पान का बीड़ा

“जिन्हें पान खाने खिलाने की तमीज़ नहीं वो क्या जिन्दगी जियेंगे?” अक्सर कहते|

तब पान का जलवा था| मान का एक पान काफी था| रसास्वादन का शब्द पान का मान रखता है| मजाल क्या कोई दांत पान की कुतर भी जाए| जिन्हें पान चबाने की आदत होती है वो अक्सर ज़ाहिल होते हैं| इंसान की तहजीब, रुतबा, खानदान और तासीर का पता उसके पान खाने के तौर तरीके से लगता है|

पनवाड़ी उन्हें दूर से देखता तो उनका पान लगाना शुरू कर देता| बीच बीच में दो चार दस पान और लग जाते, मगर उनका पान ख़ूब वक़्त लेता| जब तक कत्था चूना अपना रंग एकसार न कर लेते, घोटा चलता रहता| वक़्त होता, जान पहचान, काम बेकाम, चेले – चंटारे उन्हें सलाम ठोंकने आते| एक दूसरे के नाम दुआ पढ़ते| नेहरू से लेकर मर्लिन मुनरो तक बहार होती| पनवाड़ी न  रुकता, घोटा चलता रहता| घड़ी आध घड़ी के बाद पनवाड़ी कहता, रंग मस्त आ रहा है, जजमान| एक उड़ती नज़र पान को चूमती हुई निकल जाती| कहते – पान को भावज बनाना है क्या, बस करो| इधर पान का नुस्खा आगे बढ़ता, उधर देश की ग़रीबी हटती और टाटा बिड़ला भीख मांगने ठंडी सड़क निकल जाते| दूसरी घड़ी बीतते बीतते उमराव जान की याद आती कि छप्पन छुरी  चलती| पूछा तो कभी नहीं मगर कहते है कत्था चूना घोटते हुए पनवाड़ी पान पर सरस्वती यंत्र बनाता|

पान का बीड़ा भक्तिभाव से ग्रहण करते| मन्त्रजाप भी करते होंगे| इसके साथ नगर परिक्रमा का काम शुरू होता| आप भले ही उसे क़स्बा कहें, मगर मील भर पदयात्रा उनका नियम था| कारवां में लोग आते जाते, अलग होते जाते| मंथर गति से कदमताल मिलते जाते| हूँ हाँ करते सबकी बात सुनते जाते| सरकारी ओहदेदार भी इसी क्रम में मेलजोल करते| शायद ही कभी कुछ बोलते| जिनके काम होने होते, चुपचाप हो जाते| कभी कभार कुछ बोलते तो अगले दिन सुबह शहर भर में चर्चा रहता| सोने से पहले मूँह से निचुड़ा हुआ पान कलई के पीकदान में संभाल कर रख देते| दांत का निशान न रहता मगर रस भी तो न रहता|

सुबह समय पूजा पाठ भोजन भजन करते बीतता, शेष विद्यालय में पढ़ाने लिखाने और पीटने चिल्लाने में| गला दर्द करता और थक कर बुरी तरह बैठ जाता| दोपहर घर पहुँच कर चाय चबैना के बाद अपने कुतुबखाने में बैठकर पानदान उठाते| पंडिताइन दोपहर में पुरानी फ़िल्मों के इश्किया गाने सुनती हुई यह पान लगाया करतीं| जिस दिन विविध भारती पर सुरैया के गाने बजते पान में सुर आ जाते| नूरजहाँ का नूर उन्हें बहुत भाता था| जब कभी सही गाना गुनगुनाने लगते, पंडिताइन फूले न समातीं|

पान खाना कला है| जितना देर मूँह में रहे, रस देता रहे| जब तक पत्ता ख़ुद न घुल जाए, उसे न छेड़ते| जिस पान पर कत्था चूना घोटने में घड़ी दो घड़ी लगती हो उसे भोगने में क्या छः घड़ी न लगें? पान मूँह में घुलता रहता| किताबें दिल में उतरती रहतीं| कभी कभी रात बेरात कविता कहानी बन कर पान कागज़ पर उतर जाता| कभी कभी रात होती, सुबह न होती|

पान का दौर चलता रहा, चलते चलते चला गया| इंस्टेंट कॉफ़ी का दौर आया| दो मिनट मैगी आई| तुरंत तैयार खाना आया| चालीसा पढ़ने वाले चार चक्कर अगरबत्ती घुमाकर भगवान को बहलाने लगे|  जिन्दगी जीने की फुर्सत किसे, सलीका किसे? हिंदुस्तान की तहजीब और तासीर किसे? किसे फुर्सत इश्क़ करे, बातें बनाये, घोटा करे, घूँट घूँट जिन्दगी के मज़े करे? किसे फुर्सत जिया करे??

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परांठे

हिन्दुस्तानी खाने में बड़ा चक्कर है| फुलका, रोटी, चपाती, परांठा, नान में फ़र्क करना भी बड़ा मुश्किल है|

तवा परांठा और तंदूरी रोटी खाने के बाद तंदूरी परांठा हलक से नीचे उतारने में दिल्लत होती है| आखिर तंदूरी परांठा परांठा कैसे हो सकता है भरवाँ तंदूरी रोटी होना चाहिए| परांठे का भी गजब चक्कर है, तवा परांठा और कढ़ाई परांठा समझने में भी मशक्कत है| कढ़ाई परांठा को नासमझ डीप फ्राई परांठा कहते है| समझदार कहते हैं कि तवा गहरा है उसे कढ़ाई मत कहो| दिल्ली की गली परांठे वाली में तो खुलकर कढ़ाई में परांठा तला जाता है| इस बात में दो राय नहीं की तवा और कढ़ाई के बीच इतने संकर संस्कार हुए हैं कि कौन क्या है पता नहीं चलता| उधर इन संकर संस्कार के जो भी तकनीकि नाम रहे हैं वो आज के अधकचरे ज्ञान में नदारद हो गये हैं| हिन्दुस्तानी अंग्रेजों के लिए हर सब्जी गोर्द और हर बर्तन पैन है|

पहली बार तंदूरी परांठा खाने के बाद घंटों सोचना पड़ा कि यह परांठा क्यों है| मुझे लगा कि भरवाँ रोटी बोलना ठीक है|

परांठे के पहला उपक्रम है कि उसमें कुछ भरा हुआ हो भले ही एक बूंद देशी घी| अगर परांठे में परत नहीं है तो परांठा नहीं है| आप भरवाँ रोटी और परांठे में पहला अंतर उसकी परतों से कर सकते हैं| परांठा अगर तवे पर न पचाया (हल्का भूनना या पकाना) जाए तो यह कचौड़ी हो जाता है| परांठे को अंत में तवे पर, गहरे तवे पर या पसंद के हिसाब से कम गहरी कढ़ाई में तला जाता है| यह प्रक्रिया उसे पूरा परांठा बनाती है| दो अलग अलग प्रक्रियाओं में पकना ही परांठे को परांठा बनाता है|

 

दिवाली अब भी मनती है

वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

बचपन का वो आहाता

बचपन सुहाना होता है| परी देश की अलग दुनिया| कार्टून फ़िल्म की दुनिया| दुनिया की एक चहारदीवारी होती है| उसके पार बिगड़ा पाकिस्तान| समाज नहीं बदलता, न शहर| शहर की आबादी लाख दो लाख थी, शहर के बाहर परकोटा था| आज गाँव और कालोनी के बाहर परकोटा है| लोहे के दरवाज़े लगे हैं| शहर में कई शहर रहते है| मोहल्ले और पड़ोस की अपनी दुनिया होती है| आहातों में जहाँ बसता है| गली गली में दाग़ देहलवी, कूचे कूचे पंकज उधास, कमरा कमरा जगजीत सिंह, गुसल गुसल मुहम्मद रफ़ी|

आहाता को कंपाउंड, काम्प्लेक्स, अपार्टमेन्ट, काउंटी, सिटी तक कहने के शौक गुजरे हैं| नक्शा बदल जाने से नक़्शे भी बदल जाते हैं| आहाते में चारों ओर घर के घर, एक प्रवेशद्वार – जरूरत और वक़्त के हिसाब से बड़ा छोटा| एक जैसे लोग – परिवारीजन – अपना खानदान – बस हम लोग| कभी कभी इतने बिखरे या बड़े परिवार, कि आपसी रिश्तेदारी उलझी गुलझी|

बीच में बड़ा सा घेर, दालान, आँगन, मैदान, छोटी बगीची, बाबाजी का अखाड़ा, धुल- धक्कड़, ढेर सारा प्यार, घमाघम गपशप, डूब मरा दारू दर्शन, रात की अन्ताक्षरी, औरतों की चिकचिक, बारिशों का सामूहिक बच्चा स्नान, दावतों का हलवाईखाना, नवरात्रों का रात्रिजागरण, गली क्रिकेट का गिल्ली डंडा, हफ़्ता हफ़्ता गाली गलौज, होली दिवाली मिलन सम्मलेन, गर्मियों का सामूहिक शयन, बुआओं का हल्ला गुल्ला स्वागत, लड़कियों की रुंधी रुंधी विदाई, सब का सब मान का पान|

किस का बच्चा किस ने पाला? किस ने किस के चौके रोटी खाई? किस ने किस के पतीले की दाल उड़ाई? कच्ची इमली किस ने खाई? किस को क्या पता चलना? किस को इस का पता करना? मगर फिर भी हर हफ़्ते लड़ना झगड़ना|

आहाते जीते थे, जिन्दा थे, आबाद थे, गुल-ओ-गुलज़ार थे, चहकते महकते थे, साँझा विरासत थे, सब के बुज़ुर्ग थे, सब की जान-ओ-अमानत थे| सबका मिलाजुला मेला दशहरा थे| रेडियो सीलोन का सिबाका गीत माला और आकाशवाणी का विविध भारती थे| आहाते रेडियो की झुमरी तलैया थे|

आहाते दोपहर को औरत, तिपहर को बच्चे, शाम को आदमी, रात को परिवार, सुबह को बूढ़े, दिन निकलते शिशु होते थे|

आहाते आहत हो गए| बदलते वक़्त ने आहट न की| बदलता वक़्त हँसते मुस्कुराते चुपचाप आहातों में चला आया, गुपचुप टेलिविज़न बन गया| काला सफ़ेद टेलिविज़न आहातों को बूढ़ा कर गया| आहाते इतवार के इतवार भजन कीर्तन सुनने लगे| आहाते रामानंद सागर हो गए| आहाते के गले में चित्रहार पड़ गया|

आहातों का मरना बाकि रहा| आहाते धूल फाँकने लगे| आहाते किसी कड़वी दवा का कार्बनिक कंपाउंड हो गए| गिटिर पिटिर गिरमिटिया उन्हें कंपाउंड कहने लगे|

आहाते के दिल खाड़ी युद्ध हो गये| दुनिया छोटी होती गई| एमस्टरडम आगरा आ गया| आहाते दुकान बन गये| आहाते में बंधी गौ माता नारा बन गई और दूर गोवा में गुम हो गई| गौशाला में बाइक और आहते में कार पार्किग हुई|

“आहाते जब तक हते, अपने हते” अधेड़ होते एक इंसाननुमा एग्जीक्यूटिव ड्रेस ने बोतल के सहारे पीज़ा गटकते हुए कहा| दो चश्मे उस बूढ़ी कपिला गाय की याद में आँसू बहाने लगे, जिसके पैर छूकर नवीं में नकल से नब्बे नंबर आये थे| काफ लेदर के जूतों पर पड़े वो आंसू आज भी ओस की तरह चमकते हैं|

पुराने घर

घर का दरवाज़ा बमुश्किल बीस साल का ही हुआ था| घर की उम्र से कम उम्र थी उसकी| उस दरवाजे के चेहरे पर भी बुढ़ापा उतना ही तारी था, जितना उस घर की दीवारों पर| अपनों का मूँह मोड़ लेना दिल तोड़ देने के लिए काफी होता है| घर से रिश्ता इतना ही बाकि था कि साल छः महीने में हाल चाल ले लिया जाए| वक्त का कमी का बहाना कभी पुराना नहीं होता| कभी कभी ये घर भी हँसता होगा, ठलुओं को फुर्सत कहाँ?

लगता था, घर का दरवाज़ा खोलते ही सीलन की बू आती है| याद है, बूढ़ी नानी के पुरानी रजाई से आने वाली गुनगुनाहट भरी सीलन से घर महकता था| दोनों गंध में फर्क कुछ न था, फर्क कहीं और रहा होगा| घर के पुराने सामान ने मुस्कुरा कर देखा; अनदेखा कर दिया| अजनबियों के आने जाने से पुरानी तिपाही को क्या वास्ता| उसे भी अकेलेपन की आदत सी हो गई थी| कोई पुराना शिकवा रहा होगा, वर्ना कौन मूँह मोड़ता है?

घर के फ़र्श पर याद़ों जिनती धूल जमा हैं| यादों को सहेजना कितना मुश्किल होता है| हकीम कहता था, धूल झाडोगे तो भूल करोगे, खारिश होती है| खारिश की पुरानी बीमारी है| दमा बैठ जाता है, दिमाग़ भी| सहेज कर पाँव रखने से भी यादों की सतहों पर धूल मिटने के निशान छूट जाते हैं| मकड़ियों के पुराने जालों में कोई घर कब तक अपनी पुरानी यादें फांस कर रख सकता है| यादें तो रेशम की डोरी से भी नहीं बंधतीं, मकड़ी के पुराने जाले क्या करते?

सालों कहीं दूर से आने वाली आल्हा की आवाज अब नहीं आती, दूर पड़ोस में अश्लील फ़िल्मी गाने की धुन पर भजन बज रहा है| घर में पसरे पुराने सन्नाटे के बीच झींगुरों की आवाज़ मधुर मालूम होती है| राग झींगुर में ख़याल सुनते सुनते दीवारों के कान खुश और खुले रहे होंगे| कान के पास कुछेक मच्छर अपना जीवन संगीत सुनाते हैं| दीवार पर बैठी छोटी डायनासोर कार्टून फिल्म का अहसास कराती है| कोई फुसफुसाहट सुनता हूँ, दिल धड़कने लगता है| कौन है यहाँ स्यापा करने वाला?

शायद कोई पुराना भूत होगा| पड़ोसी अक्सर कहते हैं, उन्होंने भूत देखा है| भूतों के डर से पुराने बाशिंदे भी कतराते हैं| कोई पड़ोसी इधर नहीं देखता| चोरों को भी मालूम हैं, कौवों और कुत्तों की भी| यादों के भूत पुराने घर में रहते हैं| गाँजे चरस से परलोक का आनंद उठाते अवधूत और नशे में डूबे आवारा लोंडे घर के आगे बगिया में अड्डा जमाते हैं| पुराने घर सन्यास नहीं लेते हैं| किस का मोह बांधे उन्हें, किस मोह से मुक्ति पायें?

दरों दीवारों से यादों की पपड़ियाँ उतर चलीं हैं| वक्त से पहले उमर उतर आई है और लौन बन कर झडती रहती है| ख्यालों में सीलन की सौंध बस गई हैं| आँगन की मिट्टी में सौंध नहीं आती| पुराने घर दिवाली नहीं मनाते| पुराने घर चूना सफेदी की मशहूरियां नहीं करते| पुराने घर ज़माने में नहीं जमते| कौन अपना वक़्त और कब तक बदले?

वडपलनी मुरुगन मंदिर

कभी कभी अचानक कहीं जा पहुँचने का संयोग बनता है| उस दिन भी यही हुआ| देर शाम तय हुआ कि वडपलनी में कामकाज की सिलसिले में पहुँचने से पहले मुरुगन मंदिर भी पहुंचा जाए| उत्तर भारतीय हिन्दू मंदिरों के आसपास रहने वाली गंदगी, भीड़भाड़ और पंडा पुजारी की रेलमपेल मेरे शृद्धा भाव को छू-मन्तर कर देती है| मगर दक्षिण भारत में मंदिर अक्सर साफ़ सुथरे रहते हैं| एक बात और भी है ध्यान देने की, दक्षिण भारत में बहुत सारे मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं| वडपलनी मुरुगन मंदिर भी सरकारी विभाग द्वारा नियंत्रित मंदिर है| इन सरकार नियंत्रित मंदिरों को देखकर मुझे हमेशा लगता है कि सरकारी तंत्र के अकुशल और प्रभावहीन प्रबंधन की बात सही नहीं है और जान बूझकर पैदा की गई है|

सुबह सुबह मंदिर पहुँचे| कोई हो- हल्ला नहीं था| वैसे भी यह किसी त्यौहार वाला दिन नहीं था| प्रसाद खरीदने की कोई इच्छा नहीं थी| आखिर घर लौटने में दिन थे| दो फूल मालाएं खरीदी गई| सड़क किनारे बैठे उस फूल वाले ने बात टूटी फूटी हिंदी में की मगर दाम तमिल में बताये| मैंने सौ रुपये का नोट दिया तो वो टूटे पैसे लेने चला गया| पंद्रह रुपये में दो बढ़िया फूलमालाएं|

किसी दुकानदार ने आवाज नहीं लगाई| कोई पंडा पुजारी नहीं आया| किसी ने भगवान से अपने सीधे सम्बन्ध का दावा नहीं किया| भीड़ नहीं थी| पहले से बताए गए हिसाब से हम चुपचाप टिकट काउंटर की तरफ़ बढ़ गए| दस का नोट बढाया और दो टिकट प्राप्त कीं| मुख्य मंदिर की तरफ पहुँचते ही पता लगा यह अर्चना की टिकट है, स्पेशल दर्शन का नहीं| स्पेशल दर्शन के लिए बीस रुपये का टिकट था| पहले अर्चना के लिए लाइन में लग गए| यहाँ वास्तव में कोई लाइन नहीं थी| अंतिम छोर तक पहुँचते ही, पुजारी आया| हमारी पूजा सामिग्री लेकर गर्भगृह में अन्दर चला गया| हम देखते रहे| देवता से अधिक मेरा ध्यान पुजारी पर था| मगर उसने वापिस आने से पूर्व पूरे विधि विधान संपन्न किये| ऐसा नहीं कि दूर से ही चढ़ावे की फूलमाला देव-मूर्ति की तरफ उछाल कर वापिस आ गया हो| वापिस आकर उसने आचमन का जल और माला के आधे फूल हमें दे दिए, वही हमारा प्रसाद था| हम कोई खाद्य पदार्थ तो प्रसाद के लिए लेकर आये नहीं थे|

हमने कोई देव-दर्शन तो किये नहीं थे| सारा ध्यान तो पुजारी पर था| दोबारा काउंटर पर जाकर स्पेशल दर्शन का टिकट लिया| इस लाइन में हम बिल्कुल अकेले थे| पूरा पांच मिनट सबसे बढ़िया लगने वाली जगह पर खड़े हुए अपने मन, भाषा और विचार के अनुसार मन ही मन पूजा संपन्न की| कोई पुजारी हमें रोकने टोकने समझाने बुझाने लूटने खसोटने नहीं आया| जिस पुजारी ने हमारी पूजा करवाई थी, वह भी दूर से मुस्करा कर अपने काम में लग चुका था|

इसके बाद हमने प्रांगण में मौजूद अन्य मंदिरों का दर्शन किया| ऐसे ही एक मंदिर के पुजारी ने हमारे प्रसाद के फूल और टीके के लिए दी गई भस्म को बाकायदा कागज में बांध दिया| कोई शब्द नहीं बोला सुना गया| धन्यवाद और उसके स्वीकार के रूप में नमस्कार ही रहा|

जूते मंदिर के बाहर दरवाजे के के ओर असुरक्षित रखे थे, मगर सुरक्षित ही मिले| पास की एक दुकान से स्थानीय चाय नाश्ता किया| नाम आदि नहीं पता| सारा कार्य-व्यवहार संकेतों में चलता रहा| दालवडा, प्याज आदि का पकौड़ा, एक समौसे जैसा कुछ और अलग अंदाज की एक चाय| दो लोगों में सौ रुपये भी खर्च न हुए| एक चाय में मधुमक्खी गिरने पर उस के स्थान पर दूसरी चाय भी बिना कुछ कहे सुने मिल गई|

चलते चलते बता दें यह मंदिर तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत प्रसिद्ध है| चेन्नई के बहुत सारे विवाह कार्य यहीं संपन्न होते हैं| तमिलनाडू हिन्दू धार्मिक विभाग द्वारा मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी बनाई गई है| जहाँ सभी जानकारियां उपलब्ध हैं| मैंने यह वेबसाइट बाद में देखी|

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चेन्नै की एक सुबह ईश्वर (मेरे वरिष्ठ और मित्र) से मिलने जाते समय देव का बुलावा आया। पहले पाँच रुपये के टिकट से दूरदर्शन हुए तो आदेश हुआ पास आओ तो बीस का टिकट लिया। छोटी से बात कही गई, साथ के साथ सुन ली गई। मुरुगन से पिछले दस साल में पहली मुलाकात थी। दक्षिण भारतीय मंदिरों में उत्तर भारत के मंदिरों के मुकाबले अधिक सफाई है और पैसे भी रसीद के साथ लिए जाते है। पुजारियों ने खुद बुला कर आशीर्वचन कहे और न धन मांगा न दिया गया, और बाद में किसी पुजारी ने आँख न ततेरी। सिर्फ़ दो पुष्पमालाओं से पूजा सम्पन्न हुई। खाद्य का प्रसाद ने चढ़ा, न पाया। बाहर आकर स्थानीय चाय नाश्ता हुआ और मन के साथ तन भी संतुष्ट हुआ। #chennai #murugan #vadapalani

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उड़न गाथा

हवाई यात्रा का बेहतरीन पहलू है समय की बचत और बेकार पहलू है समय की बर्बादी।

पहली पहली उड़ान से यह बात समझ आ गई थी। आप सोलह घंटे की रेलयात्रा को घटा कर दो घंटे की हवाई यात्रा में बदल सकते है। लेकिन समय की बचत कितनी हुई, यह सीधा गणित नहीं होता। आप चौदह घंटे नहीं बचाते।

आपका प्रस्थान बिन्दु जो अक्सर आपका घर होता है से लेकर गन्तव्य बिन्दु तक का समय और आराम का विश्लेषण करना होता है। उदाहरण के लिए दिल्ली से मुम्बई की उड़ान दो घण्टे की है। आपको एयरपोर्ट पर किसी भी हालत में एक घण्टा पहले पहुँचना होता है वरना आपको उड़ान में बैठने की अनुमति नहीं मिल पाएगी। रास्ते के ट्रैफिक और किसी भी असंभावना के लिए भी समय का थोड़ा ख़्याल रखना होता है। इसी लिए ज्यादातर लोग दो घण्टे पहले हवाई अड्डे पर पहुंचते हैं। नई दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल तीन जैसे बड़े टर्मिनल पर आपको डिपार्चर गेट तक पहुंचने में भी थोड़ा बहुत समय लगता है।

इस प्रकार सुबह साढ़े सात बजे की उड़ान पकड़ने के लिए आपकी घर से ढाई तीन घंटे पहले निकलना सुनिश्चित करना होता है। यानि आपको देर से देर पाँच बजे घर छोड़ना होगा। पाँच बजे घर से निकलने के लिए आपको एक या दो घण्टे पहले उठना होता है, यह समय इस पर निर्भर है कि कितने लोगों के तैयार होना है। बच्चों को इतनी सुबह जगाना भी आजकल टेढ़ी खीर है।

एक अकेले इंसान को भी अगर हवाई यात्रा करनी है लगभग तीन घंटे पहले जागना होता है। यानि साढ़े सात की उड़ान के लिए चार बजे के आसपास। अगर सुबह नींद से परेशान नहीं होना चाहते तो छः घण्टे पहले सोना भी सुनिश्चित करें।

इसी तरह विमान से उतरने के बात सामान पट्टी से सामान लेने में भी पंद्रह से तीस मिनिट का समय लग जाता है। इसके बाद वाहन अपना हो या किराये का, आप दस पंद्रह मिनट लगते हैं।

इस तरह आपको दो घण्टे की उड़ान के लिए वास्तव में छः घण्टे का समय लगाना होता है। यदि यह उड़ान सुबह सबेरे की है तो रात भर नींद का तो न पूछिये। करवट बदल बदल रात बात जाती है। यदि यह उड़ान दोपहर की है तो दिन न यहाँ का रहता है न वहाँ का।

रेल यात्रा मुझे सुविधाजनक लगती है क्योंकि रेल आपको यात्रा के दौरान सोने का एक अच्छा अवसर प्रदान करती है।