बुलावा गुजिया का

अगर मैं आप को गुजिया खाने का बुलावा दे रहा हूँ तो शायद आप भारतीय संस्कृति से पूरी तरह परिचित नहीं हैं| अगर आप को त्यौहार पर पकवान खाने का बुलावा देना पड़े तो आप या तो बाहरी व्यक्ति हैं या गाय, कुत्ते, कौवे, चींटी, पितर, भूत, प्रेत जिन्न| अगर आप भारतीय या भारत प्रेमी हैं तो चले आइये गले मिलने और गुजिया क्या घर में जो कुछ रूखा सूखा होगा पाइयेगा|

यह बुलावा गुजिया बनवाने के लिए मेरे घर आने का है| अपना चकला बेलन साथ लाइए| होली के दो चार गीत भी याद कर कर आइये| होली सिर्फ रंग नहीं है| होली बाजार से गुजिया खरीदकर ले आने की औचारिकता का नाम भी नहीं है| समय के साथ हम सब यह करने लगे हैं, मगर यह अपने आप से और अपनी सामाजिक संस्कृति से खिलवाड़ है|

उन एक मंजिला मकानों की छतें कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ी होतीं| पड़ोसी की रसोई से केवल खुशबू आपके आँगन तक नहीं आती थी, आपके लिए दिल खोल बुलावा लाती थी| खुशियाँ सिर्फ परिवार के साथ चुपचाप ढ़ाबे पर खाना खाने का नाम नहीं थीं| वरक, पापड़ और न जाने क्या क्या मिलकर बना करता था| माँ गरीब पड़ोसियों के घर रवा सूजी की गुजियाँ उतने चाव से बनवा आतीं जितने चाव से वो हमारे घर मेवा मखाने की गुजियाँ बनवाने आतीं| दोनों के अपने स्वाद थे| हम बच्चे सूजी की गुजियाँ मांग कर लाते और दूध में गला कर उसकी खीर बना कर खाते| हर घर पकवान का स्वाद अलग होता, अलग मजा होता और अलग अलग वाह वाह होती| आज कितना नीरस है हर दूकान एक सा पकवान|

सुबह से नहीं, हफ्ते भर पहले से बुलावा लगता| दिन तय रहता| दूध वाले से अतिरिक्त दूध का दिन भी सब तय रखते| बाजार में मावा कम हो जाए मगर घरों में दूध बराबर आता –  दो पैसे से दूधिये अमीर नहीं बना करते| बड़े कमरे या बरामदे में जमीन पर गद्दे और चादर बिछतीं| मोहल्ले भर के चकले बेलन सजते| औरतें होली गातीं आतीं और उनके बीच रसिया छिड़ता| कभी कभी हंसी मजाक हदें छूने लगता और दिल उछालें भरता| बच्चे बारी बारी से गुजियाँ सुलाते| बाद में गुजियाँ सिंकना शुरू होती तो पूरे मोहल्ले बंटा करतीं|

नोट – यह आलेख बाजार से लाई गुजिया खाते हुए अपराध बोध में लिखा गया हो सकता है, आप भी इन भावनाओं को साँझा कर सकते हैं|

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होली में भरें रंग

जब कोई पटाखों के बहिष्कार की बात करे और होली पर पानी की बर्बादी की बात करे, तो सारे हिंदुस्तान का सोशल मीडिया अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए पगला जाता है| कुछ तो गली गलौज की अपनी दबी छिपी दादलाई संस्कृति का प्रदर्शन करने लगते हैं|

मगर हमारी दिवाली में दिये और होली में रंग गायब होते जा रहे हैं| बहुत से त्यौहार अब उस जोश खरोश से नहीं मनाये जाते जो पहले दिखाई देता था, तो कुछ ऐशोआराम (रोजीरोटी का रोना न रोयें) कमाने के दबाब में गायब हो रहे हैं| समय के साथ कुछ परिवर्तन आते हैं, परन्तु उन परिवर्तनों के पीछे हमारी कंजूसी, लालच, दिखावा और उदासीनता नहीं होने चाहिए|

दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबन्ध के विरोध में पिछली दिवाली इतना हल्ला हुआ कि लक्ष्मी पूजन और दिए आदि जैसे मूल तत्व हम भूल गए| मैं दिवाली पर दिवाली पर जूए, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण का विरोधी हूँ| प्रसन्नता की बात है कि रंगोली, लक्ष्मी पूजन, मिठाइयाँ, दिये (और मोमबत्ती), मधुर संगीत, आदि मूल तत्व वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण नहीं फैलाते| पटाखों और बिजली के अनावश्यक प्रकाश की तरह यह सब हमारी जेब पर भारी भी पड़ते|

यही हाल होली का है| पानी की बर्बादी पर हमें क्रोध हैं| पानी की बर्बादी क्या है? मुझे सबसे अधिक क्रोध तब आता है जब मुझे बच्चे पिचकारियों में पतला रंग और फिर बिना रंग का पानी फैंकते दिखाई देते हैं| अच्छा हो की इस पानी में रंग की मात्रा कम से कम इतनी हो कि जिसके कपड़ों पर पड़े उसपर अपना रंग छोड़ें| इस से कम पानी में भी अच्छा असर और प्रसन्नता मिलेगी| टेसू आदि पारंपरिक रंग का प्रयोग करें| इसमें महंगा या अजीब क्या हैं?

होली मेरा पसंदीदा त्यौहार हैं| पिचकारी लिए बच्चे देखकर मैं रुक जाता हूँ और बच्चों से रंग डालने का आग्रह करता हूँ| अधिकतर निराश होता हूँ| बच्चों को भी अपना फ़ीका रंग छोड़ने में निराशा होती है|

दुःख यह है कि जो माँ बाप दिवाली के पटाखों पर हजारों खर्च करते हैं, हजारों की पिचकारी दिलाते हैं, वो होली पर दस पचास रुपये का रंग दिलाने में दिवालिया जैसा बर्ताव करते हैं|

मेरे लिए उड़ता हुआ गुलाल और रंग गीले रंग से अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकी यह सांस में जाकर कई  दिन तक परेशान करता हैं| गीले रंग से मुझे दिक्कत तो होती है, परन्तु चाय कॉफ़ी पीने से इसमें जल्दी आराम आ जाता है| हर व्यक्ति को गीले और सूखे रंग में से चुनाव करने की सुविधा रहनी चाहिए| बच्चों के पास गीले रंग हो मगर सूखे रंग गुलाल भी उनकी पहुँच में हों, जिस से हर किसी के साथ वो प्रेमपूर्ण होली खेल सकें|

हाँ, कांजी बड़े, गुजिया, पापड़, वरक, नमकीन आदि पर भी ठीक ठाक खर्च करें| हफ्ते भर पहले से हफ्ते भर बाद तक नाश्ते की थाली में त्यौहार रहना चाहिए| व्यायाम और श्रम कम करने की अपनी आदत का दण्ड त्यौहार और स्वादेंद्रिय को न दें|

होली का संस्कृतितत्त्व

होली को जब भी रंगों का त्यौहार कहा जाता है, हम धर्म की बात नहीं, बल्कि संस्कृति की बात कर रहे होते हैं| होली, जैसा कि नाम से मालूम होता है – बुआ होलिका के दहन और भतीजे प्रहलाद के बच जाने का उत्सव है| यह होली की धार्मिक कथा है| रंगोत्सव के रूप में कृष्ण और राधा की होली का वर्णन अवश्य मिलता है| राधा कृष्ण और गोप-गोपियों की यह होली, धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि उस समय की सांस्कृतिक सूचना और उसके सांस्कृतिक अनुसरण की परंपरा मात्र है| यही कारण है, कृष्ण को गीता के कृष्ण के रूप में देखने वाले भक्त प्रायः मथुरा-वृन्दावन-बरसाना-नंदगाँव के कृष्ण को जानने समझने में विचलित रहते हैं| होली के राधा कृष्ण मानव मात्र के राधा कृष्ण हैं|

आज होली, धार्मिक अनुष्ठान नहीं, जनपरम्परा से मनाया जाने वाला त्यौहार है| जनमानस के लिए होलिकादहन का दिन पञ्चांग में दर्ज प्रविष्ठी मात्र है| त्यौहार का मूल और पूजा का मुख्य दिन होने के बाद भी, न छुट्टी की मांग है, न पूजा का विशेष आग्रह| होलिकादहन दहन का मुहूर्त प्रायः अखबारों की रद्दी का वजन बढ़ाता है| धार्मिक रूप से होली का उप-त्यौहार होने पर भी धूल का दिन बड़ी होली के नाम से सर्वमान्य है| इस बड़ी होली को लेकर ही सारी छुट्टियाँ, सारे तामझाम, कथा किवदंतियां हैं| यह सांस्कृतिक पर्व है, जो तकनीकि रूप से फिलोरा दौज (फाल्गुन शुक्ल द्वितीया से लेकर रंग पंचमी (चैत्र कृष्ण पंचमी) तक जाता है| यदि आप भोजन सम्बन्धी परंपरा पर ध्यान देंगे तो वरक, पापड़, बड़ियाँ, मंगोड़ी, कांजी, बड़े, गोलगप्पे की तैयारियां काफी पहले से शुरू हो जाती हैं|

यह पर्व है, धर्म हाशिये पर है और संस्कृति मुख्यधारा में| यह पर्व है जो आस्तिक नास्तिक हर्ष-उल्लास से मना सकते हैं|

कड़ाहे वाली होली

सिकंदराराऊ में होली के कड़ाहों के अलग अंदाज थे| हुलियारों की अलग अलग टोलियाँ शहर में गाती – बजाती गुलाल उड़ाती और रंग खेलती घूमतीं| मगर सबसे बड़ा आकर्षण रंग के बड़े बड़े कडाहों का था, जो शहर के अलग अलग इलाकों में रखे जाते थे|

इन कड़ाहों का होली पर इस्तेमाल के अलावा कोई और काम न था| ये हर बरस होली से पहले निकलते, साफ़ होते, मौज – मस्ती करते और फिर तहखाने में जाकर सोये रहते| ये कड़ाहे कुंभकर्ण के पुराने चेले चपाटे लगते| इन कड़ाहों को ज़रा सा हिलाने में भी दो चार लोग लगते और साफ़ करने का काम भी किसी त्यौहार से कम न होता| लोग इन की सफाई के लिए भी दिन तिथि तय करते, मोहल्ले में  बुलावा लगाते|

कड़ाहे की गहराई – चौड़ाई इसके मालिक के बड़प्पन और इसमें घोले गए रंग का गाढ़ापन उसके दिल में समाज के प्रति लगाव का गाढ़ापन बताना| बढ़िया गाढ़ा पक्का रंग हफ़्तों तक लोगों के दिल दिमाग और   शरीर पर चढ़ा रहता| टेसू का तैयार रंग गुनगुना ही कड़ाह में डाला जाता| बाद में लाल हरे रंग भी न जाने कब घोल दिए जाते| हुलियारे अभी इन कड़ाहों में खुद उतर जाते तो कभी थोड़ी ताकत और प्रेम से उतार दिए जाते| अगर जोर जबरदस्ती के बीच किसी का शरीर कड़ाहे के किनारों से टकरा जाता तो मन लिया जाता कि मर्जी का मामला नहीं है और वहां मौजूद बड़े तुरंत बीच में आ जाते| शायद ही कभी किसी के चोट लगी हो|

घूमना –फिरना, रंगना – रंगाना, खाना – पीना चलता रहता| गुजिये, अंदरसे नमकीन आदि चर्चा में रहते| छोटे शहर में सब लोग जानते कि किस घर में क्या बनता है और किस घर में पकवान का स्वाद उम्दा है| मगर होली खाने के साथ पीने का त्यौहार भी है| आज लोग शराब या भंग से काम चला लेते हैं मगर तब तक ठंडाई और कांजी का जबर दौर था| ठंडाई मंहगा और शाही शौक है| दूध, बादाम, केसर, सौंफ़, गुलाबजल की उम्दा ठंडाई पीने और पिलाने के लिए जिगर चाहिए| मगर शौक़ीन घरों में हमने बेहद बड़े बड़े भगौनों में ठंडाई का गंगा की तरह बहते देखा है| दरवाजे पर आये दुश्मन को भी मांग कर ठंडाई पीते और मेजबान द्वारा हाथ जोड़कर पिलाये जाते देखा है| भांग वाली ठंडाई की के चर्चे भी जोरदार रहते| कांजी भी कम नहीं हैं|

गाजर कांजी का चर्चा अपना जोर रखता| इसमें मौसम की तरावट और उर्जा का अपना योगदान होता है| बड़े बड़े मटकों में कांजी का आचार तैयार होता| जब तक प्रेम से कांजी न बने, इसका स्वाद नहीं आता| हमारे घरों मटकों में कांजी पड़ता| अगर कोई एक बार पीकर दोबारा न मांगे तो घर की औरतें थोड़ा सा खुद चखकर देखतीं कोई कमी तो नहीं आ गई|

होली; मिलने, खेलने, खाने और पीने का त्यौहार है| रंगना और भंगना इसका सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है| इस साल बहुत दिन बाद होली के बाद लम्बा सप्ताहांत है.. आइये.. रंगे, भंगे… गुलाल उड़ायें|

“I’m pledging to #KhulKeKheloHoli this year by sharing my Holi memories atBlogAdda in association with Parachute Advansed.

होली २०१४

 

 

रंग हम भारतियों के जीवन में हमेशा ही महत्वपूर्ण होते हैं| रंगीन कपड़े, रंगोली, रंगीन फूल मालाएँ, रंगीन मिजाज नेता सब हमारे जीवन के रंगमंच को इन्द्रधनुषी बनाते हैं| होली तो रंग का त्यौहार है| होली पर आप कोई भी रंग नहीं प्रयोग कर सकते हैं| रंग का चयन न सिर्फ आपकी सेहत के लिए महत्वपूर्ण है वरन आपके व्यक्तित्व की भी झलक दे सकता है|

हमारे यहाँ होली का चलन है कि आप जिस से जलते हों, चिड़ते हों, जो आप से ज्यादा समझदार हो, जो आप से आगे निकल गया हो, जिस से आप पिछड़ गए हों, जिस के कपड़े आप के कपड़ों से अच्छे हों, जिसका पति आपके पति से ज्यादा सुन्दर हो, जिस की पत्नी आप की पत्नी से ज्यादा चतुर हो, जिस का नया घर हो, जिस के नई राजनीतिक पार्टी हो, जो किसी दल – दल से बाहर हो, और जिसके पास बिना दारू वाले दोस्त हों; उस पर काला रंग लगाया जाये| उस के बाद अपने ही जैसे बौद्धिक, मानसिक, सामाजिक, राजनितिक और आर्थिक स्तर के कुछ लोगों के साथ.. मुँह काला, मुँह काला का नारा लगाया जाना चाहिए| बाकी लोगों को कर्ण प्रिय लगे इसके लिए बुरा न मानों होली है, होलिका मैया की जय, भारत माता की जय, वंदेमातरम् आदि नारे भी लगाये जा सकते हैं|

गहरे नील रंग का प्रयोग आपके व्यक्तित्व को सुधार सकता है, बशर्ते आप सवर्ण हों| नीला रंग आपको सभी समुदायों को साथ लेकर चलने वाला; अवसर की समझ रखने वाला, आपसी सामाजिक व्यवहार में विश्वास रखने वाला बना सकता है| परन्तु यदि आप गैर सवर्ण जाति से हों तो इस रंग से परहेज करें| इस रंग के प्रयोग से आपको कोई विशेष लाभ नहीं मिलेगा वरन लोग समझेंगे की आप जहाँ के तहाँ ही रह गए हैं|

यदि आप सवर्ण हिन्दू है तो आप हरे रंग का प्रयोग कर सकते है| यह रंग पर्यावरण के प्रति आपके प्रेम का उदगार है| हरे रंग का असर देर तक रहता है| यदि आप इस रंग के लिए मेहँदी या पालक का प्रयोग करें तो आपको अति बुद्धिमान भी समझा जा सकता है| परन्तु चीन देश से रंग आयात करने वाले लोग आपके ऊपर काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं|

मैं मुस्लिम समुदाय को हरे रंग के प्रयोग की सलाह नहीं दूंगा भले ही यह चीन से आयत हुआ हो या घर पर पालक पीस कर बनाया गया हो| इस से अजीब से बू आती है और केसरिया रंग के सांड भड़क सकते है| बल्कि भारतीय मुस्लिम को तो २०१४ के पहले पांच महीने हरी तरकारी जैसे मैथी, पालक, सरसों साग, सेम आदि का सेवन भी नहीं करना चाहिए| आप केसरिया रंग का प्रयोग सावधानीपूर्वक कर सकते है|

सवर्ण हिन्दू होने की स्थिति में आप केसरिया रंग का प्रयोग भली भांति कर सकते है| इस से आपके देश भक्त, समझदार होने का सबूत मिलता है|

दिहाड़ी मजदूर, आदिवासी और गरीब लोग लाल रंग के प्रयोग से बचें| इस रंग के प्रयोग से सांड भड़क सकते हैं| होली के आसपास तो आपको चोट भीं नहीं लगनी चाहिए वरना उसका लाल रंग आपके जीवन के लिए संकट हो सकता है|

आखिरी और महत्वपूर्ण सलाह है| किसी भी स्तिथि में टेसू के रंग का प्रयोग न करें वर्ना कोई भी आपको टेसू समझ सकता है|

होली की चुनावी शुभकामनाएं!!