विश्व-बंदी २३ मई

उपशीर्षक –  तर्कपूर्ण और समझदारी वाले पूर्वाग्रह

मेरे मित्र हैं जिन्हें विश्वास था कि उनका महान और समझदार नेता लॉकडाउन-४ को बहुत सख्त रखेगा क्योंकि मुस्लिम समुदाय के त्यौहार के समय कोई समझदार आदमी मूर्खता पूर्ण जोखिम नहीं उठाएगा| मैं उस समय जोर से हंसा और उन्हें वादा किया कि सरकार लॉकडाउन-४ को मॉक-डाउन बनाने जा रही हैं| इसके बाद जैसा कि हमेशा होता हैं तो मुझे तर्कपूर्ण और समझदारी की बात करने की सलाह देने लगे| मजे की बात यह है कि जब भी यह इस प्रकार के मित्र तर्कपूर्ण और समझदारी की बात काम धंधे से इतर प्रयोग करते हैं तो मेरा विश्वास प्रबल रहता है कि अपने पूर्वाग्रह को थोपने का प्रयास हो रहा है|

खैर उनकी तर्कपूर्ण और समझदारी वाली बातें न मैं सुनता न कोई और|

इस बार तो एक मजे की बात भी हुई| उन्होंने के वास्तविक तार्किक विचार रखा| मैंने सूचित किया कि कांग्रेस नेता चिदंबरम पहले ही इस आशय का ट्वीट कर चुके हैं| वो परेशान होकर बोले – अरे, अब इस विचार को कोई नहीं सुनेगा| इस प्रकार उनके तर्क-संगत विचार को उनके समझदार नेताओं के मस्तिष्क में जगह नहीं मिली|

वैसे वह प्रधानमंत्री मोदी को बहुत तर्कपूर्ण और समझदार मानते हैं परन्तु जिस बातों के लिए मोदीजी को वह धन्यवाद कर देते हैं वह खुद उल्टी पड़ जातीं हैं| उनका परम विश्वास था कि मोदी जी आधार और वस्तुसेवाकर जैसे कुत्सित कांग्रेसी विचारों को प्रधानमंत्री बनते ही दमित कर देंगे| उस दिन मजे लेने के लिए मैंने कहा कि कांग्रेस जिनकी दुकान हैं मोदी जी उनके पुराने ग्राहक हैं| आधार और वस्तुसेवाकर ऐसा आया कि मित्र प्रवर को उसके समर्थन में बहुत तीव्र श्रम कर कर ज्ञान प्राप्त करना पड़ा| हाल में यही हाल मनरेगा मामले में भी हुआ – इस कांग्रेसी घोटाले के भांडाफोड़ करने की उम्मीद में वो मई २०२० में निर्मला जी का भाषण देख रहे थे| पता चला निर्मला जी ने खुद बाबा मनरेगा की शरण ली| दरअसल मित्र महोदय को लगता था कि मजदूरों के पलायन में मनरेगा का हाथ है|

खैर थाली बजाने मोमबत्ती जलाने और गाल बजाने के सभी काम करने के बाद आजकल उन्हें किसी नए टास्क की तलाश है|

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विश्व-बंदी २० मई

उपशीर्षक –  ज़रा हलके गाड़ी हांको

क्या यह संभव है कि आज के करोना काल को ध्यान रखकर पाँच सौ साल पहले लिखा गया कोई पद बिलकुल सटीक बैठता हो?

क्या यह संभव है कि कबीर आज के स्तिथि को पूरी तरह  ध्यान में रखकर धीरज धैर्य रखने की सलाह दे दें?

परन्तु हम कालजयी रचनाओं की बात करते हैं तो ऐसा हो सकता है|

ज़रा हल्के गाड़ी हांको, मेरे राम गाड़ी वाले…

अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों को संभलकर चलाने का पूरा सुस्पष्ट सन्देश है|

गाड़ी अटकी रेत में, और मजल पड़ी है दूर…

वह हमारी वर्तमान स्तिथि को पूरी तरह से जानते और लम्बे संघर्ष के बारे में आगाह करते हैं|

कबीर जानते हैं कि वर्तमान असफलता का क्या कारण है:

देस देस का वैद बुलाया, लाया जड़ी और बूटी;

वा जड़ी बूटी तेरे काम न आईजद राम के घर से छूटी, रे भईया

मैं हैरान हूँ यह देख कर कि कबीर मृत देहों के साथ सगे सम्बन्धियों और बाल-बच्चों द्वारा किये जा रहे व्यवहार को पाँच सौ वर्ष पहले स्पष्ट वर्णित करते हैं:

चार जना मिल मतो उठायो, बांधी काठ की घोड़ी

लेजा के मरघट पे रखिया, फूंक दीन्ही जैसे होली, रे भईया

मैं जानता हूँ कि यह सिर्फ़ एक संयोग है| परन्तु उनका न तो वर्णन गलत है, न सलाह| पूरा पद आपके पढ़ने के लिए नीचे दे रहा हूँ|

सुप्रसिद्ध गायिका रश्मि अगरवाल ने इसे बहुत सच्चे और अच्छे से अपने गायन में ढाला है:

 

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विश्व-बंदी १९ मई

उपशीर्षक –  दूरियाँ दो गज रहें

बुतों बुर्कों पर आह वाले, वाह वाले, नकाब लगाए बैठें हैं,

सूरत पर उनकी मुस्कान आती हैं, नहीं आती, ख़ुदा जाने|

जिन्हें शिकवे हैं शिकायत है मुहब्बत है, हमसे दूर रहते हैं,

दुआ सलाम दूर की भली लगती हैं, गलबहियाँ ख़ुदा जाने|

जाहिर है छिपकर चार छत आया चाँद, चाँदनी छिपती रही,

ये दूरियाँ नजदीकियाँ रगड़े वो इश्क़ मुहब्बत के ख़ुदा जाने|

जो नजदीकियाँ घटाते हैं बढ़ाते हैं, अक्सर दोस्त नहीं लगते,

हम खुद से दूर रहते हैं इतना, रिश्ते-नातेदारियाँ ख़ुदा जाने|

महकते दरख़्त चन्दन के बहकते हैं, भुजंग गले नहीं लगते,

गेंदा, गुलाब, जूही माला में नहीं लगते, गुलोगजरा ख़ुदा जाने|

दूरियाँ दो गज रहें, नजदीकियाँ चार कोस, इश्किया रवायत है,

बात करते हैं इशारों से अशआरों से, तेरी नैनबतियाँ ख़ुदा जाने|

 

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विश्व-बंदी १८ मई

उपशीर्षक –  जीवन यापन का संकट

ऐसा नहीं है कि जीवन यापन का संकट केवल मजदूरों के लिए ही खड़ा हुआ है| इस संकट से हर कोई कम या ज्यादा, पर प्रभावित है| हर किसी की कमाई में लगभग तीस प्रतिशत की कमी आई है और हर किसी का इरादा खर्च में कम से कम बीस प्रतिशत की कमी करना है| निवेश का वर्तमान मूल्य (value) दो महीनों में तीस प्रतिशत घट चुका है| अगर सरकारी पैकेज की बात की जाए तो इसका कोई सकारात्मक प्रभाव देखने के लिए कम से कम साल भर इन्तजार करना होगा|

सरकारी घोषणाओं के प्रति मेरी निराशा का निजी कारण भी है – निजी रूप से इन प्रस्तावों के चलते मेरे काम में कम तीस से पचास प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका है| यह अलग बात है कि मैं इस सब को पहले से ही संभाव्य मान कर आगे के कदम उठाने की तैयारी कर रहा था| परन्तु रास्ता कहाँ तक जाता है और गंतव्य कितनी दूर है मुझे नहीं मालूम|

मेरे लिए सकारात्मक यह है कि मैं जीवन में पिछले कई संकटों से गुजरकर उठ चुका हूँ| परन्तु मेरे जैसे हर के व्यक्ति के पीछे हजारों हैं, जिनके पास कोई मार्ग या मार्गदर्शन नहीं, न दृष्टि, न दृष्टिकोण| अन्य बुरे समय मुकाबले में यह स्तिथि यह मेरी तरक्की में एक बड़ा अडंगा है| जब अर्थव्यवस्था तरक्की कर रही हो तो आपके लिए आगे बढ़ना सरल है| परन्तु अकेले आगे बढ़ना कठिन है| सबसे बड़ी चुनौती है खेती और कुटीर उद्योग, अगर यह आगे नहीं बढ़ सके तो अर्थव्यवस्था की आधार संरचना कमजोर होगी| आप बड़ी अर्थव्यवस्था को ऊपर से बड़ा नहीं बना सकते इसके लिए इस अपने आधार को पहले मजबूत करना होता है| वर्तमान समय में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी कठिनाई यह ही है कि पिछले बीस वर्ष की आर्थिक तरक्की के दौरान इसका आधार कमजोर हुआ है| घर का सबसे कम योग्य बेटा खेती के लिए छोड़ दिया जाता रहा है|

हम सबकी चुनौती यह है कि इस सबके बीच अपनी अपनी आजीविका को वर्तमान स्तर से नीचे न गिरने दिया जाए|

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विश्व-बंदी १७ मई

उपशीर्षक – आपूर्ति की जय,

माँग होए मोती बिके, बिन माँग न चून|

रहीम अगर आज दोहा लिखते तो वर्तमान सरकार को इसी प्रकार कुछ अर्थ नीति समझाते| यह अलग बात है कि ज्ञान देने के चक्कर में गाली गलौज का शिकार होते|

भारत पिछले तीन चार वर्षों से मंदी का शिकार है| नोटबंदी, तालाबंदी और श्रमिकबन्दी तक हर कदम ने माँग में कमी पैदा की है| करोना से पहले भी देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार ने अपने प्रयास किये हैं|

इसके लिए सरकार ने बड़ी कंपनियों के करों में कमी की जो भले ही गलत कदम नहीं था मगर माँग बढ़ाने का काम नहीं कर सकता था| सरकार बजट के महीनों बाद बजट से भी अधिक बड़ा घोषणापत्र लेकर सामने आई| जैसा सबको पता था, कोई लाभ नहीं हुआ| बाजार में पैसा समाप्त होने लगा| सरकार ने व्यवस्था में धन बहाल करने के लिए कई प्रयास किए इनसे महंगाई तो बढ़ी, पर माँग नहीं| अगर आप आँकड़ों में देखें तो महंगाई यानि दाम जिस समय घटने चाहिए तब स्थिर रहे या बेहद कम बढ़े|

इस करोना काल में भी सरकार दो महीने के भीतर कई घोषणा लेकर आई| वर्तमान और दूसरी कड़ी को पांच दिन में शानदार रूप से आत्मनिर्भर भारत नाम से प्रचारित किया गया| जिसमें स्वतन्त्र निदेशकों के पंजीकरण जैसे सामान्य घोषणा की गई जो करोना के महीनों पहले से मौजूद थीं और न माँग बढ़ा सकती थीं न आपूर्ति| वैसे यह जरूर है कि मेरा स्वतंत्र निदेशक के लिए मैंने परीक्षा जरूर करोना तालाबंदी के दौरान उत्तीर्ण की| पिछले पांच छः दिन में सरकार के भी ऐसा कदम नहीं बता सकी जिससे आम भारतीय उपभोक्ता की और से माँग बढ़े| भारतीय उपभोक्ता को बेहद कठिन वेतन कटौती से लेकर रोजगार कटौती का सामना करना पड़ा है| छोटे दुकानदार, फेरीवाले, रेहड़ीवाले, छोटे चिकित्सक, छोटे वकील, छोटे लेखाकार सब आय की कमी का सामना कर रहे हैं| उनके खर्चे कम उस अनुपात में नहीं हुए हैं| किसानों के अपने उत्पाद का दाम नहीं मिल पाया है| भूखा प्यासा मजदूर पैदल अपने बचपन के घरों की और जा रहा है| जो मजदूर वापिस नहीं जा रहा वो या तो जड़ से कट चुका है या फिर शायद अवैध आप्रवासी है|

हर चीज सरकार के हाथ में नहीं है परन्तु सरकार इस बड़े मोटे से पैकेज में से कुछ धन सीधे इस आम जनता तक पहुंचाकर जनता के हाथ में कुछ क्रयशक्ति प्रदान कर सकती थी| सरकार बेरोजगारी भत्ता, मनरेगा, शहरी मनरेगा, मजदूरी सहायता जैसी महत्वपूर्ण बातों पर  चूक गई है| फ़िलहाल अर्थव्यवस्था ठीक होते नहीं नजर आ रही|

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विश्व-बंदी १६ मई

उपशीर्षक – त्रियोदशी में करोना दावत

करोना काल की अच्छी उपलब्धियों में एक यह भी है कि देश में त्रियोदशी संस्कारों में भारी कमी आई है| परन्तु मेरे गृह नगर के बारे में छपी खबर चिंता जनक थी|

शहर के एक बड़े सर्राफ़ की माताजी का हाल में स्वर्गवास हुआ| इसके बाद स्वाभाविक है कि उनके पुत्र, और पुत्रिओं के परिवार इकठ्ठा होते| इसमें शायद किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए| परन्तु इस परिवार ने अपनी माताजी के लिए त्रियोदशी संस्कार का आयोजन किया, जिसमें शहर भर के काफ़ी लोग सम्मलित हुए| दो दिन के बाद सर्राफ़ साहब की करोना से मृत्यु हो गई| मृत्यु के समाचार के बाद सरकार ने तुरंत तीन प्रमुख थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू का ऐलान कर दिया जिससे कि बीमारी न फैले| साथ ही उन लोगों की जानकारी इकठ्ठा की गई जो त्रियोदशी में शामिल हुए थे| इस परिवार और समारोह में शामिल कई लोग करोना से संक्रमित पाए गए|

दुःख यह कि यह समाज का सभ्य और समझदार समझे जाने वाला तबका है| यह वह लोग हैं जो दूसरों के लिए आदर्श बनकर खड़े होते है|

इस पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी है| कोई नहीं जानता कि सर्राफ़ परिवार के यहाँ मातमपुर्सी के लिए आए और बाद में त्रियोदशी समारोह में शामिल लोग कब कब किस किस से मिले| यह एक पूरी श्रंखला बनती है| यह सब जान पाना उतना सरल नहीं जितना लगता है| अलीगढ़ शहर ख़तरे की स्तिथि में अब लगभग एक महीने के लिए रहेगा| सरकार ने लगभग १५० लोगों के विरूद्ध मुकदमा कायम किया है|

कुछ अतिविश्वासी या अंधविश्वासी लोगों के कारण उनके सम्बन्धियों, मित्रों, परिवारों, पड़ौसियों, और यहाँ तक कि उनके आसपास से अनजाने में ही गुजर गए लोगों के लिए खतरा पैदा हुआ है|

अलीगढ़ वालों के समझदार होने का मेरा भ्रम इस समय कुचल गया है| मैं सिर्फ़ आशा करता हूँ कि जल्द सब ठीक हो|

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विश्व-बंदी १४ मई

उपशीर्षक – इस्तरी वाले कपड़े

तालाबंदी से ठीक पहले हमारे घर के लिए इस्तरी का काम करने वाली महिला जब आई तो बहुत डरी हुई थी| देश के अधिकतर इस्तरी का काम करने वालों की तरह वह भी पास गली में पार्क के किनारे ईंटों और बलुआ पत्थर के सहारे बनाए गए चबूतरे से काम करती है| इस प्रकार के सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर काम करने के कारण उसे भय था कि उसको संक्रमण का बहुत खतरा है| दिल्ली शहर में रहने तीन लोगों के इस परिवार के सभी सदस्यों के लिए काम करना जरूरी है| उस समय उसका एक बेटा मुंबई में था जो तालाबंदी वाली रात ही किसी तरह ट्रेन के शौचालय के सहारे बैठ का दिल्ली वापिस लौटा था| दूसरा एक निजी कंपनी के दफ्तर में हरकारे का काम करता था|

अचानक तालाबंदी हुई| आधे महीने का पैसा ख़त्म हो चुका था बाकि के लिए कोई आय नहीं थी| पहले पंद्रह दिन तो जैसे तैसे गुजर गए मगर उसके बाद कठिनाई शुरू हुई| बचत का पैसा कम हो चुका था और खाने की किल्लत हो रही थी| उसने अपने बंधे हुए ग्राहकों से सहायता मांगी और कुछ लोगों से सहायता की भी| परन्तु, अधिकांश लोगों के सामने खुद अपना ही नगदी का संकट सामने खड़ा था, तो कुछ को उस में अपना भविष्य दिखाई दिया| कुछ लोगों ने उसे सरकारी भोजन केंद्र पर जाने की सलाह दी| कहती है एक दिन बेटा गया भी, मगर उसे अच्छा नहीं लगा|

“मेहनत्त का न खाना तो चोरी या भीख लगता है, पिछले सप्ताह उसने मुझे कहा| लम्बी कतार में खड़े होने के बाद बीमार, भिखारी, मजदूर और कामगार में कोई फ़र्क नहीं लगता, साहब| वहां का खाना जैसा भी हो मगर गले से उतारने के लिए गैरत को घर पर रखना पड़ता है|”

वह उस दिन काम मांगने के लिए आई थी| सरकार ने धोबी आदि के काम की अनुमति दे दी है| हमें यह पता था कि उसकी मदद खैरात कर कर नहीं की जा सकती| कल इस्तरी के लिए हमने कपड़े दे दिए क्योंकि हम उसकी मदद करना चाहते थे| शाम तक कपड़े इस्तरी होकर आ भी गई| अब?

अब समस्या यह कि गली के नुक्कड़ पर चार घंटे रहे यह सुन्दर इस्तरी किए घरेलू कपड़े पहने जाये या नहीं| बेटे ने कहा, कपड़ों को संक्रमणमुक्त करने के लिए छिड़काव किया जाए| पत्नी बिना पहने धोने के पक्ष में थीं| पिता जी ने दो घंटे धूप में रखने की सलाह दी| आप क्या कहते हैं?

इस्तरी होकर आए कपड़े आज चार घंटे धूप में रखे गए, मगर पहनने से पहले की चिंता यानि भय जारी है|

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