हँसते इश्कियाते मुस्कुराते

मुद्दा तो यही है न, इश्क़ और हँसी पर लिखना है| वो भी अपने “बैटर हाफ” वाला इश्क़; यानि, वो इश्क़ जो होता है तो कोई बताता नहीं, नहीं होता तो सब बताते हैं| तो भाई, बैटर हाफ के साथ, इश्क़ की ईमानदार बात उन्हीं दिनों सो सकती है जब वो वास्तव में बैटर हाफ न हों|

दरअसल, बात उन दिनों की है जब न इश्क़ था, न इश्क़ की बातें, न शादी थी, न बेग़म| घर वाले जान के पीछे पड़े थे| और सारे नाते रिश्तेदार सब साजिश में शमिल थे| कहा गया, मिल लो, बाद में चाहो तो मना कर देना|

लाला की नौकरी में छुट्टी मिलना भी बोनस मिलने की तरह होता है| दोनों तरफ से कहा गया, हम आते हैं किसी इतवार| जिस शहर में मैं नौकरी करता था वहाँ, रहने का ठिकाना सब गड़बड़ था| तो मुलाकत के लिए कॉफ़ी हाउस तय हुआ| साथ में बता दिया गया कि लड़की हमारी चाय कॉफ़ी तक नहीं पीती, तो उसके लिए पानी, दूध या जूस का इंतज़ाम किया जाये| पहली बार कोई आ रहा था मुझे से मिलने और वो भी शिकार फांसने; उस पर खातिरदारी के भी नखरे उठाने थे|

दुआ – सलाम हाय – हेलो के बाद आप बैठिये आप बैठिये हुआ| मेजबानी करने की जिम्मेदारी मेरी थी| सेल्फ सर्विस कॉफ़ी हाउस में मैं सबके लिए पानी और कॉफ़ी लाकर रखने लगा| मेरी होने वाली सासू माँ अपनी बिटिया जी के चाय-कॉफ़ी तक को हाथ न लगाने के किस्से बता बता कर माहौल बनाने की कोशिश कर रहीं थी| मेरे पिताजी डर कर बैठे थे कि कहीं ये लड़की शादी के बाद घर में चाय – कॉफ़ी  पीना भी न बंद करा दे| सबके लिए कॉफ़ी लाते लाते मुझे डर लगा कि कहीं घर में नुक्सानदेय काली – पीली बोतलें न आने लगें| सर्विस काउंटर पर सेल्स गर्ल ने चुहल की, सर, शादी के बाद तो आपको बराबर के ठेके वाला ड्रिंक ही पीना पड़ा करेगा|

जब में होने वाली पत्नी जी के लिए मौसमी का ताजा जूस लेकर सर्विस काउंटर से वापिस मुड़ा, तो मेरे पिताजी मुस्करा रहे थे, ससुर साहब कॉफ़ी हाउस का मीनू उल्टा ही पढ़ रहे थे, उनका भाई मोबाइल में स्नेक खेल रहा था, मेरी बहन अपनी होने वाली भाभीजी को अजीब से देख रही थी| सासू माँ, अपनी साड़ी के पल्लू से वो कॉफ़ी साफ कर रहीं थी जो अभी तक नहीं गिरी थी|

मेरी सीट हाथ से जा चुकी थी, मेरी पसंदीदा कॉफ़ी हाथ से जा चुकी थी| उस दिन इश्क़ तो हुआ, समय की नज़ाकत देखकर हँसी बाद के लिए टाल दी गई|

मेरी सासू माँ आज भी कायम है कि उनकी बेटी चाय – कॉफ़ी नहीं पीती| ससुर साहब को लगता है शादी के बाद लड़कियों में कुछ परिवर्तन हो जाता है| पत्नी के ससुराल वाले जब तब इस किस्से को लेकर हम दौनों पर हँसते हैं|

मैं रोज पत्नी के लिए भी कभी कभी चाय – कॉफ़ी बनाता हूँ और मुस्कराहट के साथ सर्वे करता हूँ| पत्नी जी आज भी मेरे साथ हँस हँस कर दावा रखतीं हैं कि वो चाय कॉफ़ी नहीं पीतीं|

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महंगी गाड़ी और हीरा

एक प्रसिद्ध फ़िल्मी संवाद है; “अगर लड़की स्कूटी पर हो तो प्यार हो जाता है, मगर मर्सडीज़ में हो तो करना पड़ता है|”

साथ ही एक पुरानी कहावत भी है; “लडकियों का सच्चा दोस्त हीरा ही होता है”|

अपने विद्यार्थी जीवन से ही हम उन युगल को देखते आयें हैं जिनमें एक पक्ष प्रायः पढाई, कमाई, या चमकाई में अपने साथी के मुकाबले बहुत कम होता है| परन्तु इन सभी मामलों में दूसरा साथी, प्रायः, पहले साथी को बहुत ही हंसमुख, ध्यान रखने वाला, पूर्णकालिक वफादार साथी मानता है| इन जोड़ों के बारे में प्यार अँधा है वाली कहावत का हम उदाहरण हमेशा देते रहते हैं|

मगर क्या यह जोड़े सदा साथ रहते है; शायद नहीं| मुझे लगता है बराबरी के प्रेम विवाह ज्यादा सफल होते हैं| प्रायः समाज असमान विवाह नहीं होने देता और अगर किसी प्रकार यह विवाह होते हैं तो कई समस्या आतीं हैं| मैं मानता हूँ कि यह समस्याएं परिवार द्वारा तयशुदा भारतीय शादियों में भी उतनी ही होतीं हैं, मगर पारिवारिक विवाहों में सारे लड़ाई- झगड़ें, मान- मुअव्वल और समझौते पूरे परिवार के होते हैं|

बेमेल प्रेम संबंधों पर भले ही परिवारों ने मुहर लगा दी हो तब भी परिवार कभी भी इन जोड़ों के आपसी समस्या सुलझाने के लिए आगे नहीं आते| 

मोदी और विवाह

नरेन्द्र मोदी के विवाह के बारे में जबरन दबाये और उठाये जाते विवाद से केवल दो बातें सामने आतीं है:

१.      भारतीय समाज में बाल विवाह न केवल दो व्यक्तिओं बल्कि तो परिवारों को कई दशक का दुःख देने वाली बुराई है जिसे समाप्त होना चाहिए|

२.      धार्मिक अतिवादिता न तो किसी को तलाक लेने देती है न ही इतनी हिम्मत ही देती है कि वह खुल कर अपने विवाह और उसके असफल होने की बात स्वीकार कर सके| असफल विवाह बुरी याद की तरह ढोए जाते हैं या उन्हें धोये जाने का यत्न किया जाना होता है|

भारतीय समाज में विवाह एक सामाजिक सम्बन्ध है और पति –पत्नी का आपसी सम्बन्ध उनका निजी मसला है| यह एक गहन अंतर है|

हम नरेन्द्र मोदी से यह तो पूछ सकते हैं कि उनकी पत्नी का नाम क्या है, हम यह पूछ सकते हैं कि पहले किसी दस्तावेज (एफिडेविट) में उन्होंने पत्नी का नाम क्यों नहीं बताया; हम यह पूछ सकते हैं कि इस बार उन्होंने नाम क्यों बताया, हम हम यह भी पूछ सकते हैं कि कौन सा दस्तावेज झूठ है|

हम पति –पत्नी के आपसी सम्बन्ध और उसकी सफलता – असफलता के बारे में नहीं पूछ सकते|

हम मोदी को भगौड़ा इस लिए नहीं कह सकते कि उनका विवाह असफल रहा या नगण्य रहा| उन्हें विवाह से भगौड़ा कह सकने का अधिकार अगर किसी को है तो उनकी पत्नी को है, अथवा पत्नी की शिकायत पर उनके दोनों परिवारों और न्यायलय को है|

हम मोदी को भगौड़ा इसलिए मात्र कह सकते है कि वो पत्नी होने का सच बताने से भागते रहे| पत्नी का नाम न बताना झूठ नहीं है बस वो सच से भागना या सच छुपाना है|

साथ ही हम भारतीय नारी की अवधारणा पर कितना भी गर्व करें, क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भारतीय परित्यक्ता स्त्रिओं के पास हमें विकल्प ही क्या छोड़ा है?

नोट: पिछले वर्ष आया नया हिन्दू विवाह कानून हिन्दू पुरुष को तलाक लेने की हिम्मत करने की अनुमति नहीं देता| हिन्दू पुरुष के लिए पत्नी त्याग पत्नी को तलक देने से अधिक सस्ता सुन्दर तरीका बन गया है| 

विवाह, प्रेम और कामुकता

 

यह प्रेममयी सप्ताह है| प्रेम आज सबसे कम चर्चित और सबसे अधिक विवादास्पद शब्द है| धार्मिक कट्टरपंथियों  ने इसे ममता, वात्सल्य, स्नेह, मित्रता और आदर का पर्याय बनाने का प्रयास किया है तो सांसारिक अतिवादियों ने कामुकता का|

विवाह और प्रेम की आपसी स्तिथि तो और भी खराब है| विवाह जहाँ धार्मिक या अधिक से अधिक सामाजिक सम्बन्ध है तो प्रेम हार्दिक या आत्मिक|

प्रेम विवाह के बाद भी प्रेम बरकरार रहेगा अथवा विवाह में प्रेम उत्पन्न होगा?

प्रेम में कामुकता आएगी या कामुकता में भी प्रेम बना रहेगा?

जीवन की वास्तिविकता को स्वीकार करें या न करें, परन्तु स्तिथि कुछ इस प्रकार है:

सप्रेम अवैवाहिक कामुक सम्बन्ध!   

अप्रेम अवैवाहिक कामुक सम्बन्ध!

सप्रेम वैवाहिक कामुक सम्बन्ध!           

अप्रेम वैवाहिक कामुक सम्बन्ध!

सप्रेम वैवाहिक सामाजिक सम्बन्ध!  

अप्रेम वैवाहिक सामाजिक सम्बन्ध!

सप्रेम विवाहेतर कामुक सम्बन्ध!          

अप्रेम विवाहेतर कामुक सम्बन्ध!

सप्रेम विवाहेतर सामाजिक सम्बन्ध!  

अप्रेम विवाहेतर सामाजिक सम्बन्ध!

मैं न तो विवाह की संस्था पर प्रश्न उठता हूँ, न प्रेम की वास्तविकता पर| परन्तु क्यों प्रेमपूर्ण सम्बन्ध समाज की वयवस्था दम घोंट दिया जाता है|

क्या हमें प्रेम की कद्र करना नहीं आना चाहिए?

यदि विवाह बहुत पवित्र है तो संन्यास का पलायन क्यों है?

यदि संन्यास संसार की पूर्णता है तो स्त्री का त्याग क्यों है? घर छोड़कर भागना क्यों है?

यदि विवाह की संस्था इतनी पवित्र है तो तलाक का बबाल क्यों है?

यदि तलाक, विवाह का कलंक है तो विवाह में कुंठा क्यों है?

प्रेम को जीवन की पूर्णता मानने से हमारा इन्कार क्यों हैं? केवल विवाह को ही प्रेम मानने की हठ क्यों है?

सहमति और अपराध

पिछले एक वर्ष में हमारे देश में सामाजिक सुरक्षा परिदृश्य में जिस शब्द की सबसे अधिक कमी खली वह है: “सहमति”|

वर्ष के प्रारंभ में बलात्कार के सन्दर्भ में सहमति शब्द की कमी दिखाई दी और अंत में “समलैंगिक संबंधों” के सन्दर्भ में|

कानूनी दावपेंच के बाहर, बलात्कार की परिभाषा बहुत ही सरल है|

किसी एक व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के साथ उसकी सहमति के बिना यौन सम्बन्ध बनाना बलात्कार है|

किसी एक व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के साथ उसकी सहमति के बिना यौन सम्बन्धी आचरण या व्यवहार करना यौन शोषण है|

हमारा भारतीय पुरुषसत्तात्मक समाज, स्त्री की सहमति को आवश्यक नहीं मानता| स्त्री की “न में भी हाँ”, “सदा समर्पण”, और “सतीत्व की शक्ति” जैसे अवास्तविक मुहावरे गढ़ लिए गए हैं| दुर्भाग्य से हम विवाह संबंधों में भी सहमति की जबरन कल्पना कर रहे हैं, भले ही पत्नी बीमार, परेशां अथवा थकी हुई हो|

एक और मुहावरे का गलत प्रयोग किया जाता है: “ताली एक हाथ से नहीं बजती”| मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ मगर मेरी समझ से पूरा मुहवरा यह है:

“ताली एक हाथ से नहीं बजती, एक हाथ से धक्का लगता है”

“सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” में बारे में एक बात और है| हम लोग बलात्कार को तो आज तक पूरी तरह से रोक नहीं पाए हैं और विश्वभर में होने वालें “सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” के अनैतिक होने का ढोल पीटने से नहीं थकते हैं| स्वयम हमारे देश में “सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” और “सहमति पूर्ण वैवाहिक संबंधो” को पूरी मान्यता नहीं है| ऐसा कहते हुए मैं बहुत सारे संबंधों की बात करता हूँ: अंतरजातीय प्रेम विवाह, सजातीय सगोत्र विवाह, अंतर्धार्मिक विवाह|

उसी प्रकार से ‘समलैंगिक यौन संबंधों” की भी बात है| सभी इस बात से सहमत हैं कि किसी भी प्रकार का यौन सम्बन्ध जबरन नहीं होना चाहिए| परन्तु सहमतिपूर्ण समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध ठहराने की विक्टोरियन सोच मेरी समझ से बाहर है|