विश्व-बंदी ५ मई


उपशीर्षक – सुरारसिक सम्मान

सुरा रसिकों का सम्मान सदा ही रहा है| यह ही कारण है देवता भी स्वर्ग में इसका सेवन करते हैं| परंपरागत रूप से कहा जाता रहा है सुरा का सेवन करे वह सुर और जो न करे असुर| राक्षस आदि अन्य गैर-असुर समुदायों में भी सुरा सेवन की वर्णनीय परंपरा रही है| अति सर्वस्त्र वर्जनीय है, उस में हम संदेह नहीं रखते| जिन्हें सुरा नहीं मिलती उन्हें भाँग अफ़ीम प्रकृति प्रदत्त साधन उपलब्ध हैं| इस्लाम में सुरा पर प्रतिबन्ध इसके इस्लाम-पूर्व असीरियाई मूल में मालूम होता है –हो सकता है असीरिया का सम्बन्ध प्राचीन असुरों से रहा हो| सुरा का समर्थन या विरोध करते समय तथ्य कौन देखता है, मैं भी नहीं देखता|

कल से देश के हर सभ्य राज्य ने सुरा से प्रतिबन्ध हटा लिया है – गुजरात और बिहार की गणना नासमझों में पहले से है अतः उनपर फ़र्क नहीं पड़ता| सरकारी कोषागार में धन धान्य की वर्षा हो रही है| यह सुरा का ही प्रताप है| कभी मंहगाई बढ़े, कर लगाए जाएँ, सुरा-रसिक कभी विरोध नहीं करते| अधिकांश तो मात्र इसलिए सुरा क्रय करते हैं कि सरकारी कोष में गुप्त दान दे सकें|

सुरा नकारात्मक भाव से ही नहीं नकारात्मक रोगों से भी मुक्ति का रामबाण माना गया है इसके औषध रूपों की महिमा आयुर्वेद में आसव और अरिष्टों के रूप में ख्यात होती है| इस समय भय, निराशा, रोग, मनोरोग, मन-व्याधि आदि का जो साम्राज्य व्याप्त है, सुरा उसे तोड़ने में नितांत सहायक है| यही कारण है कि राष्ट्र-हितैषी गृहस्थ-संत साधारण से साधारण वस्त्रों में बिना किसी मोह माया के जीवन- मृत्यु के अविनाशी काल चक्र का मर्म समझते हुए राष्ट्र कोष में गुप्त दान का पुण्य प्राप्त करते हुए सुरा का क्रय करने अवतरित हुए और लगभग विधि विधान के साथ सुरा का क्रय-अनुष्ठान संपन्न किया| अर्थशास्त्र में इस प्रकार सुराक्रय का पुण्य प्रधानमंत्री के कोश में दान देने के समकक्ष माना जाता रहा है|

सुरा को कभी भी गलत नहीं कहा जा सकता| इसका विलोप सदा ही आपराधियों द्वारा स्तरहीन सुरा के उत्पादन और अवैध बिक्री के रूप में सामने आता है| आवश्यकता उचित सेवन विधि का प्रचार करने में है| सुरा-रसिकों को गंदगी में वास न करना पड़े| उनके सुकोमल हाथों से हिंसा न हो, इसका प्रबंध हो| सुरा-रसिकों को अपनी कारों का सारथी न बनना पड़े, यही इच्छा है|

मरने वालों और नए बीमारों की संख्या पर क्या विचार किया जाए, यह व्यर्थ लगता है|

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तिरंगा, पतंगे, और आजादी का जिन्न|


 

इस समय जब मैं यह आलेख लिख रहा हूँ, हम सभी स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं|

कल शाम नई दिल्ली के खन्ना मार्किट में टहलते हुए और उसके बाद मुझे कई बार सोचना पड़ा कि हम अपना स्वतंत्रता दिवस किस तरह से मानते हैं?

पहले थोडा परिचय दे दिया जाये| ७० – ८० दुकानों वाले खन्ना मार्किट; लोदी कॉलोनी, जोरबाग और बटुकेश्वर दत्त कॉलोनी का मोहल्ला बाजार ही है| यहाँ पर किसी भी समय आपको चार पांच सौ से अधिक लोग कभी नहीं दिखाई देते हैं| शाम होने से पहले घर गृहस्थी का सामान अधिक बिकता है और शाम होने के बाद अधिकतर भीड़, खाने पीने के लिए ही होती है| मेरे विचार से दसेक तो रेस्तरां और हलवाई ही होंगे और ठेले तो सभी खाने पीने के है ही| अधिकतर रिवाज फोन पर आर्डर लिखवा कर घर पर ही खाना मंगवाने का है|

कल नजारा अलग ही था| जब भी हम कोई त्यौहार मानते है, बाजार में वो हमेशा ही एक दिन पहले हंसी ख़ुशी और पसीने के साथ मनाया जाता है| कल दोपहर से ही स्वतंत्रता दिवस शुरू हो गया| तिरंगे, पतंगों और खाने पीने की धूम थी| छोटे बच्चे तिरंगे के हर रूप पर फ़िदा थे.. झंडे, पर्चे, कागज, विज्ञापन, केक, फीते, कुछ भी| शायद कल उन्हें देश के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा था| तिरंगी पतंगे तो गजब ढाती हैं, हमेशा| हर रंग रूप की पतंगें थी| पतंग की हर दुकान पर हर रंग की पतंगें और हर रंग – रंगत के लोग थे| पतंग खरीदते, मांझा खरीदते, चरखी सँभालते, कन्ने बांधते; सब तरह के लोग| पतंग न उड़ा पाने के कारण मुझे हमेशा शर्मिंदगी महसूस होती है| कल तो लगा कि शायद जो लोग पतंग नहीं उड़ा पाते होंगे उनके भारतीय होने पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है| “वो काटा” तो हमारा राष्ट्रीय मूल मंत्र है| “वो काटा गाँधी को.. वो काटा नेहरू को..; है न मजेदार|

फिर खाने पीने की बारी आ गयी| ठेले पर चाट पकोड़ी जल्दी ख़त्म हो गयी| गोलगप्पे जरूर देर तक टिके, मगर उनकी आपूर्ति आसान थी और बार बार हो रही थी| मगर, असल जश्न तो दो खास दुकानों पर चल रहा था| केवल दो खास दुकानें.. दोनों पर पचास पचास लोग.. दो पुलिस बाइक.. चार पुलिस वाले..| थके मारे लोग, जश्न से खुश होते लोग, यार-बास लोग, मस्त लोग, मस्ती से पस्त लोग| विद्यार्थी भी है… और कब्र का इन्तजार करने वाले बुढ्ढे भी| न भीड़ ख़त्म होती है न जोश| एक जाता चार आते| चखना भी लेना था, और बर्फ के टुकड़े भी| कोई अनुशासन नहीं.. कोई धक्कम धक्का भी नहीं.. सब्र ऐसा जो शायद कभी रेलवे स्टेशन पर देखने को न मिले| पैसा बह रहा है, उड़ रहा है, कूद रहा है.. गरीबी की ऐसी तैसी..| क्या रखा है ३२ रुपल्ली की गरीबी में| बोतल और कैन.., यस, वी कैन…|

रात ढलते ढलते जब बाकि का सारा बाजार बंद होने लगा, मगर यहाँ तो जश्न की रात थी| लोग आजादी के नशे में चूर थे, उनकी हर बोतल में आजादी बंद थी, उनकी हर कैन में आजादी के बुलबुले उठ रहे थे|

मैं थक गया था; घर चला आया| घडी ने साढ़े दस बजा दिए थे|

सुबह आसमां में बादल थे, चीलें थी और हमारी रंग बिरंगी पतंगें थीं| सड़क पर तिरंगे लहराते बच्चे थे| जन सुविधाएँ के बोर्ड के ठीक नीचे, आजाद देश का आजाद सपूत नशे में चूर चित्त पड़ा था| एक साथी ने कहा, आज ड्राई-डे है न, कल डबल पीना पड़ा होगा न||

कामवाली बाई ने कहा, आज ड्राई डे है तो क्या कल फ्लड डे था न भैया|

तिरंगा, पतंगे, और बोतल से निकला आजादी का जिन्न|