यात्रा तकनीकि


लम्बी यात्रायें हमेशा ही हमें लुभाते रहीं हैं| बचपन के दिन, जब ट्रेनें आज के मुकाबले धीरे चला करतीं थीं; वक़्त आसानी से कटता था| हर स्टेशन पर आते जाते लोग, हर बार सामान के लिए जगह बनाना, परिचय लेना, दोस्ती करना, पंखा झलना, खिड़की के बाहर मिलकर देखना, ताश खेलना, मिल बाँट कर खाना, सुख – दुःख बाँटना, एक दुसरे के पते लेना, कभी कभी चिठ्ठी पत्री करना और फिर भूल जाना| या कहिये सदा के लिए यादों में बसा लेना|

वक़्त बदलता है, बदल गया| वक़्त के साथ तकनीकि बदल गई| लगता है; आज बोतल बंद पानी ख़रीदा जाता है, डिब्बाबंद खाना खाया जाता है और कान में मोबाइल की लीड लगा कर गाने सुनते हुए सो जाते हैं|

मगर इंसान नहीं बदला| आज भी हम एक दुसरे से मिलते हैं, मुस्कराते हैं, अगर आपस में कुछ महसूस करते हैं तो बतलाते हैं| हालचाल, दोस्ती, मिलकर हल्का फुल्का खाना और मोबाइल पर मिलकर गाने सुनना| यदि सफ़र लम्बा हुआ तो मिलकर मोबाइल या लैपटॉप पर एक दो फ़िल्में देखना वरना एक दुसरे को पेनड्राइव में फिल्मों और गाने का उपहार दे देना| जब भी कहीं नेटवर्क में साथ दिया तो एक दूसरे को फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज देना, ट्विटर पर फॉलो कर लेना| यात्रा के पलों में मिलकर खींचे गए फोटोग्राफ में मिलकर टैग करना| कुछ एक मजेदार विडियो बना कर सोशल मीडिया में अपनी यादों में संजो लेना|

तकनीकि ने इंसान को नहीं बदला, तौर तरीके बदल गए हैं, आदतें बदल गई हैं| बदलती दुनिया में छोटे छोटे गाँव विस्तार पा रहे हैं तो दुनिया मोबाइल में सिमट आई है| मोबाइल सबकी पहुँच में है मगर छोटा है और लैपटॉप सफ़र में ले जाने के लिए अभी बड़ा है|

वक़्त और तकनीकि बदल रही है| वक़्त पर किसका जोर है? मगर तकनीकि; उसे इंसान को बदलने की जगह, इन्सान के हिसाब से खुद को बदलना होगा|

सफ़र मजेदार हो जाये अगर आपके पास हल्का फुल्का लैपटॉप हो जो लैपटॉप होकर भी टेबलेट हो और टेबलेट होकर भी मोबाइल| जिसे लेकर आप कहीं भी दौड़ सकें और कहीं भी रूककर उसमें से एक खिड़की खुल जाये… प्यार की, दोस्ती की, मुस्कराहट की, गाने गुनगुनाने की, चिड़िया चहचहाने की, फिल्मों की, सुख दुःख बाँटने की, सोशल मीडिया की, टैगिंग की, शेयरिंग की|

क्या हो कि दिन सुबह हो…

[विशेष: यह आलेख इंडीब्लॉगर द्वारा आयोजित “Time to Transform” प्रतियोगिता और ‘ASUS Transformer Book T100” के बारे में विचार करते हुए लिखा गया है]

स्वर्ण लंका


 

एक समय की बात..

मृत्यु लोक का एक नगर..

इंद्र के स्वप्न सरीखा..

 

सोने की सड़क.. सड़क पर सोना..

सोने के स्तम्भ..        सोने के स्तूप..

सोने के शस्त्र..  सोने के शास्त्र..

सोने की समृद्धि..        समृद्धि का सोना..

सोने का सूर्य..          और चन्द्र..

 

नभ वायु जल आकाश सब सोना..

राज मुकुट सोना…       पददलित पायदान सोना..

 

स्वप्न भी सोना..        श्वास भी सोना..

रुदन, क्रदन, हास्य सोना सोना सोना…

सुख दुःख, प्रेम प्रतीति, श्रृद्धा सुमन, रिश्ते नाते, मित्र शत्रु सब सोना…

 

सब सुखी, सब मस्त, सब पस्त, सब प्रसन्न, सब सन्न, सब आसन्न, सब श्रेष्ठ…

सोना तो कुंदन है…      कसौटी है…

जिधर स्वर्ण; उधर धर्म, मर्म, कर्म, शर्म.. उधर हवा गर्म… ह्रदय नर्म….

 

जलते थे, जलाती थी..    जल से घिरी लंका जला दी गयी..

 

विकट वनवासी वानर..    वानर ने जला दी..

नासमझ वानर…       भालू, रीछ, जंगल वाला वानर….

 

न हाथ लगाया..         न मन, न मस्तिष्क…

लंका ने वानर की पूँछ में आग दे दी.. आग लगा दी.. आग लग गयी…

वानर उछलता रहा.. कूदता रहा.. भागता रहा…

आनंद आग में बदल गया.. आनंद नहीं फैला.. आग फैल गयी….

 

लंका भष्म हो गयी..    

अहंकार, अहंकार नहीं… चाटुकार नहीं 

रावण विद्वान.. रावण ज्ञान.. रावण महान… रावण लोक पति.. रावण विश्वरूप,

रावण विकास.. रावण समृद्धि.. रावण सोना.. रावण समस्त सृष्टि.. 

रावण सुन्दर.. रावण शिव सुन्दर.. रावण सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

 

लंका राख.. लंका चिता.. लंका चिता की राख.. लंका अस्थि कलश…

लंका लंका लंका लंका लंका लंका लंका लंका स्वर्ण लंका…

स्वर्ण लंका..                         स्वर्ण लंका..

आम अति उत्साह आदमी पार्टी


सफलता उत्साह दिलाती है और अति उत्साह आपकी अच्छी भली योजना को सफलता से कई योजन दूर भेज देता है|

आम आदमी पार्टी की दिल्ली विजय ऐसी ही थी कि लगा दिल्ली अब दूर नहीं| अचानक जोश खरोश में चर्चा हुई, अब देश की हर सीट पर लड़ाई लड़ी जायेगी| न संगठन, न कार्यकर्ता, न धन, न धान्य; सभी जोश से लड़ने चल पड़े|

उस समय देश भर में लोकसभा सदस्यता प्रत्याशी के फॉर्म इस तरह भरे गए जैसे आईआईटी या आईएएस के फॉर्म भरे जाते हैं| संसद सदस्य बने या न बनें, तीसरे स्थान पर रहने का पक्का ही था| मगर एक पार्टी के सबसे ज्यादा जमानत जब्त करने का रिकॉर्ड बना लिया गया|

कारण क्या रहे होंगे?

परन्तु मेरे मन में कई प्रश्न उठ रहे हैं|

१.       क्या पार्टी देश में हर जगह मौजूद थी? क्या भ्रष्ट्राचार जो आज मध्यवर्गीय मुद्दा है, क्या वो राष्ट्रव्यापी मुद्दा भी है? देश में आज भी मानसिकता है जिसमें आज भी सामंतवाद का उपनिवेश है, जहाँ सत्ता को चढ़ावा चढ़ाना धर्म है|

२.       क्या पार्टी ने दिल्ली में यह नहीं सुना कि राज्य में केजरीवाल और देश में मोदी? कारण सीधा था केजरीवाल को जनता कुछ दिन प्रशिक्षु रखना चाहती थी|

३.       क्या पार्टी कुछ महत्वपूर्ण चुनिन्दा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकती थी? शायद धन और संसाधन को पचास सीटों पर केन्द्रित किया जा सकता था| उस स्तिथि में पार्टी संसद में महत्वपूर्ण स्वर बन सकती थी और शायद तीसरा सबसे बड़ा दल बन सकती थी|

४.       क्या आगे की रणनीति को ध्यान में रख कर मनीष सिसोदिया या किसी अन्य को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता था? क्या पार्टी में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत नहीं होना चाहिए?

५.       क्यों पार्टी बार बार जनता के पास जाने की बात करती है और भाजपा या कांग्रेस कार्यकर्ताओं से सलाह वोट लेती हैं? क्या पार्टी के पास जो विचारशील, विवेकशील, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं हैं, उनकी सुनवाई या मत प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए?

६.       क्या दिल्ली पुलिस के मामले में धरना देने के समय पार्टी यह नहीं कह रही थी कि देश के हर मुद्दे पर हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री धरना देंगे और वही भ्रष्ट बाबु राज करेंगे जिनसे हम लड़ रहे हैं?

७.       दिल्ली में हम अगर तीन दिन विधानसभा में बैठे रहते और सदन को दस दिन बिठा कर रखते तो जनता खुद देखती कि दोषी कौन हैं? सरकार बनाते समय पार्टी दस दिन जनता से पूछती रही, त्यागपत्र देते समय जनता कहाँ गयी, कार्यकर्ता कहाँ गए? दिल्ली को और दिल्ली में पार्टी कार्यकर्ताओं को क्यों नेतृत्व विहीन छोड़ दिया गया?

८.       क्या सोनी सूरी, मेधा पाटकर, और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक सेनानियों को चुनावों में हरवा कर पार्टी ने उनके दीर्घकालिक संघर्ष कमजोर नहीं कर दिए?

९.       आज अगर दिल्ली विधानसभा भंग होती है तो चुनाव शायद जल्दी होंगे? क्या पार्टी हर घर में जाकर हर हफ्ते बता सकती है कि उसने कब क्या क्यों कैसे किया? पार्टी के पास एक एक बात के जबाब में सोशल मीडिया पर, कार्यकर्ताओं के मोबाइल पर और मोबाइल मैसेजिंग सर्विसेस पर इन सब बातों के जबाब हैं?

आज आम आदमी पार्टी को आवश्यकता है कि उन मतदाताओं को चिन्हित करे जिन्होंने उसे दिल्ली विधान सभा या संसदीय चुनावों में मत दिया है| सभी मतदाताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए जाने चाहिए| एक साथ, विधानसभा क्षेत्र और दिल्ली राज्य के बारे में बात होनी चाहिए| बात होनी चाहिए वर्तमान संसद सदस्यों पर पार्टी के नियंत्रण और उनके अपने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय कार्यक्रमों की| बात होनी चाहिए, उन सभी महत्वपूर्ण प्रत्याशियों की जिनका चुनाव में खड़ा होना, अपने आप में एक कार्यक्रम था, एक मुद्दे की बात थी, एक सिंद्धांत की उपस्तिथि थी|