सुशांत के नाम पर


मैं न्याय व्यवस्था के विचाराधीन विषयों पर लिखने में संकोच करने लगा हूँ| फिर भी स्वयं से क्षमायाचना सहित लिख रहा हूँ| 
 
सुशांत के मामले में पहले उसे अवसाद पीड़ित आत्महत्यारे के रूप में प्रचारित किया गया| आत्महत्या को लेकर उसके विरुद्ध बहुत सी बातें की गईं| कौन थे वो लोग? कुछ कहने से पहले अपनी अपनी पोस्ट देख लें|
 
गहन अवसाद ने अगर इंसान हार जाए तो आत्महत्या हो जाती है| इस से वो कायर नहीं हो जाता| वास्तव में हारने से पहले वो एक लम्बी लड़ाई लड़ चुका होता है| बहुत से उन मुद्दों पर जिनपर हम आत्मसमर्पण कर कर जीवन में आगे बढ़ चुके होते हैं, संघर्ष शुरू ही नहीं करते|
 
हमारे लिए जरूरी है कि हम मित्र या परिवार के रूप में अवसादग्रस्त व्यक्ति के साथ खड़े हों| पर अक्सर ऐसा होता नहीं है| हम हाथ छुड़ा कर चल देते हैं|
 
फिर दृष्टिकोण बदला|
 
इसके बाद अचानक से फिल्म उद्योग की आपसी गुटबाजी, भाईभतीजावाद आदि आदि पर बात होने लगती है| लगता है अवसाद के कारण की खोज होने लगती है| यह सब वाद उपवाद फ़िल्म दुनिया में आने वाला हर व्यक्ति झेलता है| बल्कि हमारे आपके व्यवसाय, कार्यालय विद्यालय और परिवार में भी यह सब कमोवेश होता है| हर बाहरी व्यक्ति को पता होता है कि उसे नया दामाद या नई बहू का सा सौतेला बर्ताब मिलने वाला है| फिर भी कई बार कुछ लोग हार जाते हैं या अवसाद में चले जाते हैं| कौन लोग हैं जिन्होंने फ़िल्म उद्योग के गुटबाजी को यहाँ मुद्दा बनाया?
 
फिर दृष्टिकोण बदला|
 
जाँच आगे बढ़ी| बहुत से लोगों को दाल का काला दिखने लगता है| और नशेबाजी का मामला सामने आया| नशा अवसाद के कारण भी जीवन में आ सकता है और मौज मस्ती के शौक में भी| मगर सांगत बुरी होनी चाहिए या शौक| कोई जबरदस्ती तो नशा कराता नहीं, आप खुद गर्त में गिरते हैं| परिवार और समाज मूक बधिर देखता रहता है| न अवसाद के इलाज का प्रयास होता न नशे के| बुरी संगत को दोष देकर आप पीछे हट जाते हैं – अपनी अच्छी संगत बचा कर रखते हैं| कौन लोग हैं जिन्होंने फ़िल्म उद्योग के नशे को यहाँ मुद्दा बनाया?
 
फिर दोषियों को ढूंढा जाता है| पुरानी कथा, भोला भाला लड़का, फंसाने वाली लडकियाँ| कौन लोग हैं जिन्होंने फ़िल्म उद्योग की लड़कियों को यहाँ मुद्दा बनाया? हो सकता है बात कुछ और निकले| अभी तो परतें उखड़ रही हैं|
 
 
फिर दृष्टिकोण बदला|
 
अब सुशांत हाशिये पर चले गए हैं| लगता है, उनको आत्महत्यारा  नशेड़ी माना जा चुका है| कोई उनपर या उनकी समस्या पर ध्यान नहीं दे रहा| बात चलनी चाहिए थी – आत्महत्या को कैसे रोका जा सकता था, नशा कैसे रोका जाए| नशे के खरीददारों को पकड़ा जा रहा है बेचने वाले कौन और कहाँ  हैं?
 
नशा बेचने वाले जब आपको फंसाते हैं तो आप उन्हें घृणा करते हैं, आप जानते हैं वो गलत हैं, पर वो लोग अपने धंधे में हार नहीं मानते| कोई व्यवसायी नहीं मानता जैसे लोग गोरा करने की क्रीम और गंजापन दूर करने की दवा शताब्दियों की बेशर्मी से बेच रहे हैं| पर जाब आप उनके चंगुल में फंस जाते हैं तो आप उन्हें प्रेम करते हैं जैसे आप गोरेपन की क्रीम, गंजेपन की दवा को करते हैं| नशा बेचने वाले नहीं पकड़े जाते, वो शरीफ़ इज्जतदार लोग होते हैं वो नशेड़ी की तरह नाली में नहीं लेटते| नशेड़ी गिरफ्तार होते रहते हैं| कोई इलाज नहीं कराता|
 
मैं बाप होता तो इलाज कराता अवसाद का, नशे का| बुरी संगत के जबाब में अच्छी संगत देने का प्रयास करता| मुश्किल नहीं है यह सुनील दत्त कर चुके हैं| संजय दत्त का हालिया बायोपिक कितना भी एकतरफ़ा हो या लगे, देखा जा सकता है| संजय के बायोपिक में अच्छी बात यह है उसमें गलत संगत देने वालों को दोष देने से प्रायः बचा गया है| संजय ने भले ही मर्दानगी के घटिया झण्डे गाड़े हों, लड़कियों को दोष देने से भी बचा गया है| अपने पाप. अपराध, दुष्कर्मों और अनुचित कर्मों की जिम्मेदारी खुद लेनी होती है|ध्यान रखें मैं सुनील दत्त की बात कर रहा हूँ, संजय न बनें|
 
इस मामले में दृष्टिकोण फिर बदलेगा| मुझे ऐसा लगता है| समाज ने अपनी गलत नस दवा दी है|कोई नहीं जनता किस दृष्टिकोण के साथ लोग किस जाँच को प्रभावित कर रहे हैं|
 
सुशांत के मामले में जितनी परतें हैं उन्हें देखें| न्याय इतना सरल नहीं कि दो चार पत्रकार कर दें या एक दो जज| वर्ना दुनिया भर में परतदार न्याय व्यवस्था की क्या जरूरत थी| परतें निकलने तो दीजिए|

सोफ़े पर बैठ कर अगर हम न्याय कर पाते तो इतने न्यायिक प्रपंच की क्या जरूरत रहती| ईश्वर ने भी रावण या कंस के लिए त्वरित न्याय नहीं किया था, क़यामत के सुदूर दिन की अवधारणा भी है|
धैर्य रखें| मीडिया को बंद रखें| जल्दी का काम शैतान का है या मिडिया का, उन्हें करने दें|
मूल पोस्ट यहाँ लिखी जा चुकी है: