नगद नालायक


प्रचलित पांच सौ और एक हजार  रूपये के नोट की कानूनी मान्यता रद्द करने का स्वागत योग्य वर्तमान सरकारी फैसला काले धन को समाप्त करने के पुराने और असफल तरीकों में से एक है| इस से पहले जनवरी १९४६, १९५४, १९७८ में बड़े नोटों की कानूनी मान्यता रद्द की गई थी| दिक्कत यह रही कि विभिन्न कारणों से यह बड़े नोट, जैसा कि इस बार भी किया जा रहा है, दोबारा प्रचलन में लाये गए| परन्तु इस बार प्रक्रिया में अंतर भी दिखाई देता है|

इस प्रकार की प्रक्रिया में काले धन का वह मामूली हिस्सा जो नगद के रूप में रखा गया हो, लगभग नष्ट हो जाता है| इस प्रक्रिया में जो काला धन बाहर आने की आशा होती है, वह अपने आप में बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है| परन्तु यह काले धन को समाप्त नहीं करता, काले धन का अधिकतम हिस्सा रियल एस्टेट, सोना, और विदेशी बैंकों में होता है| इस बड़े हिस्से को नियंत्रित करने का प्रभावी उपाय सरकारों के लिए उठाना असंभव नहीं, परन्तु कठिन है| वर्तमान में काले धन की अर्थव्यवस्था सामान्य अर्थव्यवस्था के पच्चीस फ़ीसदी के बराबर है| वर्तमान प्रक्रिया भविष्य में काले धन के उत्पादन पर भी कोई समुचित रोक नहीं लगाती|

मोदी सरकार के फैसले में एक नई बात है, यह बेहद स्फूर्त प्रक्रिया के तौर पर और सीमित समय अवधि में हो रहा है| नगद में काला धन रखने वालों को अपने पुराने नोट नए नोटों से बदलने का मौका नहीं दिया गया है| सरकारी अधिसूचना के अनुसार वर्तमान प्रक्रिया नकली नोट, काला धन, आदि का मुकाबला करेगी|

परन्तु, इस प्रक्रिया का नुकसान निम्न आय वर्ग को होगा, जिनके पास अधिकतर धन नगद में होता है| असंगठित क्षेत्र के मजदूर, छोटे दूकानदार, फेरीवाले, आदि जब अपनी कल (८ नवम्बर २०१६) की आय घर ले कर जा चुके थे तब यह घोषणा हुई| उनकी अधिकतम आय/सम्पत्ति रद्दी बन गई और यह देखने की बात है कि वो आज (९ नवम्बर २०१६) किस प्रकार अपनी खरीददारी कर पाते हैं| उनके लिए बैंक की सुविधा, अगर है तो, एक दिन बाद होगी| परन्तु इनमें से अधिकतर के पास जन धन योजना के बाद भी बैंक अकाउंट नहीं है या दूर दराज इलाकों में है| यह सही है कि १० नवम्बर के बाद बैंक उनके अकाउंट खोल कर उसमें पैसा जमा कर सकती हैं, परन्तु यह वित्तीय भागीदारी प्रक्रिया का दुर्दांत रूप होगा| कारण, इनमें से अधिकतर के पास अपने पते के समुचित प्रमाण नहीं होते|

भारत में दूरदराज के ग्रामीण और जंगल इलाकों में बैंक और डाकघर की सुविधा न होने से वहां मौजूद लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा| उनको अपनी छोटी छोटी बचत शहर ले जाकर बदलनी होगी या इस प्रक्रिया में बिचालियों को मोटा धन देना पड़ेगा|

अन्य भारतियों के लिए समस्या थोड़ी हास्यास्पद है, अधिकतर समझदार लोग अब नगद कम रखते हैं और बैंक मशीनें, अगर देती हैं तो, एक बार में पाँच से अधिक एक सौ के नोट नहीं देतीं| उनके पास खर्च सब्जी भाजी लेने के लिए उधार का विकल्प बचता है वह भी अगर उनका सब्जी वाला अगर कल सब्जी ला पाया तब| ऑनलाइन खरीदने वालों के लिए थोड़ा राहत रहेगी|

वर्तमान अधिसूचना

  • दिनांक ८ नवम्बर २०१६ को बैंक ग्राहकों की सेवा नहीं कर पाएंगे| अपना हिसाब किताब बनाकर रिज़र्व बैंक को देंगे|
  • दिनांक ८ और ९ नवम्बर को एटीएम काम नहीं करेंगी| उनमें से नगद धन राशि बैंक निकल लेंगी|
  • दिनांक ३० दिसंबर २०१६ तक केवल चार हजार रुपये की धनराशि तक के नोट प्रति व्यक्ति बदले जा सकते हैं|
  • चार हजार रुपये से लेकर पचास हजार रूपये की धनराशि बिना किसी पहचान प्रक्रिया के भी बैंक खाते में जमा कराई जा सकती है|
  • पचास हजार रूपये से अधिक की धन राशि जमा करने के लिए सामान्य नियम अनुसार पहचान प्रक्रिया पूरी करनी होगी|
  • जमाकर्ता किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भी इस धन को जमा कर सकते हैं, परन्तु इसके लिए खाताधारक की सहमति और जमाकर्ता की पहचान प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए|
  • १० नवम्बर से २४ नवम्बर २०१६ तक एक दिन में बैंक शाखा में जाकर केवल १०,००० रुपये निकाले जा सकेंगे, जबकि एक हफ्ते में केवल २०,००० रूपए|
  • १० नवम्बर से १८ नवम्बर तक एटीएम से प्रतिदिन प्रतिकार्ड २,००० रुपये निकाले जा सकेंगे और उसके बाद प्रतिदिन प्रतिकार्ड ४,००० रुपये निकलेंगे|
  • किसी भी प्रकार ने गैर नगद अंतरण – चैक, डिमांड ड्राफ्ट, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, मोबाइल बेलेट, इलेक्ट्रोनिक निधि अंतरण, पेमेंट बैंक आदि इस अवधि में मान्य रहेंगे|
  • अगर कोई व्यक्ति ३० दिसंबर तक नगद धनराशि नहीं बदल पता तो वह रिज़र्व बैंक में पहचान प्रक्रिया पूरी कर कर बदल सकेगा|

पहचान प्रक्रिया

पहचान प्रक्रिया के लिए पेन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आदि प्रयोग किये जा सकते हैं|

आयकर व्यवस्था

वर्तमान में अगर कोई व्यक्ति दो लाख से अधिक नगद धनराशि बैंक में जमा करता है तो इसकी सूचना बैंक आयकर विभाग को देती है| आयकर विभाग जांच का निर्णय के सकता है|

अनिवासी और प्रवासी

अगर आप भारत से बाहर हैं तो आप किसी अन्य व्यक्ति को भारत में रखे नगद खाते में जमा करने के लिए अधिकृत कर सकते हैं|

परिमाण आधारित विश्लेषण

काले धन की अर्थव्यवस्था अधिकतर निवेश नगद धनराशि में नहीं होता| किसी भी व्यक्ति के पास काले धन के एक करोड़ से अधिक रुपये होने की सम्भावना बहुत कम है| अधिकतर धन संपत्तियों, बेनामी संपत्तियों, कंपनियों, सोना – चांदी, और विदेशी बैंकों में होता है| बेनामी संपत्तियों के अलावा उनमें से किसी से निपटने की कोई सटीक योजना सरकार के पास नहीं है| संपत्तियों में काले धन के निवेश के कारण बहुत सारी निवास योग्य संपत्तियों पर मालिकों के ताले लटक रहे हैं| बाजार में सम्पतियों के अनावश्यक दाम इस सब के कारण बढ़े हुए हैं|

दूर दराज के क्षेत्रों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों किसानों, मझोले दुकानदारों के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है| पेट्रोल पंप आदि की तरह बिक्रीकर में पंजीकृत दुकानदारों को भी दो दिन तक अमान्य धनराशि स्वीकार करने की अनुमति मिलनी चाहिए थी|

सरकार ने नगद आधारित व्यवस्था को बैंक आधारित व्यवस्था में बदलने का अवसर हाथ से जाने दिया है| नए नोटों का प्रचलन सही निर्णय नहीं है|

हर प्रक्रिया में लाभ हानि होते है| वास्तविक परिणाम अगले पचास दिन में दिखाई देंगे| हमें सरकार का सहयोग करने का प्रयास करना चाहिए|

 

कूड़े वाले भैया


वो रोज हमारे दरवाजे आते हैं, घर नहीं आते|

अजब बात हैं न, पांच साल में शायद ही उन्हें हमने एक बार भी नाम से पुकारा हो| उन्हें मौन रखकर भी पुकारा जा सकता है, वर्ना भैया का शाश्वत संबोधन है ही|

हम भारतीयों को अपने घर का कूड़ा कूड़ेदान में डालकर आने में जो लज्जा आती है, उसी लज्जा का मूर्त नाम है – कूड़े वाले भैया|

हर सुबह सबसे पहले दरवाजा वही खटकाते हैं| दरवाजा खटकने का अंदाज और समय बता देता है, कौन है| वो रोज हमारे दरवाजे आते हैं, घर नहीं आते| दरवाजे से उनका काम हो जाता है| बहुधा मौन संवाद रहता है| कभी कभी जब मैं हालचाल पूछ लेता हूँ तो कहीं दूर से कोई अचानक जागता सा जबाब देता है| कभी कभी बच्चों से बात कर लेते हैं| अपने बच्चों को साल में एक बार होली पर ही देख पाते हैं न वो| जिस मंदिर में प्रसादी पर नौकरी करते हैं, उस की धर्मशाला में साल भर होने वाले शादी ब्याह से आस लगी रहती है| अपना अपना लालच है, साहब| प्रसादी से पेट भरता है, बेगारी से कपड़ा पहनते हैं, और ईनाम से घर पैसा भेज देते हैं| बेटी की शादी किये थे २०१५ में, दस हजार का दहेज़ देने में जान निकल गई थी| जमींदार से उधारी तो रहती ही है| नहीं नहीं, अब तो सब जमींदार साहब को प्रधान जी बोलने लगा है, वो खुद कहलाते हैं|

कई बार जब भैया महंगाई की बात करते हैं तो अन्दर से मन हिल जाता है, कहीं पैसे बढ़ाने की तो नहीं कह रहे| सत्तर रूपये महीने में अगर कोई दस रूपये बढ़ाने की कह दे तो मन को खलेगा न| लगभग पंद्रह फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हो गई| कोई बढ़िया से बढ़िया कंपनी भी नहीं देती| यह बात अलग है, पांच साल में भैया ने कभी पैसे बढ़ाने के लिए नहीं कहा| एक बार मैंने पूछा पैसा बढ़ा दें, बोले क्यों कॉलोनी में दुश्मनी लेते हो?

एक पड़ौसी से लड़ाई रहती है| मत पूछिए, एक बार अखबार में उसका फ़ोटो आया था न| अपने दरवाजे पर गंदगी करता है, साझा सीढ़ियों पर कूड़ा डाल देता है| फोकट में उसका कूड़ा उठाना पड़ता है| अगर न उठाओ तो बाकी लोग के लिए सीढ़ी पर गंदगी रहता है, गाली भैया को मिलती हैं| इसलिए उठाना तो पड़ता है| कोई बात नहीं, भैया उसे गाली देते हैं – माँ बहन बेटी की| पड़ौसी शरीफ़ आदमी, कुछ नहीं बोलता| एक बार भैया ने उनकी किसी “सेटिंग” को गाली दे दी, तब निकल आया था बाहर| खूब लड़ाई हुई, पड़ौसी को गाली, उसकी माँ – बहन – बेटी को गाली देता तो ठीक भी था – किसी अनजान औरत को गाली देने का क्या मतलब| उस दिन पड़ौसी की बेटी रोने लगी| उस दिन से भैया, पड़ौसी को बेटी की गाली नहीं देते, उसकी बेटी के बराबर उम्र की बेटी हैं न भैया की|

भैया कभी नागा नहीं करते, अगर किसी दिन नहीं आना हो तो गली के किसी कूड़ा बटोरने वाले लड़के को बोल देते हैं| कुछ लोग उन लड़कों को लेकर भैया को पीठ पीछे गालियाँ देते हैं| भैया कभी सुन लें तो एक बार मुड़कर देख लेते हैं – बस| ज्यादातर बोलने वाले चुप हो जाते हैं| बोलने वाले अपनी इज्ज़त दरवाजे पर गिरवी रखकर बोलते हैं|

जब नगरपालिका की गाड़ी आने लगी तो मैं बोला अब तो आपका धंधा बंद| बोले हिन्दुस्तानी आदमी चौराहे पर हग-मूत सकता है, घर का कूड़ा खुद बाहर नहीं डाल सकता|

उन्होंने गाली नहीं दी न| आपको और मुझे बुरा सा क्यूँ लग रहा है| जाने दीजिये छोटा आदमी है|

 

दहशत