बंद होते बैंक

मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

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हवाला के चेहरे

छोटे शहरों में जिस तरह घरेलू झगड़े देखने के लिए मजमा लगता है, वैसे ही आजकल हमारे टेलीविजन पर गिरफ्तारियां देखने का मजमा लगता है| ये टेलीविजन वाले अपनी कानूनी समझ में इतने कच्चे होते हैं कि गिरफ़्तारी को ही न्याय का अंतिम सत्य मान कर चौबीस घंटे का उत्सव मना लेते हैं|

पिछले दिनों प्रवर्तन निदेशालय ने एक एयर होस्टेज को हवाला लेनदेन के मामले में हवाई जहाज से उतार कर गिरफ्तार कर लिया| दिन भर मीडिया में इस तरह हल्ला मचा जैसे देश के असली दुश्मन को पकड़ लिया गया हो| चेनलों की हवाला से क्या वास्ता? उन्हें तो एयरहोस्टेज प्रोफेशन के साथ जुड़े ग्लेमर की आड़ में अपनी टीआरपी बढ़ाने से मतलब|

हवाला लेनदेन के मामले में धन को इधर से उधर लाने ले जाने वाले की भूमिका कठिन और मूर्खतापूर्ण होती है| यह लोग माल के मालिक नहीं, हवाला के ढाबे के छोटू नौकर होते हैं| मगर माल के असली मालिक और कर्ताधर्ता कोई और लोग होते हैं|

खैर मामले में कथित तौर पर एक हवाला ऑपरेटर को भी गिरफ्तार क्या गया है| हवाला ऑपरेटर का काम कुछ कुछ रंगरेजों या किसी ढाबे के रसोइये की तरह का है| यह लोग देश का काला धन बाहर देशों की आर्थिक गंगा में दुबकी लगा कर सफ़ेद कर लाते हैं|

हमारा मकसद यहाँ किसी एयर होस्टेज, हवालाकर्मी या हवाला ऑपरेटर का बचाव करने का नहीं| मगर प्रश्न यह उठता है कि आखिर यह हवाला प्रयोग करने वाले महारथी कौन लोग है? यह क्यों नहीं पकड़े जाते|  ख़बरों में कहा गया कि कुछ सर्राफ़ा बाज़ार के लोग हैं| हवाला की गंगा में सर्राफ़ा बाज़ार का महत्त्व गंगोत्री जैसा है| लोग अपना काला धन लाते हैं और उसे यहाँ सुनहरा निवेश बनाकर उन्हें दे दिया जाता है| इसके आगे उस काले धन को देश विदेश की गंगा में दुबकी लगा लगवाकर सफेदी करने का काम हवाला के हिस्से में आता है|

अब हमारे देश में काला धन पैदा करने वालों पर हाथ डालना तो मुश्किल काम है| काले धन वाले क़ानून के इतने पास बैठे हैं कि क़ानून के लम्बे हाथ उनसे आगे निकल जाते हैं और उन्हें पकड़ नहीं पाते| इसीलिए हमारे देश में वित्तमंत्री लोग उनके लिए आम माफ़ी योजना लाते रहते हैं और क़ानून की इज्ज़त बचाते रहते हैं|

मगर कभी सोचा नहीं हमने कि अगर टैक्स चोर न हों तो यह हवाला ऑपरेटर क्या करेंगे? यह टैक्स चोर ही वास्तव में हवाला के असली माईबाप और असली चेहरा हैं|