घटते वेतन की अर्थ-व्यवस्था


विश्व-बंदी २8 मई – घटते वेतन की अर्थ-व्यवस्था

जब भी आर्थिक चुनौती सामने आती है तो सामान्य मानवीय स्वाभाव से यह अपेक्षा की जाती है कि खर्च में कटौती करे| आप अपनी चादर के अधिक पैर नहीं फैला सकते – भले ही आप कितना भी उधार लें या अपना दिवालिया पिटवा लें|

परन्तु सरकार के लिए यह स्तिथि इतनी सरल नहीं होती| उनकी जबाबदेही बहुत सी कठिन गणनाओं और निर्णय से उन्हें पीछे खींचती है| न सिर्फ़ भारत सरकार बल्कि विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की गई घोषणाएं इस प्रकार के सामान्यीकृत गणित से प्रेरित हैं| बाजार आधारित वर्तमान अर्थव्यवस्था मूलतः खर्च करने की प्रवृत्ति और क्षमता पर आधारित है| खर्च न हो तो अर्थ व्यवस्था नहीं बचेगी| सामान्य घरों और विराट कंपनियों की अर्थ व्यवस्था को आप खर्च कम कर कर बचा सकते हैं परन्तु सरकार खर्च कम कर कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बचा रही हैं या डुबा रही है यह सरल प्रश्न नहीं है|

इसलिए मैं वेतन घटाने के प्रश्न पर आशंकित हूँ| सरकार द्वारा वेतन घटाने से अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है| खासकर जब आप छोटे और मझौले उद्योगों और दैनिक कामगारों को रोजगार देना चाहते हों|

  • वेतन घटाने सेवेतनभोगी के आयकर योग्य आय में कमी आती है और प्रत्यक्ष कर की कम वसूली होती है|
  • सामान्य वेतनभोगी को अपने खर्च कम करने होते हैं| वह ऐसे खर्च सबसे पहले कम करेगा जिनके लिए घर में विकल्प मौजूद हैं – जूता पोलिश, प्रेसवाला, धोबी, सफाईवाला, सहायक दर्जी, कपड़ों की मरम्मत, फल, गैर मौसमी सब्जियाँ, प्रोटीन भोजन, बेकरी और बाजार के अन्य मिठाई-पकवान, घर की बहुत से गैर जरूरी मरम्मत, छोटे बच्चों की शैक्षिक सहायता, अखबार, पत्रिकाएं, गैर विद्यालय पुस्तकें, पर्यटन, वैद्य, हकीम, चिकित्सक, डिजायनर कपडे आदि बहुत लम्बी सूची हो सकती है| भले ही इनमें से अधिकतर वस्तु और सेवा कर के दायरे से बाहर रहेंगे परन्तु अर्थव्यवस्था में इस सब की गणना होती है|
  • जब इन सब लोगों और उद्योगों को इस प्रकार की समस्या आएगी तो इन सब के सेवा-प्रदाता और सामान विक्रेता (suppliers) आदि के व्यवसाय भी प्रभावित होंगे|
  • यह सभी लोग मिलकर बाजार बनाते हैं और इनके डूबने से बाजार डूबता है|
  • मेरा मोटा अनुमान, बिना किसी आँकड़ेबाजी, यह है कि अगर सरकार वेतन में ३०% प्रतिशत कटौती करती है तो निजी उद्यम भी इसी प्रकार की कटौती के लिए प्रेरित होंगे और यह कटौती अपने अंतिम परिणाम के रूप में अर्थव्यवस्था में ३० % तक की कमी कर देगी|
  • पुराने समय में राजे महराजे इसलिए अकाल आदि के समय में परोपकार के लिए बड़ी घोषणा की जगह बड़ी इमारत आदि की घोषणा करते थे – लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा हो या राजस्थान और गुजरात को बड़ी बड़ी बावड़ियां सभी सरकारी सहायता के उचित उदाहरण है| वर्तमान में मनरेगा भी इसी प्रकार की योजना है|

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विश्व-बंदी ३० अप्रैल


उपशीर्षक – वेतन कटौती का दिन

कोई  भी इस बार मई दिवस की शुभकामनाएं लेना देना नहीं चाहता|

इस बार किसी को वेतन का इन्तजार नहीं है, वेतन कटौती की बुरी तरह आशंका है| देश का हर अधिकारी कर्मचारी अपने मोबाइल में यह देखना चाहता है इस बार वेतन कितना कटकर आ रहा है| आज सुबह पहली चिंताजनक ख़बर यह थी की देश में १०० बड़ी कंपनियों में से २७ लम्बे समय वेतन देने की स्तिथि में नहीं हैं| दूसरी बुरी ख़बर तीसरे पहर आ चुकी थी, रिलायंस समूह वेतन कटौती कर रहा है| यह बात अलग है कि बड़ी कंपनियों की ख़बरें निचले स्तर पर वेतन कटौती अभी दर्ज़ नहीं कर रहीं हैं|

कठनाई सूक्ष्म, लघु, और मध्यम उद्यमों, दुकानदारों और उनके करोड़ों कर्मचारियों के लिए आने जा रही है| इन उद्योगों के पास न देने ले लिए पर्याप्त आय और जमा धन पूँजी है न कोई सरकारी सहायता| इन उद्योगों ने मार्च का आधा वेतन पुरानी आय और जमा धन पूँजी से दिया गया है| इसके बाद इनमें से अधिकतर उद्योगों की अप्रेल माह का पूरा वेतन देने की स्तिथि नहीं हैं| इनके कर्मचारी अघोषित रूप से बेरोजगार हैं ही, सरकारी कानूनी परिभाषा के परे अधिकतर सूक्ष्म और लघु उद्यमों के मालिक भी बेरोजगार की श्रेणी में हैं| लॉक डाउन को समर्थन देने से बाद भी यह कहना होगा कि अगर लॉक डाउन मई में जारी रहता है तो मध्यम उद्योग भी वेतन देने में अक्षम होंगे|

सरकार को यह गणना नहीं करनी कि उसे बीमारी से जीवन बचाना है या गिरती अर्थव्यवस्था से, बल्कि  यह गणना करनी है कि बीमारी से जीवन बचाने के लिए कितना खर्च उठा सकती है और कब तक| उतने दिन के भीतर बीमारी को काबू करना है और उसके बाद ही अर्थव्यवस्था को खोलना है|

निश्चित रूप से शुद्ध ग्रीन जोन में अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रूप से खोला जा सकता है| कठिनाई यह भी है कि पिछले बीस वर्ष की सरकारी अनीतियों के कारण देश की अर्थव्यवस्था कुछ खास बड़े शहरों के आगे पीछे घुमने लगी है| इसे यथासंभव रूप से शीघ्रतापूर्वक विकेन्द्रीयकृत करना होगा| परन्तु फिलहाल कुछ तो शुरू हो मगर जीवन से बिना समझौता किए और बीमारी से बिना हार माने|

अंत में इतना और कहूँगा, सच है या नहीं परन्तु बहुत से पूंजीपति अर्थव्यवस्था को जल्दी खुलवाने के लिए दबाब की नीति के रूप में भी प्रयोग करने की कोशिश कर सकते हैं, ऐसी आशंकाएं सामने आई हैं|

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नाकारा सरकारी कर्मचारी या व्यवस्था


किसी भी व्यस्त रेलवे स्टेशन की टिकिट खिड़की पर जाइये| एक लम्बी लाइन लगी होगी| परेशानहाल, बेचारे, थके – मांदे खीजते, पसीने से तर-बतर आम जनता की| उस लाइन में लगे सभी पचास लोगों को एक ही उम्मीद होती है – जल्दी टिकट मिलजाने की| एक ही देवता होता है – बुकिंग क्लर्क| एक ही भजन होता है – गलियां|

साला काम चोर! हाथ धीरे चला रहा है|

दरअसल खिड़की पर मौजूद बन्दे ने अभी जेब से ही पैसे नहीं निकाले हैं|

साले को अभी मूतने  जाना है; *** *** ***; मुफ्तखोर साला|

आपकी तरह उसे भी किसी तयशुदा समय पर मूत नहीं आता, किसी भी टाइम आता है, दिन में एक दो बार|

देखो सूअर कैसे चाय की चुस्की ले रहा है|

चाय की चुस्की उस समय लेता है जब आपका खिड़की वाला भाई पैसे गिन रहा होता है|

सामान्यतः बुकिंग खिड़की पर बैठा व्यक्ति कान बंद रखता है और लगभग एक मिनिट में एक टिकट की दर से टिकट काटता रहता है, जिसमें से लगभग १० सेकंड ही टिकट काटने में लगते हैं, 15 सेकंड पैसा गिनने में और बाकी समय ग्राहक के पैसे देने और उसे बकाया पैसा लौटाने में| यदि ग्राहक पहले से पैसा निकल कर रखे तो लगा समय लगभग 40 फीसदी कम किया जा सकता है|

किसी भी सरकारी विभाग, बैंक, अस्पताल में चले जाइये| लाइन में लगी भीड़ गालियाँ जपती रहती है|

इसके विपरीत अगर निजी क्षेत्र के संस्थानों की ओर देखे तो…|

पहले तो भीड़ नहीं होती| भीड़ को कम करने के कई तरीके अपनाये जाते हैं| जैसे निजी भ्रमण के लिए कीमत मांगना, समान सुविधाओं के लिए भी अधिक कीमतें, छद्म शान्ति का माहौल|

यदि निजी संस्थाओं में भीड़ होती है तो ऐसा नहीं है कि उन्हें कोई जल्द या अच्छी सुविधा दे जाती है| इसके उलट जल्दी सुविधा के लिए यह संस्थान कानूनन कीमत मांगते हैं, (सरकारी क्षेत्र में कानूनन कीमत तो होती नहीं, रिश्वत का सहारा हो सकता है)| साथ ही भीड़ के लिए वातानुकूलन और छद्म शांत वातावरण का सहारा लेकर ग्राहक के मन को शांत रखा जाता है| सरकारी क्षेत्र के विपरीत निजी क्षेत्र के संस्थान इन्तजार कर रहे ग्राहक के लिए कुर्सियों का इंतजाम रखते हैं|

सरकार आपके पैसे से चलती है, इसलिए आपका पैसा बचाने के लिए इस प्रकार की व्यवस्था प्रायः नहीं की जाती| अब इस प्रकार की व्यवस्था की जाने लगी है|

मगर मैं मूल मुद्दे पर वापिस आता हूँ| क्या टिकट खिड़की पर बैठा व्यक्ति नाकारा है? क्या पब्लिक डीलिंग पर बैठा कोई अन्य व्यक्ति नाकारा है? क्या सरकारी स्कूल का वो मास्टर नकारा है जिसे बहुत से अन्य सरकारी काम करने की बाध्यता रहती है और कई बार अतिरिक्त सरकारी कमाई का लालच भी|

कभी सोचिये जिन हालत में सरकारी कर्मचारी काम करते हैं, उन हालत में आप काम कर पाते|

उन्हें अपनी मेहनत का पैसा मिलने दीजिये| सातवें वेतन आयोग में हुई कम वृद्धि का विरोध कीजिये| यह पैसा देश की अर्थव्यवस्था में ही वापिस आकर इसे गति प्रदान करेगा|