मणिराम हरिराम का चीला


जब भी अलीगढ़ जाना होता है तो ट्रेन से उतरने के बाद चीला खाना मेरा पसंदीदा शगल है| बचपन में चीला मेरे लिए अचरज था, क्योंकि मेरे सभी साथी अंडे वाला चीला पसंद करते थे, बल्कि कहें तो उसके दीवाने थे| घर पर माँ बेसन के चीले बनती थी जो इतने शानदार नहीं लगते थे कि उनके लिए दीवाना हुआ जाये| बाद में जब “स्ट्रीट फ़ूड” के लिए स्वाद विकसित हुआ तो उसे समझने के दौरान बेसन, मूंग दाल और अंडे का चीला और उनका अंतर समझ में आया|

बहुत से लोग चीले को उत्तर भारत का डोसा मानते हैं| मगर चीला चटनी के साथ खाने की चीज है| बेसन (साथ में कभी कभी रवा/सूजी भी) का चीला खाने में पतला मगर पेट में थोड़ा भारी होता है| अंडे का चीला मूल रूप से मूंग दाल का ही चीला है, मगर उसमें अंडा फैंट कर डाला जाता है|

अलीगढ़ में बेसन और अंडे के चीले में कटा हुआ उबला आलू, प्याज आदि भरकर थोड़ा सेका जाता है और बाद में इस तरह ग्यारह बारह टुकड़े कर दिए जाते हैं, जैसे भुर्जी बनाना चाह रहे हों| यह चीला सिकते समय देखने वाले को मसाला डोसा लगता है तो परोसे जाते समय आलू चाट जैसा| इसके उप्पर चटनी डालकर चम्मच से खाते हैं| (वैसे कुछ अलीगढ़ी लोग आमलेट चीले की भी मांग करते हैं)

मूंग की दाल का चीला, चीलों की दुनिया का बादशाह है| मूंग की दाल के चीलों में भी मुझे पहले अलीगढ़ में राजू का चीला पसंद था तो आज मनीराम – हरीराम का चीला|

सुदामापुरी क्रासिंग (अब सुदामापुरी पुल के नीचे) दो भाई अपनी अपनी ठेलों के एक साथ मिलकर खड़ी करते हैं, जिससे भाइयों का प्यार दीखता है| पहली ठेल पर मूंग दाल और दूसरी ठेल पर अंडे का चीला|

मेरी पसंद मूंग दाल का चीला|

आज अंडे का चीला बनाने वाला भाई बीमार है, मेरी दो मूंग दाल चीले की इच्छा रखी है| खुराक से हिसाब से दो चीले पांच रोटी के बराबर का मामला है| पांच चीले पहले हैं – मुझे बताया जाता है| मुझे छटवां और नवां चीला दिया जायेगा| अब हम गप्पे मारेंगे या बीस मिनिट टहल सकते हैं|

पीसी हुई मूंग की दाल को कटोरी भरकर लिया जाता है| और तवे पर फुर्ती से फैलाया जाता है, डोसे की तरह पतला नहीं करते, थोड़ा मोटा रहता है| बात चलती है, चीले को फ़ैलाने का समय और चक्कर दोनों एकदम पक्के हैं, कम या ज्यादा में वो मजा नहीं रहता| जो लोग फ़ैलाने को आसान बनाने के लिए दाल में पानी डालते हैं, वो अपने चीले और यश दोनों में पानी डाल लेते हैं|

जिस समय यह सिक रहा होता है, उसी समय इस पर अदरक, प्याज, मिर्च लगा कर हाथ से थपथपा और दुलार देते हैं| इसके बाद सीधे इसके ऊपर ही पनीर को कद्दूकस कर कर उसकी परत बनाते हैं| पहले से पनीर को घिसकर नहीं रखा जाता| इससे एक समान पर्त बनती है| वह इस को फिर से हाथ से थपथाकर दुलार देता है| यही दुलार तो चीले में जान डालता है| इसके बाद ५० ग्राम मक्कन की टिकिया सिकते हुए चीले के नीचे सरकी जाती है|

दो मिनिट के बाद चीला थोड़ी देर के लिए पलट दिया जाता है| यह भूख को जगा लेने का समय है| चीले के ठीक आठ बराबर हिस्से होते हैं, जी हैं पूरे सात कट| चीला आपकी थाली में परोसा जाता है| आपके सामने खट्टी (हरी) और मीठी (सौंठ) चटनी हैं|

मगर मैं पुराना ग्राहक हूँ| मैं शिकायत करता हूँ| अगर चटनी ग्राहक को अपने हाथ से लेनी पड़े तो वो प्यार मोहब्बत वाला स्वाद नहीं आता|

खाने की हर चीज कला और विज्ञान से भले ही बनती हो, जबतक दुलार न हो वो खाना बन सकती है, स्वाद नहीं| बेसन और अंडे के चीले अगर चम्मच से चाट की तरह खाए जाते हैं तो मूंग दाल चीला हाथ से खाने में स्वाद देता हैं| अगर मूंग दाल चीले के आठ की जगह बारह हिस्से हो तो बेहतर हो, मगर कहीं स्वाद न बदल जाए|

और इस प्यार और दुलार भरे एक चीले का मूल्य 60 रुपये| समय शाम दिन छिपने के बाद| अलीगढ़ की सुदामापुरी रेलवे फाटक (अब पुल)|

पुनः – किसी ज़माने में सुदामापुरी फाटक को खूनी फाटक कहते थे, मगर अब कुछ साल से पुल बन गया है|

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सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

साइकिल की हमारी सवारी


स्कूल में जिन दिनों पंडित सुदर्शन (मूलनाम बद्रीनाथ भट्ट)  की कहानी “साइकिल की सवारी” पढ़ी थी तब मुझे साइकिल चलानी नहीं आती थी| मुझे लगता था कि अगर साइकिल बहुत बचपन में में सीख लेने की चीज है, वर्ना किसी मुसीबत से कम नहीं है| पापा की साइकिल मोहल्ले में सबसे ऊँची और भारी साइकिल थी और उस पर हमसे लठ्ठा साइकिल नहीं चलती थी| दस पैसे रोज पर छोटी साइकिल किराये पर लाने का मतलब जेबखर्च सीधा सीधा नुक्सान था|

खैर दसवीं क्लास के बाद मैनें साइकिल जैसे तैसे सीख ली क्योंकि बारहवीं में हमारा सेंटर घर से चार किलोमीटर दूसरे कस्बे में (सिकंदराराऊ से पुरदिलनगर) था और माँ नहीं चाहतीं थी  कि मैं पैदल जाऊं|

बारहवीं के बाद मैं कभी दोबारा साइकिल चलाई हो, ऐसा याद नहीं|

अभी पिछले महीने, पत्नी जी ने साइकिल खरीदी और दिल्ली जैसे शहर में वो उसे एक दो बार दफ्तर भी ले गई, तो सोचा यार कुछ तो किया जाए| मैं बेटे तो स्कूल छोड़ने और लाने के लिए साइकिल लेकर जाने लगा| दिल्ली के भीष्म पितामह मार्ग पर साइकिल लेन तो बनी हुई है मगर उसके हालत नाजुक हैं| लगता है किसी नाले ले ऊपर कमजोर कंक्रीट से इसे बनाया गया है| जगह जगह टूटा फूटा भ्रष्टाचार दिखाई देता है| बकाया जगह पर घरविहीन लोगों की रिहायश और बैठकें हैं|

मगर पिछले हफ्ते सुबह सुबह पांच बजे घर से साइकिल पर निकले| अरविंदो मार्ग पर ट्रैफिक कम था| सुबह की ठंडक तारी थी| चिड़ियों के करलव की सुरताल कान में शहद घोलने लगी थी| लोदी रोड पर चहलकदमी करने वालों की रोनक होने लगी थी| गर्मीं की सुबह शीतल पवन, चिड़ियों की चहचाहट, आसमान में उड़ते पक्षियों की रौनक ये वो इनाम हैं जो जल्दी उठने वालों को नसीब होते हैं|

पंडारा रोड होकर मैं इण्डिया गेट पहुँचता हूँ| बहुत से तेज रफ़्तार गाड़ियाँ हैं| कई साइकिल सवार भी आये हुए हैं| बढ़िया बढ़िया साइकिल और सवार की सुरक्षा के सारे इंतजामात देख कर हैरान हूँ| साइकिल भी कोई ग़रीबी का खेल नहीं है| वैसे भी तेज रफ़्तार गाड़ियों के बीच दिल्ली में साइकिल चलाना दुष्कर कार्य है| सोचता हूँ दिल्ली के सबसे बड़े पिकनिक स्पॉट, दिल्ली के गौरव इन्डिया गेट पर साइकिल चलाना खतरनाक मगर मजेदार काम है|

तभी, तेज रफ़्तार साइकिल से एक सत्तर साला जवान मुझे पीछे छोड़ देते हैं| मैं इण्डिया गेट को चारों तरफ से देख रहा हूँ| शानदार नजारा है| तेज रफ़्तार गाड़ियाँ मुझे रास्ता दे रहीं हैं|

छाया की अमूर्त अभिव्यक्ति


डॉ. छाया दुबे प्रकृति से अपना सम्बन्ध देखती है और प्रकृति उनकी अमूर्त रूप में उनके कैनवास पर उतरती है| उनसे बात करते हुए लगता है कि कैनवास उनके अकथ्य को रंग के रूप में उतारता है और उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है|

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प्रकाश उनकी अभिव्यक्ति को तेज प्रदान करता है और चटख रंगों के रूप में निखर कर आता है| सूर्य और जल उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण साधन और साध्य है जिन्हें वो भिन्न रंगों के माध्यम से व्यक्ति करती हैं| इस कारण उनकी रचना प्रक्रिया में चिंता के रंग और लकीरें दिखतीं हैं मगर अवसाद नहीं दिखाई देता|

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वो प्रकृति बचाने और पृथ्वी बचाने की बात आशावादिता के साथ करतीं है| उनसे बातचीत में लगता है कि भोपाल जैसे शहरों में जीवन और प्रकृति को लेकर अवसाद व्याप्त नहीं हुआ है सकारात्मक चिंताएं जरूर हैं| यह भाव उनकी कला को विशेषता देता है|

आश्चर्यजनक रूप से वो प्रकृति की चिंताओं के बीच उसके दोहन और शोषण की चमक – दमक को भी देख पातीं हैं| या कहिये, तमाम चिंताओं के बीच, प्रकृति के प्रति उनका सौन्दर्य बोध पूरे रोमानी अंदाज में मौजूद है|

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नारी शोषण शोषण और प्रताड़ना जैसे विषय ही उनके यहाँ अवसाद नहीं भरते वरन वो उसे पूरी आशा और प्रकाश के साथ देखती है|

ईश्वर और दर्शन भी, उनके अंतर्मुखी स्वभाव को बहिर्मुखी बनाते हैं|

छाया दुबे के शब्दों में:

“ मेरे चित्रों का मध्यम मिश्रित रहा है| एक्रेलिक ऑइल, ड्राई पेस्टल, सभी का प्रयोग करती हूँ| मेरे काम में नुकीले फोर्सफुल स्ट्रोक, परिश्रम एवं प्रयास को दर्शाते हैं| और सॉफ्ट स्पॉट स्ट्रोक स्थिरता और संतोष का सूचक हैं| मेरे चित्रों में पीले रंग का विशेष महत्त्व है, जैसे पृथ्वी और जीवन के लिए सूर्य की ऊर्जा का महत्त्व है| सभी रंगों के तालमेल में सृष्टि का सौन्दर्य निहित है, इन रंगों के साथ मेरी इस यात्रा में संगीत का साथ अनिवार्य सा है; मानो संगीत के लय एवं भाव मानो मेरे स्ट्रोक को और लयात्मक एवं भावयुक्त एवं अर्थपूर्ण बनाते हैं|”

डॉ. छाया दुबे के चित्रों की प्रदर्शनी, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम, २०५, तानसेन मार्ग, निकट मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन, पर दिनांक 28 अप्रैल से 8 मई 2016 तक चल रही है|