कोविड काल के बच्चे

क्या बचपन बीतता है हमारा? न खेल न धमाल न कमाल| आम पर बौर आ कर उतर गई, न आम पर झूले पड़े न ही नीम पर| छुपा छुपाई, दौड़भाग, गेंद बल्ला, गिल्ली डंडा किसी का कुछ नहीं पता| जीवन का दस प्रतिशत जीवन के जीवन होने की आशा में निकल गया| जीवन की आशा!! माँ-बाप को देखकर तो नहीं लगता कि कोई जीवन की आशा में जी रहा है| यह जीवन तो मृत्यु की आशंका में बीत रहा है|

कितना टीवी देखा जाए, कितना कार्टून, कितनी फ़िल्म| किसने माँ –बाप को बोल दिया कि बच्चे इन्हें पसंद करते हैं| टीवी से छूटो तो मोबाइल पकड़ा दिया जाता है|

कभी कभी सोचता हूँ, घर में खिड़कियाँ किस लिए होती हैं?  पिताजी कहते हैं कोई कोविड बाबा है, झोली वाले बाबा का बड़ा भाई| अगर प्यारे प्यारे बच्चों को खिड़की या बालकनी में खड़ा देख लेता है तो पकड़ लेता है| घर में खिड़की दरवाज़े आखिर हैं किस लिए – जब बच्चे इनके पास खड़े तक नहीं हो सकते| दादी कहती हैं कि तुम बच्चे अगर घर के बाहर निकलोगे तो मोदी पापा को मारेगा| माँ दिन भर काले काले टीके लगाती रहती हैं| खट्टे मीठे चूरण चटनी खाने की उम्र में दवा की चूं खट्टी गोली चूसनी पड़ती है| मिठाई की जगह च्यवनप्राश| अगर भाई बहन भी एक दूसरे को अपनी थाली से कुछ उठाकर दे दें तो माँ बाप मिलबाँट कर खाने की जगह सब लोग अपना अपना खाना खाओ का उल्टा उपदेश देने लगते हैं| सुबह शाम हल्दी सौंठ का दूध| और दादी, उनका बस चले तो खीर में भी हल्दी काली मिर्च का का तड़का मार दें| दिन में तीन बार नहाना और पांच बार हाथ मूँह धोना तो ऐसे करना होता है कि त्रिकाल संध्या और पांच वक़्त की नमाज़ की पाबंदी हमारे ही ज़िम्मे लिखी गई हैं|

मुझे लगता है कोविड जरूर कोई भूत होगा जो बड़ों के दिमाग में रहता है| सुना है उसके सिर आने पर आदमी खाँसने लगता है| उसकी साँसें कम होने लगती हैं| वो अपने आप को घर के पीछे वाले कमरे में बंद कर लेता है|

मगर इन बड़ों को देखो, नाक का कपड़ा ठोड़ी पर चिपकाए बाज़ार में घूम रहे हैं| सब्ज़ी की दुकान पर कंधे से कंधे मिलाकर कोविड को गलियाँ दे रहे हैं|

ऐश्वर्य मोहन गहराना 

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ठोड़ी चढ़ा नक़ाब

विश्वबंदी ५ मई २०२० – ठोड़ी चढ़ा नक़ाब

कौन डरा है करोना से? लगता तो नहीं कोई भारतीय करोना से डरता है| बाजार में निकल जाए साठ प्रतिशत से अधिक लोग करोना से कम चालान से अधिक डरते हैं| चालान से डरने वाले इन लोगों को लगता है कि बस ठोड़ी पर नकाब चढाने मात्र से ये बच जायेंगे| अगर पुलिस वाला कह दे कि मैं तुम्हारा चालन नहीं काटूँगा क्योंकि दो चार दिन में यमराज तुम्हारा चालन काटेंगे तो यह पुलिस वाले को ठीक से अपना काम न करने का दोष देने लगेंगे| जैसे इन का खुद के प्रति कोई कर्त्तव्य न हो|

तबलीगी जमात वाले अल्लाह की मर्जी का तर्क दे रहे थे आज हर कोई दे रहा है| हर कोई पूछ रहा है कि क्या घर पर बैठे रहें| कोई यह नहीं समझना चाहता कि घर में रहने और घर से काम करने की सुविधा उठाना जरूरी है| जब तक हम काम करने की आदत नहीं बदलेंगें कोई फ़ायदा नहीं होगा| लेकिन सबसे बड़ी बात है कि हम तो छोटी छोटी चीजें नहीं बदलना चाह रहे हैं| जैसे ठीक से नक़ाब पहनने की आदत|

नक़ाब केवल करोना का बचाव नहीं है| यह बेहद आम बीमारी खाँसी जुकाम से लेकर करोना तक से बचाता है| नक़ाब हमें सैंकड़ों प्रकार के प्रदूषण से बचाता है| मुझे चिकित्सक ने बचपन में धूल से बचने के लिए नाक पर रूमाल रखकर चलने के लिए कहा था| इसके बाद  करीब तीन साल पहले मुझे प्रदूषण से बचने के लिए मास्क यानि नक़ाब लगाने के लिए बोला गया| कुल मिला कर नक़ाब के बहुत से लाभ है|

मैं यह नहीं कहता कि हमें हर समय नक़ाब नाक पर चढ़ाए रखना चाहिए| परन्तु कम से कम जब भी चढ़ाएं तो ठीक से चढ़ाए| पुलिस वाले के लिए लगाएं न लगाए पर ध्यान रखे इसकी आवश्यकता आपको और हमें खुद है|

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सुरा

विश्वबंदी २९ मई – सुरा 

सोमरस यानि शराब यानि अल्कोहल यानि आसव को अधिकतर एशियाई लोग गंभीरता से नहीं देते| हम एशियाई तो खैर किसी बात पर गंभीर नहीं हैं, हमें लगता है कि बस शांति के नशे में जिन्दगी बिताओ और यमराज के घर जाओ या किसी क़ब्र में लम्बा वाला आराम करो| गंभीरता तो सुरा सेवन से ही आती है| कभी ईमानदारी से लिखा जाए तो यूरोप के विकास में सुरा के योगदान को नकारा नहीं जा सकेगा| प्राचीन भारत के स्वर्णयुग में भी सुरा का महत्व दृष्टिगोचर होता है| अम्बेडकर जी ने रामराज्य की सफलता के पीछे सुरा के महत्त्व को पहचाना था पर विस्तार से उन्हें चर्चा नहीं करने दी गई| सुरा-विरोधियों को लगता है कि सुरा सेवन की बात एक गलत आरोप है जबकि यह तो वास्तव में गुणवत्ता है|

जिस प्रकार से सुरा आम मानव को आपस में जोड़ती है उसी प्रकार सुरा-विरोध धार्मिक कट्टरपंथी समुदायों को जोड़ता है – हिटलर से लेकर गाँधी तक सभी कट्टरपंथी मनुष्य, मुस्लिम से लेकर वैष्णव से लेकर जैन तक सभी कट्टरपंथी पंथ सुरा विरोध से जुड़े हुए है| कुल मिलाकर सभी असुर समुदायों में सुरा के प्रति घृणा का भाव रहता है| भारत में भी इसके प्रति अच्छी भावना का न होना लम्बे कट्टरपंथी दुष्प्रचार का परिणाम है| भारत के कट्टर पूंजीवादी गुजरात और कट्टर श्रमवादी बिहार में सुरा पर प्रतिबन्ध है|

करोनाकाल न होता तो मैं भी सुराविरोध के दुष्प्रचार में फंसा रहता और इसके आर्थिक-सामाजिक-शारीरिक-धार्मिक-आध्यात्मिक महत्त्व को नहीं पहचान पाता| मुझे लगता है कि मैंने अमरत्व के मूल को नहीं पहचाना| जल्दी ही मैं भारतीय सुरापंथ के प्रमुख ग्रन्थ मधुशाला का पाठ-मनन-चिंतन करूंगा|

करोनाकाल में सुरा के बारे में जो ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ – इस प्रकार है;

  • सुरा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का मूल स्रोत व् संरक्षक है|
  • सुरा सेवन से कई कठिन विषाणु खासकर करोना दम तोड़ता है|
  • शरीर को साफ़ रखने के लिए विशिष्ठ प्रकार सुरा का शरीर पर छिडकाव और मर्दन करना होता है|
  • शैव व् शाक्त पूजा-हवन में सुरा का विशेष महत्त्व और धार्मिक लाभ है|
  • ध्यान- साधना से पहले योगीजन यदि अल्पमात्रा में सुरा सेवन करें तो ध्यान- साधना सरलता व् तरलता से संपन्न होती है|
  • काम साधना के लिए भी योग साधना जिंतनी अल्पमात्रा में सुरा सेवन करने की व्यवस्था मान्य है|
  • दुर्जन सुरा का अतिसेवन करकर अपनी योगसाधन और कामसाधना को नष्ट कर लेते हैं और समाज में सुरा विरोध का अंधआन्दोलन खड़ा करते हैं|
  • अति सदा वर्जनीय हैं| इस आलेख पर भी अतिगंभीर न हों|

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घटते वेतन की अर्थ-व्यवस्था

विश्व-बंदी २8 मई – घटते वेतन की अर्थ-व्यवस्था

जब भी आर्थिक चुनौती सामने आती है तो सामान्य मानवीय स्वाभाव से यह अपेक्षा की जाती है कि खर्च में कटौती करे| आप अपनी चादर के अधिक पैर नहीं फैला सकते – भले ही आप कितना भी उधार लें या अपना दिवालिया पिटवा लें|

परन्तु सरकार के लिए यह स्तिथि इतनी सरल नहीं होती| उनकी जबाबदेही बहुत सी कठिन गणनाओं और निर्णय से उन्हें पीछे खींचती है| न सिर्फ़ भारत सरकार बल्कि विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की गई घोषणाएं इस प्रकार के सामान्यीकृत गणित से प्रेरित हैं| बाजार आधारित वर्तमान अर्थव्यवस्था मूलतः खर्च करने की प्रवृत्ति और क्षमता पर आधारित है| खर्च न हो तो अर्थ व्यवस्था नहीं बचेगी| सामान्य घरों और विराट कंपनियों की अर्थ व्यवस्था को आप खर्च कम कर कर बचा सकते हैं परन्तु सरकार खर्च कम कर कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बचा रही हैं या डुबा रही है यह सरल प्रश्न नहीं है|

इसलिए मैं वेतन घटाने के प्रश्न पर आशंकित हूँ| सरकार द्वारा वेतन घटाने से अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है| खासकर जब आप छोटे और मझौले उद्योगों और दैनिक कामगारों को रोजगार देना चाहते हों|

  • वेतन घटाने सेवेतनभोगी के आयकर योग्य आय में कमी आती है और प्रत्यक्ष कर की कम वसूली होती है|
  • सामान्य वेतनभोगी को अपने खर्च कम करने होते हैं| वह ऐसे खर्च सबसे पहले कम करेगा जिनके लिए घर में विकल्प मौजूद हैं – जूता पोलिश, प्रेसवाला, धोबी, सफाईवाला, सहायक दर्जी, कपड़ों की मरम्मत, फल, गैर मौसमी सब्जियाँ, प्रोटीन भोजन, बेकरी और बाजार के अन्य मिठाई-पकवान, घर की बहुत से गैर जरूरी मरम्मत, छोटे बच्चों की शैक्षिक सहायता, अखबार, पत्रिकाएं, गैर विद्यालय पुस्तकें, पर्यटन, वैद्य, हकीम, चिकित्सक, डिजायनर कपडे आदि बहुत लम्बी सूची हो सकती है| भले ही इनमें से अधिकतर वस्तु और सेवा कर के दायरे से बाहर रहेंगे परन्तु अर्थव्यवस्था में इस सब की गणना होती है|
  • जब इन सब लोगों और उद्योगों को इस प्रकार की समस्या आएगी तो इन सब के सेवा-प्रदाता और सामान विक्रेता (suppliers) आदि के व्यवसाय भी प्रभावित होंगे|
  • यह सभी लोग मिलकर बाजार बनाते हैं और इनके डूबने से बाजार डूबता है|
  • मेरा मोटा अनुमान, बिना किसी आँकड़ेबाजी, यह है कि अगर सरकार वेतन में ३०% प्रतिशत कटौती करती है तो निजी उद्यम भी इसी प्रकार की कटौती के लिए प्रेरित होंगे और यह कटौती अपने अंतिम परिणाम के रूप में अर्थव्यवस्था में ३० % तक की कमी कर देगी|
  • पुराने समय में राजे महराजे इसलिए अकाल आदि के समय में परोपकार के लिए बड़ी घोषणा की जगह बड़ी इमारत आदि की घोषणा करते थे – लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा हो या राजस्थान और गुजरात को बड़ी बड़ी बावड़ियां सभी सरकारी सहायता के उचित उदाहरण है| वर्तमान में मनरेगा भी इसी प्रकार की योजना है|

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भीषण लू-लपट और करोना

विश्व-बंदी २६ मई – भीषण लू-लपट और करोना

जब आप यह पढ़ रहे होंगे तब भारत में करोना के डेढ़ लाख मामलों की पुष्टि हो चुकी होगी| कोई बुरी खबर नहीं सुनना चाहता| मुझे कई बार लगता है कि लोग यह मान चुके हैं कि यह सिर्फ़ दूसरे धर्म, जाति, वर्ग, रंग, राज्य में होगा| सरकार के आँकड़े कोई नहीं देखता न किसी को उसके सच्चे या झूठे होने का कोई सरोकार है| आँकड़ों को कलाबाजी में हर राजनैतिक दल शामिल है हर किसी की किसी न किसी राज्य में सरकार है| कलाबाजी ने सरकार से अधिक समाचार विक्रेता शामिल हैं जो मांग के आधार पर ख़बर बना रहे हैं| जनता शामिल है जो विशेष प्रकार कि स्वसकरात्मक और परनकारात्मक समाचार चाहती है|

इधर गर्मी का दिल्ली में बुरा हाल है| हार मान कर कल घर का वातानुकूलन दुरुस्त कराया गया| चालीस के ऊपर का तापमान मकान की सबसे ऊपरी मंजिल में सहन करना कठिन होता है| खुली छत पर सोने का सुख उठाया जा सकता है परन्तु सबको इससे अलग अलग चिंताएं हैं|

मेरा मोबाइल पिछले एक महीने से ख़राब चल रहा है परन्तु काम चलाया जा रहा है – इसी मैं भलाई है| तीन दिन पहले एक लैपटॉप भी धोखा दे गया| आज मजबूरन उसे ठीक कराया गया| उस के ख़राब होने में गर्मी का भी दोष बताया गया|

इस सप्ताह घर में गृह सहायिका को भी आने के लिए कहा गया है| क्योंकि पत्नी को उनके कार्यालय ने सप्ताह में तीन दिन कार्यालय आने का आदेश जारी किया है|

यह एक ऐसा समय है कि धर्म और अर्थ में सामंजस्य बैठना कठिन है – धर्म है कि जीवन की रक्षा की जाए अर्थ विवश करता है कि जीवन को संकट मैं डाला जाए| मुझे सदा से घर में कार्यालय रखने का विचार रहा इसलिए मैं थोड़ा सुरक्षित महसूस करता हूँ| मैं चाहता हूँ कि जबतक बहुत आवश्यक न हो घर से बाहर न निकला जाए| मैं अति नहीं कर रहा चाहता हूँ कोई भी अति न करे| न असुरक्षित समझने की न सुरक्षित समझने की| गर्मी और करोना से बचें – भीषण लू-लपट और करोना का मिला जुला संकट बहुत गंभीर हो सकता है|

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विश्व-बंदी २५ मई – फ़ीकी ईद

ईद कैसी, ईद ईद न रही| उत्साह नहीं था| कम से कम मेरे लिए| देश क्या दुनिया में एक ही चर्चा| क्या सिवईयाँ क्या फेनी क्या कोई पकवान क्या नाश्ते क्या मुलाक़ातें क्या मिलनी? इस बार तो कुछ रस्म अदायगी के लिए भी नहीं किया| बस कुछ फ़ोन हुए कुछ आए कुछ गए|

न होली पर गले मिले थे न ईद पर| कोई संस्कृति की दुहाई देने वाला भी न रहा – जो रहे वो क्रोध का भाजन बन रहे हैं| कोई और समय होता तो गले मिलने से इंकार करने वाला पागल कहलाता| दूर का दुआ-सलाम प्रणाम-नमस्ते ही रह गया| चलिए गले मिलें न मिलें दिल तो मिलें| मगर हर मिलने वाला भी करोना विषाणु दिखाई देता है| बस इतना भर हुआ कि लोगों की छुट्टी रही| शायद सबने टीवी या मोबाइल पर आँख गड़ाई और काल का क़त्ल किया|

हिन्दू मुसलमान सब सहमत दिखे – जिन्दगी शुरू की जाए| कोई नहीं पूछना चाहता कितने जीते हैं कितने मरते हैं, कितने अस्पताल भरे कितने खाली| मुंबई में मरीज प्रतीक्षा सूची में स्थान बना रहे हैं – मरीज क्या चिकित्सक चिकित्सा करते करते प्रतीक्षा सूची में अपना नाम ऊपर बढ़ने की प्रतीक्षा कर रहे हैं| देश और दिल्ली की हालत क्या है किसी को नहीं समझ आता| बीमार हो चुके लोगों का आँकड़ा डेढ़ लाख के पार पहुँचने वाला है| मीडिया और सरकार गणित खेल रही है| मगर बहुत से लोग हैं जो इस आँकड़े से बाहर रहना चाहते हैं या छूट गए हैं| सरकारी तौर पर खासकर जिनमें कि बीमारी मिल रही है पर कोई लक्षण नहीं मिल रहा|

आज छुट्टी थी, मगर जो लोग सुबह ग़ाज़ियाबाद से दिल्ली आये या गए शायद शाम को न लौट पाएं – सीमा फिर नाकाबंद हो चुकी है| घर से निकलें तो लौटेंगे या नहीं कोई पक्का नहीं जानता| नौकरानी को बुलाया जाए या न बुलाया जाए नहीं पता| न बुलाएँ तो न उसका काम चले न हमारा|

पीछे मंदिर में लोग इस समय शाम की आरती कर रहे हैं| मुझे मंदिर के घंटे हों या मस्जिद की अज़ान मुझे इस से अधिक बेमानी कभी नहीं लगे थे| मगर उनके अस्तित्व और प्रयोजन से मेरा इंकार भी तो नहीं है|

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विश्व-बंदी २३ मई

उपशीर्षक –  तर्कपूर्ण और समझदारी वाले पूर्वाग्रह

मेरे मित्र हैं जिन्हें विश्वास था कि उनका महान और समझदार नेता लॉकडाउन-४ को बहुत सख्त रखेगा क्योंकि मुस्लिम समुदाय के त्यौहार के समय कोई समझदार आदमी मूर्खता पूर्ण जोखिम नहीं उठाएगा| मैं उस समय जोर से हंसा और उन्हें वादा किया कि सरकार लॉकडाउन-४ को मॉक-डाउन बनाने जा रही हैं| इसके बाद जैसा कि हमेशा होता हैं तो मुझे तर्कपूर्ण और समझदारी की बात करने की सलाह देने लगे| मजे की बात यह है कि जब भी यह इस प्रकार के मित्र तर्कपूर्ण और समझदारी की बात काम धंधे से इतर प्रयोग करते हैं तो मेरा विश्वास प्रबल रहता है कि अपने पूर्वाग्रह को थोपने का प्रयास हो रहा है|

खैर उनकी तर्कपूर्ण और समझदारी वाली बातें न मैं सुनता न कोई और|

इस बार तो एक मजे की बात भी हुई| उन्होंने के वास्तविक तार्किक विचार रखा| मैंने सूचित किया कि कांग्रेस नेता चिदंबरम पहले ही इस आशय का ट्वीट कर चुके हैं| वो परेशान होकर बोले – अरे, अब इस विचार को कोई नहीं सुनेगा| इस प्रकार उनके तर्क-संगत विचार को उनके समझदार नेताओं के मस्तिष्क में जगह नहीं मिली|

वैसे वह प्रधानमंत्री मोदी को बहुत तर्कपूर्ण और समझदार मानते हैं परन्तु जिस बातों के लिए मोदीजी को वह धन्यवाद कर देते हैं वह खुद उल्टी पड़ जातीं हैं| उनका परम विश्वास था कि मोदी जी आधार और वस्तुसेवाकर जैसे कुत्सित कांग्रेसी विचारों को प्रधानमंत्री बनते ही दमित कर देंगे| उस दिन मजे लेने के लिए मैंने कहा कि कांग्रेस जिनकी दुकान हैं मोदी जी उनके पुराने ग्राहक हैं| आधार और वस्तुसेवाकर ऐसा आया कि मित्र प्रवर को उसके समर्थन में बहुत तीव्र श्रम कर कर ज्ञान प्राप्त करना पड़ा| हाल में यही हाल मनरेगा मामले में भी हुआ – इस कांग्रेसी घोटाले के भांडाफोड़ करने की उम्मीद में वो मई २०२० में निर्मला जी का भाषण देख रहे थे| पता चला निर्मला जी ने खुद बाबा मनरेगा की शरण ली| दरअसल मित्र महोदय को लगता था कि मजदूरों के पलायन में मनरेगा का हाथ है|

खैर थाली बजाने मोमबत्ती जलाने और गाल बजाने के सभी काम करने के बाद आजकल उन्हें किसी नए टास्क की तलाश है|

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विश्व-बंदी २२ मई

उपशीर्षक –  नकारात्मक विकास – नकारात्मक प्रयास

लम्बी दूरी की बस नहीं चल रहीं, पर ट्रेन चलने लगी हैं| सबसे जरूरी वाहन हवाई जहाज भी चलने की तैयारी में हैं|

कुछ दिन में सब कुछ चलने लगेगा| नहीं, चलेगा तो सुरक्षा और स्वास्थ्य| चिंता और भय सुबह सबेरे खूंटे पर टांग कर हम घर से निकलेंगे| मरेंगे तो कोविड वीर कहलायेंगे| यह मध्यवर्ग की कहानी है, मजदूर की नहीं| मजदूर का जो होना था हो चुका| उसकी स्तिथि तो सदा ही मौत के आसपास घूमती रही है|

पहली बार यह आग मध्यवर्ग तक आएगी| अंग्रेजों के काल के पहले और बाद के भारतीय इतिहास में पहली बार अर्थव्यवस्था की अर्थी निकल गई है| विकास के बड़े नारों के बाद भी विकास का कीर्तिमान नकारात्मक दर पर आ टिका है| कोविड मात्र बहाना बन कर सामने आया है वरना विकासदर तो कोविड से पहले ही शून्य के पास चुकी थी|

जिस समय भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर नकारात्मक अर्थव्यवस्था का आंकड़ा दे रहे थे, उसी समय सामाजिक माध्यम में सत्ता के अंधभक्त राहुल गाँधी के मूर्ख होने की चर्च में वयस्त थे| अर्थात सरकार और उसके गुर्गों के अपनी असफलता का अहसास तो है परन्तु उसपर चर्चा नहीं चाहिए| सरकार भूल रही है कि चर्चा होने से ही उसे सुझाव मिल सकेंगें| ज्ञात इतिहास में सरकारों के चाटुकारों ने को कभी भी कोई रचनात्मक सुझाव नहीं दिए हैं – बल्कि सरकार के आलोचकों और आम जनता की तरफ से आने वाले सुझावों में भी नकारात्मकता फैलाई है|

आज फेसबुक देखते समय गौर किया – एक मोदीभक्त ने कार्यालय खोलने की घोषणा की, तो किसी ने सलाह दी कि घर से काम करने में भलाई है| मोदीभक्त ने सलाह देने वाले को राष्ट्रविरोधी कह डाला| अब राष्ट्रविरोधी सज्जन ने सरकारी अधिसूचना की प्रति चिपकाते हुए कहा कि घर से काम करने की सलाह उनकी नहीं बल्कि खुद मोदी सरकार की है| इस पर मोदीभक्त ने समझाया कि भगवान मोदी मन ही मन क्या चाहते हैं यह भक्तों को समझ आता है| राष्ट्रद्रोही कामचोर लोग ही इस अधिसूचना की आड़ में देश का विकास रोकने के घृणित प्रयास कर रहे हैं|

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विश्व-बंदी २१ मई

उपशीर्षक –  परदेशी जो न लौट सके

इस से पहले कि अर्थव्यवस्था चले, उसका आधार डोलने लगा है| जिन्हें कुछ माह पहले तक मानव संसाधन कहा जा रहा था – अपनी असली औकात यानि मजदूर के रूप में औद्योगिक परिदृश्य से दूर हो चुके हैं| जो मजदूर दो जून की रोटी की आशा में बंधुआ की तरह जीता मरता है – लौटा है|

अब इस बात पर बहस की गुंजायश नहीं रह गई है कि मजदूर अपने मूल स्थानों की ओर क्यों लौटे? सब जानते हैं उनकी मातृभूमि कम से कम तुरंत उनका स्वागत नहीं करेगी| उनके गाँव और उनके परिवार उन को शायद तुरंत न अपनाएँ| जिस गाँव कुल चार रोटी हैं वहां खाने वाले चार से बढ़कर सोलह हो गये हैं|

परन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि लौटा कौन कौन नहीं है?

जिनके पास जमीन में गड़ी अपनी नाल का पता है – वो लौट गए हैं| जिनके पास माँ – बाप – भाई – भाभी गाँव घर है लौटे हैं भले ही यह सब नाम मात्र की आशाएं हैं| वो लौट गये हैं जिनकी जड़ों में अभी जुड़ाव की आशा है| मगर क्या उन्होंने रोज़ी- रोटी वाले अपने नए वतन से जुड़ाव नहीं महसूस किया| किया तो मगर जुड़ाव में आसरा और आश्वस्ति की कमी थी| जिन्होंने किसी पुराने राहत शिविर की काली कहानियाँ सुनी थीं और जिन्हें रेन बसेरों के बास अपनी नाक में आज भी सुंघाई देती थी – लौट गए|

वो लोग नहीं लौटे जिनके पास अपना एक कमरा – एक छप्पर – एक झौपड़ – एक टपरी – एक चाल थी| नौकरी की आस थी| सड़क पर फैंक दिए जाने का भय न था|

वो नहीं लौटे जिनके पास जड़ें नहीं थीं – जिनके नाम कुछ भी हों मगर पुराने धाम देश के नक़्शे के बाहर हैं| नेपाली लौटे – बंगाली नहीं| वो नहीं लौटे जो घर से भाग कर आये थे| वो लडकियाँ नहीं लौंटी जिन्हें कोई घर नहीं अपनाएगा| वो भाई भी नहीं लौटे जिनके भाई के हाथ में खंजर हैं|

पाठकों से अनुरोध हैं बताएं उनके बारे में हो नहीं लौटे|

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विश्व-बंदी २० मई

उपशीर्षक –  ज़रा हलके गाड़ी हांको

क्या यह संभव है कि आज के करोना काल को ध्यान रखकर पाँच सौ साल पहले लिखा गया कोई पद बिलकुल सटीक बैठता हो?

क्या यह संभव है कि कबीर आज के स्तिथि को पूरी तरह  ध्यान में रखकर धीरज धैर्य रखने की सलाह दे दें?

परन्तु हम कालजयी रचनाओं की बात करते हैं तो ऐसा हो सकता है|

ज़रा हल्के गाड़ी हांको, मेरे राम गाड़ी वाले…

अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों को संभलकर चलाने का पूरा सुस्पष्ट सन्देश है|

गाड़ी अटकी रेत में, और मजल पड़ी है दूर…

वह हमारी वर्तमान स्तिथि को पूरी तरह से जानते और लम्बे संघर्ष के बारे में आगाह करते हैं|

कबीर जानते हैं कि वर्तमान असफलता का क्या कारण है:

देस देस का वैद बुलाया, लाया जड़ी और बूटी;

वा जड़ी बूटी तेरे काम न आईजद राम के घर से छूटी, रे भईया

मैं हैरान हूँ यह देख कर कि कबीर मृत देहों के साथ सगे सम्बन्धियों और बाल-बच्चों द्वारा किये जा रहे व्यवहार को पाँच सौ वर्ष पहले स्पष्ट वर्णित करते हैं:

चार जना मिल मतो उठायो, बांधी काठ की घोड़ी

लेजा के मरघट पे रखिया, फूंक दीन्ही जैसे होली, रे भईया

मैं जानता हूँ कि यह सिर्फ़ एक संयोग है| परन्तु उनका न तो वर्णन गलत है, न सलाह| पूरा पद आपके पढ़ने के लिए नीचे दे रहा हूँ|

सुप्रसिद्ध गायिका रश्मि अगरवाल ने इसे बहुत सच्चे और अच्छे से अपने गायन में ढाला है:

 

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विश्व-बंदी १९ मई

उपशीर्षक –  दूरियाँ दो गज रहें

बुतों बुर्कों पर आह वाले, वाह वाले, नकाब लगाए बैठें हैं,

सूरत पर उनकी मुस्कान आती हैं, नहीं आती, ख़ुदा जाने|

जिन्हें शिकवे हैं शिकायत है मुहब्बत है, हमसे दूर रहते हैं,

दुआ सलाम दूर की भली लगती हैं, गलबहियाँ ख़ुदा जाने|

जाहिर है छिपकर चार छत आया चाँद, चाँदनी छिपती रही,

ये दूरियाँ नजदीकियाँ रगड़े वो इश्क़ मुहब्बत के ख़ुदा जाने|

जो नजदीकियाँ घटाते हैं बढ़ाते हैं, अक्सर दोस्त नहीं लगते,

हम खुद से दूर रहते हैं इतना, रिश्ते-नातेदारियाँ ख़ुदा जाने|

महकते दरख़्त चन्दन के बहकते हैं, भुजंग गले नहीं लगते,

गेंदा, गुलाब, जूही माला में नहीं लगते, गुलोगजरा ख़ुदा जाने|

दूरियाँ दो गज रहें, नजदीकियाँ चार कोस, इश्किया रवायत है,

बात करते हैं इशारों से अशआरों से, तेरी नैनबतियाँ ख़ुदा जाने|

 

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विश्व-बंदी १८ मई

उपशीर्षक –  जीवन यापन का संकट

ऐसा नहीं है कि जीवन यापन का संकट केवल मजदूरों के लिए ही खड़ा हुआ है| इस संकट से हर कोई कम या ज्यादा, पर प्रभावित है| हर किसी की कमाई में लगभग तीस प्रतिशत की कमी आई है और हर किसी का इरादा खर्च में कम से कम बीस प्रतिशत की कमी करना है| निवेश का वर्तमान मूल्य (value) दो महीनों में तीस प्रतिशत घट चुका है| अगर सरकारी पैकेज की बात की जाए तो इसका कोई सकारात्मक प्रभाव देखने के लिए कम से कम साल भर इन्तजार करना होगा|

सरकारी घोषणाओं के प्रति मेरी निराशा का निजी कारण भी है – निजी रूप से इन प्रस्तावों के चलते मेरे काम में कम तीस से पचास प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका है| यह अलग बात है कि मैं इस सब को पहले से ही संभाव्य मान कर आगे के कदम उठाने की तैयारी कर रहा था| परन्तु रास्ता कहाँ तक जाता है और गंतव्य कितनी दूर है मुझे नहीं मालूम|

मेरे लिए सकारात्मक यह है कि मैं जीवन में पिछले कई संकटों से गुजरकर उठ चुका हूँ| परन्तु मेरे जैसे हर के व्यक्ति के पीछे हजारों हैं, जिनके पास कोई मार्ग या मार्गदर्शन नहीं, न दृष्टि, न दृष्टिकोण| अन्य बुरे समय मुकाबले में यह स्तिथि यह मेरी तरक्की में एक बड़ा अडंगा है| जब अर्थव्यवस्था तरक्की कर रही हो तो आपके लिए आगे बढ़ना सरल है| परन्तु अकेले आगे बढ़ना कठिन है| सबसे बड़ी चुनौती है खेती और कुटीर उद्योग, अगर यह आगे नहीं बढ़ सके तो अर्थव्यवस्था की आधार संरचना कमजोर होगी| आप बड़ी अर्थव्यवस्था को ऊपर से बड़ा नहीं बना सकते इसके लिए इस अपने आधार को पहले मजबूत करना होता है| वर्तमान समय में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी कठिनाई यह ही है कि पिछले बीस वर्ष की आर्थिक तरक्की के दौरान इसका आधार कमजोर हुआ है| घर का सबसे कम योग्य बेटा खेती के लिए छोड़ दिया जाता रहा है|

हम सबकी चुनौती यह है कि इस सबके बीच अपनी अपनी आजीविका को वर्तमान स्तर से नीचे न गिरने दिया जाए|

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विश्व-बंदी १७ मई

उपशीर्षक – आपूर्ति की जय,

माँग होए मोती बिके, बिन माँग न चून|

रहीम अगर आज दोहा लिखते तो वर्तमान सरकार को इसी प्रकार कुछ अर्थ नीति समझाते| यह अलग बात है कि ज्ञान देने के चक्कर में गाली गलौज का शिकार होते|

भारत पिछले तीन चार वर्षों से मंदी का शिकार है| नोटबंदी, तालाबंदी और श्रमिकबन्दी तक हर कदम ने माँग में कमी पैदा की है| करोना से पहले भी देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार ने अपने प्रयास किये हैं|

इसके लिए सरकार ने बड़ी कंपनियों के करों में कमी की जो भले ही गलत कदम नहीं था मगर माँग बढ़ाने का काम नहीं कर सकता था| सरकार बजट के महीनों बाद बजट से भी अधिक बड़ा घोषणापत्र लेकर सामने आई| जैसा सबको पता था, कोई लाभ नहीं हुआ| बाजार में पैसा समाप्त होने लगा| सरकार ने व्यवस्था में धन बहाल करने के लिए कई प्रयास किए इनसे महंगाई तो बढ़ी, पर माँग नहीं| अगर आप आँकड़ों में देखें तो महंगाई यानि दाम जिस समय घटने चाहिए तब स्थिर रहे या बेहद कम बढ़े|

इस करोना काल में भी सरकार दो महीने के भीतर कई घोषणा लेकर आई| वर्तमान और दूसरी कड़ी को पांच दिन में शानदार रूप से आत्मनिर्भर भारत नाम से प्रचारित किया गया| जिसमें स्वतन्त्र निदेशकों के पंजीकरण जैसे सामान्य घोषणा की गई जो करोना के महीनों पहले से मौजूद थीं और न माँग बढ़ा सकती थीं न आपूर्ति| वैसे यह जरूर है कि मेरा स्वतंत्र निदेशक के लिए मैंने परीक्षा जरूर करोना तालाबंदी के दौरान उत्तीर्ण की| पिछले पांच छः दिन में सरकार के भी ऐसा कदम नहीं बता सकी जिससे आम भारतीय उपभोक्ता की और से माँग बढ़े| भारतीय उपभोक्ता को बेहद कठिन वेतन कटौती से लेकर रोजगार कटौती का सामना करना पड़ा है| छोटे दुकानदार, फेरीवाले, रेहड़ीवाले, छोटे चिकित्सक, छोटे वकील, छोटे लेखाकार सब आय की कमी का सामना कर रहे हैं| उनके खर्चे कम उस अनुपात में नहीं हुए हैं| किसानों के अपने उत्पाद का दाम नहीं मिल पाया है| भूखा प्यासा मजदूर पैदल अपने बचपन के घरों की और जा रहा है| जो मजदूर वापिस नहीं जा रहा वो या तो जड़ से कट चुका है या फिर शायद अवैध आप्रवासी है|

हर चीज सरकार के हाथ में नहीं है परन्तु सरकार इस बड़े मोटे से पैकेज में से कुछ धन सीधे इस आम जनता तक पहुंचाकर जनता के हाथ में कुछ क्रयशक्ति प्रदान कर सकती थी| सरकार बेरोजगारी भत्ता, मनरेगा, शहरी मनरेगा, मजदूरी सहायता जैसी महत्वपूर्ण बातों पर  चूक गई है| फ़िलहाल अर्थव्यवस्था ठीक होते नहीं नजर आ रही|

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विश्व-बंदी १६ मई

उपशीर्षक – त्रियोदशी में करोना दावत

करोना काल की अच्छी उपलब्धियों में एक यह भी है कि देश में त्रियोदशी संस्कारों में भारी कमी आई है| परन्तु मेरे गृह नगर के बारे में छपी खबर चिंता जनक थी|

शहर के एक बड़े सर्राफ़ की माताजी का हाल में स्वर्गवास हुआ| इसके बाद स्वाभाविक है कि उनके पुत्र, और पुत्रिओं के परिवार इकठ्ठा होते| इसमें शायद किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए| परन्तु इस परिवार ने अपनी माताजी के लिए त्रियोदशी संस्कार का आयोजन किया, जिसमें शहर भर के काफ़ी लोग सम्मलित हुए| दो दिन के बाद सर्राफ़ साहब की करोना से मृत्यु हो गई| मृत्यु के समाचार के बाद सरकार ने तुरंत तीन प्रमुख थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू का ऐलान कर दिया जिससे कि बीमारी न फैले| साथ ही उन लोगों की जानकारी इकठ्ठा की गई जो त्रियोदशी में शामिल हुए थे| इस परिवार और समारोह में शामिल कई लोग करोना से संक्रमित पाए गए|

दुःख यह कि यह समाज का सभ्य और समझदार समझे जाने वाला तबका है| यह वह लोग हैं जो दूसरों के लिए आदर्श बनकर खड़े होते है|

इस पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी है| कोई नहीं जानता कि सर्राफ़ परिवार के यहाँ मातमपुर्सी के लिए आए और बाद में त्रियोदशी समारोह में शामिल लोग कब कब किस किस से मिले| यह एक पूरी श्रंखला बनती है| यह सब जान पाना उतना सरल नहीं जितना लगता है| अलीगढ़ शहर ख़तरे की स्तिथि में अब लगभग एक महीने के लिए रहेगा| सरकार ने लगभग १५० लोगों के विरूद्ध मुकदमा कायम किया है|

कुछ अतिविश्वासी या अंधविश्वासी लोगों के कारण उनके सम्बन्धियों, मित्रों, परिवारों, पड़ौसियों, और यहाँ तक कि उनके आसपास से अनजाने में ही गुजर गए लोगों के लिए खतरा पैदा हुआ है|

अलीगढ़ वालों के समझदार होने का मेरा भ्रम इस समय कुचल गया है| मैं सिर्फ़ आशा करता हूँ कि जल्द सब ठीक हो|

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विश्व-बंदी १५ मई

उपशीर्षक – करोना के कारण बेहतर कॉर्पोरेट लोकतंत्र

करोना ने भारत ने कॉर्पोरेट सुशासन के लिए बेहतरीन उपहार दिया है| सरकार ने, जाने- अनजाने में, कंपनियों के अंश-धारकों (shareholders) के लिए लगभग सभी कंपनियों की आम सभाओं में शामिल होने की प्रक्रिया को सरल कर दिया है| लगता है कि सरकार ने यह अनजाने में ही किया है वर्ना इस दृष्टिकोण से अब तक प्रचार किया जा चुका होता और वित्तमंत्री इसे आत्मनिर्भर भारत वाली सरकारी पोटली में शामिल कर चुकी होतीं| ध्यान रहे कि यह सरलीकरण मात्र इसी वर्ष के लिए हुआ है|

अगर आप किसी  भारतीय कंपनी में अंशधारक हैं, तो यह वर्ष उस कंपनी की आम सभाओं में शामिल होने के लिए उचित वर्ष है| इस वर्ष दूर दराज के क्षेत्र में बैठा सामान्य अंशधारक जिसने कभी किसी कंपनी की असाधारण आम सभा या वार्षिक आम सभा में भाग नहीं किया है, इस वर्ष घर बैठे ही इसका अनुभव ले सकता है| इस से पहले दूरदराज के अंशधारक पिछले कुछ वर्षों से डाक-मतदान या ई-मतदान करते रहे हैं|

किसी कंपनी के अंशधारक के रूप में कंपनी की किसी भी आमसभा के शामिल होना आपका विशेष अधिकार है| इससे अपनी कंपनी, जिसके एक छोटे से मालिकाना हिस्सेदार हैं, को समझने और उसकी निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अनुभव मिलता है| परन्तु बड़े शहरों के बाहर रहने वले अधिकतर अंशधारकों ने इस प्रकार का कोई अनुभव कभी नहीं लिया है| साथ ही बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की शिकायत रही है, कि कुछ विशेष लोग वहाँ आकर अक्सर गड़बड़ी फैलाते हैं| परन्तु इस बार ऐसा कुछ होने की सम्भावना नहीं हैं|

इस बार आप ठीक उसी तरह कंपनियों की आम सभाओं में भाग ले सकते हैं जिस तरह आप अपने मोबाइल या कंप्यूटर से ग्रुप विडियो कॉल करते हैं या पिछले दो महीने से ऑनलाइन सभाएं कर रहे हैं|

शुरूआती आवश्यकताएं

बिना शक, मूल बात यह है कि आपके पास किसी कंपनी के शेयर होने चाहिए – चाहे यह पुराने कागज़ वाले शेयर सर्टिफिकेट के रूप में हों या आपके डीमेट खाते में दर्ज हो| आपके पास पहले से शेयर है तो बधाई, वर्ना तुरंत अपनी मनपसंद कंपनियों के कुछ शेयर जल्दी से खरीद लें| जिस दिन कम्पनी अपने अंशधारकों को आम सभा का बुलावा भेजेगी, उस से कम से कम हफ्ता दस दिन पहले यह खरीद आप कर कर रख लें| शेयर बाजार में इस दिनों मंदा चल रहा है आप कम खर्च में कुछ अच्छे शेयर खरीद सकते हैं| मगर ध्यान रहे मैं आपको यहाँ कोई निवेश सलाह नहीं दे रहा हूँ|

अब आते हैं आमसभा में शामिल होने की पहली जरूरत पर| तो आपके पास कोई भी ठीक ठाक चलता हुआ, कंप्यूटर, लैपटॉप या फिर मोबाइल होना चाहिए| ४जी सिम वाला कोई भी साधारण सा मोबाइल भी आप के काम आ सकता है|

दूसरी जरूरत, हमें मालूम ही है एक अच्छा सा इन्टरनेट| अगर आपके इलाके में बढ़िया ब्रॉडबैंड नहीं है तो इलाके का सबसे बेहतरीन स्पीड वाला इन्टरनेट कनेक्शन ले लें|

इसके बाद आपके पास अपना ख़ुद का एक ईमेल पता होना चाहिए| यह पता चालू हालात में होना बहुत जरूरी है| कहीं ऐसा न हो कि जब आम सभा का बुलावा आये तो आप खुल जा सिमसिम जपते रह जाएँ|

अगर आपके पास इतना है तो आप अपनी कंपनी में मालिकाना हक का इस्तेमाल करते हुए कॉर्पोरेट लोकतंत्र और कॉर्पोरेट सुशासन में अपना बहुमूल्य योगदान देने ले लिए तैयार हैं|

अरे थोड़ा सा तो रुकिए, पहले कंपनी या डिपाजिटरी या रजिस्ट्रार व ट्रान्सफर एजेंट से पता कर लें कि उनके पास आप का चलता हुआ ईमेल पता है| अगर नहीं है तो उन्हें इसे अद्यतन करने के लिए कहें| वैसे कंपनी वाले खुद भी आपसे पता करने के लिए अखबार में और अपनी वेबसाइट पर जनसूचना लगाकर आपसे आपके चालू ईमेल पते की जानकारी माँगेंगे|

अब आपको यह देखना है कि आपके पास किस प्रकार की कम्पनी के शेयर हैं – ईवोटिंग वाली या ईमेल-वोटिंग वाली| दोनों प्रकार की कंपनियों के लिए आम सभा में भाग लेने की प्रक्रिया अलग है और मैं इसे समझाने जा रहा हूँ|

ईमेल वोटिंग वाली कंपनियाँ

जिन कंपनियों में एक हजार से कम अंशधारक हैं, वह कंपनियां ईमेल से वोटिंग कराएंगी| इन कंपनियों की आम सभा में आपको ज्यादा बेहतर अनुभव मिलने की उम्मीद है| इनके शेयर आपको शेयर बाजार से शायद नहीं मिलेंगे|

यह कंपनियां आपको उनके रिकॉर्ड में दर्ज आपके ईमेल पते और अधिकतर मामलों में समाचारपत्र में जन सूचना देकर आम सभा का बुलावा देंगी|

कंपनियों की आम सभाएं विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग या किसी अन्य चलचित्रीय विधि से संपन्न होंगी| इस वर्गीकरण की कम्पनियां लॉग इन करने वाले पहले ५०० सदस्यों को दोतरफ़ा संवाद की सुविधा उपलब्ध कराएंगी जबकि अन्य सदस्यों को एक तरफ़ा सीधा प्रसारण देखने की सुविधा मिलेगी| अधिकतर मामलों में किसी आम अंशधारक को दोतरफ़ा बातचीत की सुविधा की जरूरत नहीं होती जब तक कि आपके पास कोई महत्वपूर्ण प्रश्न या विचार नहीं है|

आम सभा में सभी विचार विमर्श के बाद यह कम्पनियां अपने अंशधारकों के पास ईमेल के माध्यम से मतदान की प्रक्रिया प्रारंभ करेंगी| आपको अपने मताधिकार का प्रयोग करना है|

मतदान में देरी होने पर, मतदान का निर्णय थोड़ी देर से लेकर थोड़े दिन के लिए आम सभा की बैठक को स्थगित करकर और बाद में पुनः बुलकर भी अंशधारकों को बता दिया जाएगा|

ईवोटिंग वाली कंपनियाँ

जिन कंपनियों में एक हजार या अधिक अंशधारक हैं, वह कंपनियां ईवोटिंग कराएंगी, यह ईमेल वोटिंग से अलग है| इन कंपनियों में से बड़ी कंपनियों के शेयर आपको शेयर बाजार मिल सकते हैं|

यह कंपनियां आपको उनके रिकॉर्ड में दर्ज आपके ईमेल पते पर और साथ ही अधिकतर मामलों में समाचारपत्र में जन सूचना देकर आम सभा का बुलावा देंगी|

कंपनियों की आम सभाएं विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग या किसी अन्य चलचित्रीय विधि से संपन्न होंगी| यह वर्गीकरण की कम्पनियां लॉग इन करने वाले पहले १००० सदस्यों को दोतरफ़ा संवाद की सुविधा उपलब्ध कराएंगी जबकि अन्य सदस्यों को एक तरफ़ा सीधा प्रसारण देखने की सुविधा मिलेगी| अधिकतर मामलों में किसी आम अंशधारक को दोतरफ़ा बातचीत की सुविधा की जरूरत नहीं होती जब तक कि आपके पास कोई महत्वपूर्ण प्रश्न या विचार नहीं है|

इस कंपनियों में आम सभा की बैठक से पहले ईवोटिंग हो जाती हैं| इसके लिए आपके पास जरूरी सूचना आम सभा के बुलावे से साथ ही भेजी जाती है| इस प्रकार की कंपनियों की आम सभा में बहुत गंभीर विचार विमर्श पहले के मुकाबले कम हुआ है|

फिर भी जिन लोगों ने आम सभा से पहले मतदान नहीं किया है उन्हें मतदान की पुनः सुविधा मिलेगी| मतदान का निर्णय करने के लिए दो तीन दिन का समय दिया जाता है| मतदान का निर्णय कंपनी के वेबसाइट पर लगाया जाता है|

आशा करता हूँ, आपको कॉर्पोरेट लोकतंत्र में हिस्सा बनकर प्रसन्नता होगी और महत्वपूर्ण निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनने का गौरव प्राप्त होगा|

 

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विश्व-बंदी १४ मई

उपशीर्षक – इस्तरी वाले कपड़े

तालाबंदी से ठीक पहले हमारे घर के लिए इस्तरी का काम करने वाली महिला जब आई तो बहुत डरी हुई थी| देश के अधिकतर इस्तरी का काम करने वालों की तरह वह भी पास गली में पार्क के किनारे ईंटों और बलुआ पत्थर के सहारे बनाए गए चबूतरे से काम करती है| इस प्रकार के सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर काम करने के कारण उसे भय था कि उसको संक्रमण का बहुत खतरा है| दिल्ली शहर में रहने तीन लोगों के इस परिवार के सभी सदस्यों के लिए काम करना जरूरी है| उस समय उसका एक बेटा मुंबई में था जो तालाबंदी वाली रात ही किसी तरह ट्रेन के शौचालय के सहारे बैठ का दिल्ली वापिस लौटा था| दूसरा एक निजी कंपनी के दफ्तर में हरकारे का काम करता था|

अचानक तालाबंदी हुई| आधे महीने का पैसा ख़त्म हो चुका था बाकि के लिए कोई आय नहीं थी| पहले पंद्रह दिन तो जैसे तैसे गुजर गए मगर उसके बाद कठिनाई शुरू हुई| बचत का पैसा कम हो चुका था और खाने की किल्लत हो रही थी| उसने अपने बंधे हुए ग्राहकों से सहायता मांगी और कुछ लोगों से सहायता की भी| परन्तु, अधिकांश लोगों के सामने खुद अपना ही नगदी का संकट सामने खड़ा था, तो कुछ को उस में अपना भविष्य दिखाई दिया| कुछ लोगों ने उसे सरकारी भोजन केंद्र पर जाने की सलाह दी| कहती है एक दिन बेटा गया भी, मगर उसे अच्छा नहीं लगा|

“मेहनत्त का न खाना तो चोरी या भीख लगता है, पिछले सप्ताह उसने मुझे कहा| लम्बी कतार में खड़े होने के बाद बीमार, भिखारी, मजदूर और कामगार में कोई फ़र्क नहीं लगता, साहब| वहां का खाना जैसा भी हो मगर गले से उतारने के लिए गैरत को घर पर रखना पड़ता है|”

वह उस दिन काम मांगने के लिए आई थी| सरकार ने धोबी आदि के काम की अनुमति दे दी है| हमें यह पता था कि उसकी मदद खैरात कर कर नहीं की जा सकती| कल इस्तरी के लिए हमने कपड़े दे दिए क्योंकि हम उसकी मदद करना चाहते थे| शाम तक कपड़े इस्तरी होकर आ भी गई| अब?

अब समस्या यह कि गली के नुक्कड़ पर चार घंटे रहे यह सुन्दर इस्तरी किए घरेलू कपड़े पहने जाये या नहीं| बेटे ने कहा, कपड़ों को संक्रमणमुक्त करने के लिए छिड़काव किया जाए| पत्नी बिना पहने धोने के पक्ष में थीं| पिता जी ने दो घंटे धूप में रखने की सलाह दी| आप क्या कहते हैं?

इस्तरी होकर आए कपड़े आज चार घंटे धूप में रखे गए, मगर पहनने से पहले की चिंता यानि भय जारी है|

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विश्व-बंदी १३ मई

उपशीर्षक – गाँव की ओर

भले ही इस वक़्त की हर सरकार बार बार करोना को मानव इतिहास की सबसे ख़तरनाक बीमारी कहे, मगर प्लेग और स्पेनिश फ्लू एक बड़ा कहर ढा चुके हैं| इन बीमारियों के समय में एक आम विचार पनपा था – गाँव की ओर पलायन| प्लेग के समय लोग बड़े गाँवों से निकल कर खेतों में रहने चले गए थे|

कारण: सामान्य बुद्धि कहती है, कम जनसँख्या घनत्व के इलाकों में बीमारी का फैलाव धीरे होगा – या शायद बीमारी वहाँ तक देरी से पहुँचे| दूसरा, शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में रहने का खर्च बहुत कम होता है| अपेक्षागत सुरक्षित पर्यावरण आपके स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता के लिए उचित है| सबसे महत्वपूर्ण कितनी भी ख़राब स्तिथि हो – कुछ न कुछ आप अपनी क्यारी या खेत में उगा लेंगे – जबकि बड़े शहरों को गांवों से आने वाले खाने पर ही निर्भर रहना है| कुल जमा, कठिन समय में शहरी जीवन के मुकाबले ग्रामीण जीवन सरल रहता है| हालाँकि आजकल के दिनों में गांवों और शहरों के विकास की जो खाई पैदा हुई है उसके चलते ग्रामीण जीवन उतना भी सरल नहीं है|

पिछले एक माह में में प्रवासी मजदूरों का अपने जन्मस्थानों की तरफ़ लौटने की बातें सामने आई हैं| न सड़कों पर पैदल जाने वालों की भीड़ कम हुई हैं न रेल गाड़ियों का इन्तजार करने वालों की| अब जब गाड़ियाँ चलने लगीं हैं – रेलवे स्टेशन के बाहर बहुत भीड़ है| परन्तु विशेष बात यह है कि पैसे वाले जो लोग अपने ग्रीष्मकालीन घरों और फार्म हाउस में पैसा लगा रहे थे वह भी खेती और अन्य कृषिपरक कार्यकलापों के बारे में बात कर रहे हैं| शहरों में घटते वेतन, कम न होते खर्च, तंगहाल अर्थव्यवस्था कुछ कारक हैं ही| साथ ही अगर गाँव और पुराने शहर वापिस साल दो साल के लिए भी आबाद होते हैं तो वहां का आर्थिक पर्यावरण सुधर सकता है और जन प्रदत्त विकास हो सकता है| पढ़े लिखे लोगों का वापिस पहुंचना और विकास की चाह स्थानीय प्रशासन पर भी विकास के लिए दबाब बनाएगी| किसी भी सरकार के लिए घटती जनसँख्या और अर्थव्यवस्था वाले इलाके के मुकाबले बढ़ते इलाके में धन लगाना सरल ही नहीं बल्कि परिणाम देने वाला है| मोर अगर जंगल में नाचेगा तो कौन देखेगा?

इस सब कारणों से बहुत से मध्यवर्गीय लोग भी गाँवों और छोटे शहरों की ओर लौटने पर विचार कर रहे हैं|

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विश्व-बंदी १२ मई

उपशीर्षक – वसीयतें लिख ली जाएँ

वक्त आ गया है कि वसीयतें लिख ली जाएँ – त्रियोदशी कर कर निपटा दी जाए| पितृपक्ष छोडिए – आए न आए!!

नहीं, मैं नकरात्मक नहीं हूँ| मेरे लिए न मौत नकरात्मक है न वसीयत, बीमारी को जरूर मैं नकारात्मक समय समझता हूँ और मानता हूँ| वसीयत अपने बच्चों और शेष परिवार में भविष्य में होने वाले किसी भी झगड़े की सम्भावना को समाप्त करने की बात है|

इस समय वसीयत का महत्त्व बढ़ जाता है| किसी भी होनी-अनहोनी से समय परिवार के लिए बहुत कुछ जानना समझना और बचाना जरूरी है| साथ ही यह भी जरूरी है कि अपना जीवन भी ख़तरे में न पड़े|

सबसे पहले एक अपनी सारी संपत्ति और उधारियों का हिसाब लगाएं| अगले एक वर्ष के हिसाब से उधारियों के चुकाने का इंतजाम करने और घर खर्च का हिसाब करें| इस के साथ अन्य जरूरी जिम्मेदारियों के खर्च का बजट तैयार कर लें| बची संपत्ति के स्वमित्व तय कर दें| मैं सिर्फ़ सामान्य जानकारी लायक बात ही यहाँ कह रहा हूँ| अगर आप किसी प्रकार की दुविधा में हैं तो किसी विशेषज्ञ की सलाह ले सकते हैं| यह भी तय करें वसीयत का पता किसे हो और किसे न हो|

ध्यान दें आपके सभी ईमेल, सोशल मीडिया आदि एकाउंट्स भी आपकी संपत्ति हैं| आपकी मृत्यु के बाद इनका क्या करना है, यह बहुत जरूरी है| सभी सेवा प्रदाता आपके निर्णय को सुरक्षित रखते हैं और आपके अकाउंट को आपके जाने के बाद आर्काइव या बंद करने जैसे विकल्प आपके सामने रखते हैं| ध्यंद दें आपके एकाउंट्स में बहुत सी ऐसी जानकारी होती हैं जो बात में घर परिवार के लिए जरूरी हो|

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विश्व-बंदी ११ मई

उपशीर्षक – मौत का मार्ग

हमेशा से पक्का विचार रहा है है कि मजदूर किसान को सड़क या सार्वजनिक जगहों पर नज़र नहीं आना चाहिए| वास्तव में, इनको दिन में नज़र ही नहीं आना चाहिए| पहले ज़माने में निपट मजदूरों के एक तबके को फटा हुआ बाँस लेकर चलना होता था जो इंसानों को बताता कि फलां तबके का मजदूर आ रहा है| उस व्यवस्था की निंदा होनी चाहिए| उन्हें दिन में निकलने की जरूरत ही क्या थी?

चलिए महान राज्य आ गया है| सरकार ने आदेश दिया है – श्रमिकों को  सड़क और पटरियों पर चलने से रोकें| कितनी मज़ेदार बात है| माफ़ कीजिए – सरकार ट्रेन चला दी हैं – मजदूर अब घर जा सकते हैं| यह अलग बात है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए भी कुछ लोगों के पास पैसे नहीं हैं और उन्हें शौक लगा है कि मरेंगे मगर पैदल ही घर पहुचेंगे|

आज से तो और भी ट्रेन चलाई गई हैं – वातानुकूलित| और अगले छः दिन की वातानुकूलित ट्रेन पहले आधा घंटे में पूरी बुक हो चुकी है| ट्रेन में न खाना, न कम्बल, न चादर – मगर लोग जा रहे हैं| और वो लोग जा रहे हैं जो लॉक डाउन हो या न हो, जहाँ हो वहीँ रुको का उपदेश दे रहे थे| यह उच्च मध्य वर्ग है – वह वर्ग जो धर्म जाति के भेदभाव के बिना देश में करोना फ़ैलाने के लिए बेहिचक जिम्मेदार है| जाने की शर्त भी तो सामान्य है – लक्षण न दिखाई दें तो चले जाइएगा|

कई लोग पूछते हैं आखिर इतने सारे सरकारी, खैराती, निजी अस्पतालों, मकानों, दुकानों और जमीन ज़ायदाद के बाद भी सरकार बहादुर ने वातानुकूलित ट्रेनों को ही एकांतवास केंद्र में क्यों बदला? यह अंदाज लगाना अब कठिन नहीं रहा| ट्रेन उन्हें हवा खाने ले जाया करेगी – सरसों के खेत, नारियल के पेड़, चम्बल को बीहड़, हिमालय के हिमयोगी सब धाम के दर्शन होंगे|

वक्त आ गया है कि वसीयतें लिख ली जाएँ – त्रियोदशी कर कर निपटा दी जाए| पितृपक्ष छोडिए – आए न आए!!

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विश्व-बंदी १० मई

उपशीर्षक – श्रमिकविरोधी पूंजीपशुवाद  

देश के कथित पूंजीवादी शासक एक एक कर लगातार श्रमिक कानूनों को रद्द कर रहे हैं| एक विधि-सलाहकार होने के नाते मैं वर्तमान कानूनों का समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस प्रकार रद्द किए जाने का स्पष्ट नुक्सान देखता हूँ| पूंजीवादी दुर्भाग्य से यह गलत कदम उस समय उठाया जा रहा है, जिस समय उद्योगों के लिए श्रमिकों की जरूरत बढ़ रही है और जिन स्थानों पर उद्योगों की भीड़ हैं वहां श्रमिकों की भारी कमी है| ऊपर से देखने में लग सकता है कि अगर ऐसे में मजदूरों को रोका जाता है तो उद्योग को लाभ होगा| परन्तु दुर्भाग्य से रूकने के लिए मजदूर हैं ही नहीं| हर बीतते हुए दिन या तो वो लौट कर अपने गाँव घर जा रहे हैं, या असुरक्षित स्तिथियों में संक्रमण का बढ़ता ख़तरा उठा रहे हैं| साथ में महामारी और मृत्यु के नृत्य को पूँजीपशुओं की मानसिकता तांडव में बदल रही है|

यह सभी कानून इस लिए गलत नहीं हैं कि यह मजदूरों को कोई खास लाभ दे रहे हैं, न इसलिए कि मजदूर संगठनों पर कमुनिस्ट का कब्ज़ा है, यह इसलिए गलत हैं कि इनको न उद्योगपति समझ पाते हैं और न श्रमिक| ये पुराने श्रमिक कानून उस तरह का धर्म हैं जिसमें समस्त निष्ठा  ईश्वर को भुला कर कर्मकाण्डों पर टिका दी गई ही| यह क़ानून सिर्फ़ नौकरशाही के कागज़ों का पुलंदा मोटा करते हैं| इनमें सुधार के लिए, इन्हें सरल, समझने योग्य, पालन योग्य बनाने की आवश्यकता थी, न कि रद्द करने की|

वर्तमान में उद्योगों के वेतनदेय क्षमता नगण्य है, साथ ही वो मजदूरों को कोई अन्य लाभ – इज्जत, सुरक्षा, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य सुविधा या बीमा – कुछ देने के लिए न तो बाध्य हैं और न देने जा रहे हैं| पूँजीपशुओं की पूरी ताकत उन्हें गुलाम की तरह रखने में लगी हुई है| मगर गुलाम बनने के लिए आएगा कौन?

अगर मजदूरों का रोजगार प्रदाता उद्योग के आसपास रहने- खाने के बाद घर भेजने लायक बचत न हो, इज्जत न मिले और अगर उसे अपने गाँव के छोटे मोटे रोजगार में जीवन यापन संभव रहे और कम ख़तरा उठाना पड़े तो वो वापिस क्यों लौटेंगे|

हर बात का उचित लाभ भी होता है, अगर श्रमिक कानूनों के रद्द किए जाने के बाद भी यदि श्रमिक नहीं मिलते तो उद्योगों के लिए पूंजीपति के घर से दूर श्रमिक के द्वार पहुंचना होगा और महाराष्ट्र गुजरात की जगह अवध-मगध आना होगा

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विश्व-बंदी ८ मई

उपशीर्षक – लैपटॉप – तालाबंदी में अत्यावश्यक उपकरण

इस तालाबंदी के दौरान सबसे अधिक प्रयोग के बाद भी कम चर्चा में रहा है ऑफिस प्रदत्त लैपटॉप|

हर ऐसी कंपनी जिसने अपने अधिकारीयों और कर्मचारियों को लैपटॉप दिए हैं, वह इस समय सबसे अधिक सुविधाजनक स्तिथि में हैं| उनके लोग बेहतर काम कर पा रहे हैं और उनमें आपकी समूह भावना अधिक विकसित होकर उभरी है| मिलजुल कर समय पर भली प्रकार से समय पर काम कर कर दे पाना, और परिवार में शांति बहाल रखना जैसे काम इन लैपटॉप की प्रमुख उपलब्धि रहे हैं| अगर कंपनी प्रदत्त वाई-फाई भी है तो आप निश्चित ही अच्छी कंपनी के अच्छे अधिकारी/कर्मचारी हैं| बधाई|

दूसरे स्तर पर वो लोग हैं जिनके पास घर में अपना लैपटॉप या डेस्कटॉप हैं जिसे वह कार्यालय के लिए प्रयोग कर रहे हैं| इनका काम चल रहा है| परन्तु इसमें कंपनी की छवि अच्छी नहीं उभर रही है| घर में झगड़ा है कि कौन कब उपकरण का प्रयोग करेगा| समय पर काम नहीं हो पा रहा और शांति घर से गायब है|

सबसे ख़राब स्तिथि उन लोगों की है जिनके नियोक्ता ने उन्हें लैपटॉप नहीं दिया हैं और न ही उनके पास घर में समुचित संख्या में निजी लैपटॉप हैं|

यह स्तिथि उस समय भयाभय हो जाती हैं जब पति पत्नी दोनों को ऑफिस का काम करना हैं, बच्चों की भी ऑनलाइन पढाई होनी है| मोबाइल बहुत देर तक साथ नहीं दे पाता – आप न ठीक से लिख सकते हो न ठीक से बात कर सकते हो| न नियोक्ता ख़ुश, न कर्मचारी, न अधिकारी और न परिवार|

कंपनियों को समझना होगा – एक लम्बा समय ऐसा जाने वाला है जिसमें कर्मचारियों को कार्यालय में कम से कम बुलाए जाने में ही भलाई है| वरना बिना चेतावनी कभी भी चौदह दिन के लिए कार्यालय बंद करना पड़ेगा|

भले ही सरकारें श्रमिक कानूनों को रद्द करने की गलती कर रही हैं, इसे स्वीकार करना भारतीय कंपनियों के लिए बहुत नुक्सानदेह होने जा रहा है – जैसे १९५०-१९९० तक का संरक्षणवाद| देश का सबसे बड़ा आर्थिक सम्पदा – मानव मूल्यहीन होने जा रहा है| प्रतिफल की आशा करना त्रुटि होगी|

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विश्व-बंदी ७ मई

उपशीर्षक – करोना काल में कार्यालय सुरक्षा

जिन चिंताओं का निदान सरलता से संभव है, उन्हें नकारात्मक विचार नहीं कहा जा सकता| करोना काल में असुरक्षित कार्यालय की चिंता इसी प्रकार की चिंता है| सुरक्षा का सकारात्मक विचार है|

दिल्ली महानगर में करोना का शिकार हुए लोगों में एक हिस्सा उन लोगों का है, जो इस से लड़ने के लिए सड़कों या अस्पतालों में तैनात रहे है| हो सकता है इनके बचाव के लिए कुछ और कदम उठाए जा सकते थे, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि अर्थव्यवस्था खोल दिए जाने की स्तिथि में अन्य कार्यालय भी बीमारी फैलायेंगे| परन्तु असावधानी भयाभय स्तिथि उत्त्पन्न कर सकती है|

सामान्यतः सुरक्षित माने जाने वाले कार्यालयों को लेकर आम अधिकारीयों, कर्मचारियों और उनके परिवारों में अधिक चिंता है| क्योंकि इस प्रकार के कार्यालयों में लापरवाही का स्तर अधिक पाया जाता है|

मेरा स्पष्ट मत है, इन कार्यालयों में किसी भी प्रकार की लापरवाही के कारण किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बीमारी या एकांतवास का सामना करना पड़ता है तो इसकी आपराधिक जिम्मेदारी उस कार्यालय या संस्था के कार्यपालक अधिकारियों और कार्यकारिणी के सदस्यों की होगी – कंपनी के मामले में मुख्य कार्यपालक अधिकारी और निदेशक मंडल, संस्थाओं के मामले में सचिव और कार्यपालक कार्यकारिणी|

सुरक्षा के दो स्तर हैं जिनका पालन होना है – भले ही वह सरकारी दिशानिर्देशों का भाग हो या न हो: पहला कार्यालय स्तर पर और दूसरा कर्मचारी से सुरक्षित आवागमन को लेकर|

कार्यालय स्तर पर:

  • जबतक असंभव न हो जाए, अधिकारी व कर्मचारी घर से काम करें| उन्हें अपने सप्ताह से ४० ४५ घंटे स्वयं सुनने की सुविधा दें परन्तु कार्य अवश्य पूरा करवाएं|टीसीएस का उदहारण लेकर चलें|
  • कार्य के आवश्यक उपकरण – कलम, कंप्यूटर, काग़ज आदि कार्यालय दे सकता है और अगर अधिकारी व कर्मचारी अपने निजी उपकरण प्रयोग करता है तो मानदेय दिया जा करता है|
  • केवल स्वस्थ्य अधिकारी व कर्मचारी को ही कार्यालय आने की अनुमति दें| सभी अधिकारियों व कर्मचारियों को दैनिक स्वास्थ्य सूचना दर्ज करने के लिए कहा जा सकता है|
  • हर अधिकारी व कर्मचारी को अपने साथ रह रहे परिवारीजनों के स्वस्थ्य की सूचना देने की अनुमति रहे और अगर साथ रह रहे किसी परिवारीजन को स्वास्थ्य सम्बन्धी असुविधा या कठिनाई महसूस हो तो सम्बंधित अधिकारी या कर्मचारी को तुरंत घर से ही कार्य करने के लिए कहा जाए|
  • कार्यालय में तापमापक, साबुन, सेनिटाईज़र, जल, पेय जल, आदि की सम्पूर्ण व्यवस्था हो| सफाई का उच्च कोटि का प्रबंध हो| कड़ाई से दैनिक उच्चस्तरीय जाँच सुनिश्चित हो|
  • हर व्यक्ति मास्क, मुखोटे, घूँघट, पर्दा, बुर्का, हिज़ाब, चादर, दुप्पटे, अगौछे, गमछा आदि का अवश्य प्रयोग करे|
  • यथा संभव अधिकारियों व कर्मचारियों के कार्यालय पहुँचने और निकलने के समय अलग अलग हों| भोजनावकाश समय भी भिन्न रहे|

आवागमन स्तर पर

  • अधिकारी व कर्मचारी घर से निकलने से एक घंटे पूर्व और पहुँचने के एक घंटे बाद तापमान ले और स्वस्थ्य दर्ज करे|
  • भीड़ से बचे| कार्यालय प्रदत्त या निजी वाहन का प्रयोग हो| अनावश्यक गप्पों, मुलाकातों, बैठकों और सम्मेलनों से बचें|
  • बिना स्वास्थ्य जाँच किए किसी अधिकारी व कर्मचारी को कार्यालय में प्रवेश न करने दिया जाए|
  • हर अधिकारी व कर्मचारी को यह दर्ज करना अनिवार्य हो कि वह आज का काम घर से क्यों नहीं कर सकता था? कार्यालय में उसकी कितने समय के लिए उपस्तिथि आवश्यक है और उसके बाद उसे घर बिना दोबारा पूछे घर जाने की सामान्य अनुमति होनी चाहिए|
  • सरकारी छुट्टियों के दिन कार्यालय कतई न खुलें| काम की दैनिक लेखा-जोखा लिया जा सकता है|

सभी उच्च अधिकारीयों के लिए यह आवश्यक है कि कम से कम अपने स्तर से तीन स्तर नीचे के सभी अधिकारियों व कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर निगाह रखें और उनसे अधिकतम कार्य घर से ही करवाने का प्रबंध करें|

अगर कोई भी अधिकारी, संस्था, कंपनी, कार्यालय या विभाग सामान्य आवश्यक सावधानियों का पालन नहीं करता तो आपराधिक कार्यवाही के लिए तैयार रहे, भले ही सजा आपको सेवानिवृत्ति के बाद ही क्यों न मिले| न तो सरकार और न ही सरकार के दिशा-निर्देश (भले ही आधे- अधूरे रह गए हों) इस आपराधिक लापरवाही की सजा दिलवाने से आपको रोक पायेगी, जब तक की सामान्य बुद्धि युक्ति सुरक्षा न अपनाई गई हो|

अगर सुरक्षा के सामान्य बौद्धिक नियमों का पालन करने की ठान ली जाए तो सावधानियाँ न तो कठिन हैं न ही महंगी हैं|

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विश्व-बंदी ६ मई

उपशीर्षक – गिरमिटिया

हिंदुस्तान में वक़्त सिर्फ़ पञ्चांग के लिए बदलता है, इंसान के लिए नहीं|

हम कितनी भी बड़ी बड़ी बात करें, कितना भी अपनी पुरानी और नई महानता का गान करें, हम नहीं सुधरते| उस पर तुर्रा यह है गिने चुने बे-अक्ल लोग गाना गाते रहते हैं कि देश बुरा लग रहा है तो देश से चले जाओ| मगर असलियत है थी है और देश का हर पिछड़ापन, महानता के इन्हीं चारणों पर टिका हुआ है|

भारत द्वारा अपने मजदूरों के साथ किया जा रहा व्यवहार दुनिया भर में बेइज्जती का उदहारण बना हुआ है| पहले मजदूरों और दैनिक कामगारों की स्तिथि पर विचार किए बिना तालाबंदी कर दी गई| कोई बात नहीं, सबने माना यह अतिव्याधि का समय है सरकार ने जल्दी में जो बना कर दिया| काम धंधा, रोजी रोटी, ठौर-ठिकाना हर चीज का सवाल लिए मजदूर जब निकल पड़ा घर जाने के लिए तो नाक बचाने के लिए खैराती इंतजामात किये गए| मजदूर भले ही रोटी के साथ करोना का शिकार हो जाए| जिन्हें इज्जत की रोटी की आदत हो वो या तो बेइज्जत महसूस करें या फिर हमेशा के लिए बेइज्जती की आदत पाल लें|

लॉक डाउन के लगभग खुलने के दो दिन पहले अचानक सरकार ने मजदूरों को घर जाने की अनुमति दी| मगर दुर्भाग्य! महंगे रेल किराए की वसूली हुई| इतने से भी काम नहीं बना तो पहले गुजरात से उन्हें जबरन रोके जाने की ख़बरें आईं बाद में कर्णाटक ने खुलकर उन्हें वापिस जाने देने से मना कर दिया|
क्या वो बंधुआ, गुलाम या गिरमिटिया हैं, कि आज़ाद नहीं किए जायेंगे?

मगर यह गुलामी इतने पर ही नहीं रूकती| सरकार हर किसी के लिए माई-बाप बनना चाहती है| सुरक्षित क्षेत्रों में हर काम की अनुमति देना और काम लेना समझ आता है| परन्तु असुरक्षित क्षेत्र में किसे अनुमति है किसे नहीं इसका कोई भी सुरक्षित मानदंड नहीं है| बहुत से काम जो घरों से हो सकते थे उन्हें घरों से किए जाने पर प्राथिमिकता दी जानी चाहिए| परन्तु न व्यवसायी न सरकार इस बात पर विचार कर रहे हैं| जिन्होंने रोजगार के समय अनुबंध किये हैं वो अपनी मानसिकता में नए किस्म के गिरमिटियों और आक़ाओं में बदल चुके हैं|

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विश्व-बंदी ५ मई

उपशीर्षक – सुरारसिक सम्मान

सुरा रसिकों का सम्मान सदा ही रहा है| यह ही कारण है देवता भी स्वर्ग में इसका सेवन करते हैं| परंपरागत रूप से कहा जाता रहा है सुरा का सेवन करे वह सुर और जो न करे असुर| राक्षस आदि अन्य गैर-असुर समुदायों में भी सुरा सेवन की वर्णनीय परंपरा रही है| अति सर्वस्त्र वर्जनीय है, उस में हम संदेह नहीं रखते| जिन्हें सुरा नहीं मिलती उन्हें भाँग अफ़ीम प्रकृति प्रदत्त साधन उपलब्ध हैं| इस्लाम में सुरा पर प्रतिबन्ध इसके इस्लाम-पूर्व असीरियाई मूल में मालूम होता है –हो सकता है असीरिया का सम्बन्ध प्राचीन असुरों से रहा हो| सुरा का समर्थन या विरोध करते समय तथ्य कौन देखता है, मैं भी नहीं देखता|

कल से देश के हर सभ्य राज्य ने सुरा से प्रतिबन्ध हटा लिया है – गुजरात और बिहार की गणना नासमझों में पहले से है अतः उनपर फ़र्क नहीं पड़ता| सरकारी कोषागार में धन धान्य की वर्षा हो रही है| यह सुरा का ही प्रताप है| कभी मंहगाई बढ़े, कर लगाए जाएँ, सुरा-रसिक कभी विरोध नहीं करते| अधिकांश तो मात्र इसलिए सुरा क्रय करते हैं कि सरकारी कोष में गुप्त दान दे सकें|

सुरा नकारात्मक भाव से ही नहीं नकारात्मक रोगों से भी मुक्ति का रामबाण माना गया है इसके औषध रूपों की महिमा आयुर्वेद में आसव और अरिष्टों के रूप में ख्यात होती है| इस समय भय, निराशा, रोग, मनोरोग, मन-व्याधि आदि का जो साम्राज्य व्याप्त है, सुरा उसे तोड़ने में नितांत सहायक है| यही कारण है कि राष्ट्र-हितैषी गृहस्थ-संत साधारण से साधारण वस्त्रों में बिना किसी मोह माया के जीवन- मृत्यु के अविनाशी काल चक्र का मर्म समझते हुए राष्ट्र कोष में गुप्त दान का पुण्य प्राप्त करते हुए सुरा का क्रय करने अवतरित हुए और लगभग विधि विधान के साथ सुरा का क्रय-अनुष्ठान संपन्न किया| अर्थशास्त्र में इस प्रकार सुराक्रय का पुण्य प्रधानमंत्री के कोश में दान देने के समकक्ष माना जाता रहा है|

सुरा को कभी भी गलत नहीं कहा जा सकता| इसका विलोप सदा ही आपराधियों द्वारा स्तरहीन सुरा के उत्पादन और अवैध बिक्री के रूप में सामने आता है| आवश्यकता उचित सेवन विधि का प्रचार करने में है| सुरा-रसिकों को गंदगी में वास न करना पड़े| उनके सुकोमल हाथों से हिंसा न हो, इसका प्रबंध हो| सुरा-रसिकों को अपनी कारों का सारथी न बनना पड़े, यही इच्छा है|

मरने वालों और नए बीमारों की संख्या पर क्या विचार किया जाए, यह व्यर्थ लगता है|

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विश्व-बंदी ४ मई

उपशीर्षक – कैद से छूटे कुत्ते बिल्ली

मुझे कोई सभ्य तुलना समझ नहीं आ रही| तालाबंदी का सरकारी ताला अभी ढीला ही हुआ कि दिल्ली वाले सड़कों पर ऐसे निकले हैं जैसे कई दिन के भूखे कुत्ते बिल्ली शिकार पर निकले हों| जिसे जो हाथ लगा मूँह पर लपेट लिया – रूमाल, मफ़लर, दुप्पटा, अंगौछा, तहमद, लूँगी| कुछ ने तो अपने दो-पहिया चौ-पहिया को धोने नहलाने की जरूरत भी नहीं समझी| शराब के आशिकों की भीड़ का क्या कहना – लगता था कि इस ज़िन्दगी का आख़िरी मौका हाथ ने नहीं जाने देना चाहते|

करोना भी बोला होगा – गधों, सरकार थक गई है तुमसे, इसलिए लॉक डाउन कम किया हैं| मगर मैं नहीं थका – मेरा काम चालू है|

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस समय करोना के मौजूदा मरीज़ों का चौथाई पिछले तीन दिन में आया है| साथ ही करोना के मौजूदा मरीज़ों का एक-तिहाई दिल्ली-मुंबई और आधा बड़े नामी शहरों से आता है|

ख़बरों में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का बयान छपा है, जो बहुत चिंताजनक तस्वीर हमारी पढ़ी-लिखी नासमझ जनता के बारे में पेश करता है| उनके बयान से कोई भी कह सकता है कि:

  • अन्तराष्ट्रीय यात्रियों की बड़ी संख्या बड़े शहरों से है और उनकी मुख्य भूमिका बीमारी फ़ैलाने में रही है|
  • ग्रामीण भारत अधिक अनुशाषित व्यवहार कर रहा है| बड़े शहरों में ठीक से लॉक डाउन का पालन नहीं किया गया|
  • मजूदूरों को और उनसे शायद कोई ख़तरा नहीं, क्योंकि विदेश से आने वालों से उनका संपर्क बहुत कम होता है|

भले ही सरकार से कितनी भी कमियां रहीं हो मगर जनता ने सरकार के प्रयासों को पूरा नुक्सान पहुँचाया है| इसमें सरकार समर्थकों का प्रदर्शन सबसे ख़राब रहा – जब उन्होंने ढोल नगाड़ों के साथ साड़ों पर नाच गाना किया बाद में आतिशबाजी की| अपने समर्थकों से प्रधानमंत्री की निराशा तो उनके पिछले दो महीने के उनके भाषणों में भी झाँकती नज़र आती है|

इस बीच सरकार को घर लौटते प्रवासी मजदूरों से किराया वसूलने के मुद्दे पर व्यापक जन-आलोचना का सामना करना पड़ा है और वह बात घुमाने में लगी है|

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विश्व-बंदी ३ मई

उपशीर्षक – आरोग्य सेतु, खुली शराब

मैं हर बात पर मोबाइल एप बना दिए जाने में कोई तर्क नहीं देखता| परन्तु जिन गिने चुने कार्यों के लिए एप बढ़िया सेवा प्रदान कर सकते हैं उनमें निश्चित रूप से “असुरक्षित संपर्क चेतावनी” और “असुरक्षित संपर्क पुनर्सूचना” निश्चित ही आते हैं| परन्तु आरोग्य सेतु के बारे में बहुत से प्रश्न हैं जो अनुत्तरित हैं| यह प्रश्न “घोषित” मूर्ख राहुल गाँधी द्वारा उठाने से मूर्खतापूर्ण नहीं हो जाते| प्राचीन संस्कृत साहित्य आज तक अपने समय के “घोषित” महामूर्खों का ऋणी है|

अधिकतर एप अनावश्यक सूचना मांगने और उनके दुरूपयोग का माध्यम रहे हैं| अगर यह एप कोई भी सूचना गलती से भी गलत हाथों में पहुँचा दे तो यह देश और सरकार के लिए खतरा बन सकता है| मैं इस मामले में मोदी जी या उनकी सरकार की निष्ठा पर प्रश्न नहीं उठा रहा, न ही एप विकसित करने वाले गुप्त समूह पर| परन्तु किसी भी सरकारी कार्यकलाप की पुनः जाँच होने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए|

करोनाकाल के प्रारंभ में कथित रूप से मोदी सरकार ने हवाई अड्डों पर निगरानी के आदेश दिए थे जिससे संकृमित व्यक्तियों की पहचान हो सके| जब भी इस काम के ठीक से न होने पर प्रश्न उठता है अंध-भक्त तर्क देते हैं कि यह काम मोदी खुद थोड़े ही करते, यह सब अधिकारियों की गलती है| यही तर्क मेरा भी है| मेरा आरोग्य सेतु के अंध-समर्थकों से यह ही निवेदन है कि आरोग्य सेतु मोदी जी ने खुद थोड़े ही बनाया है, इसकी सुरक्षा जाँच होने में क्या कठिनाई है?

आज दिन भर सोशल मीडिया में जिस तरह सरकार समर्थक बातें करते रहे उस से ऐसा भान होता है जैसे कि सरकार ताला बंदी को हल्का नहीं कर रही बल्कि करोना के आगे घुटने टेक रही है| मोदी भक्त सरकार का अनावश्यक बचाव करते नज़र आ रहे हैं| जबकि इस बात पर कोई बड़ा प्रश्न नहीं उठा है| वास्तव में लोग तालाबंदी पर अधिक प्रश्न उठाते रहे हैं| यह जरूर लगता है, सरकार तालाबंदी के समय का सदुपयोग उपकरणों, दवाइयों, योजनाओं आदि में करने में असफल रही है|

तालाबंदी जरूर जारी हैं पर कल से शराबबंदी खुलने के साथ|

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विश्व-बंदी १ मई

उपशीर्षक – करोना काल में पूंजीपतिवाद का दबाब

मेरे मन में कभी भी इनफ़ोसिस के किसी भी संस्थापक सदस्य के लिए कोई विशेष सम्मान नहीं रहा| यह लोग पूँजीपतिवाद (न कि पूंजीवाद) का उचित उदहारण मालूम देते हैं| जिस देश में बेरोजगारी व्याप्त हो और कर्मचारियों पर पहले से ही १२ घंटे काम करने का पूंजीपतिवादी दबाब हो वहां यह महोदय और अधिक काम करने का प्रवचन दे रहे हैं|

वास्तव में मैं पिछले कई दिनों में सरकार का इस बात के लिए ही धन्यवाद कर रहा हूँ कि सरकार पूंजीपतिवाद के दबाब में आकर लॉक डाउन को न लागू करने या उठाने पर आमादा नहीं हुई| प्रकृति ने पूंजीपतिवादी समझी जाने वाली सरकार से लोकहितकारी राष्ट्र का पालन करवाने ने कुछ हद तक सफलता प्राप्त की है| करोना काल की सबसे बड़ी सीख अर्थव्यवस्था को सकल उत्पाद से नहीं बल्कि सकल प्रसन्नता से नापने में है|

शाम तक इस आशय की ख़बरें आ गई कि लॉकडाउन को दो हफ्ते के लिए बढ़ाते हुए इस में जबरदस्त परिवर्तन किए गए हैं| सरकारी अधिसूचनाओं को पढ़ना इतना सरल नहीं होता|  तमाम दबाब के बीच सरकार लोकहित, सकल प्रसन्नता, सकल स्वास्थ्य, सकल उत्पाद जैसी अवधारणाओं में उचित समन्वय बैठाने का देर दुरुस्त प्रयास कर रही है|

देश को पहले से ही लाल, संतरी, हरे मुख्य ज़ोन में बाँट दिया गया है| इन के अतिरिक्त राज्य सरकारों के आधीन कन्टेनमेंट ज़ोन भी है, जो सबसे गंभीर है| अब कुल मिला कर पूर्ण लॉक डाउन केवल कन्टेनमेंट ज़ोन में ही रह जाएगा| देश का हर बड़ा शहर नक्शे पर लाल रंग से रंगा हुआ दिखता है| अब कम महत्त्व के समझे जाने वाले पिछड़े इलाके हरे रंग में रंगते हुए ग्रामीण भारत के साथ देश की अर्थव्यवस्था संभालेंगे| विकास इस समय उत्तर नहीं प्रश्न है|

करोना काल कतई सरल नहीं| कोई आश्चर्य नहीं कि लॉक डाउन के टोन डाउन होते समय श्रेय लेने के लिए श्रेय-सुखी प्रधानमंत्री जनता के सामने नहीं आ रहे|

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विश्व-बंदी ३० अप्रैल

उपशीर्षक – वेतन कटौती का दिन

कोई  भी इस बार मई दिवस की शुभकामनाएं लेना देना नहीं चाहता|

इस बार किसी को वेतन का इन्तजार नहीं है, वेतन कटौती की बुरी तरह आशंका है| देश का हर अधिकारी कर्मचारी अपने मोबाइल में यह देखना चाहता है इस बार वेतन कितना कटकर आ रहा है| आज सुबह पहली चिंताजनक ख़बर यह थी की देश में १०० बड़ी कंपनियों में से २७ लम्बे समय वेतन देने की स्तिथि में नहीं हैं| दूसरी बुरी ख़बर तीसरे पहर आ चुकी थी, रिलायंस समूह वेतन कटौती कर रहा है| यह बात अलग है कि बड़ी कंपनियों की ख़बरें निचले स्तर पर वेतन कटौती अभी दर्ज़ नहीं कर रहीं हैं|

कठनाई सूक्ष्म, लघु, और मध्यम उद्यमों, दुकानदारों और उनके करोड़ों कर्मचारियों के लिए आने जा रही है| इन उद्योगों के पास न देने ले लिए पर्याप्त आय और जमा धन पूँजी है न कोई सरकारी सहायता| इन उद्योगों ने मार्च का आधा वेतन पुरानी आय और जमा धन पूँजी से दिया गया है| इसके बाद इनमें से अधिकतर उद्योगों की अप्रेल माह का पूरा वेतन देने की स्तिथि नहीं हैं| इनके कर्मचारी अघोषित रूप से बेरोजगार हैं ही, सरकारी कानूनी परिभाषा के परे अधिकतर सूक्ष्म और लघु उद्यमों के मालिक भी बेरोजगार की श्रेणी में हैं| लॉक डाउन को समर्थन देने से बाद भी यह कहना होगा कि अगर लॉक डाउन मई में जारी रहता है तो मध्यम उद्योग भी वेतन देने में अक्षम होंगे|

सरकार को यह गणना नहीं करनी कि उसे बीमारी से जीवन बचाना है या गिरती अर्थव्यवस्था से, बल्कि  यह गणना करनी है कि बीमारी से जीवन बचाने के लिए कितना खर्च उठा सकती है और कब तक| उतने दिन के भीतर बीमारी को काबू करना है और उसके बाद ही अर्थव्यवस्था को खोलना है|

निश्चित रूप से शुद्ध ग्रीन जोन में अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रूप से खोला जा सकता है| कठिनाई यह भी है कि पिछले बीस वर्ष की सरकारी अनीतियों के कारण देश की अर्थव्यवस्था कुछ खास बड़े शहरों के आगे पीछे घुमने लगी है| इसे यथासंभव रूप से शीघ्रतापूर्वक विकेन्द्रीयकृत करना होगा| परन्तु फिलहाल कुछ तो शुरू हो मगर जीवन से बिना समझौता किए और बीमारी से बिना हार माने|

अंत में इतना और कहूँगा, सच है या नहीं परन्तु बहुत से पूंजीपति अर्थव्यवस्था को जल्दी खुलवाने के लिए दबाब की नीति के रूप में भी प्रयोग करने की कोशिश कर सकते हैं, ऐसी आशंकाएं सामने आई हैं|

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विश्व-बंदी २८ अप्रैल

उपशीर्षक – करोना काल का भोजन उत्सव

ग़लतफ़हमी है कि धर्म भारतियों को जोड़ता और लड़ाता है| हमारी पहली शिकायत दूसरों से भोजन को लेकर होती है| इसी तरह भोजन हमें जोड़ता भी है| करोना काल में भारतीयों को भोजन सर्वाधिक जोड़ रहा है| यहाँ तक कि रोज़ेदार भी भोजन और पाक-विधियों पर चर्चा में मशगूल हैं| पारिवारिक समूहों से लेकर मित्रों के समूह तक पाक विधियों की चर्चा है|

मैं परिवार में भोजन रसिक के रूप में जाना जाता हूँ, परन्तु इस समय देखता हूँ कि जिन्हें बैंगन पुलाव और बैगन बिरियानी का अंतर नहीं पता वह भी उबला-बैंगन बिरियानी और भुना-बैंगन बिरियानी के अंतर पर चिंतन कर रहे हैं| जिसे देखिये नई विधियाँ खोज रहा है और पारिवारिक और निजी स्वाद के अनुसार|

अभी पिछले सप्ताह परवल की चटनी बनाई थी तो मित्रों, सम्बन्धियों और रिश्तेदारों ने उसके तीन अलग अलग परिवर्धित संस्करण बनाकर उनके चित्र प्रस्तुत कर दिए| मैं गलत हो सकता हूँ, मगर स्वाद के हिसाब से लॉक डाउन के पहले ७-१० दिन साधारण घरेलू खाने के रहे, उसके बाद नए नाश्तों ने ७-१० दिन रसोई सजाई| उसके बाद भारतीय रसोइयों में दोपहर और शाम के पकवानों की धूम मची – मुगलई, पंजाबी, कायस्थ, लखनवी, बंगाली, उड़िया, गुजरती, मराठी, बिहारी, आन्ध्र, उडुपी, चेत्तिनाड, केरल, आदि अलग अलग पाक परम्पराओं को खोजा और समझा गया है| मगर गूगल बाबा जरूर सही जानकारी दे पाएंगे| अगर कोई सही दिशा निर्देशक जनता को सर्व-भारतीय पाक विधियों के बारे में बताने लगे तो राष्ट्रीय एकता को मजबूत होने में एक अधिक समय नहीं लगे| अब हम मिठाइयों की और बढ़ रहे हैं| मैं अगले महीने इटालियन, मेक्सिकन, थाई, जापानी आदि पाक-विधियों के भारत में प्रयोग की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकता|

भोजन प्रेमी भारतीयों के लिए सबसे बड़ी कठिनाई पाक सामिग्री की कम उपलब्धता है तो सबसे बड़ा प्रेरक भी यही है – उपलब्ध सामिग्री के नए नवेले प्रयोग, नए स्वाद, नया आपसी रिश्ता|

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विश्व-बंदी २७ अप्रैल

उपशीर्षक – प्रकृति का पुनर्निर्माण

करोना के फैलाव के साथ साथ प्रकृति का विजयघोष स्पष्ट रूप से सुना गया है| दुनिया में हर व्यक्ति इसे अनुभव कर रहा है| सबसे बड़ी घोषणा प्रकृति ने ओज़ोनसुरक्षाकवच का पुनर्निर्माण के साथ की है| दुर्भाग्य से मानवता अभी भी प्रकृति के विजयघोष पर गंभीर नहीं है| अगर वर्ष २०२० में मानवता डायनासोर की तरह प्रकृति विलुप्ति का आदेश दे दे तो शायद पृथ्वी के नए सम्राट शायद १० लाख साल बाद मूर्ख मानवों की आत्मविलुप्ति को सहज ही पढ़ा रहे होंगे| यह ठीक वैसा ही है जैसे हम डायनासोर की विलुप्ति पढ़ते हैं| आज हम प्रकृति की यह चेतावनी स्पष्ट सुन सकते हैं: अगर मानव नहीं सुधरे तो पृथ्वी पर सबसे कब समय तक विचरण करने वाली प्राणी प्रजाति में मानव की गिनती की जाएगी|

ओज़ोन सुरक्षा कवच में अभी और भी छेद हैं और यह वाला सुराख़ इसी साल देखा गया था और इसे भरने में प्रकृति को मात्र दो या तीन महीने लगे| यह कार्य शायद करोना जन्य लॉक डाउन के कारण जल्दी संपन्न हो गया| इसके बनने और बिगड़ने का कारण जो भी रहा हो, दोनों घटना प्रकृति का स्पष्ट शक्ति प्रदर्शन हैं| यदि मानव अपनी बिगड़ीं हरकतें करने से कुछ और दिन रोका जा सका तो प्रकृति चाहे तो शेष ओज़ोन सुरक्षा कवच की मरम्मत भी कर सकती है|

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद यह स्पष्ट लगता है कि लॉकडाउन प्रतीकात्मक ढील के साथ बढ़ने जा रहा है| शहरी मध्यवर्ग आर्थिक दबाब के बाद भी डरा हुआ है और मुझे नहीं लगता कि स्तिथि जल्दी सामान्य होगी| गाँव और वन क्षेत्र को कदाचित इतनी चिंता न हो या फिर उनपर दबाब बहुत अधिक होगा| किसी मामूली इलाज के लिए भी अस्पताल जाने से लोग बचना पसंद करेंगे| इसका कारण मात्र भय नहीं बल्कि अस्पतालों को करोना के प्रति ध्यान केन्द्रित करने की भावना है| आश्चर्यजनक रूप से लोग अस्पतालों की कम जरूरत महसूस कर रहे हैं| स्वस्थ पर्यावरण, समुचित शारीरिक व मानसिक आराम और घर का ताजा खाना अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी बनकर उभरे हैं|

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विश्व-बंदी २६ अप्रैल

उपशीर्षक – घरेलू नौकर चाकर

लॉक डाउन कब खुलेगा? इस प्रश्न के पीछे अपने अटके हुए काम निबटाने से अधिक यह चिंता है कि हम अपनी घरेलू नौकरानी को कब वापिस काम पर बुला सकते हैं| जो लोग घर से काम कर रहे हैं उनके लिए यह जीवन-मरण जैसा प्रश्न है| हमें अपनी लम्बी चौड़ी गृहस्थी सँभालने के लिए सहायक की जरूरत रहती है: कुछ तो गृहस्थी का आकार बड़ा है कुछ हमें उसे सँभालने की आदत नहीं मगर सबसे बड़ी बात दोनों पति-पत्नी कार्यालय के काम में जुटे हुए हैं| एक औसत गृहस्थी के रोजाना के कार्य कम से कम चार पांच घंटे का समय ले ही जाते हैं| मगर घर में रहते हुए बहुत से काम बढ़ भी तो गए हैं – तीन बार चाय कॉफ़ी, प्रतिदिन कुछ नया बनाने का दीर्घ राष्ट्रीय त्यौहार, कुछ नई किताबें, फ़िल्में और सॉप ऑपेरा, पारवारिक समय की बढ़ी हुई माँग, और बच्चों की पढ़ाई|

हम सबका समय-प्रबंधन बिगड़ा हुआ है| अगर समय प्रबंधन को नियंत्रित नहीं किया जाए तो शायद घरेलू नौकर चाकर इसे न सुधार भी न पाएं| परन्तु यह भी सच है कि काम का दबाब और उस से अधिक माहौल का तनाव सिर चढ़ने लगा है| फिर भी मुझे रोज अपने समय प्रबंधन पर विचार करना पड़ रहा है| भविष्य-प्रबंधन की परियोजना भी बनानी और पूरी करनी है| क्या भविष्य में घरेलू चाकरों की चौबीस घंटे घर रखने के की परिपाटी पुनः शुरू करनी चाहिए?

इस छोटा छिपा हुआ प्रश्न यह भी है कि अगर नौकर चाकर को वेतन भी देना है तो काम तो करा सकें वरना काम करने और वेतन देने की दोहरी मार भी गले पड़ी है| कुछ भले लोग तो पहले ही वेतन मनाही कर चुके हैं| कुछ उसमें कटौती पर विचार कर रहे हैं| धन का दबाब तो हम सब पर है| अगर केंद्र सरकार मंहगाई भत्ता कर कर रही है तो आम जनता क्यों न करे? सरकार अनजाने ही ग़रीबों को पूरा वेतन देने के आग्रह का नैतिक अधिकार खो बैठी है| यह चौतरफ़ा वेतन कटौती सेवा क्षेत्र में देश के सकल घरेलू उत्पाद में १०-१५ फ़ीसदी की कमी दर्ज़ कराने जा रही है|

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विश्व-बंदी २५ अप्रैल

उपशीर्षक – स्व-तालाबंदियों की यादें  

हमारे लिए न तो तालाबंदी पहली है न कर्फ्यू| परन्तु पुरानी सब तालाबंदी मेरे अपने विकल्प थे|

मेरे जीवन की पहली तालाबंदी बारहवीं की बोर्ड परीक्षा से पहले आई थी|

छोटे से कस्बे में पढाई को लेकर मारामारी का माहौल नहीं था| बल्कि हालात यह थे कि पढ़ाने वाले शिक्षक भी हार मानकर बैठने लगते थे| उधर गणित को लेकर मेरे मन में भय व्याप्त होने लगा था| दसवीं के बाद मैंने तय किया था कि बिना प्राइवेट ट्यूशन लिए गणित विज्ञान पढ़ना कठिन है| परन्तु भारतीय माता-पिता इस तरह की बात कहाँ सुनते हैं? इसके बाद डेढ़ साल मौज मस्ती में काट दिए कि अनुत्तीर्ण होने का ख़तरा साफ़ दिखाई दे रहा था| इससे पहले की मेरी पूरी पढ़ाई छात्रवृत्ति के साथ हुई थी और अनुत्तीर्ण होने की कोई आदत भी नहीं थी| पूरे क़स्बे मोहल्ले को लगता था कि कितना भी आवारागर्दी करेगा – तृतीय श्रेणी तो आएगा ही| यह दो एक हितेषियों को छोड़कर किसी के लिए चिंता का विषय न था|

अचानक नववर्ष के ठीक पहले मोहल्ले के एक बड़े ने बिन मांगी सलाह दी कि किनारे से उत्तीर्ण होने से बेहतर है कि इस बात खाली उत्तर पुस्तिका रखकर अगली बार मेहनत करना| मगर विद्रोह का कीड़ा तो दिमाग में घुसा हुआ ही था तो उत्तीर्ण होने का निर्णय किया| किताबें खोलने के बाद पता चला कि इस बार उत्तीर्ण होना कठिन लगता है| फिर क्या था, समय सारिणी बनाई और चार घंटे की नींद पर अपने आप को लाया गया| उन दिनों योग का ठीक ठाक अभ्यास था तो नींद के नियंत्रण में योग ध्यान का सहारा लिया| किसी ने नींद को तीन चार महीने के लिए टालने के लिए मन्त्र तंत्र भी बताए थे – जिसमें इक्कठा की गई नींद बाद में पूरी करना अनिवार्य था| वैसे नींद को छः घंटे से चार घंटे पर लाना कोई बड़ी बात नहीं थी – दण्ड-बैठक, आसन, त्राटक, आवारागर्दी, खटाई, गुड़, चीनी, मिर्च, घी, तेल का परहेज तय हुआ – प्राणायाम और ठंडाई जारी रही| तीन चार महीने पक्की रसोई से कोई सम्बन्ध नहीं रखा – रूखी रोटी, सब्ज़ी, सलाद, दही-बूरा| अंतिम परीक्षा के बाद पक्की रसोई की इच्छा जता कर सोने चला गया था पर सालों तक यह अंतिम इच्छा बनी रही जिसे माँ ने पूरा किया|

परिणाम आने के बहुत बाद समझ आया था कि उत्तीर्ण होने की मेरी ज़िद ग़लत थी – अनुत्तीर्ण होकर पूरी तैयारी के साथ दोबारा परीक्षा देना अधिक उचित था| प्रण किया कि आगे इसका ध्यान रखा जाएगा – मेरे सभी सनदी लेखाकार और कंपनी सचिव जानते ही होंगे कि ध्यान रखने का ईश्वर ने भरपूर मौका दिया – साथ में स्व-तालाबंदियों का भी|

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विश्व-बंदी २४ अप्रैल

उपशीर्षक – स्वदेशी और स्वावलंबन

क्या होता, अगर ३१ दिसंबर २०१९ को मैं आपसे कहता कि भारत को स्वदेशी और स्वावलंबन के सिद्धांत की और बढ़ना चाहिए और इन विषयों पर गाँधी के विचारों पर चिन्तन करना चाहिए? शायद मैं खुद अपने आपसे सहमत नहीं होता| परन्तु इस करोना काल में हम सब इस पर विचार कर रहे हैं| मैं नियंत्रित विदेशी निवेश और खुले व्यापार का समर्थक रहा हूँ| मेरी समाजवादी शिकायतें छद्म-पूंजीवाद से जरूर रही है|

पिछली शताब्दी में स्वदेशी के नाम पर स्थानीय उद्योगों के अपरिष्कृत उत्पाद ही जनता को उपलब्ध होते रहे हैं| यही कारण था कि १९९० तक भारत में विदेशी सामान को लेकर इतना उन्माद था कि तस्करों की पूरी फ़ौज माँग पूरा करने में लगी थी| भारत मानवता के इतिहास के लम्बे समय (५००० में से शायद पिछले २५० वर्ष छोड़कर) तक एक निर्यातक रहा है और विश्व-व्यापार के बड़े हिस्से पर अरब व्यापारियों के साथ हमारा नियंत्रण रहा है| यह कहना कि स्वावलंबन के नाम पर हम वर्तमान खुली विश्व व्यवस्था से पीछे हटें तो यह विश्व निर्यात और विश्व अर्थ-व्यवस्था पर पुनः स्थापन्न होने की भारतीय सम्भावना को नष्ट कर देगा|

परन्तु हमें संतुलन की आवश्यकता है| यह संतुलन तीव्र विकास से ही आ सकता है| हमें अपनी अपार जनशक्ति को प्रयोग करने की आवश्यकता है| हमें समझना है कि हमारा जनसँख्या घनत्व अभी तक हमारे हित में ही है और हालात उतने ख़राब नहीं जितने प्रचारित होते रहे हैं – जापान का उदहारण सामने है|

करोना काल यह समझने का अवसर है कि हम किस प्रकार और किस मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं| हमारी विश्व-व्यापार का मार्ग हजारों साल अरब व्यापारी रहे हैं हम उनके सहारे दुनिया में अपनी अर्थव्यवस्था को शीर्षस्थ बना कर रख सके हैं| यह स्तिथि तब पलट गई थी जब यूरोपीय व्यापारियों ने हमारे उत्पादन तंत्र पर नियंत्रण हासिल किया था| हमें व्यापार, पूँजी और नियंत्रण के चक्र को समझकर ही कुछ फ़ैसला करना चाहिए|

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विश्व-बंदी २२ अप्रैल

उपशीर्षक – न्यायलोप और भीड़हिंसा

अगर समाचार सही हैं तो एक ऐसे गाँव ने जिसमें गैर हिन्दू आबादी नहीं है क्रोधित हिन्दूयों की बड़ी भीड़ ने दो साधू वेशभूषाधारियों की बच्चाचोर मानकर हत्या कर दी| मृतकों की वास्तविक साधुओं के रूप में पुष्टि हुई| कई दिनों तक भारत के दुष्प्रचारतंत्र (आप समाचार तंत्र कहने के लिए स्वतंत्र हैं) ने इसे मुस्लिम आतताई भीड़ द्वारा साधुओं की हत्या के रूप में प्रचारित कर दंगे या गृहयुद्ध के हालात पैदा करने का प्रयास किया| दुर्भाग्य से भारत में भीड़हिंसा परंपरा की तरह स्थापित हो रही है| दुष्प्रचारतंत्र ने वर्तमान घटना का दुष्प्रयोग भीड़हिंसा की बनती जा रही विशिष्ट सामुदायिक पहचान को पलटने के लिए किया था| परन्तु, भीड़हिंसा आखिर क्यों?

इतिहास में राजा-महाराजाओं में भी हमने न्यायप्रियता को सामान्य गुण के रूप में न लेकर विशिष्ट गुण के रूप में दर्ज किया है| मानवता में शासक से लेकर शासित तक का हिंसा ही न्याय का प्रमुख साधन रहा है| न्याय प्रणाली का ह्रास, सत्ता की निस्कृष्टता का पहला प्रमाण पस्तुत करते रहे हैं| पिछले कई दशकों से दुनिया भर के सभी इंगितों (इंडेक्स) में भारत सबसे पीछे न्याय सम्बन्धी इंगितों में ही है और स्तर लगातार गिर रहा है|

अगर न्याय का महंगा या विलंबित हो या न्याय प्रणाली भ्रष्ट तो क्या होगा? समाज वैकल्पिक न्याय व्यवस्था के बारे में विचार करेगा| सरकारी अवैचारिकता के चलते भारत में स्थानीय वैकल्पिक न्याय प्रणालियों का विकास नहीं हो सका है जैसे न्याय-पंचायत, मध्यस्थता और सुलह के औपचारिक ढ़ांचे खड़े नहीं हो सके| यहाँ तक कि बड़े बड़े न्यायाधिकरण निंदनीय रूप से न्यायाधीशों, न्यायविदों, अधिवक्ताओं और सरकारी अधिकारीयों के सेवानिवृत्ति केंद्र बनकर रह गए हैं|

विलंवित न्याय के चलते भारतीय राजनैतिक प्रणाली ने पहले तो पुलिस द्वारा की जाने वाली गिफ्तारियों को न्याय का समकक्ष बना दिया| झूठी या गलत गिरफ्तारियों के मामलों से भारत के तमाम न्यायिक निर्णय भरे पड़े हैं, सबूत के अभाव में आरोपी के छूटने की लम्बी चर्चा होती है परन्तु कोई सरकार या पुलिस से नहीं पूछता कि असली अपराधी कहाँ है या पूरे सबूत क्यों नहीं जुट सके| धीरे धीरे आरोपियों के अन्यायपूर्ण सरकारी हत्याओं को न्याय की संज्ञा दी जाने लगी| तुरंत न्याय का दावा| जिसे मारा गया वो असली गुनाहगार था या नहीं किसे पता? जब भी आनन फ़ानन न्याय की ख़बरें आतीं है, असली अपराधी दावत उड़ाते हैं|

जब जनता ने पाया कि न्याय तंत्र या क़ानून व्यवस्था तंत्र नाकारा है, तो उन्हें अपने हाथ में न्याय को ले लेने का विकल्प दिखाई दिया| जनता का क्रोध उस समय बढ़ जाता है जब अपराधी दूसरे गाँव, समाज, शहर, धर्म, जाति, जिले, प्रदेश, रंग, लिंग, भाषा आदि किसी का हो – कुल मिलाकर बाहरी| फिर जनता सिर्फ बच्चाचोर होने के हल्के से से शक में दो साधुओं के मार देती है| साधुओं द्वारा लॉक डाउन का समुचित पालन न करना उनके प्रति शक को कई गुना बढ़ा देता है| यह बहुत बड़ी कीमत है|

मैं गिरफ्तार हुए सभी आरोपियों को दोयम दर्जे का आरोपी मानता हूँ, भीड़हिंसा के सभी मामले ऐसे ही हैं| मैं पुलिस विभाग को तीसरे दर्जे का दोषी समझता हूँ| दुष्प्रचार तंत्र के बारे में क्या कहा जाए? वो तो नबाब साहबों की पालतू मुर्गा-बटेर हैं| पहले दर्जे के मेरे आरोपी पिछले पचास वर्ष में रहे सभी सांसद, विधायक, न्यायाधिकारी, और न्यायविद हैं| यह न्याय प्रणाली और उसको सहजने वालों का अपराध है|

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विश्व-बंदी २१ अप्रैल

उपशीर्षक – प्रतिरोधक क्षमता का दुःख

यह लगभग सुखद परन्तु अत्यंत दुःखद समाचार था| भारत में ८० फ़ीसदी लोगों में करोना के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे| यह शायद वैसा ही है कि जैसा एचाईवी पॉजिटिव होना एड्स होना नहीं होता, पर संवाहक होना हो सकता है| सुखद यह है कि आप शायद विषाणु का मुकाबला करने में अभी तक सफल हैं या आप जीत चुके हैं या विषाणु को शांत तो कर ही सके हैं| हो सकता है, विषाणु शांत रहकर पुनः हमला करे या आपके शरीर को छोड़ जाए| परन्तु एड्स के मुकाबले यह मामला इसलिए अधिक ख़तरनाक है कि उसमें विषाणु का प्रसार यूँ ही नहीं हो जाता, जैसा कि करोना विषाणु के मामले में हो सकता है| बिना किसी लक्षण के आपको नहीं पता लगता कि आप के शरीर में विषाणु का घर या युद्ध स्थल है| आप अनजाने ही बीमारी फैला सकते हैं या आपके अपने शरीर में ही बाद के लिए यह बाद के लिए रुक सकता है|

क्या अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना नुक्सान तो नहीं कर जाएगा? रोज सुबह साबित लहसुन के साथ समभाग अदरक चबाने के बाद चाय पीने से फ्लू का ख़तरा कम रहता है यह मेरे परिवार का पुराना अनुभव है| भारत में तो फ्लू से बचने के लिए तुलसी-अदरक-काढ़ा चाय है ही| फेंफड़ों की मजबूती के लिए मैं हर जाड़ों में ५०० ग्राम शहद २५ ग्राम छोटी पिप्पली मिलाकर उसकी माशा भर लेता ही हूँ| अन्य भारतवासियों के पास भी अलग अलग बहुत से उपाय हैं – हल्दी सौंठ का दूध से लेकर कबूतर का शोरबा तक| आजकल के साफ पर्यावरण में जब वायु प्रदूषणजन्य बीमारियाँ नहीं हैं, पता कैसे चले कि श्वास या फेफड़ों को पुराना कष्ट है या नया करोना? शायद सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता का विकास होने तक हमें लम्बी और धीमी लड़ाई लड़नी होगी| यह थकाऊ और उबाऊ नहीं होना चाहिए|

अब द्रुत जाँच किट को भी बेअसर पाया जा रहा है| राजस्थान सरकार के बाद अब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद ने इनके प्रयोग को दो दिन के लिए रोक दिया है| कई बार लगता है काम पर वापिस जाएँ शेष सब भाग्य पर छोड़ दिया जाए|

खैर हम भारतीय हैं तो घर पर नए नए खाने पीने के प्रयोग चल रहे हैं| कुछ किताबें, कुछ फ़िल्में, कुछ गाने और बचे हुए बहुत से काम धाम|

विश्व-बंदी २० अप्रैल

उपशीर्षक: भयातुर चिंताएं

कहना चाहता हूँ दिल्ली में डर लगता है| पर देश में डरना मना ही नहीं अक्षम्य पाप है|

वैसे भी इंसान भले ही बिना सोचे बड़े कौर खा ले मगर उसे बिना सोचे बड़ी बात नहीं कहनी चाहिए| करोना शायद इंसानियत को बदलने जा रहा है या शायद नहीं| हम १९१८ से तुलना शायद नहीं कर सकते क्योंकि मानवता और अर्थ व्यवस्था उस समय से बहुत बड़े हैं| जितनी तबाही करोना ने इस साल की है उसे करने में इसे १९१८ में शायद कई गुना समय लगता और आज के सन्दर्भ से देखें तो तबाही का कारण करोना से अधिक हमारी कमजोर चिकित्सा पद्यति होती| कितना दूरगामी प्रभाव वर्तमान बीमारी छोड़ती है, यह इतिहास जानेगा| यदि यह बीमारी लम्बे समय रहती है तो निश्चित ही इसके दूरगामी प्रभाव होंगे| अन्तराष्ट्रीय राजनीति जरूर गरमाई है परन्तु मुझे यह तात्कालिक गुस्से से अधिक फ़िलहाल इसका कोई सार नहीं दिखता| अगले महीने समीकरण किसी भी करवट बदल सकते हैं|

बहुत से गरीब जिन्हें खाने के लिए भीख, कूड़े और झूठन का सहारा था उनके लिए यह दिन कुछ राहत लायें हैं| जिन्हें खैरात लेना नहीं सुहाता उनके आत्मसम्मान पर बन आई है| बढ़ती ग़रीबी और घटता आत्मसम्मान उन्हें नकारा बना सकता है| निम्न मध्यवर्ग के लिए अलग कठिनाई हो सकतीं हैं|

उलट विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद मुझे है| इसका कारण करोना नहीं बल्कि यह सीख है कि विकास का विकेन्द्रीयकरण होता तो हम बहुत से अपनी लगभग तिहाई अर्थव्यवस्था को चला सकते थे| देश के तिहाई ज़िलों में करोना का असर नहीं है| अगर गांव और तहसील/तालुकों की बात करें तो शायद दो तिहाई गाँव और तालुके एकदम अछूते हैं| इस तरह की स्तिथि में विकेन्द्रीय विकास निश्चित ही अर्थव्यवस्था की हानि को कम कर सकता है| हाँ, अगर विकास विकेन्द्रीय होता तो भौगोलिक रूप से अधिक क्षेत्र प्रभावित होता पर प्रभावित आबादी इतनी ही होती|

परन्तु यह सब अटकलें हैं| वास्तव में मेरा दिमाग यह सोच रहा है कि क्या दिल्ली जैसे महानगर सुरक्षित है? देखा जाये तो अलीगढ़ कहीं अधिक सुरक्षित लगता है| पर कब तक, कितना?

पर दुविधा यह है कि अगर केंद्रीयकृत विकास फैला तो जल्दी ही दिल्ली का प्रभामंडल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दस बीस वर्ष में अलीगढ़ पहुँच जाएगा| अलीगढ़ की दिशा में गाज़ियाबाद, मेरठ, गौतम बुध नगर, और बुलंदशहर प्रभावित है साथ में निकटवर्ती आगरा भी|

ईश्वर नींद आप भेजते रहना|

विश्व-बंदी १८ अप्रैल

उपशीर्षक – नए ध्रुव 

कल शाम हल्की बारिश हुई थी आज तेज हवाओं के साथ वैसी ही बारिश जैसी अक्सर फ़सल करने के दिनों में उत्तर भारत में आती रहती है| हवाएं गर्मी से राहत लेकर आईं| सूरज छिपने के साथ बादल भी कम हो गए|

दिल्ली में कुल ७६ कन्टेनमेंट ज़ोन घोषित हो चुके हैं| बीमारी नियंत्रण में महसूस होती है| सोमवार के कार्यालय और बहुत से कारोबार के खुलने को लेकर घरों में चिंता का माहौल है| जिन घरों के अकेले कमाने वाले – चिकित्सकीय कर्मचारी, पुलिस, आदि लोगों के परिवार को तिहरा संकट है – काम छोड़ नहीं सकते, नाते-रिश्तेदार-पास-पड़ोसी साथ छोड़ रहे हैं, भविष्य की चिंता तो है ही|

भारत्त के शेयर बाजार की खस्ता हालात के चलते हाल में चीन के पीपल’स बैंक ऑफ़ चाइना ने भारत की बेहद बड़ी कम्पनी एचडीऍफ़सी में एक फ़ीसदी से अधिक के शेयर खरीदे थे| जिसके बाद देश में चिंता का माहौल था| आज सरकार ने प्रत्यक्ष पूँजी निवेश के नियम के कड़ा परिवर्तन किया है जिसे चीन के आर्थिक आक्रांत को रोकने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है|

अभी तक भारत में बांग्लादेश और पाकिस्तान के नागरिक और कंपनियां को छोड़कर कोई भी विदेशी या विदेशी संस्था बिना किसी पूर्वानुमति के भी निवेश कर सकती थी| बांग्लादेश और पाकिस्तान के नागरिक और कंपनियां सरकारी अनुमति के बाद निवेश कर सकती हैं जिनमें से पाकिस्तान के लोगों के लिए कुछ विशेष क्षेत्र में निवेश मना था|

आज के बाद भारत के किसी भी भूमि- पडौसी देश के नागरिक और संस्थाएं बिना पूर्व अनुमति के निवेश नहीं कर पाएंगी, जिनमें से पाकिस्तान के लोगों के लिए कुछ विशेष क्षेत्र में निवेश मना रहेगा| पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, म्यानमार और बांग्लादेश आदि भारत के भूमि-पड़ौसी हैं|

चिंता यह हो सकती है कि यह क़दम चीन विरोधी नए अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीकरण में भारत की स्तिथि को एक तरफ़ खड़ा करता है| साथ ही सस्ता निवेश करने के लिए अन्य अमित्रों को भी खुला मैदान मिल सकता है| मेरी चिंता सऊदी अरब और इस्रायल से लेकर रूस और अमेरिका से आने वाला निवेश भी है खासकर तब जब यह निवेश उनके हाथ में नियंत्रण सोंप दे| खैर भी सब अटकलें हैं और सरकार चौकस लगती है|

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विश्व-बंदी १७ अप्रैल

उप-शीर्षक: संशोधित समेकित दिशानिर्देशों के साथ गृह मंत्रालय का आदेश

आज जब भारत सरकार के सूक्ष्म , लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय का ईमेल मिला| इसमें संशोधित समेकित दिशानिर्देशों के साथ गृह मंत्रालय का आदेश दिनांक 15.04.2020  संलग्न करते हुए मंत्रालय ने आग्रह किया है कि कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए इकाइयों में सभी एहतियाती उपाय किए जाने चाहिए। साथ ही बहुत से मित्रों से वार्तालाप करते हुए समझ आया कि कुछ उद्योगपति और अधिकारी भले ही खुद घर पर बैठे हों, परन्तु कर्मचारियों और कामगारों के प्रति सहानुभूति न रखते हुए उन्हें येन-केन प्रकारेण कार्यालय में देखना चाहते हैं| तो सोचा कि इस सरकारी आदेश को कानूनी निगाह से देखा जाए| आज की करोना डायरी में यही सही|

मुख्य बात यह है कि अगर आपका कार्यालय या कारखाना अगर खोले जाने की अनुमत सूची में है तो उसे किस प्रकार की सावधानियाँ बरतनी है और किसे बुलाना यां नहीं बुलाना है|

आवश्यक रूप से कड़ा पाठ

क्यों कि यह आदेश एक ऐसे कानून से है जिसमें सजा का प्रावधान है और इसका उद्देश्य बेहद ख़तरनाक बीमारी को रोकना है, इसलिए इसको कड़ा नियम मानकर पढ़ना उचित होगा| इसका ढीला ढाला पाठ आपको सजा का भागी बना सकता है| इस कानून को तोड़ने पर आपको सजा देने के लिए आपकी दुर्भावना सिध्द करने की आवश्यकता नहीं होगी|

क्यों कि यह आदेश बेहद कम समय में तैयार किया गया है अतः इसमें कुछ बाते आगे पीछे हुई हैं| हमें इसे समग्र आधार पर ही पढ़ना चाहिए|

उलंघन पर सजाएँ

इस आदेश का उलंघन करने पर उलंघन करने वालों, जिनमें सरकारी कार्यालय व कंपनियों के अधिकारी शामिल हैं, को तो साल तक की जेल हो सकती है, साथ में जुरमाना तो है ही|

अनुमति नहीं है:

तेरह प्रकार की गतिविधियाँ पूरे देश में हर हाल में पूर्णतः बंद है| कुछ गतिविधियों को (पैराग्राफ ५-२० में) कन्टेनमेंट ज़ोन के बाहर अनुमति दी गई है| अन्य जिन गतिविधियों को अनुमति नहीं दी गई है उन्हें केवल घर से कार्य करने करवाने की अनुमति समझी जानी चाहिए और इसके लिए कार्यालय भूल कर भी न खोलें|

केंद्र सरकार में लगभग १७० ज़िलों को हॉट स्पॉट घोषित किया है| स्थानीय प्रशासन उन ज़िलों में इलाकों को कन्टेनमेंट ज़ोन घोषित कर सकता है, उदहारण के लिए दिल्ली में सभी नौ जिले हॉट स्पॉट हैं और इनमें इस समय कुल ६० कन्टेनमेंट ज़ोन हैं|

नहीं बुला सकते:

अनुमति के नियमों में सरकारी क्षेत्र और कुछेक अन्य क्षेत्र को अधिकतम अनुमति सीमा के अन्दर ही कर्मचारी बुलाने की अनुमति है| उदहारण के लिए सरकारी कार्यालयों में छोटे और मझोले अधिकारियों व् कर्मचारियों को ३०% से अधिक क्षमता में नहीं बुलाया जा सकता| परन्तु असली नियम यह नहीं है बल्कि अन्य है| असली नियम मैं नीचे बता रहा हूँ:

  • कन्टेनमेंट ज़ोन में रहने वाले कर्मचारी नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं
  • ६५ वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारी नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • किसी भी बीमारी के ग्रस्त कर्मचारी, भले ही वो कार्यालय आने के लिए तैयार हों, नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • ऐसा कोई स्त्री-पुरुष जिनकी कोई भी संतान पांच वर्ष के कम हो, नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • बिना चिकित्सा बीमा कराएँ किसी व्यक्ति को नहीं बुलाया जा सकता, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • कार्यालय और किसी भी मीटिंग में बैठे हर व्यक्ति को दूसरे से एक मीटर/६ फुट दूर खड़ा या बैठा होना चाहिए|
  • किसी भी मीटिंग में १० या अधिक लोग सामान्यतः नहीं बुलाए जाने चाहिए|
  • किसी भी गैर जरूरी व्यक्ति को कार्यालय आने की अनुमति नहीं होगी|

कार्यालय की तैयारी:

  • कार्यालय आने वाले हर व्यक्ति के आने जाने का प्रबंध कार्यालय करेगा, इसके लिए किसी भी सार्वजानिक वाहन का प्रयोग नहीं होगा|
  • किसी भी वाहन में उसकी क्षमता के चालीस प्रतिशत से अधिक लोग नहीं बैठे होंगे| यानि चार और पांच सीटों वाली कार में मात्र दो लोग| पचास लोगों की बस में बीस लोग मात्र|
  • कार्यालय खुलते और बंद होते समय सेनिटाइज़ किया जाएगा|
  • कार्यालय में आते हर वाहन और उपकरण को विषाणु रहित किया जायेगा – लेपटोप, पेन पेन्सिल को शामिल समझने में ही भलाई समझें|
  • कार्यालय में हर आते और जाते व्यक्ति के तापमान जाँचने की पूरी थर्मल स्क्रीनिंग व्यवस्था होगी|
  • हर उचित स्थान पर सेनिटाइज़र और हाथ धोने की व्यवस्था होगी|
  • भोजन-अवकाश के साथ नहीं होगा हर व्यक्ति अलग अलग भोजन करेगा| मित्रता और घुलने मिलने की अनुमति न दें|
  • कोई बड़ी मीटिंग नहीं होगी|
  • किसी भी हालात में एक साथ पांच व्यक्ति इकठ्ठे न हो| बेहतर समझ कहती है कि एक व्यक्ति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अधिक व्यक्तियों के संपर्क में न आए|
  • कार्यालय के निकटतम मौजूद कोविड -१९ जाँच केंद्र और अस्पताल और क्लिनिक की जानकारी उपलब्ध रहेगी|

विश्व-बंदी १६ अप्रैल

उपशीर्षक – यमदूत

मौन उदास भय के कितना बेहतर है यह जान पाना कि दुनिया काजल की कोठरी जितनी काली नहीं है| देश में ३२५ जिले में करोना का कोई मामला नहीं आया है, ७० जिले ख़तरे से बाहर आते हुए लगते है| मगर डरता है दिल, देश में ७३६ ज़िलों में से १७० ज़िले नक़्शे पर लाल रंगे गए हैं – दिल्ली के सभी नौ रत्न और पूरे का पूरा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र|

रोज दरवाज़ा खटकने पर ये आशंका होती है कि यमदूत तो नहीं| सुबह सुबह देशी गाय का अमृत माना जाने वाला दूध देने आने वाला दूधवाला भी समझता है, मैं उसे और वो मुझ में यमदूत के दर्शन करने की चेष्टा कर रहा है| मुझे नहीं मालूम कि मेरे कर्मफल का तुलन पत्र क्या कहता है| खाने पीने का सामान लेने या तो आप जाएँ या किसी को बुलाएँ – हिम्मत का काम लगता है| दवा लेने गया था तो दुकान का कारिन्दा बोला, यूपीआई कर दीजिए नगद ले तो लेंगे पर डर लगता है| ख़बर है एक पिज़्ज़ा देने वाले को विषाणु ने जकड़ा है सौ लोग अपने घर की निगाह्बंदी में हैं| रहम हो दुनिया पर|

करोना काल में में जीवन ने बदलना शुरू किया है| पहले यूपीआई का प्रयोग नहीं करता था अब हम नगद न देना चाहते हैं न लेना चाहते हैं| मन में ख़राब विचार न आएं इसके लिए झाड़ू बुहारू करते समय काम में मोबाइल के एप पर कान में हेडफ़ोन लगाए किताबें सुनता हूँ – पूरे ध्यान से| गाने पहले भी कम सुनता था अब भी कम सुनता हूँ – सुगम संगीत एकाग्रता की दरकार नहीं रखता _ ख़राब विचार आते जाते रहते हैं| साल में एक आध फ़िल्में देखने का हुआ ये है कि एक महीने की गिनती ही तीन पर है| खाने के शौक का ये कि हर हफ्ते में दो बार नए प्रयोग हो रहे हैं| यूं तो मैं हर दिन सोचता हूँ शाकाहारी और माँसाहारी के झमेले को छोड़ सर्वभक्षी बना जाए| मरना तो यूँ भी है| भला हो करोना विषाणु का कि दिल ने पक्का कर दिया है कि अगर यह जैविक हमला है तो अगला जैविक हथियार आलू पालक मूली बैगन है ही आएगा तो हम कुछ भी खाएगा| अन्न खाना पहले ही शास्त्रोक्त नहीं है शाकाहार में भी कंद मूल फल का ही विधान है|

नाइयों के पास जाने के ख़तरे को देखते हुए अपने सिर पर खुद से मशीन पहले ही चला चुका हूँ|

आगे आगे देखिए होता है क्या?

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विश्व-बंदी १५ अप्रैल

उपशीर्षक – मध्यवर्गीय असंवेदना 

केंद्र सरकार और अधिकतर राज्य सरकारें भले ही सम्यक दृष्टिकोण से करोना से लड़ने का प्रयास कर रहीं हों, विपक्ष भले ही सरकार के साथ खड़ा हो, परन्तु यह लड़ाई को वर्ग-भेद, धर्म-भेद, और शायद जाति भेद से प्रभावित हो रही है| अफ़सोस यह भी है कि धर्मान्धता और धर्म-भेद भले ही खुल कर सामने आया है, परन्तु वर्गभेद अधिक ख़तरनाक रूप से इस लड़ाई को प्रभावित कर रहा है|

भारत सहित दुनिया भर में शुरू से ही करोना ने हवाई यात्राओं के माध्यम से प्रवेश करते हुए मुख्यतः उच्च मध्यवर्ग और मध्य वर्ग को अधिक प्रभावित किया है, परन्तु इससे हो रही लड़ाई निम्न वर्ग के विरूद्ध असंवेदना के साथ शुरू हुई है|

रोग के खतरनाक वाहक होने के उच्चतम खतरों के बाद भी, उच्च मध्यवर्ग विदेशों से अपने घर वापिस आने में सरकारी सहायता और विमान प्राप्त करने में सफल रहा| इस वर्ग का एक बड़ा तबका लॉक डाउन के बावजूद सम्बंधित राज्य सरकारों की सहायता से हरिद्वार से अहमदाबाद और वाराणसी से आन्ध्र प्रदेश वापिस पहुँचाया गया|[i] यह सभी लोगों जहाँ रह रहे थे वहाँ इनके पास उचित रहना, खाना, देखभाल और इनका पूरा ध्यान रखने की व्यवस्था थी| परन्तु यह परिवार से दूर थे, इन्हें परिवार और परिवार को इनकी चिंता थी| क्या भारत के निम्न वर्ग के पास परिवार और पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है?

परन्तु पहले जब दिल्ली और बाद में सूरत और मुंबई के निम्न वर्ग ने घर वापिस जाने की अनुमति, सुविधा और सहायता मांगी तो उन्हें सरकारी लाठीचार्ज का सामना करना पड़ा| अफसोसनाक रूप से दिल्ली से एक बहुत बड़ा निम्न वर्गीय समुदाय पैदल ही घर की चल दिया| कौन सात दिन तक भूखा प्यासा पैदल लुधियाना और दिल्ली से चलकर बरेली या पटना जाता है? केरल से बिहार तक की यात्रायें दुनिया भर के समाचारों में दर्ज हुईं| जिस समय यह सब हो रहा था, निम्न वर्ग में करोना के संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया था| मैं मानता हूँ, खतरा था और परन्तु बेहद सरल उपाय भी| यात्रा से पहले और बाद में जाँच और बहुत जरूरत होने पर कुछ दिन निगाहबंदी|

भारत में कुलीन ब्राह्मण भी अगर निम्नवर्गीय हो तो तीसरे दर्जे का नागरिक होता है| यह बात अलग है कि धर्म और जाति के नाम पर वो अपने आप को कुछ भी समझता रहे|

खैर, मुंबई में कल की घटना के लिए एक पत्रकार को ट्रेन चलने की अफवाह फ़ैलाने के लिए गिरफ़्तार किया गया है| भावनाओं का दुष्प्रयोग किसी ने भी किया हो भावनाएं है और उनका विष्फोट कष्टप्रद होगा| इसलिए उचित कदम उठने चाहिए|

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[i] https://m.jagran.com/uttar-pradesh/varanasi-city-twenty-buses-carrying-900-pilgrims-from-south-india-left-for-varanasi-20188325.html

https://m.timesofindia.com/city/ahmedabad/1800-people-stranded-in-uttarakhand-to-return-to-gujarat-in-28-buses/amp_articleshow/74862565.cms

https://www.bhaskar.com/amp/db-original/news/amit-shah-vijay-rupani-latest-updates-on-gujarat-pilgrims-return-from-haridwar-rishikesh-over-coronavirus-lockdown-127094521.html?__twitter_impression=true

https://newsd.in/gujarats-1800-pilgrims-return-from-haridwar-by-luxury-buses-in-amid-lockdown-amit-shah-vijay-rupani/amp/?__twitter_impression=true

विश्व-बंदी १४ अप्रैल

उपशीर्षक – लम्बा लॉक डाउन 

यह कितना अजीब है कि पूरा देश कैद में हैं और आजाद नहीं होना चाहता| प्रकृति किसी छोटी बात का भी इतना बड़ा बदला इंसानियत से ले सकती है तो इंसान के बड़े बड़े गुनाह…| कहते हैं भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती इसलिए शायद हमें नजला, जुकाम, दमा, दिल और दिमाग की हजारों बीमारियाँ चुपचाप मरतीं रहती हैं| हमारी सड़कों पर एक साल में इतने लोग मरते हैं कि दुनिया भर के सारे जंगली जानवरों ने भी कभी नहीं मारे होंगे| मगर हमें सामूहिक मौत से डर लगता है| अगर आशंकाओं की बात करें तो अभी बहुत कम लोग मरे हैं – आशाओं की बात करें तो शायद हम बीमारी के इस तूफ़ान की सिर झुका कर निकलने देने में कामयाब रहेंगे|

आज लॉक डाउन ३ मई तक के लिए बढ़ गया| प्रधानमंत्री के संबोधन मित्रों, भाइयों, साथियों से होकर देशवासियों तक उतर आए| मैं उनके संकल्प में आशा और मन में हताशा देखता हूँ| अगर देश के प्रधानमंत्री को दसियों बार हाथ जोड़ने पड़ते हैं तो यह उनके समर्थकों, अनुयायियों और समालोचकों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए| मैं प्रधानमंत्री को कभी देवदूत, अवतार पुरुष या महामानव नहीं मानता परन्तु भारत के प्रधानमंत्री को अपनी जनता के सामने इतना हाथ जोड़ना पड़े, यह निराश कर देने वाला है| मैं अक्षमताएं समझता हूँ परन्तु सदा की तरह उनके समर्थकों से बहुत निराश हूँ| लोग किसी एक समूह की तरफ इशारा करकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं परन्तु इस बीमारी से निपटने का पहला नियम अपना बचाव है, अगर आप किसी के संपर्क में नहीं आते तो पूरी आशा है कि आप बीमार नहीं पड़ेंगे| अगर आप बीमार पड़ रहे हैं तो पहली गलती आपकी या आपके किसी निकट व्यक्ति की है| और यह बात तब तक सही है जब तक बात कम्युनिटी ट्रांसमिशन से आगे नहीं बढ़ जाती|

मुंबई बांद्रा स्टेशन पर घर वापिस जाने के लिए हजारों लोगों की भीड़ लग गई है| यह आशंका पहले भी थी और कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के सामने यह बात पहले भी रखी थी| यद्यपि मैं मानता हूँ कि उन्हें इस समय घर वापिस भेजना कम खतरनाक नहीं है| परन्तु यदि वो लोग अगर इक्कीस दिन पहले वापिस भेज गए होते तो १४ दिन का आवश्यक क्वॉरंटीन पूरा करने बाद अपने घर में होते और कृषि कार्य में मदद कर रहे होते| साथ ही बड़े शहरों, उनके अस्पतालों और अन्य संसाधनों पर अनावश्यक दबाब भी कम हो जाता| मुंबई में मौजूद लोगों की निराशा इस बात से भी है कि जो लोग २१ दिन पहले पैदल निकले थे वो लोग एक हफ्ते की यात्रा और १४ दिन के क्वॉरंटीन के बाद एक दो दिन में परिवार के साथ होंगे| इस समय यह स्पष्ट है कि अगर ३ मई को भी लॉक डाउन खुल जाए तब भी इनमें से आधे मजदूरों को रोजगार मिलने की संभावना बेहद कम है| मैं मानता हूँ कि अगर लॉक डाउन को ३ मई से आगे बढ़ने की अगर हल्की भी आशंका है तो उन्हें स्वास्थ्य जांच के बाद वापिस जाने की अनुमति दे देनी चाहिए| दोहरी आश्वस्ति के लिए उनके गंतव्य पर पहुँचने पर उन्हें एक हफ्ते के लिए क्वॉरंटीन में रखा जा सकता है| जिन्हें इन मजदूरों से सहानुभूति नहीं है अपने उन मित्रों से पूछे जो भारत सरकार द्वारा विदेशों से निकाल कर लाये गए या अपने अपने देश लोटे हैं|

कल्पना करें आप लॉक डाउन से पहले वाली रात अनजान शहर के महंगे विलासिता पूर्ण होटल में फंस गए हैं, कमाई के साधन तुरंत बंद हो जाते हैं और आपके अपने शहर में आपके बूढ़े माता-पिता एक अदद पत्नी, दो छोटे बच्चे बिना आपके न सही मगर आपकी चिंता में आपकी कुशलता की कामना में रोज दरवाजे पर एक दिया जला रहे होते| हो सकता है कि आपके क्रेडिट कार्ड की लिमिट बहुत हो पर ४० दिन… के साथ इसकी कल्पना तो कीजिए|

सरकार को तुरंत वास्तविकता आधारित निर्णय लेना होगा|

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विश्व-बंदी १३ अप्रैल

उपशीर्षक – अनिश्चितता

सभी चर्चाओं में एक बात स्पष्ट है| मध्य वर्ग लॉक डाउन के लिए मन-बेमन तैयार है| उच्च वर्ग को शायद कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु उनके लिए लम्बा लॉक डाउन अधिक कठिनाई भरा होगा| भारत के बाहर भी हालात अच्छे नहीं इसलिए उनकी चिंता है है कि किसी प्रकार काम धंधे को चलाया जाए| लम्बा लॉक डाउन उनकी संपत्ति को बैठे बिठाए नष्ट कर सकता है| वैसे भी अर्थ-व्यवस्था राम-भरोसे है|

निम्नवर्ग को पूछता कौन है, उनके पास विकल्प नहीं है| साथ ही, लंगरों, सरकारी भोजनालयों, रैन बसेरों का उनको सहारा है| इन में से बहुत से लोगों के लिए मुफ्तखोरी बढ़िया चीज है तो बहुत से अन्य आत्मसम्मान बचा कर रखने की लड़ाई हारने के कगार पर है| एक बार आत्म सम्मान नष्ट हो जाता है तो उन्हें नकारा होने से कोई नहीं रोक सकता| शहरी निम्न वर्ग में यह खतरा अधिक है क्योंकि उनका स्वभाविक सामाजिक ताना-बाना परवाहहीन होता है| आत्म-सम्मान सामाजिक सम्मान की कुंजी है| अगर सामाजिक सम्मान की इच्छा न हो तो आत्म सम्मान का कोई मतलब नहीं होता|

मध्यवर्ग की चिंताओं का समुद्रमंथन हो रहा है| यही कारण है कि यह वर्ग रामायण, महाभारत, गीता, कुरान, आध्यात्म, आदि की चर्चा में व्यस्त रहकर इस समय को काट लेना चाहता है परन्तु उनके पास कोई कारगर राह नहीं| यह वर्ग अपने आप को राष्ट्र का कर्णधार समझता है| इनके पास अपनी हर हार हानि का दोष देने के लिए कोई न कोई होता है – मुस्लिम, आरक्षण, अमीर, गरीब, पूंजीवाद, साम्यवाद, या फिर माता-पिता भी| यह वर्ग महानगरों में सबसे बुरे हालात का सामना करने जा रहा है| करोना की बीमारी भी मुख्यतः इसी वर्ग को प्रभावित कर रही है|

white ceramic sculpture with black face mask

Photo by cottonbro on Pexels.com

कल प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन है| अटकलों का बाजार गर्म है| लॉक डाउन बढ़ता है तो जान है, नहीं बढ़ता तो जहाँ है – वर्ना लटकती तलवार है| जनमानस लम्बे संघर्ष के लिए तैयार है| परन्तु हर किसी को विश्वास है कि किसी को हो मगर बीमारी उसे नहीं होगी| आज देर शाम बाजार की तरफ जाना पड़ा| आधे लोग नक़ाब नहीं पहने थे| मेरे सामने पुलिस वाले ने दो लोगों के डंडे लगाये और तीन लोग गलती से भूल आए की मिन्नत कर रहे थे| मिन्नत करने वालों में एक का कहना था कि उसके पास घर पर हजार रुपए वाला मास्क है| पुलिस वाले ने कहा तो उसे लॉकर में रखो और डंडा कहने के बाद पहनने के लिए सस्ता वाला मास्क खरीद लो|

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विश्व-बंदी १२ अप्रैल

उपशीर्षक – संशय और भूकम्प 

शुरूआती गर्मियों उदास छुट्टियाँ का रविवार बचपन में बड़ा भारी पड़ता था| रसोई पर कुछ खास करने का दबाव रहता तो अनुभव बदलते मौसम में गरिष्ट से बचने की सलाह देता| पंद्रह दिन में किस्से कहानी, किताबें, पतंगे, पतझड़ और खडूस हवाएं नीरस हो चुके होते – ककड़ी, खरबूजा, तरबूजा, खीरा, शर्बतों, और कचूमारों का सहारा भी कोई बहुत दिन तक आकर्षित नहीं कर पाता| दिल के राजा आम अभी बहुत दूर हैं| यहाँ तक आम पना भी अभी उपलब्ध नहीं दिखता|

लॉक डाउन में सबसे बड़ी बात यह कि घर में कोई सहायक नहीं, साफ़ सफाई, रसोई बाजार सब घर के लोगों को ही करने हैं साथ में अपने अपने दफ्तरों के काम भी करने हैं| टेलीविजन की आवाज कम करने के लिए कहने का खतरा भी गंभीर है – आखिर बच्चे क्या करें?

मित्रों के साथ दिन में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए गए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च न मानने की केंद्र सरकारी घोषणा पर चर्चा हुई| हम सब स्वयं-इच्छा योगदान को जबरन सरकारी कर बनाये जाने के सरकारी क़ानून से दुःख महसूस करते रहे हैं, इस बुरे दौर में सरकारी अहम् बेहद चिंता का विषय है| आम राय यह रही कि सरकार को इस बुरे दौर में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च मान लेना चाहिए था – कम से कम कुछ समय के लिए|

सुबह पंजाब में निहंग सिखों के समूह द्वारा पुलिस अधिकारी के हाथ काटने की घटना से बेहद अधिक दुःख हुआ| मुझे यह भारत के विरुद्ध और उससे अधिक मानवता के विरुद्ध युद्ध की घोषणा जैसा लगा| कट्टरपंथी हिन्दू मुस्लिम सिख देश को डुबो देंगे|

दिन घटना विहीन जा रहा था तभी मोबाइल हाथ से गिरा और आधी स्क्रीन चकनाचूर – काँच की एक छोटी किरच अंगूठे में लग गई| निकालने के देशी नुस्खे अजमाकर चुके ही थे कि मुआ भूकम्प आ धमका| बैठे ठाले यह भूकम्प मुझे ६ से ज्यादा का लगा और यह मानकर कि पहाड़ों या विदेश में केंद्र होगा मुझे ८-९ की आशंका हुई| भला भगवान् का, ३.१ का भूकम्प बताया जा रहा है| उसके बाद भयभीत दिल्ली का दिल बैठा हुआ लग रहा है| वैसे भी दिल्ली के दिल वाले इश्क, कबाब, शराब, शबाब, चाट पकौड़ी बिरयानी के अलावा डरपोक ही होते हैं|

भूकम्प के चलते कुछ दोस्तों रिश्तेदारों से बात हुई|

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विश्व-बंदी ११ अप्रैल

उपशीर्षक –  कॉर्पोरेट असामाजिक गैरजिम्मेदारी 

मुझ से पिछले एक महीने में पूछे गए करोना सम्बन्धी जिस प्रश्न ने सबसे अधिक कष्ट दिया वह कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पर पूछा गया बेहद गैर-जिम्मेदार प्रश्न था:

“क्या कंपनी द्वारा अपने कार्यालय में रखे गए और अपने कर्मचारियों को घर में प्रयोग कराए गए साबुन, हैण्डवाश आदि के खर्च को कंपनी कानून के तहत माना जाएगा?”

मेरा उत्तर स्पष्टतः नकारात्मक रहा है|

यहाँ तक कि इस प्रकार के प्रश्न सरकार तक पहुँचे| आज सरकार ने कल जनरल सर्कुलर जारी कर देने योग्य उत्तर दिए हैं| सरकार ने सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तरों में उत्तर संख्या ५ में लिखा:

Payment of salary/ wages to employees and workers during the lockdown period (including imposition of other social distancing requirements) shall not qualify as admissible CSR expenditure.

लॉक डाउन समयावधि में दिए गए कर्मचारियों और मजदूरों के वेतन या मजदूरी, (और सामाजिक दूरी नियमों के पालन में लिए गए खर्च) कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नहीं माने जायेंगे| (भावानुवाद)

उत्तर संख्या ६ में लिखा:

Payment of wages to temporary or casual or daily wage workers during the lockdown period shall not count towards CSR expenditure.

लॉक डाउन समयावधि अस्थाई, अल्पावधि और दैनिक मजदूरों की मजदूरी के खर्च कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नहीं माने जायेंगे| (भावानुवाद)

सरकार ने बहुत ही उचित रूप से उत्तर संख्या ७ में लिखा:

If any ex-gratia payment is made to temporary / casual workers/ daily wage workers over and above the disbursement of wages, specifically for the purpose of fighting COVID 19, the same shall be admissible towards CSR expenditure as a onetime exception provided there is an explicit declaration to that effect by the Board of the company, which is duly certified by the statutory auditor.

लॉक डाउन समयावधि अस्थाई, अल्पावधि और दैनिक मजदूरों को मजदूरी के अतिरिक्त दी गई कोई भी सहायता के खर्च केवल इस बार एक बार के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी माने जायेंगे| (भावानुवाद)

मैं सरकार से इस से अधिक स्पष्टीकरण की आशा नहीं करता| कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मदारी का स्थापित नियम है कि ऐसा कोई भी खर्च जो एक व्यवसाय के सामान्य आवश्यकता का भाग हो या जो अंशधारकों, अधिकारीयों, कर्मचारियों और मजदूरों को लाभ पहुँचाने के लिए हो, वह सामाजिक जिम्मदारी की सीमा को छूता भी नहीं है|

दुर्भाग्यपूर्ण प्रश्न का मामला यहीं रुक जाता तो ठीक होता, मगर कल तुरंत ही एक सवाल प्राप्त हुआ कि क्या कंपनी उत्तर संख्या ४ का लाभ लेकर उपरोक्त खर्च को सामाजिक जिम्मदारी का खर्च बता सकती है? जब तक आप कंपनी के और अंशधारकों, अधिकारीयों, कर्मचारियों और मजदूरों के इतर समाज के लिए कुछ नहीं करते अपनी सामाजिक जिम्मदारी को पूरा नहीं करते|

मुझे याद आता है जब कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के प्रावधानों पर शुरूआती चर्चा हो रही थी तो एक बड़ी कंपनी की और से कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदरी की दर के दो प्रतिशत होने को बहुत ही अधिक बताया गया था| उस समय उका ध्यान इस बात पर दिलाया गया कि इस्लाम हर व्यक्ति से शुद्ध आय के ढाई प्रतिशत सामाजिक जिम्मेदारी पर खर्च करते की प्रेरणा देता है| कंपनियां सामाजिक जिम्मेदारी निर्वाहन के लिए इस दर को ध्यान में रखकर प्रेरणा ले सकतीं है| हिन्दू धर्म भी दान की बात करता है|

जिस समय मैं उपरोक्त प्रश्न से दुःख का अनुभव कर रहा था, मुझे बीबीसी की एक रिपोर्ट पाकिस्तान के बारे में देखने को मिली| पाकिस्तानी लॉक डाउन के समय में जगह जगह खाना, पैसा और अन्य सामिग्री बाँट रहे हैं| कुछ भारतीय खासकर सिख भी ऐसा कर रहे हैं, परन्तु इस तरह के मामलों में पाकिस्तानी भारतीयों से आगे बताये गए हैं| बीबीसी रिपोर्ट स्टेनफ़ोर्ड सोशल इनोवेशन रिव्यु के हवाले से कहती है कि ९८% पाकिस्तानी सामाजिक कार्यों के लिए ज़कात करते हैं, और इस तरह वह पाकिस्तान के जीडीपी के १% से अधिक के बराबर की रकम सामाजिक ज़िम्मेदारी ओअर खर्च करते हैं| यह पढ़ते हुए मुझे शर्मिंदा महसूस करना पड़ा कि भारतियों द्वारा सामाजिक ज़िम्मेदारी पर अपने जीडीपी का आधा प्रतिशत भी खर्च नहीं किया जाता|

मुझे यह महसूस करते हुए दुःख होता है कि भारतीय कंपनियां अपने अंशधारकों, कर्मचारियों और अधिकारियों आदि पर खर्च को सामाजिक जिम्मेदारी दिखाना चाहतीं हैं और भारतीय अपने मित्रों और रिश्तेदारों पर हुए खर्च को|

यह एक ऐसा विषय है जहाँ मेरे भारतीय अहम् को ठेस लगी है और सामाजिक जिम्मदारी के विषय पर मैं अपने देश और देशवासियों को उनसे आगे देखना चाहता हूँ|

कृपया, किसी गैर सरकारी संगठन को रकम देकर उससे अस्सी प्रतिशत वापिस लेने वाले नीचता पूर्ण विचार को न दोहराएँ| मुझे छोड़िये भारत सरकार भी इस से बहुत दुःख महसूस कर रही है| जल्दी ही कानून आपके नकेल डालेगा|

पुनश्च: – यहाँ यह स्पष्ट करता चलूँ चलूँ कि मैं सरकार द्वारा मुख्यमंत्री सहायता कोष में दी गई राशि को सामाजिक जिम्मेदारी निर्वहन न मानने को उचित नहीं मानता रहा हूँ परन्तु यह पुरानी नीति है और इसके सन्दर्भ में निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार स्वतंत्र भी है|

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विश्व-बंदी १० अप्रैल

उपशीर्षक – स्व-मुंडन 

अगर लॉक डाउन नहीं होता तो अपने शहर अलीगढ़ पहुँचे होते| शिब्बो की कचौड़ी, जलेबी हो चुकी होती और चीले का भी आनंद लेने का प्रयास चल रहा होता| शायद अपने किस्म की कुछ खरीददारी जो दिल्ली में अक्सर संभव नहीं होती, उसे अंजाम दिया गया होता| इस से अधिक यह भी कि मिलने जुलने के भूले बिसरे कुछ पुराने वादे निभाने की जुगत की जाती या फिर उन्हें अंजाम न दे पाने के कारण नई शिकायतें पैदा होतीं| पुराना घर दो चार दिन के लिए गुलजार होता, खुश होता और कहता – आते रहा करो बेटा| मैं पुराने घर की ऊँगली पकड़ कर दो रात सोता| पति पत्नी दिल्ली छोड़ कर अलीगढ़ या किसी और छोटे मझौले शहर लौट जाने के अपने पुराने संकल्प पर कुछ चर्चा करते| पुराने दिन एक बार फिर से बिसरा दिए जाते|

जनता कर्फ्यू वाले रोज बाल कटवाने जाने का इरादा था| कुछ इच्छा नहीं हुई फिर हिम्मत| बाल बहुत बढ़ गए थे| कुछ दिन पहले संदीप पारीख ने ट्विटर पर लिखा था कि उन्होंने इलेक्ट्रिक रेज़र के ट्रिमर का प्रयोग कर कर बाल काटें हैं| आज उनका अनुभव प्रयोग में  लाया गया| स्वयं बाल काटे गए| थोड़ी सहायता बेटे से लेनी पड़ी| बदले में उसका कटोरा कट करना पड़ा| कौन बाप बेटे का कटोरा कट करता कराता है? बात यह भी है कि उसके विद्यालय में कटोरा कट की अनुमति नहीं है तो जल्दी ही उसको सादा कटिंग करवानी पड़ेगी| कुछ दिन खुश रहेगा| पिताजी ने भी अपनी कटिंग का आग्रह किया है|

देवदत्त पटनायक की मेरी गीता आज समाप्त हो गई| यह मेरे लिए पहली ऑडियो बुक थी| यह अनुभव अच्छा रहा| झाडू पौछा और टहलते समय इसे सुना गया| ज्ञान और समझ में वृद्धि महसूस हुई| दूसरी ऑडियोबुक खरीद ली गई| इन दिनों में सुनने सुनाने का काम बढ़िया चल रहा है| परन्तु जो काम होने से रह गए हैं उनकी बड़ी चिंता हो रही है| दिल भी तो ठीक से काम करने में नहीं लगता|

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विश्व-बंदी ९ अप्रैल

उपशीर्षक – कार्य असंतुलन 

आजकल पता नहीं लग रहा कि कौन सा दिन कार्यदिवस है और कौन सा छूट्टी| दीर्घ सप्ताहान्त जैसे शब्द बेमानी हो चले हैं| घर से कार्य की अवधारणा में भी गजब की गड़बड़ हो रही है| घर से काम करने की छुट्टी या घर से काम की छुट्टी या घर का काम करने की छुट्टी जैसे शब्द चर्चा का विषय हैं| वैसे हर कोई अपनी सुविधा के साथ काम कर रहा है इसलिए इन छुट्टी का खास महत्त्व महसूस नहीं किया जा रहा| कोई सार्वजानिक त्यौहार नहीं मनाया जा रहा| कठिनाइयाँ तो काम करने में आ रहीं हैं|

इधर जिन घरों में ले दे कर एक ही कंप्यूटर या लैपटॉप है वहाँ पारिवारिक सामंजस्य कठिनतर हो गया होगा है| मेरे घर में दो लैपटॉप के बाद भी सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा| मेरे लैपटॉप पर मेरा एकछत्र राज्य है| दूसरे लैपटॉप को पत्नी को अपने दफ़्तर के कामकाज और बेटे को अपनी पढाई के लिए लैपटॉप चाहिए| एक पारिवारिक मित्र के घर में सुबह आठ से दोपहर बारह बजे तक बच्चों को और उसके बाद बारी बारी से पति पत्नी को घर का एकमात्र लैपटॉप प्रयोग करना पड़ रहा है| आप बच्चे को पढ़ने से रोक नहीं सकते और पति-पत्नी दोनों काम ही नहीं कर पा रहे| फर्ज़ कीजिए घर में दो या तीन बच्चे हैं तो घर का माहौल इतना ख़राब है कि नरक को अच्छा बताया जा रहा है| जिन घरों में कार्यालय जाने वाले तीन चार लोग हैं वहाँ के हालात देखकर इतने ख़राब हैं कि सुबह दूरदर्शन पर रामायण देखते समय घर में महाभारत हो जाती है और शाम को महाभारत के समय तक पति देव राम बनकर पत्नी त्याग तक की बात करने लगते हैं|

शाम तक सरकार ने घुमावदार शब्दों में मान लिया कि चिकित्सकीय खासकर सुरक्षा उपकरणों की कमी है| सरकार को लगता है कि जल्दी ही दवाएं और उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होंगे| हकीकत यह है कि भारत में पर्याप्त संख्या में रोग की जाँच भी नहीं हो पा रही है| अस्पताल बीमारों को दाखिल करने से मना कर रहे हैं| कई मामलों में बीमार सामाजिक बहिष्कार के भय से अस्पताल नहीं जा रहे, जो जा रहे हैं वो भाग रहे हैं यहाँ तक कि बीमारी के भय से आत्महत्या भी कर रहे हैं| कई शहरों में अल्पसंख्यक, अनुसूचित जातियों और महिलाओं की मृत्यु दर में अकारण वृद्धि दर्ज करने की खबरें है| इंदौर में मुस्लिम समुदाय में मृत्यु दर बढ़ने की खबर अखबारों में छपी है|

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विश्व-बंदी ८ अप्रैल

उपशीर्षक – अर्धस्नान की पुनः स्मरण 

अपनी किशोर अवस्था में मुझे बार बार हाथ धोने की आदत थी| पूजा करने, योग ध्यान करने, खाने पीने, पढ़ने बैठने, घुमने जाने आने से लेकर सोने से पहले भी हाथ मुँह धोता था| मेरे एक मित्र थे जिनको कार्यालय में हर आधा घंटे बाद उठकर हाथ धोने की सनक थी| उनके हाथ धोकर आने के बाद झागों से भरा वाश-बेसिन एक सामान्य बात थी| बाद में मैंने अपनी आदत को थोड़ा सुधार लिया यानि कमी की| पिछले कई दिनों में बचपन की अपनी आदत को मैंने वापिस पाने का उपक्रम किया है| फिलहाल दिन में तीन बार मुँह और चार बार पैर भी धोये जा रहे हैं|

स्वास्थ्य के सन्दर्भ में चल रही सब चर्चाओं में पैर धोने के ऊपर कोई खास बात नहीं हो रही| परन्तु भारत में दिशा-मैदान, घुमने फिरने, दफ्तर बाजार, शमशान, कब्रिस्तान, मित्र सम्बन्धी कहीं से भी आने के तुरंत बाद पैर धोने की परंपरा रही है| रीति रिवाज़ों में आने पर सम्मान देने के लिए पैर धोने का जिक्र आता है| केवट द्वारा सीता राम के और कृष्ण द्वारा सुदामा के पैर धोने के प्रसंग भारत में कौन नहीं सुनता| मगर सुनने के बाद भी हम पैर धोने को नहीं जानते इसलिए शायद अपनाने पर कोई बात नहीं हो रही| अस्पतालों में जूते के गिलाफ़ (shoe cover) पैर धोने से बचने का ही आधा अधुरा विकल्प है|

सामान्य रूप से भी पैर धोने के लिए पानी उड़ेल लेना पर्याप्त नहीं है| मैं अक्सर शेम्पू (जैसा के पार्लर में सुझाया गया था) या कपड़े धोने के साबुन (जैसा की कस्बाई तरीका है) का प्रयोग करता हूँ| अगर लम्बी यात्रा, कटी-फटी बिबाई यानि एड़ियाँ है तो उबले पानी में हल्दी या नीम का प्रयोग हो सकता है| हल्दी के पानी से पैर धोना सांस्कृतिक परंपरा है जिसे विवाह आदि के समय आज भी अपनाया जाता है| अगर आप अंतिम क्रिया, चिकित्सालय असुरक्षित स्थान से आ रहे हैं तो गृह द्वार पर ही हाथ मुँह पैर धोने का पुराना विधान रहा है जिसे मुझे स्वयं भी पुनः अपनाना है| अगर द्वार पर ही गुसल लगाना संभव रहे तो मन बुद्धि की प्रेरणा से नहा लेना उचित है|

आज सब्ज़ी और गल्ला सब आ गया| दिन लॉक डाउन बढ़ने की अटकल लगाने में बीत गया|

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विश्व-बंदी ७ अप्रैल

उपशीर्षक – आराम की थकान 

लॉक डाउन को बढ़ाये जाने की इच्छा, आशा, आशंका और समर्थन की मिली जुली भावना के साथ मुझे यह भी कहना चाहिए कि मैं इस से थकान भी महसूस कर रहा हूँ| साधारण परिस्तिथि में कई बार ऐसा हुआ है कि मैं महीनों घर से नहीं निकल सका हूँ| परन्तु जब आप मर्जी के मालिक हो तो आप कुछ भी कर सकते हैं| मुझे मालूम है कि लॉक डाउन के हटने के महीने दो महीने बाद भी शायद मैं आसानी से घर से न निकलूँ| परन्तु छोटी छोटी इच्छाएं होती रहती है| ऐसा नहीं कि मैं इन कामों के लिए जा नहीं सकता परन्तु लॉक डाउन के साथ आत्म नियंत्रण भी है| कई दिन से ब्रेड कटलेट खाने की इच्छा बलबती हो रही है| इन्द्रिय निग्रह के समस्त प्रयास भोजन पर ही सबसे पहले अटकते हैं| जिव्हा की वासना प्रबल होती है| अस्वादी और स्वाद रसिक होने का मेरा प्रयास तो सदा सफल है| अल्पआहारी होने के प्रयास में भी लगातार सफलता रही है| आज कांदे की सब्ज़ी बनाई खाई| अरहर की दाल तो पत्नी को मेरे हाथ की ही पसंद है| मजे की बात यह है कि साधारण चावल बनाना आज भी मुझे कठिन लगता है|

दो दिन से फल सब्ज़ी वालों की अचानक कमी हो गई है| अगर कल कोई ठेलेवाला नहीं आया तो फिर खुद जाकर सामान देखना पड़ेगा| दिन भर बार बार घर के आगे की सड़क और पीछे की गली में झाँकते बीत जाता है| कुछ तो दिखाई दे कोई तो कहानी हो कोई तो कहासुनी करे कुछ तो दिल लगे|

सड़क पर सूखे पत्ते बिखरे पड़े हैं| आज दो दिन बाद झाड़ू लगी मगर कुछ पल में ही सड़क पुनः पत्तों से भर गई| कड़ कड़ खड़ खड़ की आवाज करते हुए ये सूखे पत्ते जब हवा में नाचते गाते नीचे उतरते हैं तो दिल में संगीत उतरता है| जमीन पर बिछे हुए सूखे पत्तों पर चलना और उनकी आवाज सुनने में अपना अलग आनंद है| यह आनंद हमने अपने आप से छीन रखा है|

कल की गर्मी के बाद आज ठंडी हवा है| आसमान में बादल हैं| मौसम को भी अपनी जिन्दगी का कुछ पता नहीं| कब क्या क्या बदल जाए, क्या पता| दो महीने में दुनिया बदल गई| इंसान बदल गए|

मगर क्या वाकई हम बदल जायेंगे? लगता तो नहीं|

 

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विश्व-बंदी ६ अप्रैल

उपशीर्षक – भक्ति विषाणु 

सरकार को करोना के साथ भक्ति विषाणु से भी लड़ना पड़ रहा है| मीडिया भी कम विषाणु नहीं| उत्तर प्रदेश के कई जिलों की पुलिस के ट्विटर हैंडल्स पर कुछ सरकारपरस्त मीडिया चेनल को निशानदेह करकर असत्य और भ्रामक खबर न फ़ैलाने का अनुरोध दिखाई दिया| भले ही इस प्रकार के ट्विट बाद में हटा लिए जाए परन्तु यह सरकार की बढ़ती चिंता का द्योतक है| बलरामपुर की एक भाजपा नेत्री के विरूद्ध दिए जलाने के साथ हवा में गोलीबारी कर डालने के लिए कार्यवाही की गई – यह अलग बात की माफीनामे के साथ शायद उन्हें छोड़ दिया गया| देश दुनिया में बीमारी फ़ैल रही है और संवेदनहीन समर्थक भक्त बनकर अपने नेता को भी उपहास का पात्र बना दे रहे हैं|

सब से अधिक चिंता की बात अस्पतालों का बीमार घोषित कर दिया जाना है| मुंबई के एक नामी गिरामी अस्पताल में तीस से अधिक चिकित्सक और चिकित्साकर्मी बीमार हो गए हैं| अब अस्पताल को आम लोगों के लिए बंद किया गया है| देश में अन्य कई अस्पतालों के बारे में भी ऐसी खबरें हैं| आवश्यक साजोसामान की कमी लगातार चिंता का विषय है| तबलीगियों और विदेश से वापिस आए लोगों के बाद दिखा जाये तो बीमारों का बड़ा समूह चिकित्सा से जुड़े लोग हैं| सरकारी अस्पताल में भीड़ की अधिकता  और संसाधन की कमी के चलते उपकरण और दवा की किल्लत समझ आती है| मगर प्रसिद्ध निजी अस्पतालों में ऐसा होना चिंता का नहीं अपितु निंदा का विषय है|

देश भर में तबलीग की आड़ में मुस्लिम विरोधी बात हो रही है और मुस्लिम को चिकित्सकों का विरोधी बताया जा रहा है| परन्तु हिन्दू मकान मालिकों और पड़ोसियों द्वारा स्वधर्मी चिकित्सकों के विरुद्ध गाली गलौज की बातें भी लगातार सामने आ रही हैं|

आज पुलिस ने मोहल्ले में फिर से मार्च किया| वैसे यहाँ लोग कम ही निकल रहे हैं परन्तु पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं कहा जा सकता|

मौसम में आज काफी गर्मी महसूस हुई| प्रदूषण रहित माहौल में सूर्य अपने पूर्ण आभामंडल के साथ प्रकाशमान है| हवा की ठंडक तेजी से कम हो रही है| अगर जल्दी धूल भरी आँधियाँ नहीं आतीं तो गर्मी बहुत महसूस होगी|

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विश्व- बंदी ४ अप्रैल

उपशीर्षक – निशानदेही 

आज लोदी रोड पुलिस थाने से फ़ोन आया| पति-पत्नी से पिछले एक महीने आने जाने का पूरा हिसाब पूछा गया| पूछताछ का तरीका बहुत मुलायम होने के बाद भी तोड़ा पुलिसिया ही था| कुछ चीज़े शायद स्वाभाव से नहीं निकलतीं या शायद मेरे मन में पुलिस कॉल की बात रही हो तो ऐसा महसूस हुआ| मेरा अनुभव है कि दिल्ली पुलिस शेष उत्तर भारत की पुलिस से कहीं अधिक जन सहयोगी है| मेरे जबाब में बस्ती निज़ामुद्दीन का ज़िक्र तक नहीं था तो उसने सीधे ही मुझ से पूछ लिया| मैंने अपना आवागमन मार्ग समझा दिया तो उसे थोड़ी संतुष्टि हुई| मगर फिर भी शंका के साथ उसने हालचाल और अतापता पूछ लिया| फिर भी उसे चिंता थी कि मेरा मोबाइल उस टावर की जद में कैसे आया तो तकनीकि और भौगोलिक जानकारी के साथ संतुष्ट करना पड़ा|

वैसे परिवार में सब पंद्रह दिन से घर में ही बंद हैं| मेरे अलावा कोई भी दूध सब्जी लेने के लिए भी सीढ़ियाँ नहीं उतरा| मोहल्ले के बाहर मेरी अंतिम यात्रा भी २० मार्च को हुई थीं| वह तारीख भी पुलिस वाले के रिकॉर्ड में भी थी| ऐसा इसलिए हुआ कि मैं बस्ती निज़ामुद्दीन से मात्र कुछ सौ मीटर से ही तो गुजरा था| मोबाइल टावर आपकी मौजूदगी तो दर्ज करते ही हैं| घर भी तो बहुत दूर नहीं है निजामुद्दीन से|

मोबाइल फोटोग्राफी का एक वेबीनार देखा| जोश में दो तीन फ़ोटो खींचे गए और विडियो बनाए गए| तो

मकान मालिक रोज हालचाल के लिए फ़ोन करते हैं| आज बैंक तक गए थे| पूछा तो कहने लगे बहुत जरूरी काम था| क्या दिन आए हैं – बैंक जाने के लिए भी सफाई देनी पड़ती है| वो घर के प्रांगण में ही टहलने का उपक्रम करते हैं वर्ना रोज लोदी गार्डन जाते थे|

घर में लिट्टी-चोखा बनाया गया| यहीं समय है कि नए नए पकवान बनाए खाए जाएँ| परन्तु घुमने फिरने की कमी के कारण अतिरिक्त व्यायाम का भी ध्यान रखना पड़ रहा है|

इन दिनों आसमान का नीलापन दिल चुरा लेने वाला है| चाँद पूरे रंग ढंग में चमकता है| तारों ने भी अपनी महफ़िल मजबूती से जमा ली है| हल्की ठंडक में बाहर ही सो जाने का मन करता है| बचपन के वो दिन याद आते है जब हम छत पर सोते थे| अभी समझ नहीं आता कि छत पर सोना उचित हैं या नहीं| अजीब सी बेचैनी महसूस होती है|

विश्व- बंदी २ अप्रैल

उपशीर्षक – मूर्खता का धर्म युद्ध 

आज मानवता के संरक्षक भगवान विष्णु के अवतार श्री राम का जन्मदिन है| मानवता अपनी मौत मरना चाहती है| ताण्डव हो है| मैं मूर्खता का धर्म युद्ध देख रहा हूँ| कौन सा धार्मिक संप्रदाय ज्यादा मूर्ख है इस बात की होड़ चल रही है|

पहले भारत के प्रधानमंत्री की मानवतापूर्ण बात का तथाकथित वैज्ञानिक आधार खोजकर जनता कर्फ्यू की शाम तालियों, ढोल नगाड़ों बाजे ताशों के साथ देश ने अपना मजाक उड़वाया| इस से पहले गौमूत्र और गोबर के महाभोज आयोजित हुए कि इन दोनों पदार्थों के सेवन से विषाणु का असर नहीं होगा| फिर तबलीग वाले और उनकी मूर्खतापूर्ण वक्तव्य सामने आये जो काफ़िरों पर हुए इस खुदा के कहर में खुद बीमार पड़े और काफ़िरों से ज्यादा स्वधर्मियों के लिए ख़तरा बने| भारत के बाहर की ख़बरें भी दुःखदायी हैं| इस्रायल में ऑर्थोडॉक्स यहूदियों पर सरकार को पुलिस कार्यवाही करनी पड़ी और ड्रोन, हेलीकॉप्टरों और स्वचालित हथियारों का प्रयोग करना पड़ा| अमेरिका में एक पंथ ने बीमारों के आग्रह किया की बीमार होने पर दूसरों पर खांसने और थूकने का हमला करें|

अधिकतर धर्म बड़ी बीमारियों को ईश्वर की मर्जी (यहूदी, ईसाई, मुस्लिम) या नए – पुराने पापों का फल (हिन्दू, बोद्ध, जैन, सिख) मानते हैं| कुल मिला कर हर धर्म का अन्धविश्वासी बीमारी में मरकर स्वर्ग का द्वार अपने लिए खोलना चाहता है| कुछ लोग अपने सहधर्मियों के लिए यह “सरल” मार्ग उपहार में देना चाहते हैं तो अन्य काफ़िरों/अविश्वासियों/कमुनिस्ट आदि को पाप का फल या प्रायश्चित का अवसर उपहार में देना चाहते हैं|

इन धार्मिक अंध-विश्वास के नाम पर बहुत से लोग चिकित्सकों और स्वस्थ्य कर्मियों पर हमला कर रहे हैं कि हमारी जाँच और इलाज न करों| दूसरी तरफ वो लोग भी हैं जो चिकित्सकों और स्वस्थ्य कर्मियों पर इसलिए हमला कर रहे हैं कि उनके मरीज को देखने में देरी हो रही है|

सब डरे हुए लोग अपना बचाव चाहते हैं| मेरे जैसे कुछ घर में “डरकर” बंद बैठे हैं| तो कुछ सड़क पर सिगरेट पीते हुए सोचते हैं कि बीमार (भले ही बीमार को अपनी बीमारी का पता तक न चला हो) घर बैठे| कुछ महानुभाव इलाज के अभाव में बीमारों को मार डालने तक की बात कर रहें हैं| यह इतना घाटक है कोई बीमार अपनी बीमारी बताने में भी डरने लगे| तेलंगाना के स्वास्थ्य मंत्री को करोना हुआ है मगर दो अन्य मंत्री आज मंदिर में राम नवमी के सार्वजानिक पूजन कर कर ईश्वर प्रसन्न करते नजर आए|

सबसे घटिया वह लोग हैं जिन्हें करोना का इलाज कर रहे अपने किरायदार चिकित्सकों और स्वस्थ्य कर्मियों को घरों से निकाल रहे हैं| बहुत के पड़ोसियों ने चिकित्सकों और स्वस्थ्य कर्मियों को घर लौटने से मना कर दिया| इन मकान मालिकों और पड़ोसियों का कोई धर्म नहीं क्योंकि इनके पास अच्छा पैसा, उच्च जाति, उच्च वर्ग और कर देने का उलहना है|

शाम ठीक बीती| काम धंधा करना है पर इस माहौल में कार्य में चित्त लगाना कठिन हो रहा है| ब्लॉग के अलावा सामाजिक मीडिया के अपने को बाहर कर रहा हूँ| सही–गलत ईश्वर जाने|

विश्व-बंदी ३१ मार्च

उपशीर्षक – वित्तवर्ष का अंत 

कुछ घंटों में यह वित्त वर्ष बुरी यादों के साथ समाप्त होने जा रहा है| मैं आशान्वित हूँ कि नया वर्ष फिर से बहारें लाएगा| इस साल पहले दस महीने शानदार बीते| बहुत कुछ नया सीखा, किया और कमाया| मगर बही खाते कर चटख लाल रंग उड़ा उड़ा उदास सा हो गया है|

लेनदारियां बहुत बढ़ चुकी हैं और इस माहौल में उनकी वसूली सरल तो नहीं दिखती| पिछले एक महीने से कोई खास बिल नहीं कटे| अप्रैल से जून से वैसे भी थोड़ा तंग रहता है| इस बार हालत शायद और तंग रहेंगे| उधर, मुवक्किल पैसा समय पर नहीं देते मगर सरकार को अपना वस्तु-सेवाकर तुरंत चाहिए होता है| सरकारी कर गांठ से देना बहुत भारी पड़ता है| जब सरकार खुद आपकी मुवक्किल हो तो स्तिथि नाजुक ही रहती है| केवल रकम वसूल हो जाने रेशमी भरोसा रहता है| हम सेवा प्रदाता तो सिर्फ कागज पर ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम हैं| जमीनी लाभ शायद कुछ नहीं|

इस समय बचत से लिए गए निवेश के हालात भी अच्छे नहीं| यह साँप छछुंदर की स्तिथि है| निवेश करें तो जवानी ख़राब, न करें तो बुढ़ापा| उसपर यह मंदी का समय किसी कंगाली से कम नहीं पड़ता| शेयर बाजार में मंदी के चलते निवेश बकत कुछ नहीं तो आज सरकार ने बचत वगैरा पर ब्याज घटा दी| कंगाली में आटा गीला हो चुका है| आटे से याद आया – पिछला गल्ला भी ख़त्म हो रहा हैं और इस महीने का गल्ला भरने के लिए आधे देश के पास पैसे नहीं बाकि बचे लोग के पास दूकान जाने की समस्या|

जिन लोगों के पास नौकरियां हैं उनकी भी समस्या है| लगभग सबको साल के आखिर और कार्यालय के बंद होने के कारण औना – पौना वेतन मिला है| मुनीम भी घर पर और याददाश्त से कितना हिसाब किताब लगायें|

ब्याज घटने से भविष्य निधि पर ७.१ फ़ीसदी, बचत पत्र पर ६.८ फ़ीसदी, किसान विकास पात्र पर ६.९ फ़ीसदी का ब्याज मिलेगा| बचत खाते पर सरकार ने ४ फीसदी पर ही ब्याज रखा हुआ है| इस सब से बुढ़ापे का गणित बिगड़ जाता है| मगर कुल मिलकर ब्याज की दर जीवनयापन की महंगाई की दर से कम होने का अंदेशा हो सकता है| यह बाद अलग है कि बाजार खुद मंदा हो रहे|

सरकार ने दिवालिया कानून को थोड़ा कमजोर थोड़ा सुस्त बनाया है तो काम धंधे में कमी रहेगी| इधर कुछ नया जानने सीखने की जरूरत रहेगी कि कुछ नया काम धंधा मिलता रहे|

प्रार्थना रहेगी बाज़ार में मंदी और देश में अकाल के हालात न बनें| यह नामुराद बीमारी और दुर्भिक्ष जल्दी दूर हो|

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विश्व-बंदी २९ मार्च

उपशीर्षक – सरकारी क्षमा प्रार्थना 

ट्रेन के डिब्बों को १० हजार आइसोलेशन कैंप में बदला जा रहा है? क्या अस्पताल इतने कम पड़ने वाले हैं? बिस्तरों की कमी होने पर यह उचित हो सकता हैं – परन्तु बेहद चिंताजनक है| इस समय तक हजार लोग बीमार हो चुके हैं और सौ करीब ठीक हुए हैं| करोना से दोपहर तक २५ लोग मरे, इसके अतिरिक्त २२ लोग सरकार द्वारा किये गए आक्रामक लॉक डाउन से मारे गए हैं| 

प्रधानमंत्री ने निर्लज्ज होकर जनता से “इस उचित निर्णय से होने वाली कठिनाई” के लिए माफ़ी मांगी है|

इतिहास इस माफ़ी को उसी तरह याद रखेगा जिस तरह माता कुंती द्वारा अपने परित्यक्त पुत्र कर्ण से मांगी गई माफ़ी को याद करता है| उचित निर्णय यदि गलत तरीके से लिए जाये तो उचित नहीं रहते| लक्ष्य ही नहीं साधन, साध्य और समय का भी महत्त्व है| आपातकालीन निर्णय लेने में त्रुटियाँ हो सकती हैं, परन्तु यह निर्णय बीस दिन देर से लेने के बाद भी बिना योजना बनाये लिया गया| बिना गलती सुधारे मांगी गई माफ़ी का कोई मतलब नहीं| अब तो गलती सुधारने का समय भी निकलता जा रहा है| तत्काल ट्रेन चला कर फँसे हुए नागरिकों को उनके घर तक पहुँचाना चाहिए था| बसों के भरोसे यह काम देरी करेगा|

आज खुद प्रधानमंत्री ने कहा है परन्तु अमल करने की जिम्मेदारी सिर्फ जनता के सिर पर डाल दी:

किसी को नहीं पता क्या पिछले चार साल से हर दिन लगाये जाते इस आपातकाल में जनता को जीने का अधिकार कब ख़त्म हुआ? बीमारी का बहाना बनाकर लम्पटता को न छिपाया जाए तो बेहतर है| ठीक है कि घर से बाहर निकलना ख़तरनाक है| मगर हालत इतने क्यों बिगड़ने दिए गए?

एक मित्र से बात हुई| पति-पत्नी दौनों उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं में हैं| पुलिस नाम पता और घर से निकलने की वजह की जगह पूछने डंडा चलाती है|

कोई भी तानाशाह हो, उसके पास हर समस्या का सबसे मानवीय समाधान भी सिर्फ़ डंडा है|

विश्व-बंदी २८ मार्च

उपशीर्षक – प्रसन्न प्रकृति के दुःख 

कौन कहता है कि यह दुःखभरा समय है? प्रकृति प्रसन्न है| दिल्ली के इतिहास में मार्च में कभी इतनी बारिश दर्ज नहीं दर्ज़ की गई| बसंत और वर्षा की प्रणय लीला चल रही है| यति और रति दोनों के लिए उचित समय है| इन्हीं फुर्सत के रात-दिन ढूंढने के लिए पिछली सात पुश्तें परेशां थीं|

पर्यावरण प्रदूषण का स्तर विनाशकारी चार सौ से घट कर चालीस पर आ चुका है| मेरे फैफड़े पिछले तीस साल ने पहली बार इतना प्रसन्न हैं| बार बार बदलते मौसम के बाद भी शायद ही कोई प्रदूषण से खांस रहा है|

परन्तु सावधानी हटने का ख़तरा हर घर के दरवाज़े पर खड़ा है| आजकल सब्ज़ी तरकारी भी घर के दरवाज़े पर ही शुद्ध की जा रही है – गंगाजल का स्थान एंटीसेप्टिक सेनिटाइजर ने ले लिया है| कुछ घरों में दरवाजे पर नहाने का भी इंतजाम है – जैसे शव-यात्रा से लौटने के समय होता है|

लोग भूले-बिसरों को फ़ोन कर कर हालचाल पूछ रहे हैं| चिंता नहीं भी है, कोई मलाल नहीं रखना चाहता|

बीमारी का आंकड़ा बढ़ रहा हैं| सरकार भी तो धर्मग्रन्थ के सहारे आ टिकी है| सरकारी दूरदर्शन “रामायण” “महाभारत” से सहारे जनता को घर में रोकना चाहती है| क्या पता गीता-पाठ (क़ुरान और बाइबिल) भी शुरू हो जाए? सब जिन्दा सलीब पर लटके हैं| देश भर के भूखे प्यासे गरीब अपने घरों के बड़े बूढों की चिंता में पैदल ही घर की दिशा में बढ़ रहे हैं| आजादी के बाद, कश्मीर के बाहर यह सबसे दुःख भरा पलायन है|

धृतराष्ट्र ने राज्य सरकारों से कहा है कि पलायन करने वालों को भोजन – पानी देकर रोका जाय| मगर उस बूढ़ी माँ – पिता का क्या जो आसराहीन गाँव में बैठे हैं| रोकेंगे कहाँ, कैम्पों में?? अगर अनहोनी हुई तो यह हिटलर के कैंप साबित होंगे|

सामान से भरे ट्रकों को लिए लाखों ट्रकचालक भूखें प्यासे सड़कों पर पड़े हैं? क्या मगर अमीरों और मध्यवर्ग को अपने गाल फुर्सत नहीं| पहले सत्ता नाकारा और  निकम्मी हुआ करती थी| अब जनता भी ऐसी ही है – सत्तर साल में यथा राजा, तथा प्रजा का चक्र पूरा हुआ|

शाम देश के सबसे बड़े टैक्सी ऑपरेटर ओला का सन्देश मिला, उनके ड्राइवर बिना काम के घर में बैठे हैं, सिर पर कार लोन भी है| उनके खाने का इंतजाम करने के लिए दान का अनुरोध किया जा रहा है|

विश्व-बंदी २७ मार्च

उपशीर्षक – नीला आकाश और बिलखती सड़कें 

तनाव को मुखमंडल की आभा बनने से रोकना मेरे लिए कठिन है| ७५ मिनिट की परीक्षा ५५ मिनिट में पूरी हुई| अब मैं किसी भी कंपनी में निर्देशक बन सकता हूँ| समयाभाव में अटका पड़ा यह काम पूरा हुआ|

कुछ और रुके पड़े काम पूरे किए जाने है| मृत्यु और काल आपके सबसे बड़े साथी हैं|

बारिश रुकने के बाद दोपहर में इतना नीला आसमान पहली बार दिखा| सोचता हूँ कहाँ होंगे वो लोग जो प्रदूषण के लिए किसान को कोसते थे? प्रकृति अंधपूंजीवाद पर भरी पड़ रही है| दुनिया की शानोशौकत बड़ी बड़ी गाड़ियाँ मूँह लटकाए घरों के बाहर धूल खाने लगी हैं|  प्रकृति ने पढ़े लिए समझदार आकाशगामी पैसे वालों को बीमारी फ़ैलाने के लिए अपना वाहन चुना है – माता शीतला का वाहन भी तो गधा ही है|

बड़े शहरों से जो लोग पैदल हजार पाँच सौ किलीमीटर जा रहे हैं क्या उनकी आने वाली पीढ़ियाँ वापिस बड़े शहरों की तरफ आसानी से रुख कर पाएंगीं? क्या विकास को मजबूर होकर छोटे मझोले शहरों की तरफ रुख करना पड़ेगा? क्या हानिकारक उद्योगों को बंद रखने पर जोर दिया जाने लगेगा? सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हमें अच्छे पर्यावरण की कितनी आदत पड़ती है|

शाम तक गोल मोल सरकार ने माना कि विदेशों भ्रमण से लौटे वाले सभी यात्रियों नहीं खोजा सा सका है| हैरानी की बात यह है कि इतना खतरा उठाकर भी लोग क्यों छिपे पड़े हैं? उड़ीसा बालासोर में सरकार को एक क्लिनिक का लाइसेंस बंद करवाना पड़ा क्योंकि उस में विदेश भ्रमण से लौटे एक यात्री का अनिधिकृत रूप से इलाज किया गया था|

शाम तेज बारिश हुई और शानदार चाँद तारे दिखाई दिए| शायद यमुना का गन्दा काला पानी वापिस पारदर्शी श्यामल रंग में बदलने लगा हो|

क्या, हमें पूंजीवाद के सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा से इतर सकल घरेलू प्रसन्नता की और देखना होगा?

भविष्य बहुत कुछ कह सकता है|

विश्व-बंदी २६ मार्च

उपशीर्षक – कुछ नवारम्भ 

होली पर ही बहुत दिनों से छूटा हुआ योगाभ्यास पुनः प्रारंभ कर दिया था| आसन प्राणायाम के मौसम भी अच्छा हैं चैत्र का महिना भी|

सुबह से शरीर के बारे में सोच रहा हूँ| किसी भी प्रकार के फ़्लू-जुखाम-खाँसी के लिए गहराना परिवार का अजमाया नुस्खा है – एक कली लहसुन बराबर मात्रा के अदरक के साथ बढ़िया से चबाइए और मुँह चाय के घूँट लेने के लिए खोलिए| क्या इसे अजमाना चाहिए? आदतन हमारे घर में चैत्र नवरात्र से शरद नवरात्र के बीच कच्चा लहसुन खाने की परंपरा नहीं हैं|

दो दिन से सब्जी भी साबुन के गोल में धोकर रसोई में जा रही है| रसोई को चौका इसीलिए कहते हैं कि इसे बाकि दुनिया की गंदगी से क्वॉरंटीन (चौकस एकांतवास) रखा जाता है| आज नाश्ते रमास के चीले बनाये गए|

दोपहर वित्त मंत्रालय द्वारा गरीबों के लिए बनाई गई बकवास घोषणा को सुनकर दुःख हुआ| स्वयं सहायता समूह के लिए बिना गिरवी कर्ज की मात्रा दुगनी करने पर हँसी आई| यह कर्ज बड़ा नहीं सरल होना चाहिए| कर्मचारी बीमा राशि से अधिक धन निकालने की अनुमति से सिर्फ क्रोध आया| सरकार ने जिम्मेदारी की टोपी गरीब के सिर पहना दी है|मोदी सरकार मनरेगा की पुरानी विरोधी होने के बाद भी उसकी शरण में गई है मगर मुझे कोई आशा नहीं – कारण लॉक डाउन के दौरान मनरेगा रोजगार संभव नहीं| योजना पर हँस ने में भी बहुत रोना आया| ज़मीनी मुद्दों तक सरकार की पहुँच नहीं है|

दिन के तीसरे पहर आसमान में एक ड्रोन दिखाई दिया – मेरा अनुमान है कि निगरानी करने ले लिए पुलिस का नया तरीका रहा होगा| इस नकारात्मक समय में सकारत्मक लोगों को सड़कों पर बेफ़िक्र घूमने से रोकना होगा|

मुझे नकारात्मकता को सूंघ लेने और उसको हराते रहने की पुरानी आदत है| जीवन के समस्त नकारात्मक समय का उपयोग किया है| आज दिवेश से बात हुई| उसका आग्रह था कि कल मुझे कंपनियों स्वतंत्र निर्देशक की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेनी चाहिए| मैं सोचने लगा तो उसने कहा, मैं आपको जानता हूँ आप आज शाम या कल सुबह इसे उत्तीर्ण का लें| पढ़ने और तनाव लेने से मना किया है| कल सुबह आठ बजे का समय तय रहा| फिर भी ,अगर मैं तनाव न लूँ तो धरती न डोलने लगे|

बारिश होने लगी है| बदलता मौसम भी स्वस्थ के लिए अच्छा नहीं| दौज का पतला सा चाँद और थोड़ा दूर तेज चमकदार शुक्र तारा दिखाई दिए| तनाव मुक्त करने के लिए प्रकृति के पास अपने तरीके हैं|