बापू की दिल्ली बिल्ली

गबरू नौजवान अपनी शाहना अकड़-धकड़ के साथ चला आ रहा है| उसकी चाल में गजब की मस्ती है मगर चहरे पर लगता है कि बदलते वक़्त ने थोड़ी पस्ती ला दी है| दूर सामने मैदान में दो तीन बूढ़े किसी बात पर संजीदगी से गुफ्तगू कर रहे है| बाद पेचीदा लगती है; नौजवान ने मन ही मन सोचा| वो दूर से ही मामला समझना चाहता है मगर काला कुहासा कुछ देखने नहीं देता| गौर से देखने पर महसूस होता है, बूढ़े मिलकर खों खों खांस रहे है| खांसना भी दिल्ली शहर में गुफ्तगू करने के सलीकों में शुमार होने लगा है|

“क्या इसी कालिख भरे मुल्क के लिए जिए मरे थे?” नौजवान बूढों की तरफ़ बढ़ते हुए सर झटकता है|

उसे अपनी तरफ आता देख बूढ़े शांत होने लगे| पीढ़ियों में सोच का फ़र्क यूँहीं तो नहीं जाता|

“क्या बापू! आज क्या कोई हड़ताल है?” नौजवान ने कुछ परेशानी और कुछ हमदर्दी से पूछा|

मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा खों खों कर हंसने लगा|

“अब न वोट क्लब है न जंतर मंतर। हड़ताल करने पर पड़ते हैं हंटर।“ जैकिट वाले बूढ़े ने उदास लहजे में कहा|

“मामला क्या है, कुछ नहीं तो बापू अपनी समाधि पर ही जाकर बैठ जाइएगा|” नौजवान ने मजाकिया मगर इज्जतदार लहजे में कहा|

“आप क्यों नहीं कोई धमाका कर लेते, बरखुरदार?” मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा बोला|

“ब्राउन ब्रिटिश से क्या लड़ें? साँस लेना दूभर हो चुका है| अब तो फ़िजाओं में स्वदेशी गर्द और गंदगी है|” नौजवान मायूस लहज़े से कहने लगा| दिल के दर्द से कहिये कि फैफड़े के दर्द से, नौजवान के गले से खों खों के दबी आवाज़ धमाके होने लगे| तीनों बूढों की खाँसी और बढ़ गई|

बापू धरने पर बैठने की जगह ढूंढ रहे थे कि बिना साँस फुलाएं बैठ सके। जगह न मिली दिल्ली में| बिल्ली बने और मास्क पहन लिया ज़नाब।

Delhi pollution (c) vikram nayak

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विक्रम नायक के लोग

विक्रम नायक से बात करते समय आपको जिन्दगी के किरमिच (canvas)  का वो हिस्सा दिखाई देता है, जिसे आप जिन्दगी भर ‘अर्जुन की आँख’ बनने के फेर में नजरअंदाज कर देते हैं| विक्रम जिन्दगी को कितना करीब से बारीकी से और ‘दोनों आँखों’ से देखते हैं, उसकी बानगी आपको उन रेखाचित्रों में मिल जाएगी जिन्हें तमाम ‘लप्रेकों’ में मूल पाठ से दो कदम आगे या पीछे रचा गया है|

मेरे हाथ में विक्रम नायक की वो पुस्तिका है, जो ‘बिन मांगे मोती मिले’ की तर्ज पर मुझे उपहार में दी थी| मैं आज लेखक, चित्रकार, फिल्मकार, अभिनेता, निर्देशक, और मित्र को भूल कर उस कार्टूनिस्ट की बात करना चाहता हूँ जो इस संग्रह में है|

संग्रह के मुखपृष्ठ पर हाथी देश का नक्शा है, जिसे आँख पर पट्टी बांधे लोग महसूस कर रहे हैं| किताब के अन्दर एक पन्ने पर गाँधीजी की मूर्ति के नीचे एक बच्चा सेब खाने की कोशिश कर रहा है – वही आई-फ़ोन वाला|

‘सेव टाइगर’ के वक्त में ‘सेव फार्मर’ की बात भी हैं| लोग उस अर्थतंत्र को भी देखते है जिसमें आम जनता के दिनभर परिश्रम करने से खास जनता के घर में दौलत आती है| यह वो देश है जिसमें हम सबको हजारों अधिकार हैं, उन अधिकारों को प्राप्त करने के लाखों तरीकें हैं और अधिकारों का हनन करने वाले कर्तव्य का पाठ पढ़ाते मिलते हैं|

मैं एक पन्ने पर रुक गया हूँ, आंकड़ों में एक भूख कम हो गई है, सरकार भुखमरी मिटा रही है न| जी हाँ, एक भूख मर गई है – भुखमरी से|

एक सरकारी नहर हैं, नेताजी को उसमें तैराकी का मन किया तो लव लश्कर के साथ पहुंचे| देखा तो एक चरवाहे की भेड़ें नहर में चर रहीं हैं| अब, जब गाँव में बाढ़  आएगी तभी तो नहर में पानी आएगा न| चरवाहा कुछ ऐसा ही नेताजी को समझाने की कोशिश कर रहा है|

अरे, इस पन्ने पर कुछ कुत्ते बैठे हैं, बीच में रखी हड्डी को लेकर चर्चा हो रही है| जब आम सहमति बन जाएगी तो हड्डी पर कार्यवाही होगी| विक्रम तो नहीं बताते मगर लगता है, इन कुत्तों ने कुछ दिन पहले ‘किसी’ को काट लिया होगा|

अरे याद आया, गांधीजी के तीन बन्दर थे न| वही जो कहीं गायब हो गए थे| अब नया बन्दर आया है, जिसके कानों पर एअर-फ़ोन, आँखों पर चमकीला चश्मा और मूँह में ड्रिंक लगा हुआ है| उसे अब अच्छा दीखता हैं, अच्छा ही सुनाई देता है और अच्छा ही स्वाद आता है|

एक जमाना था जब जनता राशन की लाइन में घंटों खड़ी रहती थी और राशन नहीं मिलता था, अब अच्छे दिन आ गए हैं| जनता अब कुर्सियों पर बैठ कर इन्तजार करती है|

यह सब एक बानगी है, विक्रम नायक के लोगों की|

तीन लप्रेक

राजकमल प्रकाशन ने अब तक अपनी लप्रेक श्रृंखला में तीन लघु प्रेम कथाएं प्रकाशित कीं हैं| रवीश कुमार, गिरीन्द्रनाथ, और विनीत कुमार तीनों ने लगभग समान समय में मगर अलग अलग निगाह से प्रेम को देखा, समझा, और परखा है| मगर तीनों लप्रेक प्रेम के भिन्न आयाम भिन्न दृष्टिकोण से दर्शाते हैं| तीनों लप्रेककार बिहार में पीला – बढ़े हैं और दिल्ली पहुंचकर एक नई दुनिया, नए सम्बन्ध और नए प्रेम को समझते हैं| इत्तिफ़ाकन तीनों मीडिया जगत से जुड़े रहकर मीडिया के मोह मुक्त हैं| दुनिया को देखने का उनका तरीका आम इंसान के तरीके के मिलताजुलता मगर भिन्न है| मगर रिपोर्टिंग जैसी निर्लिप्प्ता का भाव है तो वो कोमल हृदय भी है जो प्रेम को जीता है और जिन्दगी में प्रेम की खुशबू और रंगत को जानता है|

रवीश कुमार

रवीश प्रेम को शहर की तरह या शहर को प्रेम से देखते हैं, | उनके यहाँ प्रेम निर्जीव शहर को एक पहचान देता है और शहर का हर जर्रा अपनीं अलग शख्सियत रखता है| वो प्रेम के रूप को शहर के नक़्शे के साथ बदलते महसूस कर सकते हैं| रवीश दीवारों से बातें करते, सड़कों के साथ टहलते, धुएं के साथ साँस लेते, मोड़ों के साथ करवट बदलते और भीड़ के वीराने में जिन्दगी की आहट पहचानते हैं| रवीश प्रेम में खुद नहीं जकड़े हैं, मगर प्रेम की खुशबू से सरोबार हैं| वो नाट्यशाला में बैठे प्रेक्षक हैं जो नाटकीयता के साथ ख़ुद को खोता चला जाता है, मगर नाटक नहीं बनता|

गिरीन्द्रनाथ

गिरीन्द्रनाथ प्रेम में हैं| उनका प्रेम उन्हें जी रहा है| वो मोह में नहीं हैं, प्रेम में नहीं हैं – वो कर्तव्य में है, वो जमीन की खुशबू में हैं, वो समाज में हैं; वो करवट बदलती जिन्दगी के पहलुओं में हैं| प्रेम उनका संबल हैं| गिरीन्द्रनाथ प्रेम की कहानियों में जिन्दगी को और जिन्दगी की कहानी में प्रेम को कहते हैं| प्रेम कहीं रचबस गया हैं उनमें मगर वो खुद कहीं और हैं| इस मायने में उनका लप्रेक प्रेमकथा नहीं लगता मगर प्रेम से भरा हुआ है| गिरीन्द्रनाथ जीवन से जुड़कर प्रेम को महसूस करते और प्रेम से जुड़कर जीवटता को पाते हैं| गिरीन्द्रनाथ माटी से जुड़े हैं, उनकी माटी सोना हैं मगर उनका प्रेम वो प्लेटिनम है जो हीरे को जकड़ – पकड़ सकता है| प्रेम गिरीन्द्रनाथ को जमीन – जोरू – जीवन – जीवटता समाज और सम्बन्ध से जोड़ता है| प्रेम उन्हें जीवन में स्वतंत्र करता है, उन्हें आत्मा देता हैं मगर धड़कन नहीं देता| गिरीन्द्रनाथ गाँव को अभी और देखना चाहते है| मगर गाँव को देखने के लिए उनके पास वो पराई निगाह नहीं है वो रवीश और विनीत के पास शहर को देखने के लिए है| गाँव उनके अन्दर है| यह गिरीन्द्रनाथ को दोनों से भिन्न करता और धरातल से कहीं अधिक जोड़ता है| उनके यहाँ गाँव को लेकर निर्लिप्तता नहीं है| साथ ही शहर को लेकर उनकी संलिप्प्त्ता भी बहुत तटस्थ है|

विनीत कुमार

विनीत कुमार, रवीश कुमार की तरह प्रेम शहर से प्रेम करते हैं, जो दिल्ली शहर है| वो दिल्ली जो कदम कदम पर बदलता है, रंग, रंगत, हवाएं फिजायें बदलता है| रवीश का लप्रेक भूगोल है तो विनीत का लप्रेक समाजशास्त्र| विनीत सामाजिक संघर्ष, आर्थिक संकटों, वर्ग –संघर्षों, स्त्री – पुरुष प्रेम, स्त्री – पुरुष संघर्ष और समाज की समझ पर निगाह रखते हैं| विनीत प्रेम के अन्य भावनात्मक पहलूओं पर चर्चा करते हैं, मगर प्रेम केंद्र में रहता है| उनका प्रेम विवादों – विक्षोभों – विरोध – विरोधाभास, सबके साथ हिलते मिलते जुलते टकराते टहलते चलता है| विनीत संवादों से भावों को समझते है जबकि रवीश भंगिमाओं से  भावों को पकड़ते हैं| विनीत प्रेम को ही नहीं अपने सारे परिवेश को खुद जी रहें हैं|

रवीश परिवेश के साथ जी रहे हैं, गिरीन्द्रनाथ परिवेश में जी रहे हैं, विनीत परिवेश को जी रहे हैं| यहीं उनके लप्रेक का विभेद है|

विक्रम नायक

तीनों लप्रेक में सबसे महत्वपूर्ण रचनाकार विक्रम नायक हैं| उनका अपना अलग रचना संसार है| एक चित्र से वह अपनी अलग लघुकथा कहते हैं| यदा कदा चित्रांकन शब्दांकन की कथा को ही वाणी देता है, प्रायः उत्तरकथा, पूरककथा और प्रतिकथा कहता है| विक्रम शब्दकारों के साथ सामंजस्य रखने में बखूबी कामयाब हुए हैं तो भी अपने ऊपर उन्होंने शब्दकार को हावी नहीं होने दिया है| “इश्क़ का शहर होना” में विक्रम स्वतंत्र दृष्टि से शहर देख रहे है, दिल्ली देखने के बहाने दिल्ली का और दिल्ली में प्रेम देख, रचा और बसा रहे हैं| “इश्क़ में माटी सोना” में वह बढ़ती आपसी समझ के साथ अधिक वैचारिक स्वतंत्रता और कल्पनाशीलता प्राप्त करते हैं| उनका व्यंगकार उभर कर समकालीन परिवेश पर कटाक्ष करता है, प्रेम को रिसते और रीतते हुए समाज में घुलने  मिलने देता है| “इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” तक आते आते वो पैनी निगाह से संघर्ष को समझते हैं| मुझे लगता है, लप्रेककार अब उनके साथ घुलमिल गए हैं| विक्रम अपने चित्रों में अधिक गहराई तक जाने लगे हैं| विक्रम नायक के चित्रांकन को स्वतंत्र रूप से पढ़ा जा सकता है|

इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं

तीसरा लप्रेक “इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” सामने है| यह पुस्तक रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” और गिरीन्द्रनाथ झा के “इश्क़ में माटी सोना” से कई मायनों में भिन्न है|

अगर मैं विक्रम नायक के शब्द उधार लूँ, तो यह परिपक्व नादानियों की कहानियां हैं| इन कहानियों में विनीत कुमार की स्त्री – पुरुष सम्बन्ध और प्रेम सम्बन्ध के परिपक्व समझ और उनके अन्तरंग विवरण से उनका साम्य उजागर होता है| अधिकतर कहानियों में महिला पात्र स्पष्टतः मुखर हैं| यह कहानियां प्रेम की उस बदलती इबारत की कहानियां है जिसमें स्त्री सजीव, बुद्धिमान, बुद्धिजीवी और सुस्पष्ट है| यहाँ स्त्री समाज के सभी सरोकारों के साथ समान तल पर खड़ी है| पुरुष पात्रों में नए बदलते समीकरणों के प्रति एक लाचारगी, बेपरवाही और नादानी भी झलक जाती है| विनीत कुमार के लप्रेक हल्के – फुल्के होते – होते गंभीर हैं और अपने संवादों के कारण दूर तक मार करते हैं| विनीत कुमार का लप्रेक केवल डिजिटल रोमांस नहीं है बल्कि खुदरा प्यार की थोक खबर है, इसमें उस इक्क की बात है जो मरता हैं| विनीत कुमार इस न मरते इश्क़ को मारते – मारते जीने और जीते जाने की लघुकथा है|

विनीत कुमार उस युवा वर्ग से हैं जो जानता – समझता है, “काफ़ी हाउस में पैसे किसी के भी लगें, कलेजा अपना ही कटता है”| विनीत कुमार का इश्क़ के ब्रेकअप की मौजूदगी में अंकुरित होता और अपनी सभी शर्तों – समर्पणों – और समझदारी में फलता – फूलता है| कहानियाँ अपनी लघुता में सम्पूर्ण हैं और उनके संवाद ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं| दो एक संवाद यहाँ प्रस्तुत हैं:

“ब्रेकअप के बाद रिश्तों – यादों को दफ़नाने के लिए अलग से कब्र नहीं खोदने पड़ते”

“जिस शख्स को लोकतंत्र के बेसिक कायदे से प्यार नहीं वो प्यार के भीतर के लोकतंत्र को जिन्दा रख पायेगा?”

“लाइफ में स्ट्रगल के बदले स्टेटस आ जाए तो किसी एक के एक्साइटमेंट को मरना ही होता है”

“उम्र तो मेरी ढल गई न, शौक तो उसी उम्र में ठिठका रहा”

लप्रेक में इश्क़ के बाद सबसे महत्वपूर्ण है, चित्रांकन – विक्रम नायक द्वारा अंकित चित्र कहानियाँ| तीसरे लप्रेक में विक्रम नायक और विनीत कुमार के बीच भाव पूरी भावना के साथ व्यक्त हुए हैं| विक्रम कहानियों को पूरी निष्ठा के साथ पकड़ पाए हैं| लप्रेक में पहली बार मुखपृष्ठ पर इश्क़ अपनी शिद्दत के साथ इसी पुस्तक में आया है| पृष्ठ VIII पर विक्रम अपनी इस रचना की प्रेम – प्रस्तावना एक छोटे से चित्र से रचते हैं| अधिकतर पृष्ठों पर चित्र कहनियों के साथ साम्य रखते हुए अपनी कहानी स्पष्ट और एक कदम आगे बढ़ कर कहते हैं| पृष्ठ 7, 13, 15, 54, 57, 65, 74, आदि पर मेरी कुछ पसंदीदा चित्र कहानियाँ हैं, इसके अलावा भी अनेक बखूबी से चित्रित लप्रेक मौजूद हैं|

“इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” में इश्क़ के बहुत से नमूने हैं, वह वाला भी जिससे आप आजकल में मिले थे|

इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं -  चित्र  राजकमल प्रकाशन

इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं – चित्र राजकमल प्रकाशन

पुस्तक: इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं
श्रृंखला: लप्रेक
कथाकार: विनीत कुमार
चित्रांकन: विक्रम नायक
प्रकाशक: सार्थक – राजकमल प्रकाशन
संस्करण: जनवरी 2016
पृष्ठ: 85
मूल्य: रुपये 99
ISBN: 978 – 81 -267 – 2899 – 2

इश्क़ का माटी होना

“लप्रेक” युवा प्रवासियों और महानगरीय स्वप्नरत युवाओं में लोकप्रिय साधारण साहित्य है जिसमे उबाऊ साहित्यिक हिंदी पंडिताऊपन नहीं बल्कि प्रेम का नया नजरिया है| लप्रेक श्रृंखला की दूसरी पुस्तक मेरे हाथ में है  – “इश्क़ में माटी सोना”| यह रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” से भिन्न है और अलग पाठ का आग्रह रखती है| दोनों लप्रेक में विक्रम नायक अपने रेखाचित्रों के सशक्त परन्तु नवीन कथापाठ के साथ उपस्तिथ हैं|

गिरीन्द्रनाथ कॉफ़ी के झाग में जिन्दगी खोजने की कथा कहते हैं, गिरीन्द्रनाथ जिन्दगी की कथा को जोतते हुए कहते हैं| गिरीन्द्रनाथ कहीं भी रेणु नहीं हुए हैं मगर रेणु का रूपक उनके समानांतर चलता है| गिरीन्द्रनाथ रवीश भी नहीं हुए है मगर रवीश की शैली से अलग समानांतर चलते हैं| अगर आप रेणु और रवीश के लिए गिरीन्द्रनाथ को पढ़ते हैं तो आप ख़ुद से न्याय कर पाते| गिरीन्द्रनाथ चकना और दिल्ली के भरम जीते तोड़ते और जीते हैं|

गिरीन्द्रनाथ अपने लप्रेक में छूटे हुए गाँव चनका के साथ दिल्ली में जीते हुए अपनी प्रेम यात्रा में गाँव को दिल्ली के साथ जीने चले जाते हैं| गिरीन्द्रनाथ अपने अनुभव के प्रेम की गाथा कह रहे हैं, यह भोगा हुआ यथार्थ है| उनके यहाँ प्रेम संबल की तरह खड़ा है, उनका मेरुदंड है, साथ ही उलाहना और सहजीवन है| परन्तु गिरीन्द्रनाथ के लप्रेक में प्रेम ही नहीं है, प्रेम के बहाने बहुत कुछ है|

लप्रेक में विक्रम नायक सशक्त और समानांतर कथा कहते हैं| वह गिरीन्द्रनाथ के कथन से अधिक पाठ को समझते हैं और रचते हैं| विक्रम केवल पूरक नहीं हैं बल्कि अपनी समानांतर गाथा चित्रित करते हैं| आप गिरीन्द्रनाथ को पढ़ कर जानते हैं कि नायिका आधुनिक और स्वतंत्र है परन्तु आप विक्रम नायक के रेखाचित्रों के माध्यम से ही पुष्टि पाते हैं कि गिरीन्द्रनाथ की नायिका प्रायः भारतीय परिधान पहनती है| बहुत से विवरण हैं जहाँ विक्रम नायक लप्रेक के पूरक हैं परन्तु वह कई स्थान पर स्वयं के रचनाकार को उभरने देते हैं| विक्रम के चित्र अपनी स्वयं की कथा कहते जाते हैं – उनमें गंभीरता, व्यंग, कटाक्ष है|

पृष्ठ 3 पर विक्रम जब सपनों की पोटली से उड़ते हुए सपनों को किताब में सहेज कर रखते हैं तो वो पूरक हैं या समानांतर, कहना कठिन है| पृष्ठ 6, 12, 13, 49, 80 जैसे कई पृष्ठों पर विक्रम और गिरीन्द्र को साथ साथ और अलग अलग पढ़ा – समझा जा सकता है| कहीं कहीं विक्रम आगे बढ़कर तंज करते हैं, (जैसे पृष्ठ 21, 56, 70)| विक्रम लेखक को शब्द देते है (जैसे पृष्ठ 80, 81)|

कुल मिला कर यह पुस्तक गिरीन्द्रनाथ के लिए माटी बन जाने के प्रक्रिया है, वो माटी जो सोना उगलती है|

पुस्तक: इश्क़ में माटी सोना

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चित्र: राजकमल प्रकाशन के वेबसाइट स

श्रृंखला: लप्रेक
कथाकार: गिरीन्द्रनाथ झा
चित्रांकन: विक्रम नायक
प्रकाशक: सार्थक – राजकमल प्रकाशन
संस्करण: दिसंबर 2015
पृष्ठ: 88
मूल्य: रुपये 99
ISBN: 978 – 81 -267 – 2837 – 4

विक्रम नायक का शहर

रवीश कुमार कह रहे है, किताब जितनी मेरी है उतनी ही विक्रम नायक की भी है| जब किताब खोली तो विक्रम नायक सबसे पीछे दिखाई दिए तो मैंने उन्हें आगे करते हुए, पीछे से किताब पढ़ना शुरू किया|

यूँ क़ुतुब मीनार पर दूरबीन लगी है, इश्क़ दूर जाना चाहता है, दूर तलक जाना चाहता है|

किताब शुरुआत में जंतर मंतर सी लगती है और अन्ना महसूस होते हैं लवपाल की चाहत मेट्रो सी लगती है| जब मेट्रो वैशाली के जंगल में प्रवेश करती है मंगल कलश के बराबर रखा दीपक उम्मीद सा लगता है| बारीकी से पकड़ा गया है, उस वैशाली से इस वैशाली तक का सफ़र|

अन्ना, रैली, मीडिया पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के बीच प्रेम पसीज रहा है| प्रेम का झंडा छितरा रहा है, दिमाग का पर्चा उड़ रहा है मगर जोड़ा नहीं बन पा रहा है| मैं अभिभूत हूँ अभिव्यक्ति पर|

बाइक वाला चित्र गूगल ग्लास हो गया है| साऊथ दिल्ली आँखों में बस गयी है और बाइक हकीकत की ओर जा रही है| साथ जा रहे है मगर साथ भी तो नहीं जा रहे, मगर जो तो रहे ही हैं| जोरबाग छूट रहा है, मगर दिल्ली मुड़ कर भी तो नहीं देखने देती| दिल्ली शतरंज ही तो नहीं है, दिल्ली में प्यादे नहीं खेलते|
दिल्ली की निगाहें आपको देखती नहीं है तो अकेले भी तो नहीं छोड़तीं| सीसीटीवी कैमरे हों या ऑटो| दिल्ली एक पिंजड़ा ही तो है जिसे आप पकड़ना चाहते हो और जहाँ से आप उड़ जाना चाहते हो| दिल्ली जहाँ कोई आप नहीं आता मगर हर कोई देख लेना चाहता है|

कुल मिला कर दिल्ली के तमाम पुल फ्लाईओवर और मेट्रो दिल्ली को जोड़ ही नहीं पाते| दिल्ली दिल सी तो लगती है मगर रहती दिल्ली ही है| दिल ऑटो सा छोटा है, फुर्र हो जाना चाहता है|

मैं विक्रम नायक की नजर से दिल्ली देख रहा हूँ| उनकी दिल्ली इश्क़ नहीं है, दिल्ली इश्क़ हो जाना चाहती है| मैं आखिरी चित्र तक पहुँच गया हूँ| दिल्ली शहर नहीं दिल्ली हो गई है| यह चित्र विक्रम नायक की दिल्ली का भव्य दुखद प्रारूप है| मैं इस चित्र एक अलग किताब की घुटन महसूस करता हूँ, मगर यही एक कौने ने रवीश कुमार अपने हस्ताक्षर कर देते हैं| यहाँ मेट्रो की आवाजाही में प्रेम लप्रेक हो रहा है| मुखपृष्ठ पर रवीश हाशिये पर है| आखिर जिस प्रेम को वो लिख रहें हैं, वो खुद हाशिये पर ही तो खड़ा है| रवीश कुमार का प्रेम करावल नगर सा ही महसूस हो रहा है| अब रवीश कुमार को पढूंगा मगर लिखूंगा नहीं| मैं बुराड़ी नहीं होना चाहता|

पुनश्च:
विक्रम नायक के लोगों के लिए किताब रोहिणी है, रवीश कुमार वालों के लिए द्वारिका| जिन्हें दोनों को पढ़ना है, उनके लिए जोरबाग| मगर पढ़ने से पहले अगर पैदल ही कनॉट प्लेस से चांदनी चौक का चक्कर लगा आयें, तो किताब रायसीना हिल्स सी लगने लगेगी|