गुनाहों का दैत्य


पता नहीं क्या कारण रहा कि कई सालों से मैं धर्मवीर भारती का लोकप्रिय उपन्यास “गुनाहों का देवता” पूरा नहीं पढ़ पाया| एक कारण शायद रहा कि जब भी मैं इसे पढ़ना या पुनः पढ़ना शुरू करता, अपने को सुकोमल भावनाओं के भंवर में पाता| मगर इसका फायदा यह भी है कि अब जब गुनाहों का देवता पूरी तरह ख़त्म करने का दृढ निश्चय किया तो माहौल अलग था|

भारत सरकार ने पिछले दिनों पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन यौन सम्बन्ध बनाने के कृत्य  को अपराध की श्रेणी में लाने से मना कर दिया| राष्ट्र के सभी प्रबुद्ध जन इसे अपराध की श्रेणी में लाने की मांग कर रहे है मगर देश में पुरुषवाद उसी तरह हावी है जिस प्रकार महिला आंदोलनों पर महिलावाद| क़ानून के दुरूपयोग, व्यावहारिक कठिनाइयाँ, एकतरफ़ा अपराध, और परंपरा के नाम पर घिनौने अपराध को प्रश्रय देने का जो प्रयास हाल में हुआ उतना तो शायद भारत में कभी नहीं हुआ हो|

ऐसे समय में गुनाहों के देवता का पाठ मुझे उस पड़ाव पर ले गया जहाँ शायद में अन्यथा नहीं पहुँच पाता| यह कालजई उपन्यास सालों पहले लिखी गई मध्यवर्गीय जीवन की एक पवित्र प्रेम कथा है| इसमें आदर्श का दामन थामने वाले पात्र घुटन का जीवन जीने हुए अपने जमीर को मारते और खुद मरने लगते है| प्रेम वास्तविकता की वेदी पर बलि हो जाता है| मगर यह उपन्यास वैवाहिक बलात्कार को हाशिये से उठाकर कथानक के मध्य में लेकर आता है|

“हाथों में चूड़े अब भी थे, पाँव में बिछिया और माँग में सिन्दूर – चेहरा बहुत पीला पड़ गया था सुधा का; चेहरे की हड्डियाँ निकल आयीं थीं और आँखों की रौशनी भी मैली पड़ गयी थी| वह जाने क्यों कमजोर भी हो गयी थी|”

यह तो वर्णन की शुरुवात है| भारती जी उपन्यास को लिखते समय वैवाहिक बलात्कार पर नहीं लिख रहे है इसलिए बहुत साधारण और तटस्थ वर्णन मिलता है मगर स्तिथि कि गंभीरता को समझा जा सकता है| यह उपन्यास उस लेखक ने लिखा है जो गहराई और गंभीरता से लिखता है मगर ग्राफ़िक डिटेल्स में नहीं जाता|

“हाँ सब यही समझते हैं, लेकिन जो तकलीफ है व मैं जानतीं हूँ या बिनती जानती है|” सुधा ने गहरी साँस लेकर कहा – “वहाँ आदमी भी बने रहने का अधिकार नहीं|”

एक भारतीय लड़की और कितना कह सकती है| शायद उसे दब कर बोलना ही सिखाया गया है| अगर वो बोलती भी है तो उसे क्या जबाब मिलता है वह और भी निंदनीय है|

“और जहाँ तक मेरा ख्याल है वैवाहिक जीवन के प्रथम चरण में ही यह नशा रहता है फिर किसको यह सूझता है| आओ, चलो चाय पीयें|”

मुझे इस बात की प्रसन्नता हो रही है कि इस बात में “मेरा ख्याल है” जोड़ा गया है| आज कल के सामाजिक धीर-वीर तो सीधे फ़तवा ही दे देते हैं| मगर ख्याल हक़ीकत नहीं होते| हक़ीकत कुछ और होती है| स्तिथि की भयाभयता का बयान करना कई बार बहुत कठिन होता है|

“मैं क्या करूँ, मेरा अंग – अंग मुझी पर व्यंग कर रहा है, आँखों की नींद ख़तम है| पाँवों में इतना तीखा दर्द है कि कुछ कह नहीं सकती| उठते बैठते चक्कर आने लगा है| कभी – कभी बदन काँपने लगता है| आज वह बरेली गए हैं तो लगता है मैं आदमी हूँ|”

वैसे तो उपरोक्त वर्णन पढ़ने में बहुत कुछ कहता है मगर हमारा पुरुषवाद “मार लेने”, “फाड़ देने” और “ऐसी – तैसी करने” की मर्दवादी परंपरा से बंधा होने के कारण इस वर्णन में मात्र पुरुष की मर्दानगी का गौरव ही देख सकता है| लेकिन एक बहुत महत्वपूर्ण टिपण्णी इस उपन्यास में सुधा करती है| यह टिपण्णी हिन्दू धर्म की आड़ लेकर देश भर में इस कृत्य को बढ़ावा देने वालों के मूंह पर तमाचा है|

“हिन्दू – गृह तो एक ऐसा जेल होता है जहाँ कैदी को उपवास करके प्राण त्यागने की भी इजाजत नहीं रहती, अगर धर्म का बहाना न हो|”

हमारे सामाजिक धीर – वीर कह सकते है कि अलां और फलां के बारे में कुछ क्यों नहीं कहा| उत्तर सिर्फ इतना है कि पात्र हिन्दू है और अपने धर्म के बारे में ही तो बोल सकते हैं| अगर किसी को इस से संतोष नहीं होता तो उनसे विनती है कि सरकार ने हिन्दू धर्म की आड़ लेकर ही तो इस कृत्य को अपराध घोषित करने से मना किया है| क्या हम सरकार से कहेंगे कि हिन्दू धर्म की आड़ लेकर ग़लत कार्यों को बढ़ावा न दें?

उपन्यास में इस बात की भी बानगी मिलती है कि इंसान जब इंसानियत से गिरना शुरू करता है तो कितना गिरता चला जाता है| सुधा का गर्भपात हो गया है| बचने की उम्मीद नहीं है| बार बार बेहोशी आ रही है| इसी क्रम में उसके मूंह से निकलता है|

“अब क्या चाहिए? इतना कहा, तुमसे हाथ जोड़ा, मेरी क्या हालत है? लेकिन तुम्हे क्या? जाओ यहाँ से वरना मैं अभी सर पटक दूँगी…”

पता नहीं वैवाहिक बलात्कार इस उपन्यास के केंद्र में क्यूँ नहीं दिखाई पड़ता| मुझे एक बार लगा कि भारती जी एक बहुत ही बड़ी टिपण्णी इस उपन्यास के माध्यम से वैवाहिक बलात्कार पर करना चाहते होंगे मगर उस समय उन्हें यह बात सामाजिक और राजनितिक रूप से समय से सदियों पहले की बात लगी होगी| अगर “गुनाहों का देवता” “गुनाहों के दैत्य” को केंद्र में रख कर लिखा गया होता तो शायद प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची में कहीं पड़ा होता| उन्हें मंटो और चुगताई की तरह कोसा जाता| मगर यह उपन्यास बताता है कि वैवाहिक बलात्कार की बात भारत में कोई आयातित बात नहीं है| बार बार उठती रही है और तब तक उठेगी, उठती रहेगी  जब तक यह अपने अंजाम तक नहीं पहुँचती|

 

वो उधार वापिसी…


आज कल के हिसाब से तंगहाली का जमाना था, जिसे नए नए बुढ्डे सस्ते का जमाना भी कह सकते हैं| लोगों की इज्ज़त पैसे से नहीं उसके दुआ – सलाम करने के क़ायदे से होती थी| ये तो वही बातें हैं, जिन्हें हम हर गुजरे ज़माने के लिए लिखते कहते हैं|

हर बुधवार और शुक्रवार को मोहल्ले के बच्चे शाम को एक घर में इकठ्ठे होते थे और दूरदर्शन पर रामायण देख कर लोग रोया या हंसा करते थे| कच्ची धूप वाली लड़कियां हमें पसंद आया करतीं थीं| उस समय कंप्यूटर बड़ी बड़ी कंपनियों और विश्वविद्यालयों में पाया जाता था, सरकार देश भर में कंप्यूटर लगा कर हर गरीब को बेरोजगार कर देना चाहती थी| इसी सिलसिले में हमारे सरकारी स्कूल में भी “टाइपराइटर पर टीवी वीसीआर” लगाकर रखा गया था (हम सब कंप्यूटर को ऐसे ही समझ पाते थे)| हमारे सरकारी स्कूल में फर्नीचर टूट टूट कर गोदाम में जमा हो रहा था| मेरी कक्षा में हिन्दू और मुस्लिम, अगड़े तगड़े, पढ़ते थे| ग़रीब, गंवार, पिछड़े, और निठल्ले दूसरे सेक्शन में थे|  मैं अलीगढ़ का नौरंगीलाल राजकीय इन्टर कॉलेज में छठी या सातवीं कक्षा में पढ़ता था|

मैं उन गिने चुने बच्चों में से था जिन्हें हर रोज घर से चार या आठ आने मिला करते थे| बाकी सब पांच या दस नये पैसे वाले थे| हम जिन्हें चार आने मिलते थे वो हमेशा घर का खाना लाते थे और दूसरों के साथ शेयर भी करते थे| उस समय घर से पानी लेन का चलन नहीं था| अजीब बात यह थी कि जिन्हें पंजी या दस्सी मिलती थी वो हफ्ते में एक दो बार ठेल पर से चार आने के छोले या आठ आने का चीला खाया करते थे| फरबरी का महीना और बदलता मौसम था| मास्टर लोग पढ़ाने छोड़कर अपनी बोर्ड एग्जाम की ड्यूटी लगवाने में लगे थे|

उस ज़माने में हमारी फीस छः नए पैसे से बढ़ा कर दस पैसे होकर शायद आठ पैसे महीने पर टिक गयी थी| फीस विरोधी छात्र आन्दोलन ख़त्म हो चुका था| अगर बहुत से बच्चे या तो जब पैसे होते थे तो क्लास टीचर खां साहब के पास एडवांस फीस जमा कराते थे या कई बार फीस न दे पाने के कारण हर तीसरे महीने नाम कटवाते थे| खां साहब किसी की फीस अपने खाते से जमा नहीं करते थे| उनके पास एडवांस जमा का खाता था, मुसलमान थे इसलिए न उधार जमा करते थे, न लेते थे, न देते थे|

उधार पैसे देना मेरा काम था, हर महीने पच्चीस तारीख को मैं अपने पास के सारे सिक्के लाता था और उधार बांटता था| इसका हिसाब खां साहब ख़ुशी और नेक नीयत से खुद रखते थे|

वो एक मुस्लिम लड़का था, पिछड़ा था और गरीब भी| अगड़ों की तरह उसके पिता नहीं थे बाप था, जिसे वो प्यार से अब्बा और इज्ज़त से अब्बाजान कहा करता था| तीन नहीं से फीस नहीं दे पाया था और पूरे पूरे चौबीस पैसे फीस बकाया हो चुकी थी| अपना नाम पुकारे जाने पर उसने मेरी तरफ़ देखा और पाने चार आने बढ़ा दिए| फ़ीस जमा हो गई| उसका सर चकरा रहा था| हाथ फैलाना और इज्ज़त उतार कर सड़क पर रख देना एक बात थी| क्लास के सभी बच्चों के सामने खां साहब ने ताकीद की, ये उधारी किसी को बताना मत| वो दिन भर नहीं बोला, अगले दिन से स्कूल नहीं आया| हफ्ता बीत गया|

सुबह का वक्त था| स्कूल से 200 मीटर दूर घंटाघर पर साईकिल पकड़े तहमद कमीज़ पहने दढ़ियल शख्स ने आवाज़ दी, जनाब गहराना साहिब| मैंने पीछे मुड़ कर देखा| गहराना साहिब, यानि मेरे पिता तो जा चुके थे और कोई दूसरे गहराना साहिब भी वहां नहीं थे| मैं आवाज़ की तरफ़ देखने लगा| आजकल का ज़माना होता तो शायद मैं भाग खड़ा होता और हनुमान चालीसा पढ़ रहा होता|

“जनाब गहराना साहिब, आप से ही काम है” उन्होंने कहा| साइकिल के लट्ठे पर बैठे बच्चे ने भी ओढ़ी हुई लोई से बाहर झाँका| “ये लीजिये आपके पैसे, इसकी तरफ़ मत देखिये, इसको पीलिया बिगड़ गया है| मेडिकल ले जा रहा हूँ|” मैंने वो चवन्नी नहीं पकड़ी|

“ले लीजिये, ये मुसलमान है, इसे इसी जिन्दगी में चुकाना है| आगे मुलाकात हुई या नहीं| खुदा जाने|” (उन दिनों खुदा ही होता था, अल्लाह को मैं नहीं जानता था शायद|) वो शख्स आंसू पौछ रहा था| बाप था न|

मैंने पैसे ले लिए| उसने सर पर हाथ रख कर मेरी सलामती की दुआ की और चला गया| मैंने घंटाघर से बाबा बरछी बहादुर की मज़ार तक चार सौ मीटर की दौड़ लगाई| अन्दर जाती हुई एक औरत के हाथ ओर वही चवन्नी रखी, “आंटी इसे चढ़ा देना”|

प्रधानमंत्री!!


 

भारतीय हिंदी समाचार चेनल पर प्रसारित किया जा रहीं नायब वृत्तचित्र श्रंखला| विश्व के श्रेष्ठ निर्देशक श्री शेखर कपूर इसके प्रस्तुतकर्ता हैं|

२३ किस्तों में प्रसारित होने वाली इस श्रृंखला की छह क़िस्त हम देख चुके हैं|

किस तरह आजादी के समय देश में ५६५ स्वशासित रजवाड़ों को भारत या पकिस्तान में मिला कर ५६६ राजनैतिक इकाइयों को जोड़ कर दो इकाइयों में तब्दील किया गया| किस तरह धर्म नहीं वरन राजनीति देश का बंटवारा करा रही थी या कहें कि धर्म द्वारा बांटे जा रहे देश को राजनीति मिला रही थी| अलग ही कथा है| सयुंक्त भारत उस दिन से पहले एक विचार था जिसको अब तक का सबसे बड़ा अमली जमा पहनाया गया था| हमने इस कथानक में देखा| हिन्दू जोधपुर पाकिस्तान में जा सकता था, क्या विचित्र राजनीति थी| बहुत सी सच्चाइयाँ आज कोई दुहराना नहीं चाहता| जोधपुर, जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर केवल कथा नहीं है देश का वो बंटा हुआ चरित्र है, जो आज भी भारत को अपने मानसिक पटल पर, बिहारी, मराठी या फिर हिन्दू मुस्लिम या ब्राह्मण- वैश्य के बाद रखता है|

एक ओर देश को जोड़ा जा रहा था| दूसरी तरफ अलग अलग राज्यों की मांग उठ रही थी| निश्चित ही भारतीय संस्कृति, बहुत सारी संस्कृतियों का संगम है और हर संस्कृति को अपनी अलग पहचान मिलनी चाहिए| मगर यह भी सच है कि हर घर परिवार की अपनी अलग संस्कृति, सांस्कृतिक पहचान होती है| कितने राज्य, किस पैमाने पर|

प्रश्न अनेक थे और हैं| हिन्दू कोड बिल!! उस समय उसका हिन्दू समाज में बड़ा विरोध हुआ, आज देश में हिन्दू समाज उन बातों पर गर्व करता है जिनका उस समय विरोध हुआ था| उदहारण के लिए, एकल विवाह.. आज हिन्दू मुस्लिम कानून में चार विवाहों की मान्यता मात्र का विरोध करते है और मजाक उड़ाते हैं| मेरे मन में कई बार प्रश्न उठता है, क्या सब के लिए समान संहिता न लाकर देश में मुस्लिम और अन्य तबकों को विकास के क्रम में पीछे नहीं छोड़ दिया गया है?

भारत चीन युद्ध भी ऐसी ही एक कथा है| भारतीय राजनीति, कूटनीति और युद्ध नीति की पहली बड़ी परीक्षा| नवविकसित देश गलती से ही सीखता है; हमने सीखा जरूर मगर क्या आज हम अपने बड़े हो जाने के गरूर में कुछ भुला तो नहीं रहे है|

कस कर बुनी हुई कहानी, संजीदगी से किया गया प्रस्तुतीकरण, आवश्वकता के अनुरूप नाट्य रूपांतरण प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी सफलता है| शेखर कपूर अपने हर शब्द से न्याय करते दिखाई देते हैं|

 

यह केवल भारत के सामाजिक इतिहास की गाथा नहीं है, देश के आगे बढ़ने की उधेड़बुन है|