चा बार, कनॉट प्लेस

परिचित पूछते हैं कि क्या कभी कभी चाय पीने वाले को भी चाय के लिए पसंदीदा जगह ढूढ़नी पड़ती है| मुझे लगता है, चाय बेहतर हो तब ही उसका असली मजा है| चा बार, चाय के लिए दिल्ली में मेरी पसंदीदा जगह में से एक है|

जब मैं पहली बार गया था तब ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर और चा बार स्टेटमेंट्स हाउस में हुआ करते थे| उन दिनों सर्विस में गजब की ट्रेडमार्क सुस्ती थी| आपके आर्डर करने के बाद भी वेटर दो चार बार पूछ जाता था कि कितनी और देर बार चाय लानी है| मकसद था आपको वहां बैठ कर आराम से पढ़ने लिखने देना| यह बात इसे चाय पीने वालों के साथ साथ पढ़ाकू और लिख्खाड़ लोगों का बेहद पसंदीदा बनती थी| स्टेटमेंट हाउस से चा बार बंद होने तक मैं लगभग हर महीने वहां गया|  मैंने इसके भारी भरकम मेनू में से बहुत सी चाय पी डालीं थीं – विश्रांति, हिबिस्कस, अश्वगंधा, नीलगिरी, इंडियन हर्बल और न जाने क्या क्या| कुल मिलकर सत्तर –अस्सी चाय तो हैं हीं| सबमें अपना अलग स्वाद है| ट्रक ड्राईवर चाय तो खैर सबसे पहले पी थी, उसका फ़ोटो भी सोशल मीडिया पर डाला था|

चा बार के दोबारा खुलने के बाद मैं पहले ही हफ्ते में यहाँ पहुंचा| नए स्थान पर चा बार और ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर दोनों का माहौल पहले से ऊर्जावान था| व्यंजन-सूची पहले से बेहतर प्रतीत होती थी| असल में सेवा पहले के मुकाबले बेहतर थी| शायद अब चा बार को सहायक इकाई की जगह एक लाभ-इकाई के रूप में स्थापित किया गया है| जहाँ पहले चा बार शांत माहौल का पर्याय था अब यहाँ एक ऊष्मा है| लोग मिलने, चाय पीने, बातें करने आते हैं| पुराने ज़माने की तरह, अब शांति से बैठकर आप दो चार पुस्तक पढने के लिए नहीं यहाँ नहीं बैठते| बैठकर पढने का विकल्प ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर अब भी देता है| आज कल ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर और चा बार सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है|

चलिए चाय की बात की जाए| शायद यह दिल्ली के किसी और भोजनालय, कैफ़े या बार से अधिक तरह की चाय उपलब्ध करता है| बेहतरीन है कि आपको चाय के बारे में सधे हुए सटीक शब्दों में व्यंजन-सूची से जानकारी मिलती है| व्यंजन सूची काफी बड़ी है और आपको बहुत परिश्रम पड़ता हैं  अपने मन, माहौल, मकसद के मिलान करती चाय पीने के लिए| मसलन अगर आप यहाँ से निकल कर डांस-फ्लोर पर उतरने वाले हैं तो अंतर मौन जैसी गंभीर शांत चाय पीने का कोई अर्थ नहीं| अगर आप गंभीरता से व्यंजन सूची पढ़ते और चाय की चुस्की भरते हैं तब यह अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त करते हैं| पुरानी कहावत हैं, पेय बहुत धीरे धीरे घूँट घूँट कर कर गंभीरता से पीना चाहिए| बेहतर चाय का आनंद आपको आपको आनंद प्रदान करता है|

स्थान: चा बार, ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर, कनाट प्लेस, नई दिल्ली,

भोजन: मुख्यतः शाकाहारी

खास: चाय,

पांच: साढ़े चार

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चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट

जब से मैं लोदी रोड इलाके में रहने आया हूँ, यह मेरा पसंदीदा भोजनालय है| दिल्ली शहर के कई बड़े नामी दक्षिण भारतीय भोजनालय, मेरी राय में, स्वाद में इसके मुकाबले नहीं ठहरते| हर महीने मैं एक बार यहाँ से कुछ न कुछ गृह वितरण पर मंगाया जाता है| भोजन घर मंगाने का हमें थोड़ा नुक्सान है| एक तो वेलकम ड्रिंक रसम नहीं मिलता और दूसरा तीन चटनी की जगह एक से काम चलाना पड़ता है|

यहाँ पहुँचते ही आपको गर्मागर्म शानदार रसम पीने के लिए मिलती है| जब तक आपका मुख्य व्यंजन  आये, आप रसम के घूँट भर सकते हैं| रसम पीने से न सिर्फ भूख बढ़ती है, वरन पाचन क्षमता भी बढ़ती है| रक्तचाप वाले रसम न लें, यहाँ रसम में हल्का नमक ज्यादा रहता है| रसम पर भोजन की बात समाप्त क्या, शुरू भी नहीं हुई है| यहाँ सुबह के नाश्ते से रात के भोजन का इंतजाम है|

यहाँ सबसे बेहतरीन दही-बड़ा| यहाँ का दही-बड़ा दिल्ली की किसी भी चाट-पकौड़ी की दुकान से बेहतर है| निश्चित ही बड़ा, उत्तर भारतीय बड़े से भिन्न है| मगर सिर्फ इसलिए की यह बड़ा भिन्न है, मैं इसकी तारीफ नहीं कर रहा हूँ, वरन इसका स्वाद लाजबाब है| यहाँ की एकमात्र मिठाई केसरी-बात (सूज़ी-हलवा) बेहतरीन है| यहाँ केसरी-बात दिल्ली या उत्तर भारत में मिलने वाले सूजी-हलवे से थोड़ा अलग तरीके से बनता है| यहाँ नाश्ते में पोंगल मेरा प्रिय है| मसाला इडली का स्वाद भी बेहतर है|

खाने की बात करें तो रवा डोसा, मैसूर डोसा मसाला, नीलगिरी उत्तप्पम पसंद आते हैं| यहाँ आकर कहने वालों के लिए तीन तरह की चटनी है – नारियल, टमाटर और कड़ी-पत्ता| लेकिन आपको यहाँ मिलता है एक और पकवान – रागी डोसा, जो गर्म-गर्म खाने में आपको अलग और शानदार स्वाद देता है| रागी दक्षिण भारत में उगने वाला पोष्टिक अन्न है| रागी डोसा ठंडा होने पर उतना अच्छा नहीं लगता, इसलिए गप्पे मारते हुए खाने के लिए नहीं है| चिदंबरम रवा स्पेशल मसाला डोसा स्वाद पसंद लोगों के लिए है| यहाँ घर पर कुछ भी नहीं मंगाया जा सकता, कुछ चीजें यहाँ आकर ही खानी होतीं है|

यहाँ की थाली एक बार जरूर खानी चाहिए| दो सब्जी, चावल, निम्बू चावल, सांभर, रसम, दो पूड़ी, दही, केसरी-बात, पापड़, आचार के साथ यह कई लोगों के लिए खुराक से अधिक हो जाती है| मगर इसकी खास बात है, दक्षिण भारतीय तरीके से बनीं सब्जियां| थ्री –इन –वन डोसा और उत्तपम भी पसंद किये जाते हैं|

सन 1930 में दक्षिण भारतीय सरकारी अधिकारीयों को ध्यान में रख कर खोला गया यह भोजनालय 1950 से इस स्थान पर है| यह नई दिल्ली के सरकारी कार्यालयों में बहुत लोकप्रिय है| इस भोजनालय के बाहर दक्षिण भारतीय नमकीन भी मिलता है| जो निश्चित ही उत्तर भारतीय नमकीन से अलग स्वाद देता है|

स्थान: चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट, लोदी रोड, नई दिल्ली,
भोजन: शाकाहारी
खास: दही-बड़ा, डोसा, पोंगल, रागी डोसा,
पांच: चार

शिब्बो की कचौड़ी, अलीगढ़

शिब्बो ने आठ साल की उम्र में सन 1951 में कचौड़ी बेचना शुरू किया – आज से छियासठ साल पहले| उनके बेटे ने रणजी खेला, उनका पौत्र ऑफलाइन-ऑनलाइन कचौड़ी बेचता है| दुकान का नाम जय शिव कचौड़ी भण्डार और वेबसाइट का नाम शिब्बोजी है| होते रहिये| हम अलीगढ़ वालों के लिए वो शिब्बो और उनकी दुकान की गद्दी पर बैठने वाला हर व्यक्ति शिब्बो|

शिब्बो – अलीगढ़ी कचौड़ी की पहचान है| अलीगढ़ी कचौड़ी आम कचौड़ी की तरह मुलायम और फूली हुई नहीं होती, वरन कड़क, भुरभुरी और चपटी होती हैं| अधिकतर इनके गोलाकार में भी कमी निकाली जा सकती है| अलीगढ़ वाले इतने सख्त आटे से कचौड़ी बनाते हैं कि इसका गोल होना मुश्किल और कटा-फटा होना आसान है| कचौड़ी के अन्दर कचौड़ी का मसाला इतना कम कि कई बार मालूम भी नहीं पड़ता| अलीगढ़ में अधिकतर कचौड़ी वाले आटे में ही मसाला मिला देते हैं| लेकिन शिब्बो का अपना अलग मानक है| आम अलीगढ़ी कचौड़ी से यह थोड़ा अलग और बेहतरीन है|

शिब्बो की कचौड़ी की महत्वपूर्ण बात है – देशी घी, कड़क कचौड़ी की भुरभुरी पपड़ी और चपटापन|

आम अलीगढ़ी कचौड़ी की तरह शिब्बो की कचौड़ी भी आलू की मसालेदार सब्जी के साथ मिलती है| लोहे की कढ़ाही में हींग और तेज गरम मसाले में बनी सब्जी अपनी श्यामल रंगत और तीखे स्वाद से अलग पहचान रखती है| इसे हम कचौड़ी वाली सब्जी कहते हैं| यह सब्जी आम आलू सब्जी की तरह पतली या रसेदार नहीं होती| यह काफी गाढ़ी होती है| कई बार लोग इसमें रस बनाने के लिए सन्नाटा (अलीगढ़ी रायता) मिलाते हैं| सब्जी और सन्नाटे के मिश्रण स्वाद को और अलग ऊँचाई पर पहुंचा देता है| सभी बड़ी कचौड़ी वालों की तरह शिब्बो के यहाँ भी हल्के और तेज मसाले की सब्जी मौजूद है| हल्के मसाले का अर्थ यह नहीं की सब्जी पूरी तरह हल्की हो जाए| भाई अपनी मसालेदार इज्जत का ध्यान पूरा रखा जाता है|

कचौड़ी- सब्जी के साथ में है – सन्नाटा| सन्नाटा – यानि बहुत खट्टे दही का पतला रायता| इसकी शोभा है पीला मिर्च| यदाकदा बूंदी भी मिलाई जाती है| जितना ज्यादा खट्टा दही और जितना ज्यादा पतला सन्नाटा हो, उतना ही स्वाद आता है| बेहतरीन रायते को पीकर आपके कान भले ही लाल पीले हों, मगर हम इसे सुपाच्य मानते हैं| और मिर्च को छोड़ दें तो यह है भी सुपाच्य, मगर मिर्च न होने पर दही के बर्तन की इस धोवन को कौन पीना चाहेगा?

अलीगढ़ी कचौड़ी अलीगढ़ में हर मोड़ पर मिल जाती है| मगर शिब्बो की बात अलग है| शिब्बो की दुकान अब पहले से ज्यादा बड़ी हो गई है| बैठकर खाने का प्रबंध हुआ है| पूड़ी सब्जी, लड्डू, हलवा और जलेबी भी बेहद स्वादिष्ट मिलती है|

स्थान: शिब्बो की कचौड़ी, जय शिव कचौड़ी भण्डार, बड़ा बाजार, अलीगढ़

भोजन: शाकाहारी

खास: अलीगढ़ी कचौड़ी, आलू सब्जी, सन्नाटा, जलेबी,

पांच: साढ़े चार

अशोक चाट भंडार, चावड़ी बाज़ार

मैं अक्सर चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर ३ का प्रयोग नहीं करता| वरना सौ की पत्ती का खर्चा पक्का है| फिर भी यह बात अलग है कि मैं जब भी चावड़ी बाज़ार जाता हूँ तो यहाँ अक्सर पहुँच ही जाता हूँ| यह हौज़ काज़ी चौक है और यहीं है अशोक चाट भंडार|

मेरा यहाँ से भावनात्मक लगाव है| दर-असल मेरे नानाजी चाट पकौड़ी के इतने शौक़ीन थे कि खुद से बनाना सीखा था उन्होंने| उनके हाथ का बनाया कलमी-बड़ा मैंने एक ही बार खाया था बचपन में कभी, आज तक वो बेहतरीन कलमी बड़ा भुलाये नहीं भूला| तो अशोक चाट भंडार की ख़ासियत यह है कि कलमी – बड़ा बनाने वाली इस से बेहतर दुकान, या कहिये इस के अलावा कोई और दुकान मैं नहीं जानता| वैसे हिन्दू अख़बार में इस दुकान से बेहतर दुकान बताने के लिए सालों पहले एक पूरी कथा छापी थी| खाने वाले दोनों जगह खाकर बहस को जिन्दा रखे हुए हैं| उस दूसरी दुकान के बारे में बात फिर कभी|

यहाँ का मेनू कोई बहुत बड़ा नहीं है, चाट-पकौड़ी की दुकानों का होता भी नहीं| मगर यहाँ स्वाद खास है और चाट तो स्वाद पर ही बिकती है| यहाँ खास बात है भारत की देशी रतालू यहाँ चाट में प्रयोग होता है| विदेश से आया आलू तो खैर है ही|

मेरी पहली पसंदीदा चाट है यहाँ – कलमी-बड़ा| यह दरदरी पीसी गई चना दाल से बनता है और इसीलिए इसे बनाना कठिन काम है| सका अपना कुरकुरा स्वाद मुंह में घुलता हुआ इसे हर-दिल-अज़ीज़ बनता है| बेहतरीन दही, अध्-उबले रतालू और हलके मसाले इसे यादगार स्वाद देते हैं| मैं आपको सलाह दूंगा, अपनी पसंद से दही- चटनी कम ज्यादा कराने की जगह दुकानदार पर छोड़ दीजिये| उसे हमसे बेहतर पता है|

इसके बाद कचौड़ी चाट का मजा लिया जा सकता है| ऐसा नहीं कि यहाँ कचौड़ी सामान्य कचौड़ी से अलग है, अलग है उसका परोसना| सब जगह कचौड़ी सब्जी या चटनी के साथ मिलती है और प्रायः नाश्ते का अहसास देती हैं| बाकि जगह से अलग यहाँ कचौड़ी नाश्ता नहीं वरन चाट है और दही, चटनी, मसाले के साथ मिलती है|

और हम हिन्दुस्तानियों की सबसे बड़ी साझा कमजोरियों में से एक यहाँ है – गोल-गप्पा, जिसके पानी पर दुनिया का हर पानी – पानी भरता है| यहाँ गोलगप्पे का पानी काफी मसालेदार है और आपकी हिन्दुस्तानी जीभ के लिए यह पूरी तरह सकूं देने वाला है|

आते रहेंगे इस सत्तर साल पुरानी दुकान में|

स्थान: अशोक चाट भंडार, हौज़ क़ाज़ी, चावड़ी बाज़ार, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: कलमी-बड़ा, कचौड़ी चाट, गोल-गप्पे,

पांच: पांच

गोविंदा का छप्पन भोग

प्राचीन भारत में व्यवसायी धार्मिक हुआ करते थे आजकल धर्म व्यवसायिक हो गए हैं| लम्बे समय से कुछ धर्म-सम्प्रदाय मात्र अपने अनुयायियों के लिए उत्पाद बनाते और बेचते रहे हैं| इससे इनके आश्रम, मठ, मंदिर, मस्जिद के खर्चे निकल जाते थे| महंगे प्रसाद और ऊँचे चंदे देने के बाद मिलने वाले भोजन पर चर्चा करना अब बेमानी लगने लगा है| आज कुछ मठाधीश, यहाँ तक कि सन्यासी, बाक़ायदा व्यवसायों के निदेशक मंडलों में हैं या उन्हें बाहर नियंत्रित कर रहे हैं|

गोविंदा की थाली, छप्पन भोग आदि के बारे में सुनकर भी यही सब विचार आए| गोविंदा, हिन्दू वैष्णव कृष्ण भक्ति धारा के इस्कॉन संगठन (अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ) द्वारा संचालित भोजनालय श्रृंखला है| यह भोजनालय और इसके सहायक जलपानगृह और मिष्ठान भंडार प्रायः इनके मंदिर प्रांगण में होते हैं| दिल्ली स्तिथ इस्कॉन मंदिर में हर माह के अंतिम रविवार छप्पन भोजन उत्सव का आयोजन होता है|

आज भारतीय भोजन में लगातार प्याज लहसुन का प्रयोग बढ़ रहा है| पिछली पीढ़ी तक जिन परिवारों में प्याज लहसुन प्रयोग होता था उनको आज बिना प्याज लहसुन के खाना बनाना पहेली लगता है| (कहावत है, नया मुल्ला प्याज ज्यादा खाता है|) दिल्ली में तो खैर पंजाबी, मुगलाई, ईरानी, और कायस्थ खाने का जबरदस्त प्रभाव है| ऐसे में यह गोविंदा भोजनालय बिना प्याज लहसुन के बने राजसिक भोजन का बढ़िया विकल्प है|

इस अप्रेल महीन के अंतिम रविवार मैंने छप्पन भोग का भोग लगाने का इरादा किया| मन मैं भावना थी, प्रसाद के छप्पन प्रकार के भोजन मिलेंगे| यहाँ की व्यंजन सूची में लगभग वही सब व्यंजन है जिन्हें आप दिल्ली में किसी भी सामान्यतः अच्छे भोजनालय में पाएंगे|

छप्पन भोज के दिन यहाँ बुफे है| पहुँचने पर सबसे पहले स्नेक्स लेने का आग्रह हुआ पकौड़ा, कचौड़ी- आलू सब्जी, पाव-भाजी, पापड़ी चाट, गोलगप्पे| बाद में कई सलाद, दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय, चाइनीज भोजन  और मिठाइयाँ| मसालों का संतुलित से थोड़ा ही अधिक प्रयोग बाजार में मिलने वाले आम पकवानों से थोड़ा हल्का बनाता है| इसमें कोई शक नहीं कि भोजन मांस मछली प्याज लहसुन से मुक्त होने के कारण तामसिक नहीं है| आलू, जैसे कंद की उपस्तिथि के कारण इसे जैन भोजन भी नहीं कहा जा सकता| मसालों की व्यापकता के कारण सात्विकता के पैमाने पर खरा नहीं उतरता, शुद्ध भारतीय राजसिक भोजन|

बुफे सिस्टम में पकवानों के अधिक विकल्प हमेशा आपको ललचाते हैं| नियंत्रण रखना अपने आप में योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः का भाव उत्त्पन्न करता है|

स्थान: गोविंदा भोजनालय, इस्कान मंदिर, दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: छप्पनभोग

पांच: साढ़े तीन

काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी

काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह नहीं रही होगी| इसमें बैठने की जगह हो न हो, यह जगह खास तो है और हर खाने वाले के दिल्ली दिल में खास जगह बना लेती है| पहली बार जब गया तो अजीब से सवाल से उमड़ रहे थे| पुराने दुकान की पुरानी डाट की छत से लटके पुराने पंखे, पुराने तंदूर से निकलती नान की महक, आप की साँसों से होते हुए पेट में पुकारने लगती है|

आप मेनू देखते है तो धुआंधार शब्द बार बार दिखता है – धुआंधार नान, धुआंधार लच्छा परांठा, धुआंधार पनीर मख्खन मसाला| यूँ है तो यह लज़ीज, मगर आपको चेतावनी देता हूँ – न खाएं| अगर खाते हैं तो छोड़ नहीं पाएंगे और हफ्तेभर तन-मन-धन से याद करेंगें|

यह परिवार और दोस्ती में प्रेम बढ़ाने वाला भोजनालय है – यहाँ एक नान में से “हम दो – हमारे दो” खा लेते हैं, कोई मनाही नहीं| आप पहले एक नान मंगा लें, लुफ्त उठायें और बाद में जरूरत के मुताबिक दूसरा – तीसरा मंगा सकते हैं| जब आप यहाँ कोई भारी-भरकम आर्डर देते हैं तो वेटर बेहद शीघ्र-शांत सलीके से आपको ये सलाह देंगें|

मेरे बेटे को यहाँ की लस्सी और रायता पसंद है, साथ में आलू प्याज  नान| उसके लिए यहाँ कुछ और मंगाने का मतलब नहीं| मैं यहाँ के नान का मुलाज़िम हुआ जाता हूँ, किसी सब्जी- दाल की न पूछिए|

दाल और सब्जी ज्यादातर कम मसालेदार और उम्दा हैं, मगर नान का ज़ायका आपके दिल में जो घर करता है, तो बाकि चीज़ो के लिए जगह नहीं| अमृतसरी थाली भी बहुत पसंद की जाती है| यह शाकाहारी भोजनालय है, जिसके पुराने बोर्ड पर “शुद्ध वैष्णव” लिखा हुआ है| अलबत्ता, प्याज लहसुन मिल जाता है| सलाद में बिना मांगे ढेर से प्याज मिलती है|

यह जगह है, पुरानी दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के पास| आप खारी बावली से बेहद उम्दा मेवे – मखानों की ख़रीददारी करने के बाद यहाँ आयें| आप दुकान में बाहर ढेर ग्राहक खड़े पाएंगे और दो बड़े तंदूर| परिवार वाले ग्राहक दूसरी मंजिल (first floor) पर बिठाये जाते हैं और उनके लिए अलग तंदूर वहां लगा है| तीनों तंदूर पर लगातार काम होता रहता है|

स्थान: काले – दी – हट्टी, निकट फ़तेहपुरी, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नान, धुआंधार नान,

पांच: साढ़े चार