तीसरी जात

भारत में आप जातिवादी (या कहें, भेद्भावी) न होकर भी जाति के होने से इंकार नहीं कर सकते| जाति व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था से जन्म आधारित में परिवर्तित हुआ माना जाता है, और आज यह भेदभाव के आधार के अलावा आदतों, परम्पराओं, भोजन, रिहायश और वंशानुगत बीमारियों का प्रतीक है| इनमें जाति विशेषों से सम्बंधित कई बातें दुर्भावना से भी प्रेरित मानी जाती हैं|

परन्तु, किसी भी व्यवस्था के प्रारंभ होने के समय उसके कुछ न कुछ कारण रहे होते हैं, भले ही बाद में वह सही साबित हो या गलत| मेरे मन में एक प्रश्न हमेशा रहा कि कर्म आधारित जाति व्यवस्था में जातियों के श्रेणीक्रम का क्या मापदंड था और क्यों था|

किसी भी सामाजिक व्यवस्था में ज्ञान को सुरक्षा और अर्थ से पहले रखा गया है| ब्राहमण यानि ज्ञान का पहले स्थान पर रखने पर कोई प्रश्न नहीं हैं| आज हम सुरक्षा को हमेशा धन के बाद रखते हैं और मानते हैं की धन ही धर्म और सुरक्षा का संवाहक है| मानवता और देश का विकास धन और धनपतियों की धरोहर मन जाता है| मजे की बात यह है कि अधिकांश भारत में ब्राहमण और वैश्य खान – पान की शाकाहारी आदतों की बहुलता के चलते स्वाभाविक रूप से निकट जाति समूह लगते हैं| साथ ही दानजीवी ब्राह्मणों के लिए भी यह सरल था कि वो राजाओं का मूँह देखने की जगह धन स्रोत वैश्यों को सम्मान देकर जातिक्रम में दूसरे स्थान पर आसन्न करते|

आज जब पूँजीवाद का समय है और पूंजीपति के आते ही धर्म के तमाम देवता, पंडित, फ़कीर, सन्यासी आदि विशिष्ट क्रम (VIP Line) में लग कर उन्हें दर्शन देते हैं| सत्ता ज्ञानवान के स्थान पर धनवान से पूछकर नीति – निर्धारण करती हैं| कहा जाता है कि विश्व का एक बड़ा देश अपने हथियार निर्माता धनपतियों को ख़ुश करने के लिए अपनी सेना को नरक में भी भेजने के लिए तैयार रहता है| ऐसे समय में मुझे लगता है कि जातिक्रम निर्धारित करते समय वैश्यों को अगर पहले नहीं तो दुसरे स्थान पर अवश्य होना चाहिए था|

परन्तु ऐसा नहीं हुआ| क्यों?

पिछले सप्ताह जब भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की संभावित विदाई और इस सप्ताह उनके पद पर न रहने के निर्णय के सन्दर्भ में क्रोनी – कैपिटलिज्म के सहारे भारतीय जाति व्यवस्था में वैश्यों यानि पूँजी को तीसरे सामाजिक पायदान पर रखने का निहित कारण समझ आया|

पूँजीपति पूँजीवाद के छद्म रूप बाजार और अर्थव्यवस्था के नाम पर अपने लोभ – लालच की व्यवस्था चलता हैं| इस लोभवाद में पूँजीवाद कहीं नहीं रहता केवल पूंजीपति रहता है जो अपने लोभ के लिए पूंजीवादी सिद्धांतों का दुरूपयोग करता है| उसके लोभ के लाभ पर आश्रित लोग उसके लिए विकास और खुशहाली के गीत लिखते है और कुतर्क रचते हैं| जिस प्रकार मदमस्त हाथी अपने सामने आने वाली हर अच्छी बुरी चीज को कुचल देता है, उसी प्रकार यह लोभवाद धर्म, कर्म, सुरक्षा आदि को अपने कुहित में कुचलता चलता है| रघुराम राजन इसके पहले शिकार नहीं हैं| इस्रायल में बैंक ऑफ़ इस्रायल के गवर्नर प्रोफ़ेसर स्टैनले फिशर लगभग सात साल पहले इसके और कहीं अधिक सीधे शिकार बने थे|[i]

हमारे प्राचीन विद्वानों को उस समय में लगा होगा कि पूँजी, पूंजीपति और पूँजीवाद का साथ आसानी से लोभवाद को जन्म देता है| अगर अगर पूँजीसत्ता को धर्मसत्ता और राजसत्ता से पहले या किसी एक के साथ दे दिया जाता जाता तो यह लोभवाद भारत को बहुत पहले विकास के नाम पर बर्बाद कर चुका होता|

 

[i] https://promarket.org/raghuram-rajan-stanley-fischer/

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मैला आँचल

प्रकाशन के साठ वर्ष बाद पहली बार किसी क्षेत्रीय उपन्यास को पढ़कर आज की वास्तविकता से पूरी तरह जोड़ पाना पता नहीं मेरा सौभाग्य है या दुर्भाग्य| कुछेक मामूली अंतर हैं, “जमींदारी प्रथा” नहीं है मगर जमींदार और जमींदारी मौजूद है| कपड़े का राशन नहीं है मगर बहुसंख्य जनता के लिए क़िल्लत बनी हुई है| जिस काली टोपी और आधुनिक कांग्रेस के बीज इस उपन्यास में है वो आज अपने अपने चरम पर हैं, और सत्ता के गलियारे में बार बारी बारी से ऊल रहे हैं| साम्राज्यवादी, सामंतवादी और पूंजीवादी बाजार के निशाने पर ग्रामीण समाजवादी मूर्खता का परचम लहराते कम्युनिस्ट उसी तरह से हैं जिस तरह से आज हाशिये पर आज भी करांति कर रहे हैं| विशेष तत्व भगवा पहन कर आज भी मठों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और सत्ता उनका चरणामृत पाती है| गाँधी महात्मा उसी तरह से आज भी मरते रहते हैं…. हाँ कुछ तो बदल गया है, अब लोगों को ‘उसके’ मरते रहने की आदत जो पड़ गयी है|

पता नहीं किसने मुझे बताया कि ये क्षेत्रीय या आंचलिक उपन्यास है, शायद कोई महानगरीय राष्ट्रव्यापी महामना होगा| मैला आँचल भारत के गिने चुने शहरी अंचलों को बाहर छोड़कर बाकी भारत की महाकथा है; और अगर महिला उत्पीड़न के नजरिये से देखा जाये तो आदिकालीन हरित जंगल से लेकर उत्तर – आधुनिक कंक्रीट जंगल तक की कथा भी है| पढ़ते समय सबकुछ जाना पहचाना सा लगता है|

पूर्णिया बिहार की भूमि कथा का माध्यम बनी है| दूर दराज का यह समाज एक अदद सड़क, ट्रेन और ट्रांसिस्टर के माध्यम से अपने को आपको राजधानियों की मुख्यधारा से जोड़े मात्र हुए है| समाचार यहाँ मिथक की तरह से आते हैं| हैजा और मलेरिया, उसी तरह लोगों के डराए हुए है जिस तरह साठ साल बाद नई दिल्ली और नवी मुंबई के लोग चिकिनगुनिया और डेंगू जैसी सहमे रहते हैं|

कथानायक मेडिकल कॉलेज के पढ़कर गाँव आ जाता है; धीरे धीरे गाँव में विश्वास, युवाओं में प्यार, देश में नाम और सरकार में सतर्कता कमा लेता है| नहीं, मैं डाक्टर विनायक सेन को याद नहीं कर रहा हूँ| गाँव जातियों में बंटकर भी एक होने का अभिनय बखूबी करता है| अधिकतर लोग अनपढ़ है और जो स्कूल गए है वो सामान्य तरीके से अधपढ़ हैं| जलेबी पूरी की दावत के लिए लोग उतना ही उतावले रहते है जिस तरह से आज बर्गर पीज़ा के लिए; मगर हकीकत यह है कि जिस तरह से देश की अधिसंख्य आबादी ने आज बर्गर पीज़ा नहीं खाया उस वक़्त पूरी जलेबी नहीं खायी थी|

बीमारी से लड़ाई, भारत की आजादी, वर्ग संघर्ष, जाति द्वेष, जागरूकता और स्वार्थ सबके बाच से होकर उपन्यास आगे बढ़ता है| यह उपन्यास एक बड़े कैनवास पर उकेरा गया रेखाचित्र है जिसमे तमाम बारीकियां अपने पूरे नंगेपन के साथ सर उठाये खड़ी हैं| ये सब अपने आप में लघुकथाएं हैं और आसपास अपनी अनुभूति दर्ज करातीं हैं|

पुनःश्च – मेरे हाथ में जो संस्करण है, उसमें विक्रम नायक के रेखाचित्र हैं| मैं विक्रम नायक को रेखाकथाकार के रूप में देखता हूँ| उनके रेखाचित्रों में गंभीर सरलता झलकती है| इस संस्करण में उनके कई चित्र सरल शब्दों में पूरी कथा कहते हैं| बहुत से चित्र मुझे बहुत अच्छे लगे|

बहू बेटी, दामाद बेटा

भारत में स्तिथि कुछ इस तरह से मानी जाती है कि अगर आप किसी घर की बहू हैं तो आप इज्ज़त के पायदान में सबसे नीचे हैं और अगर आप किसी घर के दामाद हैं तो आप इज्ज़त में हर पायदान से ऊपर हैं|

मगर नई हवा शायद कुछ बदल रही है| क्या वाकई??

हमारे वृज क्षेत्र में बहू हर किसी के पैर छूती है तो दामाद हर किसी से पैर छुलवाता है| ध्यान रहे हमारे यहाँ बेटा सभी बड़ों के पैर छूता है, मगर बेटी किसी के पैर नहीं छूती|

अब से कुछ वर्ष पहले जब एक नए नवेले दुल्हे ने अपने ससुर के पैर छुए तो हम सबके दिल में इज्ज़त बढ़ गई| और अगले ही पल उसी परिवार के बहुत से लोगों ने उस थोड़ी सी पुरानी बहू को याद किया जिसने बड़ों के पैर नहीं छुए थे| कुल जमा निष्कर्ष था कि दामाद का पैर छूना अच्छी बात है मगर बहू का पैर न छूना बुरी बात है| सभी लोगों को पैर छूने वाले दामाद में बेटे के दर्शन हुए| मगर पैर न छूने वाली बहू में किसी को बेटी न दिखाई दी|

उसके बाद एक समारोह में मैंने पहली बार एक घर के दामाद को बेटे की तरह खाना परोसते देखा| मगर आधुनिकता को छटका तब लगा जब बेटा उस पूरे समय दोस्तों और रिश्तेदारों से गप्प मारता रहा| मुझे शक हुआ कि क्या दामाद को बेटा बनाने की कवायद में बेटे को दामाद बना दिया गया है| मगर ससुर साहब ने दामाद को समारोह के बाद गले लगाया, “आप तो हमारे बेटे ही हो, हमने तो बेटी देकर बेटा लिया है|” मेरा दिल थोड़ा खुश हुआ| मैंने पूछ लिया फिर तो दामाद को बेटों की तरह दौलत में हिस्सा मिलेगा| ससुर साहब ने जबाब न दिया| बस अगले दिन कोठी के आगे एक नामपट्ट और लग गया, सुपुत्र के नाम का|

एक बार एक सज्जन के मुलाकात हुई| उनकी कन्या के लिए वर की आवश्यकता थी| उनके शब्दों में बेटी देकर बेटा लेना था| दान – दहेज़ से परहेज था| मगर अगले वर्ष उनके सुपुत्र के लग्न- सगाई कार्यक्रम में जाने को मिला तो बोले, “गरीब घर की लड़की है, वर्ना बहुत से लोग थे जो सेडान कार दे रहे थे| हमने घर में क्या कमी है?” मन में आया बोलूं, “सदेच्छा की”| इन सज्जन ने अपनी बेटी की शादी में सिर्फ चालीस लोगों की बारात की अनुमति दी थी| मगर सुपुत्र के विवाह में चालीस का वादा करने के बाद भी बिना किसी पूर्व सुचना के पूरे डेढ़ सौ लोग लेकर पहुँच गए| बाद में फिर एक और बेटी के विवाह में रोने लगे, “सालों ने पहले पच्चीस लोग बोले थे और अब पिचहत्तर ले कर आ रहे हैं|

एक और सज्जन मिले| बहू की तारीफ करते थक न रहे थे| उसके काम, नौकरी, नाम, आचार – विचार सब सुनकर अच्छे लग रहे थे| यहाँ तक बोले, अब बेटी तो पराई लगती है| बहू ही जीवन है| उनके विदा लेकर बाहर निकला ही था कि साथ आये सज्जन ने उनको बेटी सम्बन्धी अपशब्द से सम्मानित किया बोले, जब बीमार हुए थे तो बेटी की ससुराल वालों ने इलाज में खूब खर्चा किया था, बेटी सेवा के लिए पड़ी रही| यहाँ तक कि बेटी का घर टूटने लगा| रिश्तेदारों ने समझा बुझा कर बेटी को उसके घर भेजा| आज जब बेटी घर से निकाली जाती है, तो पराई हो गई|

प्रेम निवेदन

यह बसंत – वैलेंटाइन का प्रेमयुग नहीं है जिसमे इश्क़ इबादत था| ये वो वक़्त है जिसमें लवजिहाद और प्रेमयुद्ध है| सरफिरो के लिए प्रेम पूजा नहीं असामाजिकता है, यौन है, वासना है, बलात्कार है|

एक हिन्दू – एक मुसलमान| एक कायस्थ – एक शेख़| एक शाक्त – एक शिया| एक मंदिर – एक मस्जिद| एक संस्कृतनुमा हिंदी – एक फ़ारसीनुमाउर्दू| एक भैया – एक भाई| एक गाय – एक बकरा| एक गोभी – एक गोश्त| एक नौकरी – एक धन्धा| एक कंप्यूटर – एक कॉमर्स| एक मूँछ – एक दाढ़ी| एक चाकू – एक छुरा| एक ये – वो| एक यहाँ – एक वहाँ| एक ऐसा  – एक वैसा|

हमारे बीच में एक सड़क है जो जिसके फुटपाथ कभी नहीं मिलते, न ही सड़क के किनारे बने घर|

दो घर आमने सामने, जिनका हर रोज सूरज निकलते आमना सामना होता है| उनके बीच सड़क पच्चीस फुट और पच्चीस साल चौड़ी है| हर सड़क के बीच डिवाइडर रहता है, कई बार एक ऊँची दीवार रहती है, जो किसी को दिखती नहीं है, हर किसी को महसूस होती है| यह दीवार दिल में बनती है और सड़क पर जा खड़ी होती है| हर सड़क के बीच डिवाइडर रहता है, कई बार गहरा समंदर रहता है| समंदर ख्यालों में रहता है और दिल उसमें डूब जाता है|

प्यार समर्पण है, प्यार त्याग है मगर प्यार न तो आत्म – समर्पण है, न भागना है|

मगर वो प्रेम क्या जिसे जाहिर भी न किया जाये| प्रेम में इंकार हो या न हो, इजहार तो होना ही चाहिए| हम जानते है कि हम एक दूसरे को प्रेम करते है| न बोलना कई बार बहुत ज्यादा होता है और बोलना कम| मगर समाज बहरा होता है, क़ानून अँधा|

कई बार लगता है दो घर बहुत दूर हैं और उनके बीच में जो समंदर है उसमें तैरते हुए और दूर चले जायेंगे| उनके बीच में एक पुल बना देना चाहिए| उन्हें रस्सी से बाँध दिया जाना चाहिए| उनके बीच में लक्ष्मण रेखा नहीं लक्ष्मण झूला चाहिए|

बस तय किया है, इस वैलेंटाइन तय किया दोनों घरों को मजबूत रस्सी से बाँध कस कर बांध दिया जाए, हमेशा के लिए|

अपने एनसीसी के दिन याद आ रहे हैं| उन दिनों सीखा था कि किस तरह से दो उंची बिल्डिंगों या पेड़ों के बीच में रस्सियों का पुल बनाया जाये, जिससे कि दोनों के बीच आना जाना हो सके| इस नेक काम में भरोसे के दो लोगों की जरूरत है जिन्हें इस तरह के पुल बनाना आता है और जो सामने वाले घर की छत पर जा कर इस नेक काम को अंजाम दे सकें| अब यह तय है कि तीन मंजिल ऊँचे दोनों घरों के बीच में एक रस्सी का मजबूत पुल बना दिया जाये, अपना एक लक्ष्मण झूला|

वैलेंटाइन डे के दिन सुबह अपनी खास शेरवानी पहने मैं| रस्सी के उस पुल के बीच, बीचों बीच मैं… एक छोटा सा छोटा सा गुलदस्ता हाथों में, ताजा सफ़ेद गुलाब और तरोताजा लाल गुलाब का गुलदस्ता| वहाँ से उनके मोबाइल पर एक कॉल.. अब प्लीज छत पर आ जाओ..| और आसमान में उड़ती हुई बहुत सारी लाल और सफ़ेद पतंगों के बीच हवा में झूलते हुए रस्सियों के मजबूत झूले पर एक प्रेम निवेदन|

टिपण्णी : यह पोस्ट http://cupidgames.closeup.in/. के सहयोग से  इंडीब्लॉगर द्वारा किये गए आयोजन के लिए लिखी गई है|

कुलनाम

अभी हाल में “ओऍमजी – ओह माय गॉड” फिल्म देखते हुए अचानक एक संवाद पर ध्यान रुक गया| ईश्वर का किरदार अपना नाम बताता है “कृष्णा वासुदेव यादव”| इस संवाद में तो तथ्यात्मक गलतियाँ है;

 

१.      उत्तर भारत में जहाँ कृष्ण का जन्म हुआ था वहां पर मध्य नाम में पिता का नाम नहीं लगता| वास्तव में मध्य नाम की परंपरा ही नहीं है, मध्य नाम के रूप में प्रयोग होने वाला शब्द वास्तव में प्रथम नाम का ही दूसरा भाग हैं, जैसे मेरे नाम में मोहन|

 

२.      उस काल में कुलनाम लगाने का प्रचलन नहीं था|

 

'Vamana Avatar' (incarnation as 'Vamana') of V...

‘Vamana Avatar’ (incarnation as ‘Vamana’) of Vishnu and King ‘Bali’. (Photo credit: Wikipedia)

 

 

 

जाति सूचक शब्द में नाम का प्रयोग शायद असुर नामों में मिलता है, जैसे महिषासुर, भौमासुर| यह भी बहुत बाद के समय में| प्रारंभिक असुर नामों में भी इस तरह का प्रयोग नहीं है, जैसे – हिरन्यकश्यप, प्रह्लाद, बालि, आदि|

 

ऐतिहासिक नामों में मुझे चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम में ही कुल नाम का प्रयोग मिलता है, स्वयं मौर्य वंश में भी किसी और शासक ने कुलनाम का प्रयोग नहीं किया है| विश्वास किया जाता है कि वर्धनकाल तक भारत में जाति जन्म आधारित न होकर कर्म आधारित थी| यदि उस समय जाति या कर्म सूचक कुलनाम लगाये होते तो हो सकता कि शर्मा जी का बेटा वर्मा जी हो| सामान्यतः, मध्ययुग तक कुलनाम का प्रयोग नहीं मिलता| हमें पृथ्वीराज चौहान का नाम पहली बार कुलनाम के साथ मिलता है|

 

 

स्त्रियों में कुलनाम लगाने की परंपरा बीसवीं सदी तक नहीं थी| स्त्रिओं में कुमारी, देवी, रानी आदि लगा कर ही नाम समाप्त हो जाता था| बाद में जब स्त्रिओं में कुलनाम लगाने की परंपरा आयत हुई तो बुरा हाल हो गया है| प्रायः सभी स्त्रिओं को विवाह के बाद अपना कुलनाम बदलकर अपनी पहचान बदलनी पड़ती है अथवा अपनी पुरानी पहचान में पति की पहचान का पुछल्ला जोड़ना पड़ता है|

 

पाठकों के विचारों और टिप्पणियों का स्वागत है|

 

दो ऑटोरिक्शा चालक

अभी गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में अपना पर्चा प्रस्तुत करने के लिए जाना हुआ| जाते समय अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से विश्वविद्यालय तक और लौटते समय दिल्ली कैंट से लोदी रोड तक ऑटो रिक्शा की सवारी का लुफ्त उठाया और सामायिक विषयों पर चर्चा हुई| दोनों रिक्शा चालकों की समाज और देश के प्रति जागरूकता और उस पर चर्चा करने की उत्कंठा ने मुझे प्रभावित किया|

गुजरात:

मुझे नियत समय पर पहुंचना कठिन लग रहा था और रास्ता भी लम्बा था| बहुत थोड़े से मोलभाव के बाद, मैं अपनी दाढ़ी और पहनावे से मुस्लिम प्रतीत होने वाले चालक के साथ चल दिया| मैंने सामान्य शिष्टाचार के बाद सीधे ही प्रश्न दाग दिया. अगले चुनावों में वोट किसे दोगे| बिना किसी लाग लपेट के उत्तर था, मोदी| मैंने दोबारा पूछा, भाजपा या मोदी? मोदी सर| मैंने कहा, वो तो कसाई है, उसे वोट दोगे| चालक ने शीशे में मेरी शक्ल देखी, आप कहाँ से आये है? मैंने कहा दिल्ली से, अलीगढ़ का रहने वाला हूँ| उसने लम्बी सांस ली और शीशे में दोबारा देखा| मैंने उचित समझा कि बता दूँ कि हिन्दू हूँ|

“हिन्दुओं से डर नहीं लगता सर, सब इंसान हैं|” थोड़ी देर रुका, सर ये गुजरात है, “जिन हिन्दुओं ने बहुत सारे मुसलामानों की जान बचाई थी वो भी सबके सामने मोदी ही बोलते है| बोलना पड़ता है सर| वोट का पता नहीं, अगर दिया तो मोदी को नहीं देंगे और कांग्रेस या और कोई हैं ही नहीं तो देंगे किसे?” अब मेरे चुप रहने की बारी थी|

काफी देर हम लोग चुप रहे, फिर उसने शुरू किया, “सरकार बड़े लोगों की होती है और हम तो बस वोट देते हैं| अगर वोट भी न दें तो ये लोग तो हमें कभी याद न करें| इस देश में वोट बैंक और नोट बैंक दो ही कुछ पकड़ रखते हैं| हम कोशिश कर रहे हैं, वोट बैंक बने रहें| इसलिए वोट देंगे|”

Drive thru

Drive thru (Photo credit: Nataraj Metz)

दिल्ली:

दिल्ली कैंट स्टेशन पर उतरने ऑटो रिक्शा दलाल से मीटर किराये से ऊपर पचास रुपया तय हुआ| ऑटो चालक सिख था| उसने बताया कि ज्यादातर जगहों पर अवैध पार्किंग ठेके है और ये लोग पचास रुपया लेते है| पुलिस इन ठेके वालों से हफ्ता वसूलती है और ये बिना रोकटोक ऑटो खड़ा करने की जगह देते हैं| दिल्ली एअरपोर्ट पर ऑटो के लिए कोई वैध – अवैध पार्किंग नहीं है क्योंकि ऑटो रिक्शा देश की शान के खिलाफ हैं| ऑटो पर विज्ञापन से लेकर पुलिस भ्रष्टाचार तक लम्बी चर्चा हुई| उसने भाजपा और कांग्रेस को सगा भाई बताया| “हिस्सा तय है जी सारे देश में इनका ७० – ३० का|” “कॉमनवेल्थ की समिति में दोनों के लोग थे साहब|” “क्रिकेट का रंडीखाना तो दाउद चलाता है साहब और भाजपा – कांग्रेस के लोग उसमें नोट बटोरने जाते हैं|” उसके मन और जुबान की कडुवाहट बढती रही और मेरे लिए सुनना कठिन हो गया|

अंत में उसने कहा, “साहब हमें नहीं पता कि केजरीवाल कैसा करेगा, क्या करेगा और उसके पास मंत्री बनाने लायक अच्छे समझदार लोग हैं या नहीं; मगर हम उसे वोट देकर जरूर देखेंगे|”

मैं सोचता हूँ, अगर देश की आम जनता के मन में लोकतंत्र की भावना मजबूत हैं, यही अच्छी बात दिखती है| वरना तो लोग हथियार उठाने के लिए भी तैयार ही जाएँ| कहीं पढ़ा था न इन्ही दो चार साल में “शहरी नक्सलाईट”| 

तिरंगा, पतंगे, और आजादी का जिन्न|

 

इस समय जब मैं यह आलेख लिख रहा हूँ, हम सभी स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं|

कल शाम नई दिल्ली के खन्ना मार्किट में टहलते हुए और उसके बाद मुझे कई बार सोचना पड़ा कि हम अपना स्वतंत्रता दिवस किस तरह से मानते हैं?

पहले थोडा परिचय दे दिया जाये| ७० – ८० दुकानों वाले खन्ना मार्किट; लोदी कॉलोनी, जोरबाग और बटुकेश्वर दत्त कॉलोनी का मोहल्ला बाजार ही है| यहाँ पर किसी भी समय आपको चार पांच सौ से अधिक लोग कभी नहीं दिखाई देते हैं| शाम होने से पहले घर गृहस्थी का सामान अधिक बिकता है और शाम होने के बाद अधिकतर भीड़, खाने पीने के लिए ही होती है| मेरे विचार से दसेक तो रेस्तरां और हलवाई ही होंगे और ठेले तो सभी खाने पीने के है ही| अधिकतर रिवाज फोन पर आर्डर लिखवा कर घर पर ही खाना मंगवाने का है|

कल नजारा अलग ही था| जब भी हम कोई त्यौहार मानते है, बाजार में वो हमेशा ही एक दिन पहले हंसी ख़ुशी और पसीने के साथ मनाया जाता है| कल दोपहर से ही स्वतंत्रता दिवस शुरू हो गया| तिरंगे, पतंगों और खाने पीने की धूम थी| छोटे बच्चे तिरंगे के हर रूप पर फ़िदा थे.. झंडे, पर्चे, कागज, विज्ञापन, केक, फीते, कुछ भी| शायद कल उन्हें देश के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा था| तिरंगी पतंगे तो गजब ढाती हैं, हमेशा| हर रंग रूप की पतंगें थी| पतंग की हर दुकान पर हर रंग की पतंगें और हर रंग – रंगत के लोग थे| पतंग खरीदते, मांझा खरीदते, चरखी सँभालते, कन्ने बांधते; सब तरह के लोग| पतंग न उड़ा पाने के कारण मुझे हमेशा शर्मिंदगी महसूस होती है| कल तो लगा कि शायद जो लोग पतंग नहीं उड़ा पाते होंगे उनके भारतीय होने पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है| “वो काटा” तो हमारा राष्ट्रीय मूल मंत्र है| “वो काटा गाँधी को.. वो काटा नेहरू को..; है न मजेदार|

फिर खाने पीने की बारी आ गयी| ठेले पर चाट पकोड़ी जल्दी ख़त्म हो गयी| गोलगप्पे जरूर देर तक टिके, मगर उनकी आपूर्ति आसान थी और बार बार हो रही थी| मगर, असल जश्न तो दो खास दुकानों पर चल रहा था| केवल दो खास दुकानें.. दोनों पर पचास पचास लोग.. दो पुलिस बाइक.. चार पुलिस वाले..| थके मारे लोग, जश्न से खुश होते लोग, यार-बास लोग, मस्त लोग, मस्ती से पस्त लोग| विद्यार्थी भी है… और कब्र का इन्तजार करने वाले बुढ्ढे भी| न भीड़ ख़त्म होती है न जोश| एक जाता चार आते| चखना भी लेना था, और बर्फ के टुकड़े भी| कोई अनुशासन नहीं.. कोई धक्कम धक्का भी नहीं.. सब्र ऐसा जो शायद कभी रेलवे स्टेशन पर देखने को न मिले| पैसा बह रहा है, उड़ रहा है, कूद रहा है.. गरीबी की ऐसी तैसी..| क्या रखा है ३२ रुपल्ली की गरीबी में| बोतल और कैन.., यस, वी कैन…|

रात ढलते ढलते जब बाकि का सारा बाजार बंद होने लगा, मगर यहाँ तो जश्न की रात थी| लोग आजादी के नशे में चूर थे, उनकी हर बोतल में आजादी बंद थी, उनकी हर कैन में आजादी के बुलबुले उठ रहे थे|

मैं थक गया था; घर चला आया| घडी ने साढ़े दस बजा दिए थे|

सुबह आसमां में बादल थे, चीलें थी और हमारी रंग बिरंगी पतंगें थीं| सड़क पर तिरंगे लहराते बच्चे थे| जन सुविधाएँ के बोर्ड के ठीक नीचे, आजाद देश का आजाद सपूत नशे में चूर चित्त पड़ा था| एक साथी ने कहा, आज ड्राई-डे है न, कल डबल पीना पड़ा होगा न||

कामवाली बाई ने कहा, आज ड्राई डे है तो क्या कल फ्लड डे था न भैया|

तिरंगा, पतंगे, और बोतल से निकला आजादी का जिन्न|