Janta Curfew

मैं रविवार २२ मार्च २०२० को जनता कर्फु के पालन की घोषणा करता हूँ और स्वैक्षिक रूप से २१ मार्च २०२० को भी जनता कर्फु का पालन करूंगा|
क्या आप इसका पालन करेंगे?

आप इस मीम को शेयर कर सकते हैं:

I m participating in #JanataCurfew on Sunday. Are you_ I will observe it on Saturday also. (1)

भय और सूचना

अगर दुनिया में मरने वालों को गिना जाए तो आतंक से अधिक लोग भय का शिकार हैं| भयाक्रांत मैं भी हूँ और आप भी|

भय और आतंक दुनिया के सबसे बड़े व्यवसाय हैं| आतंक अपराध के रूप में आता है और भय सूचना के रूप में| दुनिया में सबसे कम डरे हुए लोग सूचना के अभाव में जीते हैं, और बहादुर इन सूचनाओं के बाद भी भय पर विजय पाते हैं| भय से अधिक भयानक क्या होगा, भय का फैलाया जाना, भय को फ़ैलाने वाला? मगर भय जारी है|

भय फ़ैलाने की प्रक्रिया सरल होती है – आपका हित, हित चिंतन, हित हानि की सूचना और हित साधन का आग्रह| हमें सही और गलत सूचनाओं की परख करनी होती है| परन्तु अधिकांश सूचनाओं की परख करने का कोई तरीका नहीं होता|

आज सामाजिक प्रचार माध्यम बहुत तीव्रता से सूचना का प्रसार करते हैं| सूचनाओं का आवागमन इतनी तीव्रता से हो रहा है कि उनकी पुष्टि का समय नहीं है| हम सूचना माध्यम भी निर्भर नहीं कर पा रहे कि वह स्वविवेक का प्रयोग करकर सही सूचना ही पंहुचायेंगे| ऐसे में एक अतिरिक्त भय अधिक बढ़ता है – अगर सूचना सही निकली तो क्या होगा?

सूचना देने के लिए प्रयोग की गई भाषा का भी बड़ा असर होता है| शब्द चयन किसी भी सूचना को भयानक बना देता है| अधिकांशतः मीठे शब्द खतरनाक होते हैं और डरावने शब्द गीदड़ भभकी| उदहारण के लिए रंग निखारने की क्रीम अक्सर मीठे शब्दों में डर फैलातीं हैं और समाज को अरबों की चपत लगतीं हैं| दूसरी ओर हफ्ता और महिना वसूल करने वाले अपराधी भारी भरकम भाषा के बाद भी मीठे रिश्वतखोरों का मुकाबला करने में असमर्थ रहते हैं|

हाल में सारी दुनिया को भयभीत करने के पीछे भी सरकारों और अन्तराष्ट्रीय संस्थाओं की मीठी बातें हैं| कोरोना विषाणु से दुनिया भयाक्रांत है, अगर किसी को भी अधिक खतरनाक प्रदूषण की चिंता नहीं है| मैं इस भय को गलत और अनावश्यक नहीं कहता परन्तु प्रदूषण दुनिया को अधिक बीमार करता रहा है और लाखों की मृत्यु का कारण बना है|

अच्छा यह है कि इस भय के चलते शायद समय पर इस विषाणु के प्रसार को रोक लिया जाए|

ख़ुद हराम दिल्ली

प्रदूषण की मारी दिल्ली से बाहर निकलते समय आपके फेफड़े ख़ुशी से चीख चीख कर आपको धन्यवाद करने लगते हैं| कान आसपास आँख फाड़कर देखने लगते हैं – क्या जगह है कि सन्नाटे में शांति है? आँख हवा को सूंघने लगती है – क्या हुआ हवा को कि जलन नहीं हो रही? आती हुई उबास बंद होते ही नाक खुलकर जीने लगती है| त्वचा फिर एक बार साँस लेने लगती है| शहर बदलते ही स्वाद तो खैर बदल ही जाता है|

उत्तर भारत में नीला असमान देखना जीते जी स्वर्ग देखने का साकार सपना लगता है| दिल्ली को फर्क नहीं पड़ता| किसने पीछे पांच साल में ध्रुवतारा देखा? किसने पिछले बीस साल में रात के सन्नाटे में झींगुर का गान सुना? कौन धरती की सौंध को दो रात सूंघ पाया? हर कोई धीमी मर रहा है – खुद अपनी चुनी हुई हत्या – आत्महत्या नहीं कहूँगा| आत्महत्या में कम से कम दुस्साहस तो लगता है| हमारी मौत एक नाकारा मौत है| दिल्ली वाली मौत उधार का (की नहीं) वैश्या है जिसे हम सब बाप का माल समझकर भोगना चाहते हैं|

धर्म के नाम पर पांच – ग्यारह – इक्कीस दीपक नहीं जलाते – हर दिवाली हम पटाखे फोड़कर अपने धर्म से ज्यादा अपना गुरूर बचाते हैं| बात किसी धर्म की नहीं है हमारे गुरूर की है- हठधर्मिता की है| हमारी दलील हैं, हम क्या सब कूंए में कूद रहे हैं? मुझे मत रोको|

किसान को दोष देना अच्छा लगता है न| मान लिया किसान दोषी है – मगर साल के दो महीन  के लिए न| बाकि दस महीने के लिए एक बार अपनी आत्मा को ज़बाव तो दे कर तो देखो| मन और आत्मा का सम-विषम तो करो| दस महीने का दोष किसे दें – पाकिस्तान को, चीन को या अमेरिका को|

हमें अपनी आँख में धूल झोंकना अच्छा लगता है| सम-विषम अनुलोम-वियोम करेंगे| घर के अन्दर जो कार्बन मोनो ऑक्साइड रोज पैदा होता है – सोचा कभी? सीशा (लेड) वाला पुताई करवाई है दीवार पर कभी देखा कि बच्चे के पेट में और फैफड़ों में कब चला गया? दिन भर कान घौंस कर रखी गई गानों की आवाज कब दिमाग में ध्वनि-प्रदूषण कर गई – पूछा? दूध, दूध-मिठाई पीते वक़्त कभी सोचा कि आपको और आपके बच्चे को नकली दूध का वीडियो क्यों देखना पड़ता है? आप ने रेस्टोरंट में कभी बोला भैया ये वाले चार प्रदूषक मेरे खाने में मत डालना – कम स्वाद के लिए नहीं लडूंगा?

आइए सरकार को दोष दें| आइए किसान को दोष दें| बावर्ची को दोष दें| पड़ौसी को दोष दें|

नोट: इस बार दिल्ली से त्रिवेंद्रम आते समय सोचा नहीं था कि मैं दोनों शहरों में कोई तुलना करूंगा मगर…

बाबरी दिवाली

राम और बाबर का पांच सौ साल पुराना रिश्ता लगभग अटूट है| किसी भी अदालत का कोई फैसला इस रिश्ते को नहीं तोड़ सकता| यह रिश्ता मंदिर मस्जिद का मोहताज नहीं है| यह रिश्ता दिवाली का है|

दिवाली उद्गम भले ही भगवान राम के अयोध्या वापिस आने से जुड़ा हो परन्तु किसी न किसी दिन भारतीय दिवाली को आधुनिक बनाने का श्रेय ज़हीर-उड़-दीन बाबर को जरूर दिया जायेगा| वैसे तो दिवाली को अति-आधुनिक प्रकाश-प्रदूषित बनाने का जिम्मा भी चंगेज़ी इलाकों के बाशिंदों को दिया जाना चाहिए|

जब राम अयोध्या वापिस लौटे – लगभग सभी ग्रन्थ – गाथाएं – गवैये सहमत हैं – नागरिकों ने दीवले जलाकर उन का स्वागत किया| दिवाली से जुड़े सारे शब्द दीवलों से जाकर जुड़ते हैं| चाहे किसी का दीवाला निकलना हो या किसी की दिवाली होनी हो; दीवले चुपचाप अपनी उपस्तिथि का अहसास करा देते हैं| यह अलग बात है कि बाबरी और चीनी दिवाली में दीवलों की सदेह उपस्तिथि कम होती जा रही है|

बाबर समरकंद से जब भारत आया तो अपने साथ हिंदुस्तान के लिए वो नायब तोहफ़ा लाया जिसके खिलाफ कोई शब्द सुनना किसी कट्टर हिंदूवादी या इस्लामवादी को शायद ही गवारा हो| यह बेशकीमती तोहफा है – बारूद और उसकी औलाद आतिशबाजी| बाबर या उसके दिखावापसंद वंशजों ने दिवाली के दीयों की रौशनी से मुकाबला करने के लिए आतिशबाजी के जौहर दिखाने शुरू किये| धीरे धीरे आज यह आतिशबाजी दिवाली का सबसे दुखद पर्याय बन गई है| अदालती फरमानों के बाद भी दिवाली पर आतिशबाजी होती है| राम से सहज सच्चे सुन्दर दीवलों का मजाक बाबर की आतिशबाजी आजतक उड़ाती है|

बाबर के खानदानी मंगोलों की कृपा से आजकल उनके मूल देश चीन से आने वाली प्रकाशलड़ियाँ भी तो कुछ कम नहीं| झूठीं चमक-दमक प्रकाश प्रदूषण – लाभ कोई नहीं|

पढेलिखे कहे जाने वाले लोग आतिशबाजी कर कर मलेरिया और डेंगू तो रोकने का दावा करने में नहीं चूकते| बेचारे भूल जाते हैं हमारे सीधे सादे राम जी की कृपा से मिट्टी का सस्ता सा दिया भी मच्छर मार लेता हैं और आबोहवा भी ख़राब नहीं करता|

मगर माटी के दिया कोई क्यों ले – उससे दिखावा कहाँ हो पाता है? उसकी धमक कहाँ पड़ोसी के कान में जाती है, उसकी रौशनी से कौन नातेदार चौंधियाता है? चुपचाप पड़ा रहता है – तेल की धार देखते देखते सो जाता है|

जाने कब राम जी की दिवाली वापिस आएगी|

दिवाली पर पहले लिखे गए आलेख:

रंगीन दीवले 

अहोई कथा – दीवाली व्यथा

दिवाली अब भी मानती है

प्लेटफ़ॉर्म का पेड़

कौन बड़ा कलाकार है, ईश्वर या मानव?

किसकी कलाकृति में अधिक नैसर्गिक सौंदर्य है? मानव सदा ईश्वरीय सुंदर में अपनी कांट छांट करता रहता है| मानवीय हस्तक्षेप बेहतर मालूम होता है तो गंभीर प्रश्न भी छोड़ जाता है| आखिर मानव को हर बात में अपना हस्तक्षेप करने की क्या आवश्यकता है? मानव नैसर्गिक सौन्दर्य में अपनी सुविधा के हिसाब से सुन्दरता और कुरूपता देखता है|

चंडीगढ़ का रेलवे स्टेशन, प्लेटफ़ॉर्म एक का दिल्ली छोर| इंजन से लगभग तीन चार डिब्बे की दूरी पर एक सुंदर सा पेड़ है जो स्टेशन के बाहर दूर से देखने पर बड़ा सुन्दर, छायादार, प्रेममय हरा भरा दिखाई देता है| मगर जब हम प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचते हैं तो आधुनिक छत और उसकी अत्याधुनिक उपछत के चलते उसका तना ही दिखाई देता है|

अच्छी बात यह है कि मानवीय सौन्दर्यकारों ने इस पेड़ में महत्ता को स्वीकार और अंगीकार किया| उन्होंने हमारे कथित आधुनिक सुविधा भोगी समाज की प्रकृति से दूरी को भी अपने सौन्दर्य कार्य में समाहित किया| पेड़ की प्लेटफ़ॉर्म पर उपस्तिथि को सीमित किया गया है|

इस पेड़ का तना तीन रंगों से रंगा गया है, शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग अच्छा न लगा हो| शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग उन कीट पतंगों को आकर्षित करता हो जिन्हें मानव पसंद न करता हो| पेड़ के चारो उसकी सुरक्षा के लिए और उनकी जड़ों और तनों  के सहारे मौजूद मिट्टी से प्लेटफ़ॉर्म गन्दा होने से बचाने के लिए सुरक्षा बाड़ा भी बनाया गया है| पेड़ का मनोहर हरापन क्रूर आधुनिक की निगाह से बचा लिया गया है| मेरे मन के इस मरोड़ से बेख़बर पेड़ अपने में मगन है| पेड़ प्लेटफ़ॉर्म को आज भी छाया देता है| पेड़ पेड़ है – पिता की भूमिका में बना रहता है| मैं उसके पास बैठकर बोधिसत्व होने की प्रतीक्षा में हूँ|

 

मरती हुई नदी अम्मा

क्या आप एक पात्र में गंद या गन्दा पानी लेकर अपनी माँ के सिर पर डाल सकते हैं?

अगर आपका उत्तर नकार में है तो आप घटिया किस्म के झूठे हैं| अगर आप एक भारतीय हिन्दू हैं तो आप झूठे ही नहीं महापापी भी हैं| ईश्वर अनजाने में किये गए पाप को तो माफ़ कर भी दे मगर जानते बूझते अनजान बनने से तो काम नहीं चलेगा| ईश्वर के माफ़ करने से क्या माँ दिल से माफ़ करेगी|

नदियाँ, जिन्हें सारा भारत माँ कहता है और जिनका देवी कहकर मंदिरों में पूजन हो रहा है, उनके माथे ऊपर कूड़ा करकट कौन डाल रहा है?

माँ के दुर्भाग्य से यह सब उसकी अपनी धर्म संताने कर रही हैं| हभी हाल में माँ यमुना के किनारे पर उनके पूजन के नाम पर प्रदूषण करने वाले एक स्वनामधन्य हिन्दू धर्मगुरु ने तो अपनी गलती मानने और अदालत द्वारा लगाये गए जुर्माने को देने से इंकार कर दिया| सुबह सुबह नदियों में आचमन करने जाते पूंजीपति अपने कारखानों में प्रदुषण पैदा करते हैं और उसे बिना साफ़ सफाई के नदियों की गोद में डाल देते हैं| बहुत से तो इनता अच्छा करते हैं कि कारखाने में या उसके पास धरती की कोख में अपनी पैदा की गई गंद डाल देते हैं|

अगर किसी माँ का इतना अपमान होगा तो उनका मन मलिन न होगा| क्या वो माँ ये न कहने लगेगी कि ईश्वर उसे ऐसे संतान से मुक्ति दे? क्या वो अपने लिए मृत्यु की कामना न करने लगेगी?

शायद अब नदियाँ ईश्वर से प्रार्थना कर रहीं हैं, हमें पानी मत देना मौला|

तेरी प्यास मेरी प्यास

तेरी प्यास तू जाने, जब मैं प्यास से मरूँगा अपना पानी ढूँढ लूँगा| जाने अनजाने हम सभ्य शहरी यही कहते आए हैं अपने जंगली जाहिल और गंवारों से| अब…

अब पानी जा रहा है| बहुत लूट लिया हमने जंगली जाहिल और गंवारों का पानी| खेती किसानी और सिचाई के नाम पर बने बांध शहरों को पानी देते रहे| कुछ पैसे का बूता था तो कुछ प्रचार तंत्र पर मजबूत पकड़| आज भी हम उन्हें पानी के लिए दोष दे देते हैं| मगर कब तक…

जिन लोगों के लालच ने गाँवों और जंगलों के ताल तालाब तलैया लूट लिए थे वो कब से शहरों में आ बसे| उनके साथ उनका पाप भी| हमेशा पानी का घड़ा नहीं भरा करता पाप का घड़ा भी भरता है|

जंगली जाहिल और गंवारों के पास पानी दस बीस किलोमीटर में पानी तो था जो उनकी औरतें ढो ढो कर ले आतीं थीं| हम और हमारी औरतें… बाजार से खरीदोगे… हा हा हा… कितनी कीमत दे पाओगे?

जो साफ पानी कभी प्रकृति मुफ़्त देती थी आज बीस रुपये बोतल में खरीदते हो… कल… परसों… आज भी एक साल का हमारा पीने का पानी बाजार में पंद्रह हजार साल का पड़ता है| अब परिवार का सोचो…

दिल्ली शहर… इस किनारे से उस किनारे तक कंक्रीट से मड़ा हुआ… यहाँ सड़क किनारे की हरियाली को खोदो तो  नीचे पुरानी सड़क निकल आती है… कुछ तो प्रकृति प्रदत्त भी छोड़ देते| मगर अब वर्षा जल संचयन की भी मशीन लगाओ…|

वर्षा… सुनकर तुम्हें कीचड़ और सड़क पर भरा पानी याद आता है| पुराण में एक कथा आती है.. अमृत जब दैत्यों के गले में उतरा तो तामसिक हो गया… हम वही दैत्य हैं… हमारे नगर महानगर दैत्य का वह गला हैं| जहाँ वर्षा का जल बिना बाढ़ के भी प्रलय बनता है, बीमारी लाता है|

जब एक करोड़ पढ़े लिखे सभ्य लोग पानी के लिए दुकानों पर चीख रहे होंगे… गुहार लगा रहे होंगे… और पानी की कंपनी पानी लाने की कीमत बढ़ा रही होगी… तब एक दिन पैसे ख़त्म होंगे और हमें मरना होगा|

हमें मरना होगा एक साथ प्यासा, तड़पता हुआ, बिना अर्पण के, बिना तर्पण के| मरते हुए सोचना होगा… उन जंगली जाहिल गंवारों को तर्पण तो मिला था… हमारे पास तो मरने वक़्त आंसू भी नहीं होंगे तर्पण के लिए|

पानी रखिये

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