उपचार-विराम


मन में बहुत दिन से बात घूम रही है|

क्या कठिन रोग के रोगी का उपचार धन-अभाव में रुकना चाहिए? अगर रोगी के परिवार के पास धन न हो तो क्या सरकारी या सामाजिक मदद होनी चाहिए? आखिर किसी रोगी के लिए उपचार का अभाव होना ही क्यों चाहिए?

अपने जीवन में तीमारदर के तौर पर लगभग पंद्रह वर्ष चिकित्सालयों के चक्कर काटने के दौरान मैंने परिवारों को इस यक्षप्रश्न का सामना करते देखा है|

कुछ विचारणीय स्तिथि इस प्रकार हैं:

  • उपचार से लाभ की कोई चिकित्सीय आशा न हो|
  • उपचार से लाभ की कोई वास्तविक चिकित्सीय आशा न हो, परन्तु चिकित्सक कुछ परीक्षण आदि करना चाहें| यह रोगी और परिवार के लिए कष्टकर और बाद में लाभप्रद भी हो सकता है| परन्तु नए चिकत्सकीय अनुसन्धान के लिए आवश्यक है| इस के लिए प्रायः लिखित अनुमति ली जाती है परन्तु वास्तव में यह एक तरफ़ा होता है| अनुमति न देने पर चिकित्सक और चिकित्सालय गलत व्यवहार करते देखे जाते हैं| समाज भी परिवार का साथ नहीं देता|
  • उपचार मंहगा हो और रोगी के परिवार के लिए आर्थिक समस्या पैदा करता हो| हो सकता है कि परिवार के बाद धन न बचा हो, खर्च बीमा की सीमा से ऊपर निकल गया हो और अब उधार की नौबत हो| इस परिस्तिथि में रोगी के बचने के बाद भी परिवार का आर्थिक/सामाजिक रूप   से बचना कठिन हो जाता है| अगर रोगी ही परिवार का कमाऊ व्यक्ति हो तो जीवन  कठिन परीक्षा लेता है|
  • वर्तमान स्थान पर उपचार न हो परन्तु कहीं और उपचार संभव हो परन्तु रोगी को ले जाने के साधन या क्षमता न हों|
  • रोगी का पूर्ण उपचार संभव न हो परन्तु जीवन लम्बा किया जा सकता हो, हो सकता है कि उसके इस अतिरिक्त जीवन कला में रोग का निदान संभव हो जाए|

किसी भी मानवीय दृष्टिकोण से यह उचित नहीं जान पड़ता कि रोगी को उपचार के अभाव में मरना पड़े| परन्तु मुझे यह दृष्टिकोण, अंध-मानवीय दृष्टिकोण लगता है| हमें रोगी और परिवार के बारे में भी सोचना चाहिए|

कोई भी अच्छा चिकित्सक किसी रोगी को मरते नहीं देखना चाहता| इसलिए मैं कभी चिकित्सक से सलाह नहीं लेना चाहूँगा| अनुभव के आधार पर कहूँगा कि बीस वर्ष से कम अनुभव वाले चिकित्सक इस तरह के मामलों के राय कम आदेश अधिक देते हैं| इसके बाद, चिकत्सकीय अनुसन्धान संस्थाओं में, मैं यह देखता हूँ कि अगर चिकित्सालय सम्पूर्ण जानकारी दिए बिना कहीं भी तीमारदार से हस्ताक्षर कराए  तो भाग निकलें|  आपके रोगी के बचने की सम्भावना कम ही है| परन्तु यदि सम्पूर्ण जानकारी मिले तो सभी कष्टों के बाद भी अनुसन्धान में भाग लेने की अनुमति दी जा सकती है| जानकारी देने वाले संस्थान और चिकित्सक अपनी तरफ से गलत अनुसन्धान में रोगी को नहीं धकेलेंगे| चिकित्सा विज्ञान को लाभ होगा|

धनाभाव की स्तिथि में निर्णय बेहद कठिन है| अच्छे चिकित्सक अक्सर रोगी के सम्पूर्ण इलाज और अनुमानित खर्च के बारे में सही राय देते हैं और शेष निर्णय परिवार पर छोड़ देते हैं|  अगर परिवार इलाज को जारी न रखने का निर्णय लेता है तो यह निर्णय ख़ुशी से नहीं होता| यह देखने में आता रहा है कि इलाज जारी रखने का निर्णय कई बार शेष परिवार के लिए जमा-पूँजी, संपत्ति, वर्तमान आय, भविष्यत आय ही नहीं कई बार मान मर्यादा को भी दाँव पर लगाना पड़ता है| यद्यपि यह ऐसा दुःख है जिसे सामान्य समाज समझ नहीं पाता| ऐसे समय में मुझे लगता है कि परिवार यह निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए कि परिवार को बचाया जाए या रोगी को| यह दुःखद बात कहते समय मुझे भुवनेश्वर की कहानी भेड़िये याद आ रही है फिर भी मैं यह बात कह रहा हूँ|

एक कल्याणकारी राज्य व्यवस्था के नागरिक होने के नाते हम सरकार और समाज से हम बहुत सी आशाएं कर सकते हैं परन्तु उनकी भी अपनी सीमाएं हैं|