यह झूठा पानी न भी फैंका जाए तब भी कोई और उसे नहीं पीयेगा| घरों में भी अक्सर हम पूरा ग्लास पानी लेते हैं| ग्लास में बचा हुआ पानी बर्बाद हो जाता है| पानी की यह सब बर्बादी भी रोकी जा सकती है – save water|

कटिंगपानी #CuttingPaani इसका उपाय हो सकता है| हम भारतीय लोग जरूरत न होने पर पूरी चाय नहीं लेते| कटिंगचाय से हमारा काम चल जाता है| यह उदहारण पानी के लिए भी अजमाया जा सकता है| जब जरूरत न हो तो ग्लास में पूरा पानी लिया ही क्यों जाए? अगर पूरा पानी लिया गया है, तो क्या जरूरत से ज्यादा होने पर उसे किसी और काम में प्रयोग नहीं कर सकते? बचे हुए पानी का प्रयोग बाद में पीने के अलावा भी पौधों को पानी देने, झाड़ू-पोंछा करने, और पालतू जानवरों को पिलाने के लिए किया जा सकता है| हमारे भारतीय परिवारों में झूठा पानी पौधों या पालतू जानवरों को नहीं दिया जाता| इसलिए कोशिश करें कि यह अतिरिक्त पानी झूठा होने से पहले ही अगल निकाल दिया जाए|

आइये पानी बचाने की शपथ लें| अगर आप अभी भी सोच रहे हैं तो यह तीन वीडियो भी देखते चलें|

[i] इस दोहे में पानी का पहला अर्थ सच्चे मोती की चमक, दूसरा मनुष्य की विनम्रता और तीसरा रोटी बनाने के लिए गूंथे गए आटे की लोच से है| उचित चमक, उचित विनम्रता और उचित लोच के बिना इमोटी, मनुष्य और आटे का कोई प्रयोग नहीं है|

प्रदूषण का साल


दिल्ली में साल २०१७ प्रदूषण का साल रहा| हर साल बढ़ते प्रदूषण के लिए दिल्ली वाले नई नई दलीलें पेश करते हैं| इस दलीलों का कुल जमा मतलब यह होता है कि प्रदूषण का कारण दूसरे हैं, वो नहीं| इन दलीलों में दिल्ली वाले यह भूल जाते हैं कि प्रदूषण से बीमार पड़ना और मरना उनको है; दूसरों को नहीं|

मुझे साल २००५ में पहली बार बोला गया कि दिल्ली छोड़ कर किसी प्राकृतिक जगह में चले जाओ| मगर बहुत से कारण रहे, यह नहीं हो पाया| उस समय मुझे लाइलाज खाँसी का मरीज बताया गया| खैर, खाँसी का होमियोपैथी में इलाज हुआ और जो थोड़ा बहुत बचा था उसे देशी नुस्खे ने दूर कर दिया| दिल्ली में रहना आजकल एक अग्नि परीक्षा है| आज सुबह रोज इस उम्मीद में मोबाइल पर प्रदूषण का स्तर देखता हूँ कि शायद कम हो, मगर होता नहीं|

दशहरा के साथ जो ठंडक, उत्सव, मौज-मस्ती के जो दिन शुरू होते हैं वो मेरे लिए पस्ती के दिन बनने लगते हैं| नाक ढंकने के लिए कपड़े से लेकर मास्क तक का इंतजाम शुरू होने लगता है| फिर भी कुछ न कुछ चूक होती है| फ़िजाओं में फैला जहर कहीं न कहीं फेफड़ों तक पहुँचता ही है|

पिछले तीन हफ्ते से खाँसी से हाल बुरा रहा| बिना मास्क के घर से निकलने पर गले में खारिश और सीने में जलन होने लगती है| खाँसी से कमर टूट जाती है कई बार| इस दिसंबर में कमर में दर्द रहा| आज भी है| आँखों में जलन तो अब कहने की बात नहीं| यह सब शायद अकेले मुझे होता है| अगर बाकी लोगों को होता तो वो भी आवाज उठाते| अगर वो लोग गूंगे हैं, तो अपने बुढ़ापे तक बहरे और अंधे होने से कोई नहीं रोक सकता|

आप किसी भी राजनीतिक पार्टी से हों, पूछें तो सही पार्टी से क्या कर रहे हो उस देश या राज्य में जहाँ सत्ता में हो| अगर भाजपाई हो तो पूछो कि अगर सारा दोष राज्य का है तो उनकी दिल्ली सरकार बर्खास्त क्यों नहीं हो रही| अगर आप-पार्टी से हैं तो पूछे कि क्या कदम उठे| अगर राजनीति में गधे हो तो पूछो सब सरकारों से कि क्या कर रहे हो? कांग्रेस और कम्युनिस्ट से भी पूछो की सत्ता और विपक्ष में रहकर पर्यावरण पर तुम्हारे सरोकार क्या थे और हैं?

मगर मरने तक हम अपनी अपनी पार्टी को बचायेंगे, अपने अपने त्योहारों की कुरीतियों को बचायेंगे, अपने अपने धंधे के गंद छिपाएंगे| और किसी दिन खांसते खांसते एक गूंगी बहरी मौत मर जायेंगे|

जी तो पा नहीं रहे, आइये मिलकर मरें|

दिल्ली का प्रदूषण पर्व


दिल्ली में साल भर प्रदूषण का स्तर ख़तरे की सभी सीमाओं से कई गुना ऊपर रहता है| लेकिन दिल्ली वाले ठहरे आँख के अंधे कान के कच्चे| न कोई सही चीज आसानी से दीखे, न कोई सही बात आसानी से सुनाई दे| जब तक प्रदूषण से सूरज दिखना बंद न हो जाए तब तक दिल्ली वालों को प्रदूषण समझ नहीं आता| यह उच्चतम प्रदूषण भी दिल्ली वालों के लिए एक पर्व हो गया गया है| बच्चों की स्कूल से छुट्टी, अमीरी में कहीं बाहर घुमने निकल जाना, या एयरप्योरिफायर लगाकर घर में मस्त फ़िल्में देखना| अब तो यह सालाना जलसा हो गया है कि होगा ही होगा| दिल्ली सरकार और भारत सरकार इस पर्व पर कुछ मनोरंजक समाधान पेश करेंगे| यही सब है, और क्या?

वैसे तो प्रदूषण दिल्ली वालों की दीखता नहीं और दिख भी जाए तो हमारे पास बहुत सारे हास्यास्पद समाधान है| जैसे – पंजाब हरियाणा वाले पिराली जला रहे हैं हैं; दिल्ली के गरीब लोग कचरा जला रहे हैं; भवन निर्माण मजदूर धूल उड़ा रहे हैं| हद होती हैं दिल्लीपन की|

प्रदूषण का यह प्रदूषण उच्चस्तर दिल्ली से सामान्य स्तर प्रदूषण से २० से ३०% अधिक ही होता है| सामान्यतः दिल्ली का प्रदूषण स्तर ३०० होता है और दिल्लीवालों का प्रदूषण सहनशीलता स्तर ४०० होता है, जो वैज्ञानिक रूप से पर्यावरण की मृत्यु का परिचायक है| यह प्रदूषणस्तर दिल्लीपन को हास्यास्पद बनाता है| इस स्तर पर दिल्ली की जनता, राज्य सरकार और कभी कभी दिल्ली की भारत सरकार भी जग जाती है| यह जगना इस तरह का है कि कोई नशेड़ी नींद से जागकर नशे में बक बक कर रहा हो|

दिल्ली प्रदूषण के सामान्य प्रमुख कारक भी कम हास्यास्पद नहीं है:

  1. दिल्ली का स्थलमध्य होना: भारत के अधिकतर बड़े शहर समुद्र के काफ़ी निकट हैं, इसलिए प्रदूषण दिल्ली में फंस जाता हैं|
  2. जनसंख्या: प्रति वर्ग किलोमीटर में रहने वाला जनसंख्या घनत्व दिल्ली में इतना अधिक है कि दिल्ली शहर वर्ग प्रतिकिलोमीटर अधिक कार्बन डाई ओक्साइड छोड़ता है| दिल्ली में घरेलू प्रदूषण करक गैस स्टोव, फ्रिज, कूड़ा, हीटर, वातानुकूलन, आदि का घनत्व भी काफ़ी अधिक है|
  3. कूड़ादान: दिल्ली कूड़े का प्रबंधन आजतक ठीक से नहीं कर पाती| यहाँ स्वच्छता का मतलब है किसी मैदान में पेड़ के सूखे पत्तों पर झाड़ू लगाते हुए फ़ोटो खींचना|
  4. जनयातायात साधन: दिल्ली वाले सरकार से यह नहीं पूछते कि बसें इतनी कम क्यों हैं? कॉलोनियों के अन्दर रिक्शे क्यों बंद हैं? मेट्रो का अंतराल कम क्यों हैं? दिल्लीपन में शरीफ़ दिल्ली वालों को मजबूर करता है कि दस हज़ार माहना से भी अधिक खर्चा अपने सर पर डालो और कार ले आओ, भले ही द्वार पर खड़ी रहे| सुरक्षा की संवैधानिक और सार्वभौमिक जिम्मेदारी भी सरकार का उत्तरदायित्व कम से कम दिल्ली में नहीं खड़ा करती|
  5. आस पड़ोस का प्रदूषण: दिल्ली को विकास चाहिए, दिल्ली को सुविधाएँ चाहिए मगर इस विकास की कीमत अदा करने की जिम्मेदारी झारखण्ड, छत्तीसगढ़, या कोई और पिछड़ा राज्य उठाये| मगर भाई प्रदूषण तो हवा के साथ आएगा ही| और विकास की मार झेलता हुया ग़रीब रोजगार की तलाश में दिल्ली ही तो भागेगा ही|

मगर कोई नहीं पूछता की वास्तविक क्या हैं, इनका क्या निदान है और उसमें खुद उसका क्या योगदान होगा और सरकार की अब तब और आगे की उत्तरदायिता क्या है?

खैर छोड़िये, प्रदूषण पर राजनीति करते हैं जब तक दिल्ली वाले खुद प्रदूषण से न मर जाएँ|

बापू की दिल्ली बिल्ली


गबरू नौजवान अपनी शाहना अकड़-धकड़ के साथ चला आ रहा है| उसकी चाल में गजब की मस्ती है मगर चहरे पर लगता है कि बदलते वक़्त ने थोड़ी पस्ती ला दी है| दूर सामने मैदान में दो तीन बूढ़े किसी बात पर संजीदगी से गुफ्तगू कर रहे है| बाद पेचीदा लगती है; नौजवान ने मन ही मन सोचा| वो दूर से ही मामला समझना चाहता है मगर काला कुहासा कुछ देखने नहीं देता| गौर से देखने पर महसूस होता है, बूढ़े मिलकर खों खों खांस रहे है| खांसना भी दिल्ली शहर में गुफ्तगू करने के सलीकों में शुमार होने लगा है|

“क्या इसी कालिख भरे मुल्क के लिए जिए मरे थे?” नौजवान बूढों की तरफ़ बढ़ते हुए सर झटकता है|

उसे अपनी तरफ आता देख बूढ़े शांत होने लगे| पीढ़ियों में सोच का फ़र्क यूँहीं तो नहीं जाता|

“क्या बापू! आज क्या कोई हड़ताल है?” नौजवान ने कुछ परेशानी और कुछ हमदर्दी से पूछा|

मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा खों खों कर हंसने लगा|

“अब न वोट क्लब है न जंतर मंतर। हड़ताल करने पर पड़ते हैं हंटर।“ जैकिट वाले बूढ़े ने उदास लहजे में कहा|

“मामला क्या है, कुछ नहीं तो बापू अपनी समाधि पर ही जाकर बैठ जाइएगा|” नौजवान ने मजाकिया मगर इज्जतदार लहजे में कहा|

“आप क्यों नहीं कोई धमाका कर लेते, बरखुरदार?” मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा बोला|

“ब्राउन ब्रिटिश से क्या लड़ें? साँस लेना दूभर हो चुका है| अब तो फ़िजाओं में स्वदेशी गर्द और गंदगी है|” नौजवान मायूस लहज़े से कहने लगा| दिल के दर्द से कहिये कि फैफड़े के दर्द से, नौजवान के गले से खों खों के दबी आवाज़ धमाके होने लगे| तीनों बूढों की खाँसी और बढ़ गई|

बापू धरने पर बैठने की जगह ढूंढ रहे थे कि बिना साँस फुलाएं बैठ सके। जगह न मिली दिल्ली में| बिल्ली बने और मास्क पहन लिया ज़नाब।

Delhi pollution (c) vikram nayak

सुपर का उत्सव #CelebratingSuper


कुछ बदलाव सुखद होते हैं| सुखद बदलाव तात्कालिक लाभ के लिए नहीं किये जाते बल्कि उनके पीछे दीर्घकालिक भावना रहती है| यह जरूरी नहीं की हर बदलाव जो हमें सुखद लगता हो वो दीर्घकालिक तौर पर सुखद ही हो| पिछली दो तीन शताब्दियों में होने वाला औद्योगिक विकास सुखद तो रहा पर दीर्घकालिक रूप से सुखद नहीं है| यह बात समझने में मानवता को समय लगा है| दुर्भाग्य से आज भी हम में से अधिकांश लोग जब विकास की बात करते हैं, तब हम दीर्घकालिक विकास की बात नहीं करते| इस तरह का तात्कालिक विकास भले ही आज की पीढ़ी को सुख दे परन्तु आने वाली पीढ़ियों के लिए दुःख के पहाड़ खड़े कर रहा है|

तात्कालिक विकास से उत्त्पन्न समस्याएं मानवता को कष्ट देतीं हैं, परन्तु प्रायः वह मानव जो उस अंध-विकास का ध्वजवाहक होता है – वह अपने कार्यों के दुष्परिणाम न देख पाता है न भुगत पाता है| आज समय आ गया है कि जो लोग तात्कालिक विकास के पीछे है, उस से लाभान्वित होते हैं वह  अपनी जिम्मेदारी समझें और उठायें| कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (CSR) इस दिशा में एक कदम है| परन्तु यह अपर्याप्त होगा अगर यह भी दिशाहीन रहे|

विकास यात्रा में बहुत सी चीजें आज जरूरी हैं – जैसे यातायात साधन| परन्तु यह जरूरी नहीं कि हर घर पर कार हो, न यह जरूरी है कि कार से प्रदुषण पैदा हो, न यह जरूरी है कि कार हर समय प्रयोग की जाए| लेकिन यदि कोई कार्य होगा तो उसके अच्छे बुरे परिणाम होंगे ही| यदि कार से कोई प्रदूषण होता है तो उस का निवारण करने के लिए शायद हर कार के साथ एक बड़ा पेड़ शहर में हो| यह एक उदाहरण है, जरूरी नहीं कि पेड़ ही प्रदूषण से बचाएं कोई तकनीक हो जो प्रदूषण को दूर करने में मदद्गार हो| क्या यह हो सकता है कि प्रदुषण फ़ैलाने वाले वाहनों, यंत्रो, तंत्रों, कल और कारखानों के साथ प्रदूषण रोकने के तकनीकि उपाय लगा दिए जाएँ? हर नाक के ऊपर मास्क न होकर हर चिमनी के ऊपर मास्क हो|

आप सारे कारखाने मास्क से नहीं ढक सकते तो आपको इस उपाय की भी जरूरत है| खासकर जब आप किसी कारखाने के मालिक नहीं है तब तक तो आप उसमें प्रदूषण नियंत्रक यंत्र नहीं लगा सकते| यह काम या तो मालिक का है या सरकार का| कारखाने ही क्या आज हर घर से प्रदूषण पैदा होता है| हमारी एलपीजी गैस के चूल्हे घर के सुरक्षित माहौल में कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसे जहर का उत्पादन होता है| हमारे कमरों में हरपल प्रतिपल छिड़का जाने वाला रूम फ्रेशनर भी प्रदूषण है –एक प्रदूषण के जबाब में दूसरा प्रदूषण|

अब प्रदूषण इतना है कि हम और आप उस से बचने के लिए तात्कालिक उपाय भी कर रहे हैं| आजकल दुनिया भर के कई शहरों में जगह जगह एयर प्योरिफायर लग रहे हैं| जन मन और धन के हिसाब से यह उचित कदम हो सकता है –समुचित कदम नहीं| परन्तु अच्छे प्रयास के रूप में इसकी सराहना होनी ही चाहिए|

ज्येष्ठ वैशाख (मई जून) के महीने में दिल्ली में बहुत गर्मी होती है| आजकल तात्कालिक उपाय है कि घर कार और कार्यालय में वातानुकूलन हो| वातानुकूलन अपने आप में गर्मी बढ़ाने का काम करता है| इस क्रिया में स्वयं ऊष्मा उत्पन्न होती है| हमारी पारंपरिक वास्तुकला इस प्रकार विकसित हुई कि घर हवादार हों और स्वाभाविक रूप से ठण्डे बने रहें| हमने उस तकनीक में विकास नहीं किया जो शायद अधिक सरल होता| यदि हर पक्के मकान दूकान कार्यालय की छत पर एक रूफ-टॉप गार्डन हो जाये और साथ में रेन-वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था हो तो गर्मी, पानी और पर्यावरण की समस्या को थोड़ा कम किया जा सके| जिन लोगों के पास अपनी छत नहीं है वो भी योगदान दे सकते हैं| बालकनी में गमले तो हो ही सकते हैं| अभी एक कंपनी ने दिवाली के मौके पर अपने स्टोरों से पौधों के बीज बाँटने का अच्छा कदम उठाया| बहुत लोगों ने पौधे लगाये होंगे| हम और आप भी अपनी बालकनी को प्राकृतिक सौंदर्य दे सकते हैं|

यह सब छोटी छोटी चीजें है, मगर अच्छे कदम है| मन में आशा भरते हैं| कुछ तो हो रहा है – #CelebratingSuper

ले साँस भी आहिस्ता


आज पर्यावरण की बात सबके दिल-ओ-दिमाग़ में कहीं न कहीं घर किये रहती है| दूर तक सोचने वाले बहुत पहले से इन बातों पर सोच-विचार करते रहे| ख़ुदा-इ-सुखन मीर तकी मीर अठाहरवीं सदी में कहे अपने एक शेर में कहते हैं:

ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम,
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का |

सांस भी सोच समझ कर लीजिये, यह दुनिया कांच का कारखाना है| कांच के कारखाने में उड़ता हुआ बुरादा, शायद उस वक़्त प्रदुषण को समझने का सबसे बढ़िया जरिया रहा हो| आज कांच का बुरादा अकेला नहीं है, तमाम ख़राब चीज़े हैं, जो हमारे पर्यावरण को और दुनिया को गन्दा करती हैं और सांस लेना दूभर हो चला है| आज प्रदुषण आज सड़क पर या नदियों में नहीं रहता, यह घर में भी है|

यहाँ तक कि जो एयर फ्रेशनर हम घर को तरोताजा करने के लिए दिन भर उड़ाते रहते हैं, वह खतरनाक प्रदूषण है| इस तरह की बहुत सी चीज़ों से हमारा रिश्ता आज ऐसा हो गया है कि पहचान नहीं आता कि ये आस्तीन के सांप हैं, इनसे बचना चाहिए|

प्रदूषण घटाने के लिए प्रयोग होने वाला हमारा गैस का चूल्हा जहरीली कार्बन मोनोआक्साइड से रसोई भर देता है| एक अदद छोटे से मच्छर से बचने के लिए हम मच्छरदानी की जगह न दिखाई देने वाले जहरीले धुंए का इस्तेमाल तो हम ख़ुशी से करते ही हैं| वक़्त-बेवक़्त कीड़ेमकोड़े मारने के लिए जहर तो पूरे होश हवास में छिड़का ही जाता है|

आज प्रदूषण घर के दर-ओ-दीवार में छिपा बैठा है| घर के दीवारों और छतों में लेड और एस्बेस्टस छिपे रहते हैं, जो पेंट, टाइल्स, और कई अन्य उत्पाद में प्रयोग होते हैं| इसी तरह से स्टोव, हीटर, चिमनी, एयरकंडीशनर, फ्रिज भी घरेलू प्रदूषण अपना योगदान देते हैं| सिगरेट पीने वाले मेहमान आ जाएँ तो बात ही क्या हैं?

खाने में जो प्रदूषण हम प्रयोग करते हैं उसका कुछ कहना बेकार है| बिना जहर का खाना हमें रास नहीं आता| क्या कभी मैंने या आपने यह कहकर कोई सब्ज़ी खरीदी है जिसमें कीड़े मारने का ज़हर न लगा हो? बिना ज़हर की सब्ज़ी अक्सर कीड़े पकड़ लेती है, थोड़ा भी बासी होने पर जल्द ख़राब हो जाती है|

आज बाहर के मुकाबले घर पाँच गुना तक अधिक प्रदूषित है| भारत में यह आंकड़ा ख़तरनाक हो जाता है जब देखते हैं की दुनिया के बीस में से तेरह सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर भारत में हैं|

संत कबीर कहते है:

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप| 
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अगर हम अपने घर में होने वाले अतिरक्त उपभोग को कम कर दें तो प्रदुषण कम कर दें| जैसे ऐसे उपाय की रसोई गैस, हीटर, स्टोव आदि का प्रयोग कम हो| इससे इनसे निकलने वाली गैस को कम किया जा सकता है| मच्छर मक्खी कीड़ेमकोड़े मारने के जहरों का प्रयोग कम करें और मच्छरदानी का प्रयोग हो| बढ़िया पेंट, टाइल्स, आदि का प्रयोग हो| प्राकृतिक हवा की घर में आवाजाही हो तो घरेलू प्रदूषण को घर से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा| घर में लगाये जाने वाले कई पौधे भी प्रदूषण से लड़ सकते हैं| कुछ विशेष प्रकार के पेंट घरेलू प्रदुषण न सिर्फ कम फैलाते हैं बल्कि कुछ प्रदूषक तत्वों को सोख भी लेते हैं|

 

देहरादून शताब्दी


रेलगाड़ियाँ घुमक्कड़ों की पहली पसंद हुआ करतीं हैं| मितव्ययता, समय-प्रबंधन, सुरक्षा और आराम, का सही संतुलन रेलगाड़ियाँ प्रदान करतीं हैं| अगर यात्रा दिन की है तो भारतीय रेलगाड़ियों में शताब्दी गाड़ियाँ बेहतर मानीं जा सकतीं हैं| नई दिल्ली देहरादून शताब्दी मुझे कई कारणों से पसंद है| यह आने और जाने दोनों बार सही समय पर पहाड़ों और वादियों में होती है| यह डीजल इंजन से चलने वाली महत्वपूर्ण गाड़ियों में से एक है|

अगर आप जाड़ों की सुबह नई दिल्ली देहरादून शताब्दी में बैठे हैं तो आपको पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लहलहाते सरसों के पीले खेत में उगते हुए सूर्य के दर्शन होते हैं| बड़े बड़े हरे भरे खेत यहाँ की विशेषता हैं| वैसे जब दिल्ली में कड़ाके की ठण्ड हो तो आप हाथ को हाथ ने सुझाई दे, ऐसे घने कोहरे का आनंद भी के सकते हैं| जाड़ों में यह रेलगाड़ी आपको पहाड़ों की रानी मसूरी के बर्फ भरे पहाड़ों तक पहुँचने का माध्यम हो सकती है|

यह ट्रेन गन्ने के खेतों, गुड़ बनाने के लघु-उद्योगिक इकाइयों, बड़ी चीनी मीलों के पास से गुजरती है| कई बार आप इस गंध का आनंद लेते हैं तो कभी कभी आपको यह बहुत अच्छी नहीं लगती|

आते जाते देहरादून शताब्दी इंजन के दिशा परिवर्तन के लिए सहारनपुर में आधे घंटे रूकती है| मुझे यह आकर्षक लगता है| बच्चे इसे देखकर रेलगाड़ियों के बारे में बहुत कुछ समझ बूझते हैं और पहुत प्रश्न करते हैं| बहुत सी ट्रेन अपने इंजन की दिशा परिवर्तन के लिए रुकतीं हैं परन्तु यह कम लम्बी गाड़ी हैं इसलिए बच्चे इंजन का निकलना और लगना दोनों देखने चाव से कर सकते हैं| साथ ही प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ भी कम होती है|

इसके बाद यह ट्रेन एक भारत के महत्वपूर्ण शैक्षिक शहर रूड़की और महत्वपूर्ण धार्मिक शहर हरिद्वार में रूकती है| हरिद्वार से गुजरते हुए यह थोड़े समय के लिए आपको धार्मिक बना देती है| इस रेलगाड़ी की अधिकतर सवारियां हरिद्वार से चढ़ती उतरतीं हैं|

हरिद्वार के बाद यह गाड़ी राजाजी राष्ट्रीय उद्यान (राजाजी नेशनल पार्क) से होकर गुजरती है| यहाँ इसकी गति अपेक्षागत धीमी रहती है| यह एक बाघ आरक्षित (टाइगर रिज़र्व) क्षेत्र है| रेलगाड़ी में बैठकर बाघ और अन्य जंगली जानवर देखना तो मुश्किल है, मगर आप यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य को निहार सकते हैं| शाम को जब रेलगाड़ी देहरादून से नई दिल्ली के लिए लौटती है तब यहाँ का सौन्दर्य देखते बनता है| इस रेलगाड़ी में लौटते हुए हरिद्वार से पहले का यह समय बहुत शांत होता हैं| यह उचित समय हैं, जब सूर्यास्त के समय आप शांत रहकर खिड़की के बाहर मोहक सौंदर्य का आनंद लेते हैं| कई बार लगता है खिड़कियाँ छोटी पड़तीं हैं|राजाजी राष्ट्रीय उद्यान से गुजरते हुए यह गाड़ी एकल ट्रैक होती है, अर्थात आने -जाने के लिए एक ही ट्रैक से गाड़ियाँ गुजरतीं हैं| कुछेक स्थान पर पहाड़ काटने से बनी दीवार आपकी खिड़की से  हाथ भर ही दूर होती है| बहरहाल, दूसरी रेल लाइन का काम चल रहा है|

मार्च के पहले सप्ताह की शाम, देहरादून से लौटते हुए जब मैं अपने दोनों ओर संध्याकालीन सौंदर्य को निहार रहा हूँ, अधिकांश यात्री देहरादून और मसूरी की अपनी थकान उतारना चाहते हैं| मैं शांतिपूर्वक चाय की चुस्कियों के साथ सुरमई शाम का आनंद लेता हूँ| हरि के द्वार पहुँचने से पहले प्रकृति के मायावी सौन्दर्य का आनंद अलौकिक है|

ऊँचे कंक्रीट


कंक्रीट की ऊँचाई अनंत आकाश की ऊँचाई के समक्ष वामनकद होती है| अहसास कराती है – हे मानव! अभी तुम बौने हो| ऊँचे कंक्रीट, हरे भरे जीवंत जंगल की तरह स्व-स्फूर्त नहीं उग आते हैं| इनकी रचना नहीं की जाती, निर्माण होता हैं| रचनात्मकता की कमी पर्याय है इनका| कंक्रीट में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती, कंक्रीट मुर्दा बना रहता है| ऊँचे कंक्रीट में बने घर जीवंत जाते हैं मगर कंक्रीट निर्लिप्त बना रहता है, किसी उदासीन पठार की तरह|

ऊँचे कंक्रीट जीवन के फैलाव और जीवन्तता के विस्तार से दूर होते हैं| कच्ची झोंपड़ी की जीवटता कंक्रीट में नहीं होती| ऊँचे कंक्रीट गर्व और गौरव की ऊँचाई का प्रतीक होते हैं, यह गर्व और गौरव घमंड की बानगी रखता है फलदार पेड़ों की तरह विनम्रता की नहीं इनमें|

कई बार लगता है इन ऊँचे कंक्रीट के निर्माता जिस तरह इनके आस पास लैंडस्केपिंग करते हैं, उस तरह इन पर भी वालस्केपिंग करते तो शायद यह जीवंत हो उठते|

मगर ऊँचे कंक्रीट घमंडी होते है, कलाकृति नहीं| काश, इन्हें निर्माता नहीं कलाकार सृजते|

हनुवंतिया पुकारे आजा…


मध्य प्रदेश में जल – पर्यटन? जी हाँ, इंदिरा सागर बांध सुना है न| उसी में सौ से अधिक द्वीप और टापू उभर आये हैं| हनुवंतिया से टापुओं का यह सिलसिला शुरू होता है| हनुवंतिया टापू नहीं है, यह तीन ओर से नर्मदा के बांधे गए जल से घिरा हुआ है| मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम इसको विकसित करने के क्रम में दूसरा जल-महोत्सव आयोजित कर रहा है –  15 दिसंबर 2016 से एक महीने के लिए|

बारिश के बाद जब बाँध में बहुत अच्छा पानी आ जाता है और गर्मियों तक बना रहता है, तब मध्यप्रदेश में जल – पर्यटन का सही समय है| मध्यप्रदेश में कड़ाके की हाड़ कंपाने वाली ठण्ड भी नहीं पड़ती| नर्मदा का पवित्र स्वच्छ जल और प्राकृतिक संसार, आपको लुभाते हैं| आस पास सघन वन, वन्य – जीव, रंग – बिरंगे पक्षी माहौल को रमणीय बना देते हैं| जीवन की आपाधापी से दूर आपको क्या चाहिए – तनाव मुक्त नीलाभ संसार|

हनुवंतिया में क्रुज, मोटर बोट के बाद अब हाउस बोट भी शुरू हो रहीं हैं| जल – क्रीड़ा, साहसिक खेल, आइलैंड कैम्पिंग, हॉट एयर बलून, पेरा सेलिंग, पेरा स्पोर्ट्स, पेरा मोटर्स, स्टार गेजिंग, वाटर स्कीइंग, जेट स्कीइंग, वाटर जार्बिंग, बर्मा ब्रिज, बर्ड वाचिंग, ट्रैकिंग, ट्रीजर हंट, नाईट कैम्पिंग आदि  बहुत कुछ शामिल है|

इंदिरा सागर बांध 950 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा बड़ा है| इस लिए यहाँ पर्यटन के क्षेत्र में विकास और निवेश की अपार संभावनाएं है| सरकार निजी क्षेत्र को यहाँ पर्यटन विकास के लिए प्रेरित कर रही है| जल्दी ही बहुत से रिसोर्ट, हाउसबोट आदि यहाँ आने की सम्भावना हैं|

खंडवा रेलवे स्टेशन से हनुवंतिया 50 किलोमीटर है और इन्दोर हवाई अड्डे से यह 150 किलोमीटर है| मध्य प्रदेश का हरा भरा निमाड़ क्षेत्र (इंदौर के आसपास का क्षेत्र) अपनी संस्कृति और विविधता के लिए जाना जाता है| विन्ध्य पर्वत माला की सतपुड़ा पहाड़ियां, नर्मदा और ताप्ति नदियाँ, ॐकारेश्वर का मंदिर और भीलों की मीठी निमाड़ी बोली निमाड़ की पहचान हैं| मध्य प्रदेश के इसी निमाड़ क्षेत्र में है खंडवा| खंडवा से याद आते हैं – फिल्म अभिनेता अशोक कुमार, किशोर कुमार, अनूप कुमार| हिंदी की प्रसिद्ध राष्ट्रवादी कविता “पुष्प की अभिलाषा” भी पंडित माखन लाल चतुर्वेदी द्वारा यहीं खंडवा में लिखी गई थी|

नीलाभ जल वाला हनुवंतिया आपको बुला रहा है|

 

अहोई कथा – दिवाली व्यथा


दिवाली का त्यौहार कहने को पांच दिन चलता है, मगर इसकी धूमधाम तैयारी पितृपक्ष के साथ ही प्रारंभ हो जाती है| पितृपक्ष के शांत दिनों में बनाई गई योजनाओं की फुलझड़ियाँ नवरात्र आते आते अपने फूल बिखेरने लगतीं हैं| सबसे पहला काम होता है – साफ़ सफाई, रंगाई – पुताई, नया सामान आदि| हर कोई अपनी सामाजिक स्तिथि के अनुसार अपनी आर्थिक मर्यादा को लांघना चाहता है|

दिवाली पर सबसे अधिक भागदौड़ मेरे जैसे लोगों के लिए रहती है| हम अपनी जड़ों से कट नहीं पाए है, इसलिए हर साल अपने घर पहुँचते हैं, दिवाली मनाने| मैं होली – दिवाली तो घर पहुँचता ही हूँ, हफ्ता – दस-दिन पहले भी घर जाना होता है| दो दिन पूरी लगन से घर साफ़| कभी दीमक का प्रकोप होता तो कभी चूहों का| इस बार मेरे सफाई अभियान के दिन इत्तिफ़ाकन अहोई अष्टमी पड़ी| सोचा न था, कि यह संयोग मुझे तो रात सोने नहीं देगा|

अलीगढ़, घर का भंडारघर, अन्दर कौने की दीवार और उसके आगे कई संदूक, चूहों को बदबू, ताजी हवा कई दूर ठहर गई थी| सामने की दीवार पर टिमटिमाता बल्ब संदूक और दीवार के बीच पर्याप्त रोशनी देने में असमर्थ था| संदूक और दीवार के बीच चूहों का घौंसला| कागज के टुकड़े, कपड़े की कतरनें| बदबू यहीं से आ रही थी शायद| मैंने डस्टकार्ड के सहारे उस सब को फैंकने का निर्णय लिया| कूड़े के ढेर पर देखा, चूहे के छोटे छोटे बच्चे बिखरे पड़े थे| अचानक उदास सी ठंडक मेरे चारो ओर फ़ैल गई| छोटे छोटे बच्चे| दोपहर की गर्म धूप उनके लिए तेज थी, रौशनी असह्य| मुझे दो एक बच्चे मरे हुए मालूम होते थे तो अन्य अब मेरे कारण मरने वाले थे| अवांछित हत्याओं का कारण था मैं|

अहोई की कथा, मेरे कानों में पड़ रही थी| मैं जानता था, यह भ्रम है| एक सेही का बच्चा गलती से मर जाता है| प्रकृति गलती की सजा देती है| मानव को क्षमा माँगनी होती है| अहोई – अनहोनी शब्द का रूप है| अनहोनी एक माता के रूप में, देवी रूप में पूजी जाती है| मैं रात भर जगा हुआ हूँ| पूजा – पाठ न करने के बाद भी उनके पीछे के सही गलत विचार समझना मेरी प्रकृति है| आज प्रकृति ने विचार दिया है|

दिवाली के सफाई के हम जीवों की हत्या तो नहीं कर देते| क्या हम खुद जैव संतुलन को नहीं बिगाड़ रहे| हम कीड़े – मकौड़े ख़त्म करना चाहते है| डरते हैं, वो बहुत न हो जाएँ| प्रकृति संतुलन बनाना जानती है| करोड़ों साल राज करने वाले डायनासोर एक झटके में हवा हो गए| कुछ लाख साल का मानव, पृथ्वी का मालिक| प्रकृति का हास्य मुझे सुनाई देता है| मैं दिन भर में मारे गए मकौड़े गिन रहा हूँ| मच्छरों की गिनती ही नहीं| दिवाली से पहले अहोई का पर्व क्यों आता है? सेही, जिसे शायद कोई मानव प्रेम नहीं करता, कोई नहीं पालना चाहता| प्रकृति के प्रतिनिधि के रूप में सेही सामने है|

अहोई कथा शायद यही कहती है| हमसे कोई अनहोनी न हो, हमारे साथ कोई अनहोनी न हो|

मांडू के राजमहल


मांडू जाकर लगा कि कभी यहीं जन्नत बसती होगी| अगर पुरातत्व विभाग के सूचनापट्ट की मानें तो ४८ पुरातत्व महत्त्व के स्थान आज भी मांडू में हैं| बताया गया कि कभी मांडू में ७०० मंदिर थे जिनमें से ४०० जैन मंदिर थे| अपने स्वर्णकाल में विश्व के सबसे बड़े महानगर में से एक मांडू को देखने से उस समय की वास्तुकला के गौरव को समझा जा सकता है| बहुत से समकालीन भवनों में मुझे उस भव्यता और समझ – बूझ का अनुभव नहीं होता जितना पंद्रहवीं शताब्दी के जहाज महल में होता है| खासकर महल के जल प्रबंधन को देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता| जिस वर्षा जल संचयन (rain water harvesting) की बात आज हम रोज कहते सुनते हैं, वो वहां बहुत सुन्दर रूप में मौजूद है| आज भी मांडू में पानी की किल्लत है मगर उस काल के संघर्षपूर्ण जीवन में पानी का न होना राज्य के लिए तुरंत जीवन – मरण का प्रश्न हो सकता था| शायद, मांडू का पतन पानी के रख रखाव के पुराने तरीकों को छोड़ दिए जाने के कारण ही हुआ होगा| इस माह जब फरक्का शहर के विद्युत् संयंत्र को पानी की कमी के कारण बंद करना पड़ा, मांडू का बूढ़ा जल – प्रबंधन हमारी आधुनिक मूर्खता का मजाक उड़ाते हुए खड़ा है| मुझे लगता है केवल जहाज महल का जल – प्रबंधन देखना ही मांडू जाने को सार्थकता देने के लिए काफी है| जहाज महल में आपको चौथे और छठे मंजिल पर तरणताल (swimming pool) देखने को मिलते है तो उन तक साफ पानी पहुँचाने का शानदार तरीका भी मिलता है| पानी के साफ़ करने के लिए पूरा संयंत्र भी उस समय बनाया गया था, जिसके अवशेष मन मोह लेते हैं|

छत पर तरणताल
छत पर तरणताल

मांडू पहुँचते ही सबसे पहले आपको आदिवासी घरों की बाहरी दीवारों पर बने चित्रण का देखकर आनंद होता है| आज मांडू की अधिकतर आबादी आदिवासी है जो छोटे छोटे घरों में रहती है|

मांडू में यूँ तो हर चप्पे पर इतिहास मौजूद है, मगर शाही महल परिसर का आनंद अलग ही है| हम मांडू पहुँचते ही जहाज महल और हिंडोला महल देखने चल देते हैं| मगर परिसर विशाल है और इसमें बहुत से भवन हैं| हिंडोला भवन की दीवारें आज भी दावत देतीं हैं किसी राजसभा के लिए|

मुझे शाही हमाम बहुत आकर्षित करता है| बहुत रूमानी हैं, उसकी छत में बनाये गए चाँद –सितारे| उस ज़माने में गर्म और ठण्डे पानी के दो नल एक साथ मौजूद हैं| जन्नत का शाही गुसल और कैसा होता होगा?

मांडू - शाही हमाम : स्नानागार
मांडू – शाही हमाम : स्नानागार

नाट्यशाला में आवाज को सबसे पीछे तक पहुंचाने के लिए दीवारों में खोखले रास्ते बनाये गए हैं| प्रकाश संयोजन बेहद उम्दा बन पड़ा है| रिहायश के लिए शानदार इंतजाम है| आप अन्दर रहकर भी दुश्मन से बच सकते हैं| पानी और ठंडी ताजी हवा की कोई कमी नहीं होती| आज यहाँ उस ज़माने में अफ्रीका से लाई गयीं चमगादड़ें अमन – शान्ति से रहतीं है|

मांडू लोहानी दरवाज़े से आप शानदार सूर्यास्त देख सकते हैं| यह दिन का आख़िरी पड़ाव है| हम बहुत बड़ी झील के किनारे बने मध्य प्रदेश पर्यटन के मालवा रिसोर्ट में पहुँच रहे है| शांत सुन्दर सुरीली शाम हमारा स्वागत करती है| हम आराम करने के लिए खुली हवा में बैठे खिरनी के बड़े पेड़ के नीचे बैठे है| देशी विदेशी सेलानी रानी रूपमति और बाज बहादुर के बारे में चर्चा कर रहे हैं| संगीत के दो महान फ़नकारों का मांडू में प्रकृति का संगीत हमें रूमानी रूहानियत की ओर ले जा रहा है| सामने पहाड़ी के पीछे हो तो उन दोनों की आत्माएं बसती हैं|

मालवा की शाम ख़ूबसूरत और सुबह शानदार है| हम सुबह छः बजे रानी रूपमती के महल के लिए चल देते हैं| नर्मदा मैया का प्रतीक रेवाकुण्ड यहीं पास में है| रानी रूपमती बिना नर्मदा के दर्शन किये अन्नजल ग्रहण नहीं करेंगी| इसलिए नर्मदा की ओर अंतिम पहाड़ी पर है रानी रूपमती का महल| वैसे रहती हो रानी बाज बहादुर के साथ ही हैं, मगर रोज आती हैं, मीलों दूर स्तिथ नर्मदा के दर्शन करने के लिए| आज धुंध है, हमें नर्मदा मैया दर्शन नहीं देतीं| इतना दूर देखना यूँ भी मुश्किल है| यहाँ अस्तबल होता था और यह दूर पूर्व में होने वाली गतिविधि पर निगाह रखने के लिए निगरानी चौकी भी था| बाज बहादुर का महल यहाँ से दिखाई देता है|

बाज बहादुर का महल, जहाँ संगीत रचता – बसता था| यहाँ की दीवारें और कमरे संगीत के हिसाब से बनवाए गए हैं| अन्यथा यह महल साधारण दिखाई देता है| यहाँ पर होतीं थीं रानी रूपमती, बाज बहादुर और अन्य बड़े संगीतकारों की महफ़िलें|

थोड़ी दूर पर हैं दाई माँ के मकबरे| बताया गया, यह कभी जच्चा – बच्चा अस्पताल की तरह प्रयोग हुए और बाद में मकबरे बने| मगर आज यह इको – पॉइंट की तरह प्रयोग होते हैं|

अब जामी मस्जिद की ओर जा रहे हैं| यह देखने में काफी शानदार ईमारत है| इसके पीछे है होशंगशाह का मकबरा, जिसमें वास्तव में कोई दफ़न नहीं हैं मगर ताजमहल बनाने वालों ने इस से प्रेरणा ली| इसे भारत में संगमरमर की सबसे प्राचीन इमारतों में माना जाता है| इसके साथ बने दालान को हिन्दू शैली में बने होने के कारण धर्मशाला कहा जाता है| एक कथा यह भी है कि जामी मस्जिद, मस्जिद के रूप में प्रयोग होने से पहले यह शाही दरबार के रूप में प्रयोग होती थी और तब शायद यह धर्मशाला शाही मेहमानों के लिए अतिथि गृह रही हो|

मांडू अपने शानदार समय में मालवा की दीर्घकालीन राजधानी धार से टक्कर लेता रहा| मगर इसका इतिहास और भूगोल धार से हमेशा प्रभावित रहा| राजा भोज की नगरी धार के लिए भले ही यह सेन्य दुर्ग के रूप में बसाया गया हो, मगर यह पूरी शान से धार या किसी भी अन्य ऐतिहासिक महानगरी को टक्कर देता है|

नपुंसकता प्रदूषित विकास और गाँव


सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना