मल्लिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ


मनीषा कुलश्रेष्ठ का मल्लिका ऐतिहासिक ताने बाने में बुना साहित्यिक पृष्ठभूमि का उपन्यास है| इस उपन्यास की नायिका मल्लिका के बारे में हिंदी में हमेशा चर्चाएँ रहीं हैं और उनके बारे में गंभीरता से छपता भी रहा है| परन्तु उनके बारे में बहुत कम वर्णन मिलता है| यह विडंवना है कि शुद्धतावादी भारतीय समाज हिंदी की प्रथम महिला साहित्यकार और अनुवादक मल्लिका का नाम बड़ी आसानी से भुला देता है| यह जानकारी तो मिल जाती है कि हरिश्चंद पत्रिका का नाम हरिश्चंद चन्द्रिका रख दिया गया था परन्तु चन्द्रिका यानि मल्लिका के बारे में हम मौन हो जाते हैं| दुर्भाग्य है कि हिंदी की प्रथम महिला होने का गौरव रखने वाली इस स्त्री को हम भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रेमिका के आगे कोई परिचय नहीं दे पाते| प्रसंगवश कह दूँ कि हम प्लासी युद्ध में अंग्रजों के सहायक रहे अमीचंद के प्रपोत्र होने के लिए आज तक हरिश्चंद के पक्ष विपक्ष में चर्चा कर लेते हैं परन्तु मल्लिका के बारे में कोई चर्चा भी नहीं होती|

कहा सकता है कि यह उपन्यास उस महिला के बारे में है जिसने हिंदी में बंगला उपन्यासों का अनुवाद कर कर इस विधा से न सिर्फ हिंदी का परिचय करवाया, साथ ही हिंदी का पहला मौलिक उपन्यास –  कुमुदनी – भी लिखा|

इस उपन्यास में मनीषा कुलश्रेष्ठ में मल्लिका के सामाजिक और साहित्यिक पक्ष को उभारने का प्रशंसनीय प्रयास लिया है| स्पष्टतः यह प्रयास जानकारियों के अभाव के चलते साहित्यकार मल्लिका के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाया है| परन्तु मेरा मानना है कि मल्लिका खुद भी अपने जीवन संघर्ष में अधिक नहीं टिक पाई| उस समय का समाज, देशकाल और घिसीपिटी परम्पराएँ हिंदी, राष्ट्र और स्वयं मल्लिका के लिए भारी पड़ीं| उन स्तिथियों में यह उपन्यास उनके समय के संघर्षों को उभारने में सक्षम रहा है|

उपन्यास में निजी वर्णनों में सच्चाई का पुट ढूँढना बुद्धिमत्ता नहीं होगी| लेखिका ने उपलब्ध जानकारियों के आधार पर उन्हें वास्तविकता के साथ गढ़ा है और स्वाभाविकता प्रदान की है|

आम पाठक और हिंदी प्रेमी के लिए यह उपन्यास वरदान की तरह है जो उस समय के भाषाई संघर्षों, सामाजिक अवचेतना, सामाजिक पुनर्निर्माण, व्यक्तिगत और राजनैतिक विरोधाभासों को स्पष्टतः रेखांकित करने में सफल रहा है| यह उपन्यास एक बार में पूरा पढ़ लिए जाने ले लिए पाठक को प्रेरित करता है|

जिन पाठकों को अमीचंद, बंकिमचन्द्र, ईश्वरचंद विद्यासागर, भारतेंदु हरिश्चंद, हिंदी के आदिकाल के बारे में समुचित जानकारी है, उनके लिए इसे पढ़ना और गुनना बेहद रुचिकर है|

मल्लिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ

 

पुस्तक – मल्लिका
लेखक – मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक – राजपाल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – उपन्यास
इस्ब्न – 9789386534699
पृष्ठ संख्या – 160
मूल्य – 235 रुपये
यह अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

उर्दू जुबां हमारी…


हर हिंदी बोलने वाले, खासकर उर्दू को पराया मानने वाले को सामान्य उर्दू जरूर आती है| यह भी कह सकते है कि उर्दू में पलने बढ़ने वाले हर हिन्दुस्तानी को सामान्य हिंदी जरूर आती है| आखिर इन दोनों भाषाओँ का रिश्ता ही कुछ ऐसा है कि बिना दोनों भाषाएँ जाने आप दूसरी को सही से नहीं जान सकते| वर्ना आपको पता कैसे चलेगा कि दूसरी भाषा से कैसे बचा जाए|

इन दोनों भाषाओँ में गुत्थी इस तरह उलझी है कि पता नहीं चलता कि आम बोलचाल में कौन हिंदी बोल रहा हैं या कौन उर्दू| अक्सर माना जाता है की अगर प्रोफ़ेसर साहब ने संस्कृत पढ़ी है तो वो हिंदी बोल रहे हैं और अगर अरबी-फ़ारसी पढ़ी है तो उर्दू|

कई बार लोग यह जानने के लिए कि बोलने वाला हिंदी बोल रहा है या उर्दू, उस से लिखवाकर देखते हैं| अगर देवनागरी लिपि में लिखा तो हिंदी और नश्तालिक़ में लिखा तो उर्दू| मगर मोबाइल के ज़माने में मामला थोड़ा पेचीदा हो गया है| नए लोग रोमन में लिखते हैं| अगर अंग्रेज बहादुर आज होते तो रोमन हिंदी या रोमन उर्दू के लिए शायद कोई नया नाम देते और हम उसे भी एक भाषा मान लेते| कई बार सोचता हूँ कि क्या लिपि बदलने से भाषा का नाम बदल जायेगा| किसी ज़माने में हिंदी कैथी लिपि में और पिछले ज़माने में संस्कृत ब्राह्मी में लिखी जाती थी| उस से भी पहले संस्कृत और अवेस्ता (पुरानी फ़ारसी) एक ही लिपि में लिखे जा रहे थे और उनके शब्द में एक दुसरे में घुले-मिले थे|

आज पंजाबी गुरुमुखी और शाहमुखी में लिखी जाकर भी एक भाषा है| खुद भारत में सिन्धी, एक साथ देवनागरी और अरबी लिपि में लिखी जा रही है| भारतीय प्रशासनिक सेवा में सिन्धी और संथाली भाषाओँ के प्रश्नपत्रों के लिए दो लिपियाँ तय की गई हैं|

वास्तव में हिंदी-उर्दू का झगड़ा ब्रिटिश इंग्लिश और अमेरिकन इंग्लिश के झगड़े से कहीं अलग नहीं है| मगर जिस तरह उर्दू को भारतीय नेताओं ने थाली में सजाकर पाकिस्तान को दे दिया है, उस तरह अमेरिकन इंग्लिश को थाल में सजाकर नहीं दिया गया है|

बिंदी तेरे बिन


हर साल हमारे समाचार पत्रों में एक खबर छपती है – इस साल ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी ने फलां फलां भारतीय शब्द को अंग्रेजी में शामिल किया| हम खुश हो जाते हैं| हम अपने शब्द की महानता समझते हैं मगर यह भूल जाते हैं कि उन्हें अपने में शामिल करने वाली जुबान दिल कितना बड़ा होगा| अंग्रेजी की इस तारीफ पर हम असहमत हो सकते हैं मगर अंग्रेजी एक बेहद छोटी छोटी जुबान से दुनिया में सबसे बड़ी जुबान में तब्दील हुई है| साम्राज्यवाद के पतन के बाद भी आज अंग्रेजी लगातार बढ़ रही है|

हर कुछ महीनों में हमारे समाचार – पत्रों में एक और खबर छपती है जिसमें उर्दू का नाम निशान मिटाने की बात होती है| यह जो उर्दू की बात होती है, ये दरअसल फ़ारसी की बात होती है| अगर सही कहे तो उस फ़ारसी की बात होती है, जिसपर अरबी प्रभाव पड़ा है| पुरानी फ़ारसी और संस्कृत एक परिवार की भाषाएँ है, अवेस्ता फ़ारसी और वैदिक संस्कृत के तमाम शब्द एक ही मूल से निकले हैं| यह निष्कासनवाद हिंदी को कमजोर करता है| आज निष्कासनवाद हिंदी की दुखद पहचान बन रहा है|एक वक्त हिंदी-उर्दू से बड़ी भाषाएँ रहीं ब्रज और अवधी को हिंदी वाले आज तिरस्कार और निष्कासन के भाव से देखते हैं वह हास्यास्पद है| हिंदी के इस तिरस्कार से पल-बढ़कर भोजपुरी एक बोली से बढ़कर विकसित भाषा का रूप लेने लगी है| जब भी हिंदी भाषा क्षेत्र की कोई पुरानी या नहीं भाषा या बोली आगे बढती हैं, हिंदी वालों की हिराकत बढ़ने लगती है| जहाँ अंग्रेजी दुनिया भर के शब्दों के साथ अपने को समृद्ध कर रहीं है, हिंदी अपने प्रभाव क्षेत्र में झुइमुई बन रही है|

आम बोलचाल हिंदी और उर्दू में फिलहाल कोई खास फर्क नहीं दिखता , मगर हिंदी से उर्दू या कहिये फ़ारसी शब्दों को निष्काषित करने के मुहिम चल रही है| हिंदी के ऊपर कठोर तत्सम भाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| आज की हिंदी को बिंदी से बड़ी नफ़रत होती है| हालत तो यह हैं कि  क़, ज़, फ़, ख़ की बिंदियाँ ही नहीं ढ़, ङ, ड़, बिंदियाँ भी गायब हो रहीं है| दुःख का विसर्ग कब और कहाँ जा उड़ा, यह तो हिन्दी वाले खुद भी नहीं बता सकते| यह निष्कासन भाषा के विकास के नाम पर हो रहा है| क्या भाषा को छोटा करते जाना उसका विकास है?

होना यह चाहिए था कि हिंदी वाले अपने बड़े बड़े शब्द कोष बनाते| हिंदी शब्द कोशों में ब्रज, अवधी भोजपुरी के सभी कामकाजी शब्द शामिल किये जाते| क्या हिंदी परिवार की सभी भाषाएँ मिलकर हिंदी को बड़ा नहीं कर देतीं|

जो लोग हिंदी में स्नेह शब्द का सही प्रयोग नहीं कर सकते, वो लोग मोहब्बत मिटाने में लगे हैं|

इसकी हिंदी क्या है?


समाचार के अनुसार, एक व्यक्ति ने वित्तमंत्री अरुण जेटली से “बुलेट ट्रेन” की हिंदी पूछ ली| हिंदी वालों में हिंदी पूछ लेना उनता ही सामान्य हो चला है, जितना अंग्रेजी वालों का हर भाषा के शब्द उठाकर अंगीकार और आत्मसात कर लेना| हर बात की हिंदी करवाना गुलाम मानसिकता की पराकाष्ठा का प्रतीक है| हिंदीवादी लोग भाषा के स्वतंत्र व्यकित्त्व की चाह में हिंदी को मात्र संस्कृतनिष्ठ शब्दों समेट देना चाहते हैं| इस प्रकार हिंदी को संस्कृत की उपभाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| संस्कृत निष्ठता के पीछे फ़ारसी शब्दों को नकारने की भावना से प्रारंभ होकर अब अंग्रेजी शब्दों को नकारने तक जा पहुंची गई है| विरोध की यह भावना इस तथ्य को भी नकारती है कि फारसी और संस्कृत एक ही स्रोत को भाषाएँ हैं|

अंग्रेजी से पहले फ़ारसी विश्वभाषा के दर्जा रख चुकी है| फ़ारसी के प्रसार में उन पारसियों और ईरानियों  का हाथ कम रहा, जिनकी मूल रूप से यह भाषा है| भारत में आये अरब, तुर्क, अफगान, मंगोल, मुग़ल आदि सबने फ़ारसी को सामान्य और राजनितिक जीवन में अधिक महत्व दिया| कारण शायद यही है कि फ़ारसी में अंगीकार, आत्मसात और समाहित करने की भावना और क्षमता अधिक रही| यही स्वीकार वृत्ति एक समय में छोटे से समूह की भाषा मानी जाने वाली अंग्रेजी को विश्वभाषा बनाने में सफल रही| आज अंग्रेजी उन देशों में भी स्वीकार है जहाँ उनके लोगों का राज नहीं रहा था|

आज भारतीय समाज इस बात की चर्चा करता है कि अंग्रेजी में कितने भारतीय मूल के शब्द हैं| क्या अंग्रेजी उन भारतीय शब्दों को अपना पाती, अगर वह अपने रोमन या ग्रीक मूलों से अपने लिए शब्द गढ़ने में समय नष्ट करती| अपने भाषा मूलों से शब्द गढ़ना गलत नहीं है| परन्तु इसे हास्यास्पद नहीं हो जाना चाहिए| शब्द सरल और सर्वस्वीकार होने चाहिए| लोहपथगामिनी जैसे शब्द स्वीकार नहीं हो पाए| परन्तु इस प्रकार के शब्दों के कारण सरकारी हिंदी और साहित्यिक विश्व की सबसे दुरूह भाषाओँ में से एक बन चुकी हैं|

अगली बार अगर आपको किसी शब्द की हिंदी न आये तो शेम्पू के स्थान पर मूल भारतीय चम्पू का प्रयोग करने का प्रयास करें| बुलेट ट्रेन की हिंदी उसके बाद ढूंढेंगे| जैसा जेटली बुलेट ट्रेन की हिंदी पूछे जाने पर कहते हैं, “थोड़ा गंभीर होने का भी प्रयास कीजिये”|

 

हिंदी में विनम्रता


Please, remove your shoes outside.

इस अंग्रेजी वाक्य का सही हिंदी अनुवाद क्या है?

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार|
  2. अपने जूते बाहर उतारें|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें|
  6. भगवान् के लिए अपने जूते बाहर उतार लीजिये|
  7. जूते बाहर उतार ले|
  8. जूते बाहर उतार ले, प्लीज|

हम हिन्दुस्तानियों पर अक्सर रूखा होने का इल्जाम लगता है| कहते हैं, हमारे यहाँ Please या Sorry जैसे निहायत ही जरूरी शब्द नहीं होते|

अक्सर हम तमाम बातों की तरह बिना सोचे मान भी लेते हैं| अब ऊपर लिखे वाक्यों को देखें|

हमारे क्रिया शब्दों में सभ्यता और विनम्रता का समावेश आसानी से हो जाता है तो रूखेपन का भी| हम प्लीज जैसे शब्दों के साथ भी रूखे हो सकते हैं और बिना प्लीज के भी विनम्र| आइये ऊपर दिए अनुवादों को दोबारा देखें|

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार| यह एक शाब्दिक अनुवाद है और किसी भी लहजे से गलत नहीं हैं| मगर हिन्दुस्तानी सभ्यता के दायरे में यह गलत हैं क्योकि “उतार” में अपना रूखापन है जो प्लीज क्या प्लीज के चाचा भी दूर नहीं कर सकते|
  2. अपने जूते बाहर उतारें| यहाँ प्लीज के बगैर ही आदर हैं, विनम्रता है| क्या यहाँ प्लीज के छोंके के जरूरत है? इसके अंग्रेजी अनुवाद में आपको प्लीज लगाना पड़ेगा|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये| क्या कहिये? ये तो आप जानते हैं कि इसमें पहले वाले विकल्प से अधिक विनम्रता है| अब इनती विनम्रता का अंगेजी में अनुवाद तो करें| आपको शारीरिक भाषा (gesture) का सहारा लेना पड़ेगा, शब्द शायद न मिलें|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा| हम तो लखनऊ का मजाक उड़ाते रहेंगे| यहाँ आपको अंग्रेजी और शारीरिक भाषा कम पड़ जायेंगे| उचित अनुवाद करते समय कमरदर्द का ध्यान रखियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें| क्या लगता है यह उचित वाक्य है| इसमें अपना हल्का रूखापन है| आपका संबोधित व्यक्ति को अभिमानग्रस्त या उचित ध्यान न देने वाला समझ रहे हैं और कृपा का आग्रह कर रहे हैं| यदि यह व्यक्ति आपके दर्जे से काफी बड़ा नहीं है तो यह वाक्य अनुचित होगा|
  6. कृपया, अपने जूते बाहर उतार लीजिये| लगता है न, कोई पत्नी अपने पति के हल्का डांट रही है|
  7. जूते बाहर उतार ले| यह तो आप अक्सर अपने बच्चों, छोटों और मित्रों को बोलते ही है| सामान तो है ही नहीं|
  8. जूते बाहर उतार ले/लें, प्लीज| यह विनम्रता है या खिसियानी प्रार्थना| हिंदी लहजे के हिसाब से तो खीज ही है|

वैसे आप कितनी बार विकल्प दो तीन और चार में कृपया का तड़का लगाते हैं?

हिंदी स्वर


से अनार, से आम
पढ़ले बेटा, आएगा काम।

से इमली, से ईख,
मम्मी देती, हमको सीख।

से उल्लू, से ऊन,
ज्ञान बढ़े दो गुणा दून।

ऋषि ज्ञान का दान,
कृषि बिना न होवे खान।

से एकम, की ऐनक,
आंख बिन न रंग रौनक।

ओखली, से औरत,
जोर से बोलो सुनले छत।

अं से अंग, अः पर अतः,
स्वर में जोड़े छः भई छः।

 

अकबर


अकबर का दौर अजीब हालत का दौर था| एक बदहवास सा मुल्क सकूं की तरफ बढ़ता है| अपनी लम्बी पारी से भी और बहुत लम्बी पारी खेलने की चाह में अबुल मुज़फ्फर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह ने अपनी हालत कुछ अजीब ही कर ली थी| यह उपन्यास उस “हालत –ए – अजीब” से शुरू होता है, जिसमें बादशाह सलामत कह उठे थे – “गाइ है सु हिंदू खावो और मुसलमान सूअर खावो|” यह वो शब्द है जिनको मूँह से निकलने पर तब और आज सिर्फ जुबां नहीं, सिर कट सकते हैं, और तख़्त बदल उठते हैं| यह वो बादशाह अकबर है, जिन्हें न सिर्फ पूर्व जन्म में शंकराचार्य के श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में जन्मे मुकुंद ब्राह्मण का अवतार बताया गया बल्कि जो खुद “अल्लाहो अकबर” को नए अर्थ देने की कोशिश में पाया गया| यह वो अकबर बादशाह है जो बाद में “दीन – ए- इलाही” की शुरुआत करता है और छोड़ सा देता है| वह बादशाह अकबर जो, “जैसे जिए वैसे मरे| ना किसी को पता किस दीन में जिए, ना किसी को पता किस दीन में मरे|”

यूँ; पुस्तक को पढ़ने और पसंद करने के बाद भी इसकी विधा के बारे में सोचना पड़ता है | हालांकि लेखक प्रकाशक इसे उपन्यास कहते हैं| मैं इसे ऐतिहासिक विवरण कहूँगा| हम सबको पढ़ना चाहिए| हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास बहुत है| शाज़ी ज़मां का “अकबर” इतिहास का पुनर्लेख है जिसे औपन्यासिकता प्रदान करने का कठिन प्रयास लेखक ने किया है| वो कुछ हद तक सफल होते होते असफल हो जाते हैं| असफल इसलिए कि आप पाठक इस से ऊब जाता है| तमाम प्रसंगों में सन्दर्भों की भरमार है| बकौल शाज़ी ज़मां, “इस उपन्यास की एक-एक घटना, एक-एक किरदार, एक-एक संवाद इतिहास पर आधारित है|”

समय, सनक और समझ से जूझते अकबर बादशाह की टक्कर पर हिंदुस्तान में डेढ़ हजार साल पहले सम्राट अशोक का जिक्र आता है| इन दो से बेहतर नाम महाकाव्यों में ही मिल सकते हैं| अकबर की जिन्दगी के ऊँचे नीचे पहलू इस विवरण में आए है जिनमें से एक को, इस पुस्तक को बाजार में बेचने के लिए भी उछाला गया था – अकबर के मूंह से निकली एक गाली जिसे तमाम हिंदुस्तान आज भी देता है| पुस्तक अकबर को उसके समकालीन लेखकों और इतिहासकारों के नज़रिए से हमारे सामने रखती है| अकबर के समकालीन इतिहास की जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण विवरण प्रदान करती है| साथ है, हिंदुस्तान का अपना माहौल आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है इसे समझा जा सकता है|

यह विवरण उपन्यास तो नहीं बन पाया है साथ ही उन महत्वपूर्ण बातों से नज़र चुराता सा निकल गया है जिन्हें इसके पत्रकार – इतिहासकार लेखक छु सकते थे| मसलन अकबर के हिंदुस्तान का फ़ारस, तुर्की, पुर्तगाल और पोप के साथ रिश्ता तो चर्चा में आता है; मगर उन हालत के बारे में टीस छोड़ जाता है जो तुर्की और इस्लाम के यूरोप और ईसाइयत से रिश्ते की वजह से पैदा हुए थे और नतीजतन हिंदुस्तान और दुनिया की तारीफ में बहुत उठापटक हुई| अकबर के जाने के बाद का दौर, धर्मतंत्र और राजतन्त्र के कमजोर होने का दौर भी था जिसने बाद में संविधानों और राष्ट्रों के लिए रास्ता खोल दिया था|

कुल मिला कर किस्सा यह शेख़ अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा और मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के ख़ुफ़िया मुन्तखबुत्तावारीख के इर्द गिर्द बुना गया है और इसमें तमाम लेखकों और इतिहासकारों की लिखत को रंगतभरे खुशबूदार मसालों के साथ परोसा गया है|

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पुस्तक – अकबर

लेखक – शाज़ी ज़मां

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2016

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-2953-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

 

इश्क़ का माटी होना


“लप्रेक” युवा प्रवासियों और महानगरीय स्वप्नरत युवाओं में लोकप्रिय साधारण साहित्य है जिसमे उबाऊ साहित्यिक हिंदी पंडिताऊपन नहीं बल्कि प्रेम का नया नजरिया है| लप्रेक श्रृंखला की दूसरी पुस्तक मेरे हाथ में है  – “इश्क़ में माटी सोना”| यह रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” से भिन्न है और अलग पाठ का आग्रह रखती है| दोनों लप्रेक में विक्रम नायक अपने रेखाचित्रों के सशक्त परन्तु नवीन कथापाठ के साथ उपस्तिथ हैं|

गिरीन्द्रनाथ कॉफ़ी के झाग में जिन्दगी खोजने की कथा कहते हैं, गिरीन्द्रनाथ जिन्दगी की कथा को जोतते हुए कहते हैं| गिरीन्द्रनाथ कहीं भी रेणु नहीं हुए हैं मगर रेणु का रूपक उनके समानांतर चलता है| गिरीन्द्रनाथ रवीश भी नहीं हुए है मगर रवीश की शैली से अलग समानांतर चलते हैं| अगर आप रेणु और रवीश के लिए गिरीन्द्रनाथ को पढ़ते हैं तो आप ख़ुद से न्याय कर पाते| गिरीन्द्रनाथ चकना और दिल्ली के भरम जीते तोड़ते और जीते हैं|

गिरीन्द्रनाथ अपने लप्रेक में छूटे हुए गाँव चनका के साथ दिल्ली में जीते हुए अपनी प्रेम यात्रा में गाँव को दिल्ली के साथ जीने चले जाते हैं| गिरीन्द्रनाथ अपने अनुभव के प्रेम की गाथा कह रहे हैं, यह भोगा हुआ यथार्थ है| उनके यहाँ प्रेम संबल की तरह खड़ा है, उनका मेरुदंड है, साथ ही उलाहना और सहजीवन है| परन्तु गिरीन्द्रनाथ के लप्रेक में प्रेम ही नहीं है, प्रेम के बहाने बहुत कुछ है|

लप्रेक में विक्रम नायक सशक्त और समानांतर कथा कहते हैं| वह गिरीन्द्रनाथ के कथन से अधिक पाठ को समझते हैं और रचते हैं| विक्रम केवल पूरक नहीं हैं बल्कि अपनी समानांतर गाथा चित्रित करते हैं| आप गिरीन्द्रनाथ को पढ़ कर जानते हैं कि नायिका आधुनिक और स्वतंत्र है परन्तु आप विक्रम नायक के रेखाचित्रों के माध्यम से ही पुष्टि पाते हैं कि गिरीन्द्रनाथ की नायिका प्रायः भारतीय परिधान पहनती है| बहुत से विवरण हैं जहाँ विक्रम नायक लप्रेक के पूरक हैं परन्तु वह कई स्थान पर स्वयं के रचनाकार को उभरने देते हैं| विक्रम के चित्र अपनी स्वयं की कथा कहते जाते हैं – उनमें गंभीरता, व्यंग, कटाक्ष है|

पृष्ठ 3 पर विक्रम जब सपनों की पोटली से उड़ते हुए सपनों को किताब में सहेज कर रखते हैं तो वो पूरक हैं या समानांतर, कहना कठिन है| पृष्ठ 6, 12, 13, 49, 80 जैसे कई पृष्ठों पर विक्रम और गिरीन्द्र को साथ साथ और अलग अलग पढ़ा – समझा जा सकता है| कहीं कहीं विक्रम आगे बढ़कर तंज करते हैं, (जैसे पृष्ठ 21, 56, 70)| विक्रम लेखक को शब्द देते है (जैसे पृष्ठ 80, 81)|

कुल मिला कर यह पुस्तक गिरीन्द्रनाथ के लिए माटी बन जाने के प्रक्रिया है, वो माटी जो सोना उगलती है|

पुस्तक: इश्क़ में माटी सोना

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चित्र: राजकमल प्रकाशन के वेबसाइट स

श्रृंखला: लप्रेक
कथाकार: गिरीन्द्रनाथ झा
चित्रांकन: विक्रम नायक
प्रकाशक: सार्थक – राजकमल प्रकाशन
संस्करण: दिसंबर 2015
पृष्ठ: 88
मूल्य: रुपये 99
ISBN: 978 – 81 -267 – 2837 – 4
यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

साम्राज्यवादी हिंदी


हिंदी भाषा को बहुत से लोग एक कृत्रिम भाषा मानते हैं जिसे उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दवी – उर्दू – रेखता से उधार लिए गए व्याकरण के साथ रचा गया| यदि हम व्याकरण की बात करें तो हिंदी का व्याकरण उर्दू से बेहद नजदीक है और बहुमत के अंधविश्वास के विरुद्ध संस्कृत व्याकरण से मेल नहीं खाता जैसे संस्कृत में तीन वचन होते हैं जबकि हिंदी – उर्दू में दो|

हिंदी कृत्रिमता का दूसरा आधार है, हिंदी का कोई अपना आधार क्षेत्र नहीं होना और इसका विकास बृज, खड़ी बोली, अवधी, भोजपुरी, मागधी, मगही, मैथली, मारवाड़ी, और तथाकथित हिंदी – परिवार की भाषाओँ के ऊपर अपने साम्राज्यवादी विस्तार से हिंदी ने लोकप्रियता पाई है| इनमें से एक समय में साहित्य – संस्कृति की भाषा रहीं ब्रजभाषा और अवधी का लगभग विलो हो रहा है और हिंदी परिवार की अन्य भाषाएँ अपने बचाव में प्रयासरत हैं| इस साम्राज्यवाद का सबसे पहला शिकार उत्तर – प्रदेश रहा है जहाँ की तीन प्रमुख भाषाएँ हिंदी विकास की भेट चढ़ चुकीं हैं – ब्रज, अवधी और उर्दू|

हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओँ का विकास हम भारत में सांस्कृतिक आदान – प्रदान और उससे उत्पन्न प्रतिक्रियाओं में देख सकते हैं| हिन्दवी – उर्दू को अपने समय की विभिन्न भाषाओँ से अपने शब्द मिले जिनमें संस्कृत अरबी फारसी अंग्रेजी पुर्तगाली और तमाम भारतीय भाषाएँ शामिल हैं| दुखद रूप से यह एक सरकारी और दरबारी भाषा रही और इसका आधार क्षेत्र सरकारी क्षेत्र और तत्कालीन राजधानियां रहीं| मगर इसे शीघ्र ही मुसलमानों से जोड़ दिया गया| उसका आम रूप जल्दी ही आर्यसमाज और कांग्रेसी आंदोलनों के साथ हिंदी के रूप में विकसित किया जाने लगा| यह उन भारतीय राष्ट्रवादी सामंतों की भाषा बनने लगी जिनका झुकाव हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति था| पहले आर्यसमाजी स्वामी दयानंद सरस्वती और बाद में वैष्णव विचारधारा के धनी गाँधी जी इसके नेता थे|

इस बात के प्रमाण हैं कि प्रारंभिक हिंदी कैथी लिपि में लिखी जाती थी| मगर भारत का संविधान बनते समय हिंदी के लिए ब्राह्मणवादी देवनागरी का चयन किया गया| हिंदी शायद विश्व की एकमात्र आधिकारिक भाषा है जिसके लिए किसी राष्ट्र का संविधान लिपि (script) का भी निर्धारण करता है| अर्थात कैथी, रोमन, ब्राह्मी आदि लिपि में लिखी गयीं हिंदी भारत की आधिकारिक भाषा नहीं है| आम तौर पर भाषाएँ अपनी लिपि स्वयं चयन करतीं हैं|

हिंदी ने पहले उर्दू को मुसलमाओं की भाषा और बाद में पाकिस्तान की भाषा कहकर देश से निकालने का प्रयास किया| उसके साथ ब्रज और अवधी को गाँव – गंवार की भाषा कहकर तिरस्कृत किया जाता रहा है| आज जब हिंदी समूचे भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने में लगी है और अंग्रेजी को चुनौती दे रही है| अंग्रेजी और हिंदी का यह विकास भारत में छोटी और मझोली भाषाओँ के लिए खतरा बन कर उभर रहा है|

मैला आँचल


प्रकाशन के साठ वर्ष बाद पहली बार किसी क्षेत्रीय उपन्यास को पढ़कर आज की वास्तविकता से पूरी तरह जोड़ पाना पता नहीं मेरा सौभाग्य है या दुर्भाग्य| कुछेक मामूली अंतर हैं, “जमींदारी प्रथा” नहीं है मगर जमींदार और जमींदारी मौजूद है| कपड़े का राशन नहीं है मगर बहुसंख्य जनता के लिए क़िल्लत बनी हुई है| जिस काली टोपी और आधुनिक कांग्रेस के बीज इस उपन्यास में है वो आज अपने अपने चरम पर हैं, और सत्ता के गलियारे में बार बारी बारी से ऊल रहे हैं| साम्राज्यवादी, सामंतवादी और पूंजीवादी बाजार के निशाने पर ग्रामीण समाजवादी मूर्खता का परचम लहराते कम्युनिस्ट उसी तरह से हैं जिस तरह से आज हाशिये पर आज भी करांति कर रहे हैं| विशेष तत्व भगवा पहन कर आज भी मठों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और सत्ता उनका चरणामृत पाती है| गाँधी महात्मा उसी तरह से आज भी मरते रहते हैं…. हाँ कुछ तो बदल गया है, अब लोगों को ‘उसके’ मरते रहने की आदत जो पड़ गयी है|

पता नहीं किसने मुझे बताया कि ये क्षेत्रीय या आंचलिक उपन्यास है, शायद कोई महानगरीय राष्ट्रव्यापी महामना होगा| मैला आँचल भारत के गिने चुने शहरी अंचलों को बाहर छोड़कर बाकी भारत की महाकथा है; और अगर महिला उत्पीड़न के नजरिये से देखा जाये तो आदिकालीन हरित जंगल से लेकर उत्तर – आधुनिक कंक्रीट जंगल तक की कथा भी है| पढ़ते समय सबकुछ जाना पहचाना सा लगता है|

पूर्णिया बिहार की भूमि कथा का माध्यम बनी है| दूर दराज का यह समाज एक अदद सड़क, ट्रेन और ट्रांसिस्टर के माध्यम से अपने को आपको राजधानियों की मुख्यधारा से जोड़े मात्र हुए है| समाचार यहाँ मिथक की तरह से आते हैं| हैजा और मलेरिया, उसी तरह लोगों के डराए हुए है जिस तरह साठ साल बाद नई दिल्ली और नवी मुंबई के लोग चिकिनगुनिया और डेंगू जैसी सहमे रहते हैं|

कथानायक मेडिकल कॉलेज के पढ़कर गाँव आ जाता है; धीरे धीरे गाँव में विश्वास, युवाओं में प्यार, देश में नाम और सरकार में सतर्कता कमा लेता है| नहीं, मैं डाक्टर विनायक सेन को याद नहीं कर रहा हूँ| गाँव जातियों में बंटकर भी एक होने का अभिनय बखूबी करता है| अधिकतर लोग अनपढ़ है और जो स्कूल गए है वो सामान्य तरीके से अधपढ़ हैं| जलेबी पूरी की दावत के लिए लोग उतना ही उतावले रहते है जिस तरह से आज बर्गर पीज़ा के लिए; मगर हकीकत यह है कि जिस तरह से देश की अधिसंख्य आबादी ने आज बर्गर पीज़ा नहीं खाया उस वक़्त पूरी जलेबी नहीं खायी थी|

बीमारी से लड़ाई, भारत की आजादी, वर्ग संघर्ष, जाति द्वेष, जागरूकता और स्वार्थ सबके बाच से होकर उपन्यास आगे बढ़ता है| यह उपन्यास एक बड़े कैनवास पर उकेरा गया रेखाचित्र है जिसमे तमाम बारीकियां अपने पूरे नंगेपन के साथ सर उठाये खड़ी हैं| ये सब अपने आप में लघुकथाएं हैं और आसपास अपनी अनुभूति दर्ज करातीं हैं|

पुनःश्च – मेरे हाथ में जो संस्करण है, उसमें विक्रम नायक के रेखाचित्र हैं| मैं विक्रम नायक को रेखाकथाकार के रूप में देखता हूँ| उनके रेखाचित्रों में गंभीर सरलता झलकती है| इस संस्करण में उनके कई चित्र सरल शब्दों में पूरी कथा कहते हैं| बहुत से चित्र मुझे बहुत अच्छे लगे|

कई चाँद थे सरे – आसमां


शम्सुर्हमान फ़ारुक़ी का यह उपन्यास पढ़ने में बहुत रोचक लगा और समय लगाकर पढ़ा| इसमें हिंदुस्तान के इतिहास के उन रोचक स्याह – सफ़ेद पन्नों को उकेरा गया है जिनका जिक्र आजकल कम ही किया जाता है| उपन्यास में इतिहास, इमारत, झगड़े, जंग, षड्यंत्र, सियासत, कल्पना, कहानी, साहित्य, शेरोशायरी ख़ास और आम जिन्दगी अपने आप आती गाती सुनाती सुनती चली गयी है|

उपन्सास एक ऐसी औरत की जिन्दगी की अजब दास्ताँ है जिसे बेहद आम औरत होने से अपने जीवन की शुरुआत की और किस्मत की कहानी उसे देश के सबसे खास औरतों में से एक बनाते हुए धूल में मिलाने के लिए ले गई| ये दास्ताँ उस औरत की है जिसने और जिसकी किस्मत ने कभी हार नहीं और वो और उसकी किस्मत कभी जीत भी नहीं पाए| ये कहानी उस औरत की है जिसके पाकीज़ा होने पर सबको उतना ही यकीं था जितना उसके घटिया – बाजारू होने का| ये कहानी उस मुल्क की है जिसे ज़न्नत समझ कर कारवां आते गए और अपने घर बनाते गए| ये कहानी उस मुल्क की है जिसको लूटने उजाड़ने का सपना बहुत सी आँखों ने देखा| ये कहानी उस बर्बादी की है जो सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि बर्बाद होने वालों को अपने हजारों साल के वजूद पर कुछ ज्यादा भरोसा था|

उपन्यास बहुत लम्बे बारीक़ विवरणों से भरा पड़ा है जो शायद चाह कर भी उतने ऊबाऊ नहीं बन पाए हैं जितने बनाने चाहे गए हैं| आपको अपनी कल्पना शक्ति को प्रयोग करने की जरूरत नहीं पड़ती|

उपन्यास कई बार पाठ्य पुस्तक की भूमिका भी निभाता है तो बार बार आगाह भी करता है कि यह मूलतः कहानीकार की वो कल्पना है जिसे वो इतिहास के दो मोती साथ पिरोने के लिए करता जाता है|

उपन्यास की सबसे बड़ी खूबसूरती इस बात में है कि ये लिखा आज की हिंदी – उर्दू – रेख्ता में है मगर उस ज़माने की हिंदी – उर्दू – रेख्ता में अपने को बयां करता जाता है|

कुरु-कुरु स्वाहा…


कुरु – कुरु स्वाहा… को पढ़ना एक श्रमसाध्य काम हैं| जिसमें आप कथानक के साथ जुड़ते हुए भी उससे दूर रहते हैं| उपन्यास मुंबई की एक कहानी को बारीकी, बेबाकी और बेगैरत तरीके के साथ पूरी साहित्यिकता, नाटकीयता, और सांस्कृतिकता के साथ कहता है| मनोहर श्याम जोशी से यह मेरा पहला परिचय है| मैंने कभी उनके हमलोग, बुनियाद या कोई और धारावाहिक भी नहीं देखा| जिस वक्त मेरे सहपाठी मुंगेरीलाल के हसीं सपने देखते थे मैं अपने अन्दर कोई मुंगेरीलाल पाले बैठा था| मगर कुरु – कुरु स्वाहा… पढ़ने से मुझे यह स्पष्ट हो गया कि मनोहर श्याम जोशी जीवन के हर फ्रेम को थ्री डी चश्मे से नहीं देखते वरन दस दिशाओं से अवलोकते हैं| उनके पास हर फ्रेम का बहुआयामी मॉडल रचने का माद्दा है|

जैसा कि उपन्यास के बारे में अंतिम पृष्ठ पर लिखा गया है, “एइसा कॉमेडी कि दार्शिक लोग जानेगा, केतना हास्यास्पद है त्रास अउर केतना त्रासद है हास्य”| मगर मैं सावधान हूँ, यह परिचय शायद मनोहर श्याम जोशी ने खुद लिखा है और अपने उपन्यास को स्वाहा करने के उनकी साजिश का हिस्सा मात्र है| कुरु- कुरु स्वाहा पढ़ते समय पाठक को अपने न होने का काम्प्लेक्स होने लगता है और पढ़ते हुए अपनी क्षुद्रता पर भी गर्व सा कुछ होता है कि पाठक इसे पढ़ पा रहा है| बहुत से विवरणों को पाठक पढने के साथ नकारता या छोड़ता चलता है और उसे अपनी तमाम क्षुद्रता के मार्फ़त पढ़ता समझता चला जाता है| कुरु – कुरु स्वाहा… खुद को स्वाहा करने से पहले अपने लेखक, अपने नायक और फिर पाठक को स्वाहा करता चलता है|

कुरु – कुरु स्वाहा… में कथानक है यह तो समझ में आता है मगर कई बार आप रुक कर कथानक को ढूंढने लगते है| कई बार लगता है कि कई कथानक है तो कई बार आप उन कथानकों के से आप उपन्यास का एक कथानक ढूंढने लगते हैं| कुरु – कुरु स्वाहा… को पढ़ना अपने जीवन के उन पहलुओं को पढ़ना हैं जिन्हें हम अपने आप में होते हुए नकारते चलते हैं| कुरु – कुरु का कुरु – कुरु वही है जो हम जीवन में घटित होते हुए नकार दिया जाता है या कि स्वीकार नहीं किया जाता| कथानायक अपनी उन उबासियों में जो हैं हीं नहीं, जीवन के उन्हीं पहलूओं को जीता चला जाता हैं|

अब जैसा की उप्पन्यास कहता है, यह पाठक पर है कि इस ‘बकवास’ को ‘एब्सर्ड’ का पर्याय माने या न माने|

अक्षर ज्ञान: चूल्हा नीचे चूल्हा


आज मेरा ढाई साल का बेटा स्कूल में पहली बार कलम पकड़ेगा| अपना बचपन याद आया|

मेरा स्कूल पाँच साल की आयु में शुरू हुआ था| माँ ने घर पर ही सौ तक गिनतियाँ, दस तक पहाड़े और हिंदी अंग्रेजी वर्णमाला याद करा दी थी| साथ में उर्दू वर्णमाला को लेकर एक कविता भी थोड़ी बहुत याद थी| बाकि कुछेक कविता याद थीं| मगर तख्ती से अपना वास्ता केवल इतना था कि वो गेंद – बल्ला (क्रिकेट) खेलने के लिए उम्दा थी|

जब स्कूल पहुंचे तो तख्ती का हमेशा के लिए बल्ला बन गया| और एचबी की पेंसिल और पच्चीस पैसे की कॉपी ने बाजी मार ली| कॉपी के कागजों से हवाई जहाज बनाना हमें आता था, मगर स्कूल के पहले हफ्ते में बारिश का जोर था तो स्कूल में आया ने हमें कागज की नाव बनाना सिखा दिया| आया जल्दी ही हमारी दोस्त और अध्यापक दोनों हो गईं| दरअसल हमारी टीचर गाँव नाते से चाची लगती थीं तो लाड़ – प्यार में हम पढ़ते नहीं थे और आया दोस्त थी तो वो खुद पढने का नाटक कर कर पढ़ाती थीं|

अब आया तख्ती पर पढ़ी थी और कागज पर लिखना उन्हें आता नहीं था तो तख्ती और कलम एक बार फिर से जिन्दगी में वापस आये|

चूल्हा नीचे चूल्हा मतलब उ
चूल्हा नीचे चूल्हा मतलब छोटा उ

पहले हफ्ते में चुल्हा बनाना सिखाया गया, जिसे आप आज अंग्रेजी का उल्टा C या लेता हुआ U कह सकते हैं| उसके बाद उ और ऊ की बारी आईं| मेरे लिए पढ़ने और लिखने पढने की वर्णमाला कुछ दिन अलग रहीं| उ ऊ अ आ अं अः ओ औ इ ई ए ऐ
आया ने शायद दो माह में स्वर लिखना सिखाये|

चूल्हे के नीचे चूल्हा बना कर उ बना और उ के ऊपर कुते की दुम लगा कर ऊ| अ और आ के बीच भी कुछ कहानियां थी जो याद नहीं रहीं| मगर याद है जब दो बहुओं में लड़ाई हो गयी तो एक एक ने सीधा और दूसरी ने उल्टा चूल्हा बना दी थी जिससे इ बन गया था|

बाद में जब आया ने क ख ग घ की जगह सबसे पहले व और ब सिखाना चाहा तो उसको कुछ भी सिखाने से मना कर दिया गया और क ख ग घ से शुरू किया गया| मगर जब भी मुझे लिखने में दिक्कत होती तो आया ही मेरी मदद करती|

प्रातः का पुनर्निर्माण


      (प्रातः का प्रथम पल)  
वो सुबह सुबह की अंगड़ाई,
       सुस्ताई, अलसाई, मदराई|
वो जगती, उन्नीदी आँखे,
       तू गीत, भ्रमर की गाई||

            वो अधसुलझे, उलझे बाल,
                   तेरा छितरा, बिखरा हाल|
            वो फूटे टूटे कंघी के दान्ते,
                   सौ मकड़ी का मकड़-जाल||

                        वो रूकती जीवन की नैया,
                               बेबस, बेसबब, बेअदब, बदहाल|
                        वो रूठा हास, परिहास, उल्लास
                               छूटा, सच्चा-झूठा, प्रातःकाल||

                              (पुनर्निर्माण के उपरान्त)
                        ओह! निखरी खिलती हंसतीं तुम,
                               चिड़िया चहकी, कूकी कोयल|
                        सद्य स्नाता, सुमुस्काती नारी,
                               पुलकित, वायु नभ जल थल||

                  वो रेशम की लहराती साडी,
                         सुलझे सुगढ़ सलोने बाल|
                  उल्लसित, अहलादित, बाला,
                         लहराती मृगनयनी सी चाल||

            हास, परिहास, उल्लास, विलास,
                   भरपूर जवानी जीता जीवन|
            इस धरा की अखंड स्वामिनी,
                   तुमने जीता मेरा तन्मय मन||
(मेरी इस कविता के प्रथम भाग में सुबह – सुबह घर में प्रेयसी के उलझे सुलझे रूप को 
देख कर उत्पन्न निराशा का वर्णन है| उनके उलझे बालों में ही जिन्दगी उलझ सी गयी है|
दूसरे भाग में नहाने के बाद तरोताजा हुई प्रेयसी का जिक्र है| संवरे सुलझे बाल जीवन को नयी प्रेरणा दे रहे हैं|
 कुछ पाठक कह सकते है कि क्या पुरुष के अलसाये
 रूप को देख कर प्रेयसी को निराशा नहीं होती होगी? हाँ, मैं सहमत हूँ|
इसलिए सभी लोग रोज नहायें सिर से पैर तक भली प्रकार, ठीक से|
 बताता चलूँ कि इस कविता की प्रेरणा मुझे इस चलचित्र से मिली है|)
…
First part of my Hindi poem, explain dull feeling prevalent in early morning life.
In second part, life is refreshed after proper bath, hair wash and hair style.
Here is a rough near – translation in English:
 
(the first moment of weaning)
Those stretch-out in the morning,
                 dull, indolence, intoxicating|
Those awakened, Quasi sleepy eyes,
                 you a song, sung by black beetle||1||
That half-stylish, elusive hair, 
                 thy sparse, scattered state|
That bursting broken comb,
                 Mesh of thousands Spider||2||
That stopped fairy of life,
                 helpless, unprovoked, savage, impoverished|
That lost laughter, humour, Joy,
                 that missed black and white morning||3||
 
(After re-freshening)
Oh! Blossom perfect cheering you,
                 like many singing birds and cuckoos|
Recently bathed, smiling lady,
                 blithe air, water, land, sky||1||
That flowing silk dress,
                 systematic, beautiful hair|
Amusing, happy, young lady,
                 wavy moves like reindeer ||2||
Laugh, humour, joy, luxury,
                 winning all my young life|
Lady of this entire universe,
                 you won my lascivious mind||3||

गायत्री मन्त्र (हिंदी)


ॐ भू भुव स्व|

वह ग्राह्य सवित्देव|

होवें शुद्ध प्रकाशित|

सुहेतु मम सद्बुद्धि ||

(गायत्री मन्त्र का यह मान्त्रिक अर्थ मैंने विक्रम संवत २०५० आषाढ़ शुक्ल पक्ष ७ दिन शनिवार को किया था| मूल संस्कृत मन्त्र की ही तरह इस पद्य की रचना में सावित्री छंद का प्रयोग करने का प्रयास किया है| मुझे संस्कृत नहीं आती अतः मैंने उस समय उपलब्ध हिंदी अनुवाद का सहारा लिया है|)

 

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः ।

तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यं ।

भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। ।

धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥