नॉएडा में माओ का भूत


 

“ग्रेटर नॉएडा में कोई किसान सरकार का विरोध नहीं कर रहा है, कुछ “सशस्त्र असामाजिक तत्त्व” अराजकता फैला रहे है|”

 “किसी के माओवादी होने का निर्धारण इस बात से होता है की वह दिल्ली से कितना दूर रहता है, वरना नॉएडा के लोगो को अब तक माओवादी कहकर मार दिया जाता|”

 क्या कारण है कि हमें जगह जगह सरकार के विरोध में लगातार उग्र होते प्रदर्शनों की खबरें सुनाई पड रही है| सारे देश में क्या कोई गृह युद्ध चल रहा है? क्यों है इस लोकतंत्र में यह उथलपुथल?

कोई भी व्यवस्था हो सभी को संतुष्ट नहीं कर सकती है| लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था समझी जाती है, जिसमे बहुसंख्या को अपनी बात कहने का मौक़ा मिलता है और यह बहुसंख्या संतुष्ट पाई जाती है| परन्तु आज देश में बहुसंख्य का असंतोष व्यवस्था के परिपालन में किसी कमी का संकेत करता है| देश की बहुसंख्या मताधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहती| पहले राजतंत्र के समय में लोक कहावत थी, “कोई नृप हो हमें क्या हानि?” आज जनतंत्र में कहावत है, “कोई नृप हो हमें क्या लाभ?”

आज के निर्वाचित नृप नग्न नृत्य में लगे है और जनता की समस्याओं से उनके सरोकार नहीं जुड पा रहे है. वह न तो राजधानी में जाकर प्रतिनिधित्व करते है, न क्षेत्र में जाकर जनता से जुड़ते है| नेता, अधिकारी, व्यापारी और अपराधी के बीच का गठजोड़; भ्रष्टाचार बनकर, जनता और देश को असामान्य क्षति पहुंचा रहा है| पत्रकारों के रूप में खडा रहने वाला लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ नष्ट-भ्रष्ट होकर अपनी भूमिका निभाने मे असफल रहा है.

देश भर मे फ़ैल रहे असंतोष को कोई नहीं सुन रहा है, मजबूरन आमजन उग्र हो रहा है| आज के निर्वाचित नृपो को लग रहा है कि इस सब को देशद्रोह कहकर दबा लेंगे| हमारे तंत्र की प्रवृत्ति हो गयी है कि पहले असंतोष को बढ़ने दो, फिर उसको उग्र होने पर हथियारों की राह दिखाओ, उसके बाद क्रूर सैनिक कार्यवाही कर कर उसको गृह युद्ध में बदल दो| जब सत्ता किसी को राजद्रोही करार देती है तब हमारा सारा तंत्र उसके पीछे पड़ जाता है| उसे न्याय की आशा मिटने लगती है और विद्रोह को और बढ़ावा मिल जाता है| हमारी सरकारों को इस सबसे बचना चाहिए|

आज जो कुछ नॉएडा में हो रहा है उससे देश का संभ्रांत समझा जाने वाला समाज भी सोच रहा है कि माओ का भूत हमारे भ्रष्ट निर्वाचित नृपों का खड़ा किया गया बबंडर तो नहीं| कहीं नेताजी, सेठजी से पगार लेकर कोई बाबूजी को बन्दर बना कर नचा रहे हो और दिल्ली में हम बंदरों के नाच पर ताली बजा रहे हों|

देश में भ्रष्ट पूंजीवाद और पंगु लोकतंत्र ही वास्तविक समस्याए है|

अहं ब्रह्मास्मि||


 

यह वेदों का अत्यधिक उल्लिखित वाक्य है. इसको लोग विभिन्न प्रकार से समझते रहे है.

ईश्वर में विश्वास न रखने वाले लोग इसे ईश्वर के न होने, और ईश्वर की जगत में आवश्यकता न होने के तर्क में भी प्रतिपादित करते है. यह लोग विश्वास करते है कि इस जगत में अगर ईश्वर नामक तत्व कि आवश्यकता है तो वह यह तत्व वह खुद है.

अद्वैतवाद इस अवधारणा में आत्मा और परमात्मा की एकरूपता देखता है. ईश्वरीय सद्गुणों में आत्मा के गुणों के रूप में परिभाषित किया जाता है. यह इस वाक्य का सर्वाधिक प्रचिलित रूप है.

द्वैतवाद आत्मा और परमात्मा ने भिन्नता का प्रतिपादन करता है और ईश्वर इस जगत में आत्मा का एक क्रूर, चापलूसी पसंद शासक है. अतः, आत्माओं को ईश्वर कि भक्ति (चापलूसी) करते रहना पड़ता है. चापलूसो पर दयालू रहने वाला ईश्वर मेरा ईश्वर नहीं हो सकता. इस विचार के चलते श्रेष्ठ आसित्क लोग मुझे नासित्क माना करते है.

मैं ईश्वर को इसलिए नहीं नकारता क्योकि भले ही वह एक भुलावा हो, पर ईश्वर का होना हमें एक सहारा देता है.

जब भी मैं अपने पास ईश्वर को देखने का प्रयास करता हूँ तब अपने को ईश्वर के अत्याधिक दूर पाता  हूँ. मुझे नहीं लगता कि ईश्वर रोज मेरे इर्द गिर्द रहता है. उसे अपनी सृष्टि पर विश्वास होना चाहिए कि वह भली प्रकार चलेगी. ईश्वर के इस जगत में आत्मा को इतने क्षमता अवश्य होनी चाहिए कि वह समुचित कार्य कर सके. इस अर्थ में, मैं एक त्रैतवादी हूँ. मुझे लगता है कि ईश्वर, प्रकृति और पुरुष भिन्न तत्व हैं. ईश्वर के बनाए सभी नियम; सात्विक, राजसिक एवं तामसिक मिलकर समस्त  प्रकृति की संरचना करते है और यह प्रकृति ही सृष्टि को चलाती है. आत्मा इन्ही प्रकृति नियमों में बंधी है. मुझे नहीं लगता कि ईश्वर उपासना मुझे किसी प्रकार से श्रेष्ठ बना सकती है या मोक्ष आदि कोई सपना मेरे लिए सच कर सकती है. मुझे ईश्वर के बनाए प्राकृतिक नियमों का पालन करना चाहिए यही मेरी पूजा हो सकती है. मुझे नहीं लगता कि ईश्वर मुझे भीख का कटोरा लेकर देखना पसंद करता है. ईश्वर कि बनाई इस दुनिया में ईश्वर की दी हुई क्षमताओं के साथ मैं ही अपना ईश्वर हूँ. यह एक प्रकार से क्षमताओं का प्रतिनिधिकरण है. यदि प्रकृति के अनुरूप नहीं चलता तो प्रकृति मेरा ईश्वर है. इस सब के उपरान्त ही ईश्वर मेरा ईश्वर है. यह मेरे त्रैतवाद का “अहं ब्रह्मास्मि” है.

नोट: मेरे विचारों से सहमत होने आवश्कता नहीं है. सभी को विचारों की भिन्नता की स्वतंत्रता है.

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