अशोक चाट भंडार, चावड़ी बाज़ार


मैं अक्सर चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर ३ का प्रयोग नहीं करता| वरना सौ की पत्ती का खर्चा पक्का है| फिर भी यह बात अलग है कि मैं जब भी चावड़ी बाज़ार जाता हूँ तो यहाँ अक्सर पहुँच ही जाता हूँ| यह हौज़ काज़ी चौक है और यहीं है अशोक चाट भंडार|

मेरा यहाँ से भावनात्मक लगाव है| दर-असल मेरे नानाजी चाट पकौड़ी के इतने शौक़ीन थे कि खुद से बनाना सीखा था उन्होंने| उनके हाथ का बनाया कलमी-बड़ा मैंने एक ही बार खाया था बचपन में कभी, आज तक वो बेहतरीन कलमी बड़ा भुलाये नहीं भूला| तो अशोक चाट भंडार की ख़ासियत यह है कि कलमी – बड़ा बनाने वाली इस से बेहतर दुकान, या कहिये इस के अलावा कोई और दुकान मैं नहीं जानता| वैसे हिन्दू अख़बार में इस दुकान से बेहतर दुकान बताने के लिए सालों पहले एक पूरी कथा छापी थी| खाने वाले दोनों जगह खाकर बहस को जिन्दा रखे हुए हैं| उस दूसरी दुकान के बारे में बात फिर कभी|

यहाँ का मेनू कोई बहुत बड़ा नहीं है, चाट-पकौड़ी की दुकानों का होता भी नहीं| मगर यहाँ स्वाद खास है और चाट तो स्वाद पर ही बिकती है| यहाँ खास बात है भारत की देशी रतालू यहाँ चाट में प्रयोग होता है| विदेश से आया आलू तो खैर है ही|

मेरी पहली पसंदीदा चाट है यहाँ – कलमी-बड़ा| यह दरदरी पीसी गई चना दाल से बनता है और इसीलिए इसे बनाना कठिन काम है| सका अपना कुरकुरा स्वाद मुंह में घुलता हुआ इसे हर-दिल-अज़ीज़ बनता है| बेहतरीन दही, अध्-उबले रतालू और हलके मसाले इसे यादगार स्वाद देते हैं| मैं आपको सलाह दूंगा, अपनी पसंद से दही- चटनी कम ज्यादा कराने की जगह दुकानदार पर छोड़ दीजिये| उसे हमसे बेहतर पता है|

इसके बाद कचौड़ी चाट का मजा लिया जा सकता है| ऐसा नहीं कि यहाँ कचौड़ी सामान्य कचौड़ी से अलग है, अलग है उसका परोसना| सब जगह कचौड़ी सब्जी या चटनी के साथ मिलती है और प्रायः नाश्ते का अहसास देती हैं| बाकि जगह से अलग यहाँ कचौड़ी नाश्ता नहीं वरन चाट है और दही, चटनी, मसाले के साथ मिलती है|

और हम हिन्दुस्तानियों की सबसे बड़ी साझा कमजोरियों में से एक यहाँ है – गोल-गप्पा, जिसके पानी पर दुनिया का हर पानी – पानी भरता है| यहाँ गोलगप्पे का पानी काफी मसालेदार है और आपकी हिन्दुस्तानी जीभ के लिए यह पूरी तरह सकूं देने वाला है|

आते रहेंगे इस सत्तर साल पुरानी दुकान में|

स्थान: अशोक चाट भंडार, हौज़ क़ाज़ी, चावड़ी बाज़ार, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: कलमी-बड़ा, कचौड़ी चाट, गोल-गप्पे,

पांच: पांच

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गोविंदा का छप्पन भोग


प्राचीन भारत में व्यवसायी धार्मिक हुआ करते थे आजकल धर्म व्यवसायिक हो गए हैं| लम्बे समय से कुछ धर्म-सम्प्रदाय मात्र अपने अनुयायियों के लिए उत्पाद बनाते और बेचते रहे हैं| इससे इनके आश्रम, मठ, मंदिर, मस्जिद के खर्चे निकल जाते थे| महंगे प्रसाद और ऊँचे चंदे देने के बाद मिलने वाले भोजन पर चर्चा करना अब बेमानी लगने लगा है| आज कुछ मठाधीश, यहाँ तक कि सन्यासी, बाक़ायदा व्यवसायों के निदेशक मंडलों में हैं या उन्हें बाहर नियंत्रित कर रहे हैं|

गोविंदा की थाली, छप्पन भोग आदि के बारे में सुनकर भी यही सब विचार आए| गोविंदा, हिन्दू वैष्णव कृष्ण भक्ति धारा के इस्कॉन संगठन (अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ) द्वारा संचालित भोजनालय श्रृंखला है| यह भोजनालय और इसके सहायक जलपानगृह और मिष्ठान भंडार प्रायः इनके मंदिर प्रांगण में होते हैं| दिल्ली स्तिथ इस्कॉन मंदिर में हर माह के अंतिम रविवार छप्पन भोजन उत्सव का आयोजन होता है|

आज भारतीय भोजन में लगातार प्याज लहसुन का प्रयोग बढ़ रहा है| पिछली पीढ़ी तक जिन परिवारों में प्याज लहसुन प्रयोग होता था उनको आज बिना प्याज लहसुन के खाना बनाना पहेली लगता है| (कहावत है, नया मुल्ला प्याज ज्यादा खाता है|) दिल्ली में तो खैर पंजाबी, मुगलाई, ईरानी, और कायस्थ खाने का जबरदस्त प्रभाव है| ऐसे में यह गोविंदा भोजनालय बिना प्याज लहसुन के बने राजसिक भोजन का बढ़िया विकल्प है|

इस अप्रेल महीन के अंतिम रविवार मैंने छप्पन भोग का भोग लगाने का इरादा किया| मन मैं भावना थी, प्रसाद के छप्पन प्रकार के भोजन मिलेंगे| यहाँ की व्यंजन सूची में लगभग वही सब व्यंजन है जिन्हें आप दिल्ली में किसी भी सामान्यतः अच्छे भोजनालय में पाएंगे|

छप्पन भोज के दिन यहाँ बुफे है| पहुँचने पर सबसे पहले स्नेक्स लेने का आग्रह हुआ पकौड़ा, कचौड़ी- आलू सब्जी, पाव-भाजी, पापड़ी चाट, गोलगप्पे| बाद में कई सलाद, दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय, चाइनीज भोजन  और मिठाइयाँ| मसालों का संतुलित से थोड़ा ही अधिक प्रयोग बाजार में मिलने वाले आम पकवानों से थोड़ा हल्का बनाता है| इसमें कोई शक नहीं कि भोजन मांस मछली प्याज लहसुन से मुक्त होने के कारण तामसिक नहीं है| आलू, जैसे कंद की उपस्तिथि के कारण इसे जैन भोजन भी नहीं कहा जा सकता| मसालों की व्यापकता के कारण सात्विकता के पैमाने पर खरा नहीं उतरता, शुद्ध भारतीय राजसिक भोजन|

बुफे सिस्टम में पकवानों के अधिक विकल्प हमेशा आपको ललचाते हैं| नियंत्रण रखना अपने आप में योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः का भाव उत्त्पन्न करता है|

स्थान: गोविंदा भोजनालय, इस्कान मंदिर, दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: छप्पनभोग

पांच: साढ़े तीन

काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी


काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह नहीं रही होगी| इसमें बैठने की जगह हो न हो, यह जगह खास तो है और हर खाने वाले के दिल्ली दिल में खास जगह बना लेती है| पहली बार जब गया तो अजीब से सवाल से उमड़ रहे थे| पुराने दुकान की पुरानी डाट की छत से लटके पुराने पंखे, पुराने तंदूर से निकलती नान की महक, आप की साँसों से होते हुए पेट में पुकारने लगती है|

आप मेनू देखते है तो धुआंधार शब्द बार बार दिखता है – धुआंधार नान, धुआंधार लच्छा परांठा, धुआंधार पनीर मख्खन मसाला| यूँ है तो यह लज़ीज, मगर आपको चेतावनी देता हूँ – न खाएं| अगर खाते हैं तो छोड़ नहीं पाएंगे और हफ्तेभर तन-मन-धन से याद करेंगें|

यह परिवार और दोस्ती में प्रेम बढ़ाने वाला भोजनालय है – यहाँ एक नान में से “हम दो – हमारे दो” खा लेते हैं, कोई मनाही नहीं| आप पहले एक नान मंगा लें, लुफ्त उठायें और बाद में जरूरत के मुताबिक दूसरा – तीसरा मंगा सकते हैं| जब आप यहाँ कोई भारी-भरकम आर्डर देते हैं तो वेटर बेहद शीघ्र-शांत सलीके से आपको ये सलाह देंगें|

मेरे बेटे को यहाँ की लस्सी और रायता पसंद है, साथ में आलू प्याज  नान| उसके लिए यहाँ कुछ और मंगाने का मतलब नहीं| मैं यहाँ के नान का मुलाज़िम हुआ जाता हूँ, किसी सब्जी- दाल की न पूछिए|

दाल और सब्जी ज्यादातर कम मसालेदार और उम्दा हैं, मगर नान का ज़ायका आपके दिल में जो घर करता है, तो बाकि चीज़ो के लिए जगह नहीं| अमृतसरी थाली भी बहुत पसंद की जाती है| यह शाकाहारी भोजनालय है, जिसके पुराने बोर्ड पर “शुद्ध वैष्णव” लिखा हुआ है| अलबत्ता, प्याज लहसुन मिल जाता है| सलाद में बिना मांगे ढेर से प्याज मिलती है|

यह जगह है, पुरानी दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के पास| आप खारी बावली से बेहद उम्दा मेवे – मखानों की ख़रीददारी करने के बाद यहाँ आयें| आप दुकान में बाहर ढेर ग्राहक खड़े पाएंगे और दो बड़े तंदूर| परिवार वाले ग्राहक दूसरी मंजिल (first floor) पर बिठाये जाते हैं और उनके लिए अलग तंदूर वहां लगा है| तीनों तंदूर पर लगातार काम होता रहता है|

स्थान: काले – दी – हट्टी, निकट फ़तेहपुरी, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नान, धुआंधार नान,

पांच: साढ़े चार