बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|


 

क्या कहा जाए? जो कहना है ज़रा जल्दी कहना है, जल्दी जल्दी कहना है| बाद में क्या बोलेंगे जब होगा बंद मुँह, कटी जुबान|

पहले *** जनसंघी लोग लठ्ठ लेकर खड़े थे, उनकी सी न बोलो तो बोलने नहीं देते थे और खुद बहुत खूबी के साथ खूब बोलते थे| अब ये *** कांग्रेसी भी आ गए है मैदान में| नहीं नहीं दिशा-मैदान के लिए मैदान में नहीं आये मगर कर वही सब रहे है| *** टोपी वाले भी आधे भारत में रायफल लिए खड़े है| माफ कीजियेगा! इससे ज्यादा हम बोलेंगे नहीं वरना वो हमारे लिए बोल देंगे|

इन सब ** ** लोंगो की क्या कहे; पहले ये अपने निचले ** से ही *** फैलाते थे, मगर अब तो इनका मुखारविंद भी ** फैलाता है| कुछ *** लोंगो को महारत ही हासिल है उनके नाम *** **** **** **** *** अदि है| इन *** को अपने ** में कन्नौज की इत्र की गंध आती है और हमारे गुलाब जल में इन्हें अपने ** से भी अधिक बदबू आती है|

ये *** लोग खुद तो बहुत लिखते-बोलते है और इनता लिखते-बोलते है कि बस रामचरित वाले गोसाईं जी क्या और टीवी वाले गोसाईं जी भी क्या? मगर कुल मिला कर इन *** को कोई भी काम कि बात नहीं बोलनी| बाबासाहेब आंबेडकर इन ** को बोलने चालने के लिए संसद की पूरा आलिशान इमारत दे गए है मगर ये ** वहाँ पर अपनी ***** चिल्ल-पों करते है और कोई बात नहीं करते| वहाँ पर ये बस एक दूसरे की तरफ ऊँगली करते है और एक दूसरे * *** करते है| ये दोनों तीनों *** का अप्राकृतिक *** है जो खुले आम मेल मिलाप के साथ चल रहा है| अगर संसद चलेगी तो कुछ तो बोला जाएगा, बोलेंगे तो कुछ तो सच उगलेगा, सच उगलेगा तो बबाल मच जायेगा और इनके ** ** हो जायेगी| देश इनकी * *** एक कर देगा|

पहले तो जनता के हाथ बंधे थे और वो बूढी हो चली बाल विधवा की तरह सब कुछ सह रही थी| इन् ****** ने आजादी से लेकर आज तक जनता के साथ इनता ****** किया कि भारतीय दंड संहिता कि धारा 376  में इनके दी जा सकने वाली सजा का प्रावधान ही नहीं मिल सका| आज जब जनता कुछ बोलने की स्तिथि में आई तो ये बिलबिला गए है| पहले एक दो अखबारों में जनता की चिठ्ठी पत्री छप जाती थी और अगले दिन रद्दी हो जाती थी| अब कुछ लोग पढ़ लिख गए है और कुछ नए हथियार आ गए है| ट्विट्टर, फ़ेसबुक, ब्लॉग, एस एम् एस, पता नहीं क्या क्या| लोग हर तरह से अपना गुस्सा उतार है| अब लोगों को पता है कि हमारी बन्दूक इनकी तोप से कमजोर है, और लोग इन ** का ** ** नहीं ** सकते|

सीमान्त प्रदेश में कुछ बोला आये तो आतंकवादी; काले क़ानून उनके * *** करने के लिए|
आदि वासी कुछ बोलते है तो माओवादी; मार दो ** को|
जब शहरी युवा कुछ बोलें तो जेल दो *** और उनपर विदेशी हाथो में खेलने का इल्जाम लगा दो|
ये देश को लूट लें तो देश भक्त; आवाज उठाने वाले युवा पाकिस्तानी ***|
अन्ना को जेल और राजा को महल – दुमहले|

अब कलम की ताकत का नया पर्याय है इन्टरनेट| देखन में छोटो लगे, घाव करे गंभीर| हालात ये है कि घाव भी सीधे इन *** के **** पर हो रहा है और इनकी *** ** है| अब बिलबिलाई जनता ने नए साधनों का इस्तेमाल कर कर हल्ला मचाना शुरू किया तो इनको वहाँ पर सारी गंद दिखाई दे गयी| असलियत में इनकी **** गई है|मानते है कि कई बार लोग गुस्सा में इन *** की थोड़ा ज्यादा ही *** देते है मगर गुस्सा में किसको होश| मैं मानता हूँ कि लोंगो को गुस्सा शांत रखना चिहिये, मगर क्या करें पिछले पचास सालो में इन ** ने कुछ ढंग का पढ़ने लिखने ही नहीं दिया तो तमीज कहा से आती|

पहले इन *** के पाकिस्तानी भैया लोगो ने एक लंबी फेहरिश्त निकाल दी काफी शब्दों की| अगर मोबाइल पर उनमे से कुछ भी लिखा तो बस गए आप काम से| आपके चरित्र का पूरा चित्रण कर दिया जायेगा| हिंदी – उर्दू वाले *** *** * आप जानकारी बढ़ने की लिए पढ़े और पढाए http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-URDU-tsk-tsk-PTA-why-oh-why.-courtesy-of-shobz.pdf और अंग्रेज के *** पढ़े: http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-ENGLISH-made-me-LOL-courtesy-of-shobz.pdf | अगर आपको न अर्थ समझ आये http://www.urbandictionary.com/ पर सबके मायने दिए है, समझे और गलती न दुहरायें| हमें तो लगता है कि इन शब्दों पर सभी दक्षिण एशियाई सरकार लोग सहमत है इसलिए किसी भी जन मोर्चा पर इन शब्दों का प्रयोग कतई न करें|

हाँ! अब हमारे *** साहब को लगा कुछ तो बड़ा किया जाय, आखिर उनका *** किसी **** से छोटा थोड़े ही है| अब देखिये, ये विलायत के पढ़े लिखे *** लोग, अपने दफ्तर में विलायती बाबू लोग को बुला लिया और घर कि औरत का फोटो दिखा कर स्यापा कर डाला, बोला मेरे लोग आपकी वेबसाइट और फोरम पर हमारी *** की *** *** कर रहे है और उसका ***, उनका ***, उसकी *** कर रहे है| देखो मेरी तो *** कर कर रख दी है| इन *** सड़क छाप **** की जीभ काट दो, इनकी *** कर दो| इन ***** की पहचान मिटा दो अपने प्लेटफोर्म, फोरम, वेबसाइट पर से|

पहले ही आम जनता परेशान है, अपनी परशानी और भड़ास कैसे निकाले| बन्दूक उठाए या इस दुनिया से अपना संदूक उठाये| अब कलम पर भी जनता का जोर नहीं रहा| अगर कोई गलत बात हो रही है तो उस गलत बात करने वाले को पकड़ो न  सरकार, सबकी ***** क्यों करते हो; ****| अगर आपकी आदरणीय ***** की मानहानि होती है तो अदालत का दरवाजा देखो न, मेरे पीछे ******* कर क्यों पड़े हो| मानते है कि मुक़दमे में “मान हानि” से पहले “मान” को साबित करना पड़ेगा, तो करो न| अब आप विलायत में अपनी ****** *** क़ानून की उपाधि हासिल की है (अगर खरीदी हो तो माफ करें, मुझे हो सकता है की सही जानकारी न हो), आप कोई ***** थोड़े है|

वैसे भी आप क़ानून के *** है, जो चाहे वो क़ानून पैदा कर दें| आप अपने सुचना तकनीकी क़ानून को देख लीजिए| नियम उपनियम बनाए है, उन्हें देख लीजिए| मगर साहब-ए- आलम! आप इस मुल्क के सारे फोन टेप करते है, तो क्या आपको आतंकवादी, तस्कर और अपने और किसी भाई बंधू की कोई खास खबर मिल पाई? आप अपनी सरकार ठीक से चला पा रहे है, जो इस इंटरनेट को ठीक से चला लेंगे? क्या आप इस देश में रोज रोज जहर खा कर मर रहे किसान की कोई सुध बुध ले पा रहे है, जो इस देश के सभी इन्टरनेट उपयोग की निगरानी कर पायेंगे? आपकी सीमा को पार कर आतंकवादी इसे आ रहे है जैसे गली का कोई खुला सांड, क्या आप उन्हें रोक पा रहे है?

तो भैया! अभी तो हाथ जोड़ कर समझा रहे है कि ढंग से देश चला तो, फसबूक, ट्विट्टर को पढकर अपने काम के बारे में हो रहे असंतोष को समझो और उसे सुधारो| मैया की आरती से वोट नहीं मिलेगा, न ही भैया की पाँय लागी करने से|

भगवान की लाठी और जनता के वोट में आवाज नहीं होती मगर चोट बहुत लगती है| अपने सीधे और उलटे भाई लोग को भी बता देना|

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|

 

 

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लड़की का घर


अभी हाल में पत्नी जी के साथ उनकी माँ के घर जाने
का मौका मिला| उनका वहाँ पर बेसब्री से इन्तजार हो रहा था| वैसे भी भारतीय
मानसिकता में विवाहित पुत्री बेहद लाडली, प्यारी, स्वागतयोग्य और इष्ट देवी सदृश्य
होती है| जैसे ही हमने घर में प्रवेश किया, पड़ोस से कोई चाची-ताई-बुआ-मामी-मौसी आ
पहुँची; पूछने लगी “ससुराल से आ गईं बिटिया?” पत्नी जी ने हाँ में जबाब दिया पर
मैंने विरोध किया;”ससुराल तो अलीगढ में है ये तो दिल्ली से आयीं है”| इसपर वह
चाची-ताई-बुआ-मामी-मौसी कहने लगीं, “ चलो ठीक है, पति के घर से सही, बेटा अब आराम
कर लो, मायका मायका होता है, मायके जैसा सुख कहीं नहीं”| मैं सोचने लगा, मेरी
बेचारी पत्नी जी का घर कहाँ है? उनके पास, माँ, पति और सास का घर है, अपना नहीं|

क्या भारतीय स्त्री को घर का कोई सुख है या सब
जगह से वह बाहर है|

एक बात और; माँ और सास के पास घर है, नव-विवाहिता
बेचारी… बच्चों की शादी तक.. बेघर हैं|

क्यों?

क्यों??

क्यो???

तब क्या जब एक नौकरी पेशा नव-विवाहिता महानगर में
पति के साथ रहती है और किराए में उसकी आधी भागीदारी है?

क्या इसके लिए क़ानून लाना होगा? क्या इसके लिए
सरकार दोषी है? क्या इसके लिए लड़की दोषी है? क्या पडोसी दोषी है? क्या सास ससुर
दोषी है? क्या माँ-बाप दोषी है? क्या समाज दोषी है?

माँ बाप अपने घर को लड़की का मायका बता कर अपने घर
को बेटे के लिए बचा लेते है|

सास-ससुर अपने घर को इस बाहरी औरत से तब तक के
लिए बचा लेते है, जब तक वो इस घर में पुरानी, विश्वस्त, अपनी और अभिन्न न हो जाए|

मायके और ससुराल से दूर रोजी रोटी की जिद-ओ-जहद वाले
रैन-बसेरे को कोई भी स्वीकारने नहीं देता|

क्या करे?

कोई तो जबाब दे??

कोई तो जिम्मा ले???

मार के टक्कर, रफूचक्कर


 

“मार के टक्कर, रफूचक्कर” सुनने में जरूर एक सामान्य सा जुमला है, परन्तु यह इस दुर्घटना के शिकार और उसके परिवार के लिए एक बड़ा दर्द है|

सड़क कानून के जानकार यह सलाह हमेशा देते रहते है कि किसी भी दुर्घटना में गलती करने वाले वाहन की पंजीकरण संख्या (Registration Number) जल्दी से कहीं लिख ली जानी चाहिए| ऐसा करना इसलिए जरूरी है कि इससे हमें मोटर वाहन दुर्घटना वाद न्यायाधिकरण (Motor Vehicle Accident Claim Tribunal) में अपनी बात ले जाने में काफी सरलता रहती है| हम न्यायाधिकरण को बता पाते है कि किस वाहन या किन किन वाहनों की गलती से यह दुर्घटना हुई और किन लोंगे के विरुद्ध यह वाद लाया जा रहा है| न्यायाधिकरण सम्बंधित वाहन की बीमाकर्ता कंपनी को राहत राशि देने का आदेश दे पायेगा|

अब यदि किसी वाद कर्ता पीड़ित को सम्बंधित वाहन का पंजीकरण संख्या नहीं मालूम हो तब क्या होगा| ऐसा प्रायः तभी होता है, जब सम्बंधित वाहन ““मार के टक्कर, रफूचक्कर” हो गया हो|  इस परिस्थिति में क़ानून पीड़ित व्यक्ति को बेसहारा नहीं छोड़ देता बल्कि पूरी सहायता करता है|

पीड़ित व्यक्ति या उसका प्रतिनिधि उप-क्षेत्राधिकारी या तहसीलदार को निर्धारित प्रपत्र पर इस सम्बन्ध में प्रार्थना पत्र दे सकता है| यह अधिकारी इस मामले की पूरी जाँच करेगा| इस जाँच में पुलिस में दायर की गई प्रथम सूचना रपट तथा चिकत्सीय जाँच रपट को ध्यान में रखा जाएगा| जाँच अधिकारी अपनी रपट जिला न्यायाधिकारी (डीएम)  जोकि claim settlement commissioner कहलाता है, को देगा| न्याधिकारी के आदेश पर सरकार पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा राशि का भुगतान करेगी| यह मुआवजा राशि सभी सामान्य बीमा कंपनियों द्वारा जमा कराई गई धनराशि से बनाए गए हर्जाना (क्षतिपूर्ति) फंड से दी जाती है| इस प्रावधान में मृत्यु की स्तिथि में पच्चीस हजार रुपये और गंभीर चोट लगने पर साढ़े बारह हजार रुपये का प्रावधान है| इस मुआवजे के लिए क्षतिपूर्ति योजना १९८९ के खंड २० (१) के अंतर्गत आवेदन करना होता है|