नीम का पेड़

नीम का पेड़ पढ़ते हुए आपको हिन्दुस्तान की उस राजनीति दांव –पेंच देखने को मिलते हैं, जो आजादी के बाद पैदा हुई| हमारी हिन्दुस्तानी सियासत कोई शतरंज की बिसात नहीं है कि आप मोहरों की अपनी कोई बंधी बंधी औकात हो| यहाँ तो प्यादे का व़जीर होना लाजमी है| व़जीर की तो कहते हैं औकात ही नहीं होती, केवल कीमत होती है| यूँ नीम का पेड़ सियासत और वजारत की कहानी नहीं होनी चाहिए थी, मगर हिन्दुस्तानी, खासकर गंगा- जमुनी दो-आब के पानी रंग ही कुछ ऐसा है सियासत की तो सुबह लोग दातून करते हैं| ऐसे में नीम के पेड़ की क्या बिसात, ये तो उस लोगों का कसूर है जो आते जाते उसे नीचे बतकही करते रहे होंगे| वर्ना तो जिस आँगन में उसने अपनी तमाम उम्र गुज़ारी वहां गुजरा तो गुजरा कुछ होगा|

नीम का पेड़ इस उपन्यास में शायद अकेला ऐसा शख्स है, जो आज के ज़माने में नहीं पहचाना जा सकता| रही मासूम रज़ा की यहीं मासूमियत रही कि उन्होंने एक पेड़ को सूत्रधार होने का मौका दिया| यहीं काम अगर उस कलई के उस पुराने लोटे बुधई के आंगन में पड़ा रहा करता होगा, तो आप पहचान जाते कि ये कौन है| उस लोटे और उसकी घिसी हुई पैंदी का जिक्र न करकर रज़ा साहब ने इस देश की सियासत के पालतू टट्टुओं के साथ न इंसाफी कर दी है| आदर्शवादी लोगों से अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जातीं हैं|

ये कहानी उन दो पुराने रिश्तेदारों की है, जिनको जमींदारी के बैठे ठाले दिनों में सियासत खेलने का चस्का लगा होगा| जमींदारी जाती रही| जमींदारों और नबाबों को लगा कि बदल कर ओहदों का नाम बदलकर विधायकी और सांसदी में तब्दील हो गया है| हुआ दरअसल यूँ उलट कि विधायकी और सांसदी जमींदारी और नबाबी बन गई| बदलते वक़्त के साथ, नए प्यादे आते गए, वजारत बदलती रहीं और व़जीर बिकते रहे|

नीम के पेड़ की कहानी इतनी सरल है कि आप गौर भी नहीं करते कि सियासत में दांव खेल कौन रहा है| कहानी बदलते हिंदुस्तान की जमीन से उठती है| यह कहानी इन वादों का इशारा करती है जिनके बूते वोट खींच लिए जाते है| यह कहानी उस आदर्शवाद जिसके जीतने की हम उम्मीद करते हैं|

पुस्तक – नीम का पेड़
लेखक – राही मासूम रज़ा
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष – 2003
विधा – उपन्यास
इस्ब्न – 978-81-267-0861-1
पृष्ठ संख्या – 350
मूल्य – 350 रुपये
यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

राजीव गाँधी और नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी के समर्थक, जिन्हें प्रायः मोदी भक्त या सिर्फ भक्त कहा जाता है अक्सर कांग्रेस के नेहरू – गाँधी परिवार के कट्टर आलोचक के रूप में उभर कर सामने आते हैं| राजीव गाँधी और उनके पुत्र राहुल गाँधी अक्सर उनके निशाने पर बने रहते हैं| नरेन्द्र मोदी के आलोचक मोदीकाल की तुलना आपातकाल या इन्दिराकाल से करते हैं| उधर एक समालोचकों के एक वर्ग को लगता है कि मोदी अपनी तुलना भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल या भारत में आर्थिक सुधारों के प्रणेता पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के करना पसंद करेंगे| परन्तु नरेन्द्र मोदी की बहुत सी बात्तें राजीव गाँधी से मेल खातीं हैं|

भविष्य स्वप्न

राजीव गाँधी को अपने युवा अवस्था में राजनीति से दूर अपना करियर बनांते देखा गया था और वह एक पायलट थे| नरेन्द्र मोदी अपनी युवा अवस्था में एक ऐसे संगठन में काम करते थे जिसका कम से कम घोषित उद्देश्य समाजसेवा और धर्म का उत्थान है| भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीति में हस्तक्षेप करते देखा जाता है मगर उसके लिए कार्य करना कम से कम नरेंद्र मोदी की युवा अवस्था में राजनीति में आने का सुरक्षित मार्ग नहीं था| दोनों व्यक्तित्व अपने आप से नहीं वरन अपने आदरणीयों के निर्णय या राय के कारण राजनीति में आयें हैं| राजीव गाँधी के मामले में निजी परिवार और नरेंद्र मोदी के मामले में संघ परिवार ने मुख्य निर्णय या राय व्यक्त की|

मुख्य अनुभव

दोनों ने राजनीति कि वास्तविक शिक्षा सक्रिय राजनीति में आने के बाद ली और प्रधानमंत्री बनते समय दोनों के सहयोगी केन्द्रीय राजनीति के लिए उनको योग्य नहीं मानते थे परन्तु उनकी बढ़ती लोकप्रियता के आगे नतमस्तक थे| दोनों के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ उनके चयन से अन्दर ही अन्दर संतुष्ट नहीं माने जाते थे|

दंगे और नरसंहार

दंगे और नरसंहार से निपटने में दोनों अपने अपने शासन काल में असफल माने जाते हैं| यहाँ तक कि दोनों के ऊपर उन नरसंहारों में खुद से शामिल होने या उसका नेतृत्व करने का आरोप लगते रहते हैं| दोनों के समर्थक दुसरे के काल में हुए नरसंहार को अपने अपने नेता के राजनितिक बचाव में प्रयोग करते हुए सहअस्तित्व का परिचय देते हैं|

लोकप्रियता

दोनों नेता अपने समय के युवा वर्ग में बहुत लोकप्रिय हैं| उम्र के तमाम अंतर के बावजूद उन्हें अपने समय में युवावर्ग में लोकप्रियता हासिल हैं| दोनों नेता अपने अपने समय में संचार माध्यम में छाये रहे हैं| बुजुर्ग वर्ग दोनों के शंका से देखता था और असहाय था|

विश्व नेता

दोनों नेताओं में अपने आप को विश्व नेता के रूप में स्थापित करने की ललक देखी गयी| जहाँ राजीव गाँधी को बहुत से अन्तराष्ट्रीय महत्व के निजी सम्बन्ध विरासत में मिली, वहां नरेंद्र मोदी को ख़राब अन्तराष्ट्रीय छवि के साथ मैदान में उतरना पड़ा| मगर नरेंद्र मोदी को अपने प्रचार तंत्र और विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से समर्थन मिल रहा है| परन्तु दोनों की विदेश नीति हमेशा प्रश्नचिन्ह के साथ देखी जाएगी| जहाँ राजीव गाँधी श्रीलंका के साथ सम्बन्ध बिगड़ने के दोषी माने जाते हैं वहीँ नरेंद्र मोदी नेपाल के साथ भारत के पुराने संबंधों को कम से कम फोरी तौर पर बिगाड़ बैठे हैं|

नई सदी

राजीव गाँधी जहां अपनी सदी के अंत के डेढ़ दशक पहले २१वीं सदी की बात करते नहीं थकते थे, वहीँ मोदी अपनी सदी के प्रारंभ के डेढ़ दशक बाद २१वीं सदी की बात करते दिखाई दे जाते हैं| दोनों के भविष्य स्वप्न दूर तक जाते हैं, जिन पर जमीनी अमल के बारे में संदेह दोनों स्थिति में बना रहता है|

सूचना प्रद्योगिकी

राजीव गाँधी का कंप्यूटर प्रेम उनके काल में चर्चा का विषय था| उन्हें देश में सूचना क्रांति का मसीहा कहा जा सकता है| उनके समय में उनके विरोधी कंप्यूटर पर सरकार और देश के बहुत अधिक आश्रित हो जाने का खतरा देखते थे| इधर नरेंद्र मोदी को भी सामाजिक सूचना क्रांति के मसीहा के रूप में देखा जाता है| निर्वावाद रूप से वो सामाजिक सूचना क्रांति का अपना चेहरा हैं| भले ही सामाजिक सूचना पटल पर उनके समर्थकों से समाज परेशान होने की बात करता है|

कैमरा

राजीव गाँधी के समय में मोबाइल फ़ोन का प्रचार नहीं था न ही डिजिटल कैमरा था| मगर राजीव देश – विदेश में पर्याप्त घूमे और उनके चित्र मीडिया में आते रहे| दोनों नेताओं को फ़ोटो खींचने का भी बहुत शौक माना जाना है| क्योंकि उस समय सेल्फी नहीं थे, राजीव अक्सर फ़ोटो खींचते भी नजर आते थे| वर्तमान में मोदी को सेल्फी खींचने का शौक है| मोदी का कैमरा प्रेम अगर आज मुहावरा है तो राजीव ने भी कैमरे के लिए कम काम नहीं किया|

राजीव गाँधी और नरेंद्र मोदी के समर्थकों को समझना होगा कि दुनिया छोटी है और एक ही धुरी पर घुमती है|

बहुमत

 

हम संविधान के वैधानिक परिभाषाओं से हटकर किस प्रकार से “बहुमत” शब्द को देखते हैं?

  • क्या सदन में अधिकांश सदस्यों का समर्थन प्राप्त होना?
  • क्या पाँच वर्ष तक सत्ता में बनाये रखने वाला पूर्ण बहुमत?
  • क्या पाँच वर्ष के लिए पूर्ण वैधानिक निरंकुशता देने वाला दो तिहाई बहुमत?
  • क्या सिर्फ सत्ता देने का बहुमत या सरकार के मन मुताबिक हर काम को होने देने का बहुमत?

पिछले कुछ दशक से भारतीय सदनों में विधायी कामकाज नहीं के बराबर हो रहा है| जो हो भी रहा है उसमें विचार विमर्श लगभग समाप्त हो गया है और राजनितिक आकाओं के मन मुताबिक कागज पढ़ कर काम चलाया जा रहा है| बहुत सारे लोग भारतीय राजनितिक प्रणाली को दो या तीन दलीय व्यवस्था में बदलना चाहते है| भले ही संसद में ऐसा नहीं हो पा रहा हो, परन्तु दो तथाकथित प्रमुख दलों के लोग जनसाधारण के बीच इसी प्रकार का प्रचार या दिखावा कर रहे है| उनमें सहमति है कि जो मेरा विरोध करता है उसे तेरा आदमी बताया जायेगा और तेरे विरोधी को मेरा| किसी भी तीसरे चौथे दसवें पचासवें विचार को जबरन नाकारा जा रहा है|

इस प्रकरण में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिन राज्यों में यह तथाकथित प्रमुख दल कोई अस्तित्व नहीं रखते उन राज्यों के बारे में या तो बात ही नहीं की जाती या उन्हें राष्ट्रीय राजनैतिक मुख्यधारा से बाहर खड़ा कर दिया जाता है| जैसे कश्मीर, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु| कश्मीर को किसी ज़माने में रहे आतकवाद के नाम पर किनारे कर दिया जाता है तो उत्तर प्रदेश पिछड़ा मूर्ख गंवार बता कर और तमिल नाडू सांस्कृतिक भिन्नता की भेंट चढ़ जाता है||

परन्तु क्या सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से बहुआयामी भारत में यह विचार उचित हैं? क्या हमारे प्रमुख दल अपने देश के बहुत बड़े हिस्से से कट तो नहीं गए हैं? क्या बहुमत के नाम पर “अनेकता की एकता” को जाने अनजाने छिन्न भिन्न तो नहीं कर दिया जा रहा है?

देश की सांस्कृतिक, वैचारिक और राजनितिक भिन्नता को परखने समंझने और उसके बारे में जागरूक होने में कोई कमी तो नहीं रह गयी है?

आप की शीतलहर

 

“दिल्ली की सर्दी” अगर अपने आप में एक मुहावरा है तो “दिल्ली का मौसम” और “मौसम का मिज़ाज” भी कहीं से भी पीछे नहीं हैं| इस समय दिल्ली में शीतलहर का मौसम है और इस बार “आप की शीतलहर” की मार है|

 

दिल्ली के चुनाव परिणामों से पहले दिल्ली के पिछले दो दशकों को अगर देखें तो हमें मानना होगा कि दिल्ली में विकास हुआ है| बिजली, पानी, सड़क, आदि की भी कोई बड़ी समस्या नहीं दिखाई देती है| दिल्ली मेट्रो दिल्ली के विकास का अग्रदूत बनकर खड़ीं दिखाई देती है| फिर क्या हुआ कि दिल्ली में कांग्रेस की शीला सरकार को हार देखनी पड़ी?

 

English: Jantar Mantar, New Delhi with Park Ho...

English: Jantar Mantar, New Delhi with Park Hotel हिन्दी: जंतर मंतर, दिल्ली (Photo credit: Wikipedia)

 

१.      जनता ने विकास में भ्रष्टाचार को गहराई से महसूस किया;

 

२.      विकास की मौद्रिक लागत की अधिकता जनता को समझ नहीं आई;

 

३.      जब दिल्ली मेट्रो लाभ में गयी तो डीटीसी के घाटे पर सवाल उठे;

 

४.      बिजली पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के निजीकरण में, जनता को जिम्मेदारी से भागती सरकार और विपक्ष दिखाई देता है;

 

५.      बिजली कंपनी के खातों में धांधली की खबर से जनता में आक्रोश है; और

 

६.      हाल की नकली महंगाई ने भी जनता के कान खड़े कर दिए हैं|

 

यदि हम साधारण कहे जाने वाले लोगों से बात करते हैं तो पाते हैं कि सभी तबकों में संसद में काम ठप्प रहना; कानूनों का लम्बे समय तक पारित न होना; ताकतवर लोगों के मुकदमों का टलते रहना सब आक्रोश पैदा करता है| लोग जन – लुभावने वादों पर अब अधिक मतदान नहीं करते| सभी को नागनाथ – साँपनाथ की राजनीति से मुक्ति चाहिए|

 

हाल के चुनावों से यह तो स्पष्ट है कि देश में अब कांग्रेस के विरुद्ध माहौल है| परन्तु भाजपा के लिए आसान राह नहीं है| उसके पास मोदी समर्थक वोट से अधिक कांग्रेस विरोधी वोट का बल है| सबसे बड़ी कठनाई यह है कि “भाई – भाई, मिलकर खाई, दूध मलाई” का भाव जनता में मौजूद है जिसे नारा बनना ही बाकि रह गया है|

 

क्या आप ये नारा बुलंद कर पाएगी?

 

“भाई – भाई, मिलकर खाई, दूध मलाई”

 

आम आदमी पार्टी संसदीय दल के लिए चुनौती

Arvind Kejriwal and friends

Arvind Kejriwal and friends (Photo credit: vm2827)

नवोदित आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनाव के रोचक परिणामों से उत्पन्न चुनौती का सामना कर पाने के लिए मेरी शुभकामनायें|

चुनाव परिणामों को देखने के बाद मेरी यह धारणा प्रबल हुई कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अहंकार का शिकार हुई|

साथ ही भाजपा सही समय के तुरंत बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के विरुद्ध उत्पन्न जन आक्रोश को समझने में सफल हुई| साथ ही भाजपा ने उचित समय पर न केवल चुनावी रणनीति में बदलाव किये वरन समय पूर्व ही चुनाव उपरांत की संभवनाओं पर भी मंथन किया|

भाजपा ने सही छवि के व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी बनाया| भाजपा ने अपने प्रमुख प्रतिद्वंदी के रूप में आआपा की पहचान की और उसकी छवि बिगाड़ने के सारे प्रयास किये अथवा उनमें भाग लिया| भाजपा के पास क्षेत्र वार समीकरणों, मतदान परिणामों और उनके दूरगामी प्रभावों का पूरा आंकलन था|

आप देख सकते है कि रामकृष्णपुरम से आआपा प्रत्याशी शाज़िया इल्मी को बेहद प्रभावी तरीके से चिह्नित किया गया| उन पर लगाये गए आरोप भले ही कहीं से भी आये हों, परन्तु भाजपा में उन्हें प्रभावी तरीके से प्रचारित किया| भाजपा ने इल्मी को आआपा के तथाकथित असल चहरे के रूप में पेश करने का प्रयास किया जिसे सोशल मीडिया पर बार बार शेयर किया गया|

इल्मी का उस क्षेत्र से चुना जाना संघ परिवार के लिए आत्महत्या करने जैसा होता क्योंकि उस क्षेत्र में विश्व हिन्दू परिषद् का मुख्यालय है और मुस्लिम आबादी का कोई बड़ा प्रभाव नहीं है| भाजपा हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से “पढ़ी लिखी मुस्लिम महिला” को जीतने देकर, देश भर के कट्टरपंथी हिन्दू समाज को नया सन्देश नहीं जाने दे सकती थी| हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से “पढ़ी लिखी मुस्लिम महिला” का जीतना कई नए सन्देश देता –

अ)    सुशासन के बढ़ा हुआ महत्त्व,

आ)  हिन्दू मुस्लिम खाई को भरना,

इ)      हिन्दू समाज में मुस्लिम समाज की सकारात्मक छवि

ई)      मुस्लिम महिला और समाज को विकास और खुली सोच का आदर्श

उ)     सांप्रदायिक राजनीति का अंत

मतदान के दिन उसके पोलिंग एजेंट पूरी तन्मयता से हर मतदाता को चिन्हित कर रहे थे और उसके मूड को भांपने का प्रयास कर रहे थे| उन्हें तीसरे पहर तक यह सही जानकारी थी कि किस पोलिंग बूथ पर किसको कितना मतदान हुआ है| भाजपा के बंधे हुए समर्थकों को शाम से ही बुला बुला कर मतदान कराया गया|

आप देख सकते हैं कि बहुत से चुनाव क्षेत्रों में अंतिम समय में हुए मतदान से ही भाजपा ने जीत हासिल की है| देर शाम के इस मतदान ने अन्य चुनावी रणनीतिकारों को सकते में डाल दिया था|

मतगणना के दिन जब यह तय हुआ कि समस्त परिश्रम के बाद भाजपा पूर्ण बहुमत के पास नहीं पहुँच रही है तो उन्होंने बहुत शीघ्र उन्हें अपनी आगे की रणनीति के पासे चलने प्रारंभ कर दिए हैं| मुझे भाजपा की प्रशंसा करने चाहिए कि उसने दिल्ली में दंभ का प्रदर्शन नहीं किया और मंझे हुए राजनीतिक दल की तरह अपने कदम उठाने का निर्णय किया है|

 इस समय भाजपा ने सबसे बड़ा दल होने के बाद भी सरकार बनाने की पहल करने से मन कर दिया है| हम इस समय बाजपेयी जी की तेरह दिन की सरकार से इसकी तुलना नहीं कर सकते| उस समय भाजपा अपनी सरकार को शहीद कर कर हिन्दू जनता को यह सन्देश दे रही थी कि अन्य सारे दल उसके विरुद्ध साजिश कर रहे हैं| आज अगर भाजपा सरकार बना कर सत्ता लोलुप होने की छवि नहीं बनाना चाहती| दूसरा सरकार बनाने के लिए होने वाली जोड़तोड़ उसे आआपा के मुकाबले में बेहद कमजोर नैतिक पायदान पर ले आएगी| अगर जल्द ही चुनाव होते हैं तो उसे अपने सारे राजनैतिक दाँव पेच चलाने का पूरा समय मिल जायेगा| यदि यह चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ होते हैं तो उस समय दिल्ली के स्थानीय मुद्दों और आआपा के सत्तर स्थानीय घोषणापत्रों पर राष्ट्रीय मुद्दे छाये रहेंगे| उस समय भाजपा दिल्ली में मोदी – केजरीवाल मुकाबले में मोदी की शक्ति को बढ़ा कर देखती है|

यह भी देखना है की भाजपा किस प्रकार सरकार बनाने की जिम्मेदारी से भागने का दोष संभालती है|

 आआपा के किये यह अभी नयी शुरुवात है और अभी उसका राजनैतिक अन्नप्राशन होना है| उसके लिए सौभाग्य की बात है कि वह दूसरा बड़ा दल है| अगर वह सरकार बनाती है तो सत्ता लोलुपता के स्तर पर उसमें और अन्य दलों में कोई अंतर नहीं रह जायेगा| सरकार बनाने के बाद उसके उसके ऊपर अपने घोषणापत्र लागू करने का दबाब होगा जिसे बिना पूर्ण बहुमत लागू करना कठिन है| लेकिन उसे यह भी नहीं दिखाना है कि वह विरोध की राजनीति में इतनी रम गयी है कि आज सत्ता से भी भाग रही है|

आआपा पर यह चुनौती है कि वह किस तरह भाजपा को सरकार बनाने के लिए प्रेरित करे| उस से भी बड़ी चुनौती यह है कि किस तरह से आआपा इस विधानसभा के भंग होने की स्तिथि में जनता को यह सन्देश देती है कि गलत प्रकार की राजनीति ने दिल्ली में दोबारा चुनावों की स्तिथि पैदा कर दी है|

 यदि आआपा किसी अन्य दल की सरकार को चलने देकर बेहद सकारात्मक विपक्ष की भूमिका अपना सकती है| आआपा भाजपा के घोषणापत्र से वह मुद्दे जनता को बता सकती है जिनसे उसकी सहमति है| खुले मंच से यह घोषणा की जा सकती है कि यदि भाजपा अपने घोषणा पत्र में से चिह्नित घोषणाओं पर पहले तीन महीने के भीतर अमल का भरोसा दे तो आआपा उसकी सरकार को अन्य मामलों पर मुद्दों के आधार पर समर्थन दे सकती है|

 

 

दो ऑटोरिक्शा चालक

अभी गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में अपना पर्चा प्रस्तुत करने के लिए जाना हुआ| जाते समय अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से विश्वविद्यालय तक और लौटते समय दिल्ली कैंट से लोदी रोड तक ऑटो रिक्शा की सवारी का लुफ्त उठाया और सामायिक विषयों पर चर्चा हुई| दोनों रिक्शा चालकों की समाज और देश के प्रति जागरूकता और उस पर चर्चा करने की उत्कंठा ने मुझे प्रभावित किया|

गुजरात:

मुझे नियत समय पर पहुंचना कठिन लग रहा था और रास्ता भी लम्बा था| बहुत थोड़े से मोलभाव के बाद, मैं अपनी दाढ़ी और पहनावे से मुस्लिम प्रतीत होने वाले चालक के साथ चल दिया| मैंने सामान्य शिष्टाचार के बाद सीधे ही प्रश्न दाग दिया. अगले चुनावों में वोट किसे दोगे| बिना किसी लाग लपेट के उत्तर था, मोदी| मैंने दोबारा पूछा, भाजपा या मोदी? मोदी सर| मैंने कहा, वो तो कसाई है, उसे वोट दोगे| चालक ने शीशे में मेरी शक्ल देखी, आप कहाँ से आये है? मैंने कहा दिल्ली से, अलीगढ़ का रहने वाला हूँ| उसने लम्बी सांस ली और शीशे में दोबारा देखा| मैंने उचित समझा कि बता दूँ कि हिन्दू हूँ|

“हिन्दुओं से डर नहीं लगता सर, सब इंसान हैं|” थोड़ी देर रुका, सर ये गुजरात है, “जिन हिन्दुओं ने बहुत सारे मुसलामानों की जान बचाई थी वो भी सबके सामने मोदी ही बोलते है| बोलना पड़ता है सर| वोट का पता नहीं, अगर दिया तो मोदी को नहीं देंगे और कांग्रेस या और कोई हैं ही नहीं तो देंगे किसे?” अब मेरे चुप रहने की बारी थी|

काफी देर हम लोग चुप रहे, फिर उसने शुरू किया, “सरकार बड़े लोगों की होती है और हम तो बस वोट देते हैं| अगर वोट भी न दें तो ये लोग तो हमें कभी याद न करें| इस देश में वोट बैंक और नोट बैंक दो ही कुछ पकड़ रखते हैं| हम कोशिश कर रहे हैं, वोट बैंक बने रहें| इसलिए वोट देंगे|”

Drive thru

Drive thru (Photo credit: Nataraj Metz)

दिल्ली:

दिल्ली कैंट स्टेशन पर उतरने ऑटो रिक्शा दलाल से मीटर किराये से ऊपर पचास रुपया तय हुआ| ऑटो चालक सिख था| उसने बताया कि ज्यादातर जगहों पर अवैध पार्किंग ठेके है और ये लोग पचास रुपया लेते है| पुलिस इन ठेके वालों से हफ्ता वसूलती है और ये बिना रोकटोक ऑटो खड़ा करने की जगह देते हैं| दिल्ली एअरपोर्ट पर ऑटो के लिए कोई वैध – अवैध पार्किंग नहीं है क्योंकि ऑटो रिक्शा देश की शान के खिलाफ हैं| ऑटो पर विज्ञापन से लेकर पुलिस भ्रष्टाचार तक लम्बी चर्चा हुई| उसने भाजपा और कांग्रेस को सगा भाई बताया| “हिस्सा तय है जी सारे देश में इनका ७० – ३० का|” “कॉमनवेल्थ की समिति में दोनों के लोग थे साहब|” “क्रिकेट का रंडीखाना तो दाउद चलाता है साहब और भाजपा – कांग्रेस के लोग उसमें नोट बटोरने जाते हैं|” उसके मन और जुबान की कडुवाहट बढती रही और मेरे लिए सुनना कठिन हो गया|

अंत में उसने कहा, “साहब हमें नहीं पता कि केजरीवाल कैसा करेगा, क्या करेगा और उसके पास मंत्री बनाने लायक अच्छे समझदार लोग हैं या नहीं; मगर हम उसे वोट देकर जरूर देखेंगे|”

मैं सोचता हूँ, अगर देश की आम जनता के मन में लोकतंत्र की भावना मजबूत हैं, यही अच्छी बात दिखती है| वरना तो लोग हथियार उठाने के लिए भी तैयार ही जाएँ| कहीं पढ़ा था न इन्ही दो चार साल में “शहरी नक्सलाईट”| 

मिटी न मन की खार – (कुण्डलिया)

 

एक शहीद पैदा किये,

एक दुश्मन दिए मार|

दंगम दंगम बहुत हुई,

मिटी न मन की खार|| दोहा १||

 

मिटी न मन की खार,

दर्पण भी दुश्मन भावे|

दर्प दंभ की पीर,

अहिंसा किसे सुहावे|| रोला||

 

दुनिया दीन सब राखे,

सब झगड़ा व्यापार|

मार काट बहुत बिताई,

अमन के दिन चार|| दोहा २||

 

उपरोक्त कुण्डलिया छंद की रचना के कुछ छिपे हुए उद्देश्य हैं| उन्हें जानने के लिए इसके छंद नियमावली पर एक निगाह डालनी होगी|

दोहा + रोला + दोहा = कुण्डलिया|

ये रचना प्रक्रिया रसोई घर में सेंडविच बनाने की प्रक्रिया से बिलकुल मिलती जुलती है|

यह रचना समर्पित है कश्मीर के लिए| कश्मीर जो आज कुण्डलिया बन गया है; भारत पाकिस्तान के बीच, भारत की सत्ता और विपक्ष के बीच, पकिस्तान के सत्ता विपक्ष के बीच, हिन्दू और मुसलमान के बीच, हमारी खून की प्यास के बीच| कुण्डलिया की एक और खासियत है, पहले दोहे का अंतिम चरण, रोले का पहला चरण होता है| यहाँ पर मैं इसे आज के सन्दर्भ में घिसे पिटे तर्क – कुतर्क के बार बार दोहराव के रूम में देखता हूँ| अगली विशेष बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है कुण्डलिया का पहला और अंतिम शब्द एक ही होता है| जैसे जीवन में बातचीत में ही झगडे शुरू होते है और घूम फिर कर बात चीत से ही समाप्त करने पड़ते हैं|

एक दूसरा कारण इस कुण्डलिया को लिखने का और भी रहा है| अफजल गुरु की फांसी| कई खबरें आतीं हैं, जिनसे लगता है कि उसे पूरी तरह न्याय नहीं मिला और देश की जनता के आक्रोश को शांत करने और असली दोषियों तक न पहुँच पाने के सत्ताधारियों की निराशा ने उसे येन केन प्रकारेण दोषी ठहरा दिया| साथ ही मैं किसी भी दशा में फांसी की सजा को न्याय के विरुद्ध मानता हूँ| फांसी दोषी को मार तो देती है पर न तो उसे पूरी सजा देती है, न पीड़ित को पूरा न्याय| युद्ध, छद्म युद्ध, गृह युद्ध, महा युद्ध आदि के मामलों में तो यह दुसरे पक्ष के लिए शहादत का उदाहरण तक बना देती है| यह कुण्डलिया इसी प्रसंग में लिखा गया है|

चुनाव २०१४ चालू है…

जब से देश की राजनीति पर गैरदलीय विपक्ष का पर्दापरण हुआ है, देश में २०१४ की बातें शुरू हो गई है| सरकार और विपक्ष प्रकारांतर से इस जादुई वर्ष को याद कर कर जनता के कुशासन सहने के लिए कह रही है या अपने को आश्वस्त कर रही है कि अभी दिल्ली आम जनता से बहुत दूर है| अन्ना हजारे का आंदोलन सत्ता और विपक्ष को अपने मन में साँपनाथ और नागनाथ मानने कि जन प्रवृत्ति का खुला द्योतक था| जनता को खुले आम अपने क्रोध को जाहिर करने का मौका मिला| शायद आंदोलनकारियों के नेतृत्व ने भी इस सफलता कि उम्मीद नहीं कि थी| एक बात स्पष्ट है कि आज उस आंदोलन का राजनितिक घटक राष्ट्रिय राजनीति में अपने को तथाकथित तीसरे मोर्चे के बराबर रखने में तो समर्थ रहा ही है,  भले ही अभी उन में अपरिपक्वता, अल्प-राजनितिक इच्छाशक्ति और सरकार बनाने लायक नेतृत्व समूह नहीं है|

साफ कहे तो कम से कम मीडिया – सामाजिक मीडिया में तो दो बड़े गठबंधनों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर यही लोग खड़े है| वास्तविक राजनीति में भले ही ये न खड़े हो पाए मगर तालाब के रुके पानी में हलचल तो है ही|

इसके बाद आज काँग्रेस और भाजपा के दो राजनितिक गठबंधन है जो कुछ हद तक प्रासंगिक रह जाते  है| दोनों दलों में नेता बहुत है, नेतृत्व नहीं है| भाजपा बाजपेयी और अडवाणी जी के बाद नेतृत्व विहीन है और उसके समर्थक जिस व्यक्ति को प्रधान मंत्री पद के लिए देख रहे है उसका राष्ट्रिय चरित्र बनना अभी बाकी है| सरकार बना पाने की स्तिथि में भी प्रान्तिक छवि वाला कमजोर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय छवि वाले नेताओं से बने मंत्रिमंडल को कैसे चला पायेगा? काँग्रेस का क्या कहे, उसके पास मन मोहन सिंह का कोई विकल्प नहीं है| जो मजबूत है वो राजपरिवार के लिए खतरा बन सकते है, कमजोर नेतृत्व नहीं कर सकते| माताजी की ऊँगली पकड़ करे देश नहीं चलता और राजकुमार अभी “छोटे” हैं|

वर्तमान संसद का कार्यकाल अच्छे बुरे कामों के लिए नहीं वरन भारतीय लोकतंत्र में व्याप्त कमियों को रेखांकित कने वाले जन सेलानियों, अपनी साख बचने की लड़ाई लड़ते मीडिया और संविधान में बनाए गए सुदृण तंत्र के लिए जाना जायेगा| न्याय तंत्र, चुनाव आयोग, महालेखापरीक्षक और प्रसिद्ध और गुमनाम जन सेलानियो का समय अब आ चुका है| यह अनावश्यक रूप से मजबूत समझी जा रही “तथाकथित विधायिका” को उसकी संवैधानिक सीमा में लाने का समय है| जो नींव अनजाने में ही, सूचना के अधिकार क़ानून के द्वारा राखी गयी अब परिपक्व हो रही है|

ऐसे समय में अगला चुनावी मुकाबले साख का संकट झेल रहे दो मूलतः कमजोर धडो में है| दुर्भाग्य से वो जानते है की सरकार उनमें से किसी एक को बनानी है और दोनों जनभावना को समझे या न समझे मगर चुनावी गणित और उसके शतरंज को बेहतर समझते हैं|

अन्ना आंदोलन से जन समर्थन खो चुके और महालेखा परीक्षक की कई रिपोर्टों से अपनी साख नष्ट करा चुके काँग्रेस के पास अब खोने के लिए कुछ भी नहीं है| आप उनके व्यवहार से बेशर्मी खुलकर देख सकते है| उनके सारे पाँसे कमजोर विपक्ष को देख कर खेले जा रहे हैं|

पिछले सप्ताहांत केंद्रीय मंत्री मंडल में हुए बदलावों के बाद सरकार एक बार पुनः अपनी साख को और गिरा पाने में कामयाब रही है| युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया गया है और जैसा कि मीडिया में चर्चा कराई गयी है कि इस समय सरकार में सब कुछ बिकाऊ है, खरीददार चाहिए| सरकार आर्थिक सुधारों के नाम पर कुछ प्रयोग करने का प्रयास अवश्य करने वाली है|

देश को सुधारों के आवश्कयता है| विपक्ष किसी भी प्रकार के आर्थिक सुधार का विरोध करने की स्तिथि में नहीं है| लोकसभा का गणित ऐसा है कि विपक्ष या तो सदन से भाग खड़ा हो या सरकार गिरने का खतरा मोल लेकर जनता के सामने बुद्धू बनकर खड़ा हो जाये| देश की विकास दर विश्व्यापी संकट के बाद भी ठीक है और पूंजीपति “आर्थिक सुधारों को खरीदने के लिए तैयार है”|

अगर चुनावों के पहले वर्ष में सरकार अपना आर्थिक सुधार कार्यक्रम संसद में जोरदार तरीके से रखने में कामयाब रही तो वह चुनावों में इसका सीधा लाभ ले पायेगी| कम से कम कोई एक वर्ग तो खुश होगा|

मैं इस समय आशा करता हूँ कि सरकार कंपनी विधेयक और इस प्रकार के अन्य कुछ कानून अवश्य पारित करवा पायेगी|

क्या मुझे ये भविष्य वाणी कर देनी चाहिए कि अगले चुनावों में काँग्रेस दोबारा सरकार बनाने जा रही है और देश पुनः सत्ता के कुशासन और आत्मघाती विपक्ष कि और बढ़ रहा है|

विधायिका को विधेयक न दे कोई ! जनता रोई !!

गुरुवार प्रातः इकोनोमिक्स टाइम्स में खबर दी थी कि सरकार में भारतीय जनता पार्टी के दबाब में आकर कंपनी विधेयक २०११ को एक बार फिर से स्थायी समिति को भेज दिया गया है| कंपनी विधेयक सदन और समिति के बीच कई वर्षों से धक्के खा रहा है| आर्थिक सुधारों का जो बीड़ा पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने उठाया था वह इस समय खोखली राजनितिक अवसरवादिता के कारण दम तोड़ रहा है|  पिछले कई वर्षों से हम देख रहे है कि हमारी सरकार नए कंपनी क़ानून की बातें करतीं रहतीं है परन्तु उन्हें मूर्त रूप देने में असमर्थ रहती है| जब हम सरकार की बात करते है तब हम किसी दलगत सरकार की बात नहीं कर रहे वरन पिछले बीस वर्षों में सत्ताधारी सभी दलों की बात करते है; भले ही वह कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, वामपंथी कोई भी हों| अफ़सोस की बात है कि संसद में बैठे लोग संसद के प्रमुख कार्य, विधि-निर्माण और कार्यपालिका नियंत्रण के स्थान पर शोरगुल, हल्लाबोल, कूदफांद आदि कार्यों में व्यस्त हैं| दुखद बात है कि हमारे राजनीतिज्ञ संसद को राजनितिक उठा पटक का अखाड़ा समझ रहे हैं और संसद के पवित्र गलियारा  सड़क की गन्दी राजनीति की चौपाल भर बन कर रहा गया है|

 

 

पिछले एक वर्ष से हम देख रहे है कि देश की जनता देश हित के एक क़ानून को बनबाने के लिए सड़क पर उतर आई है| आखिर क्यों?? पहले हमें कार्यपालिका के गलत आचरण, दु-शासन, क़ानून सम्मत अधिकारों के लिए ही सड़क पर आती थी और अधिकतर आंदोलन सत्ता की लड़ाई ही थे| परन्तु, हमारा दुर्भाग्य है कि जनतांत्रिक देश की जनता आज अपने को जनतंत्र और उसके मुख्य स्तंभ संसद और विधान सभाओं से कटा हुआ पाती है| कार्यपालिका का भ्रष्टाचार आज विधायिका का अभिन्न अंग बन गया है और खुले आम जनता कह रही है कि अब भ्रष्टाचार की लूट में भागीदार होने के लिए सत्ता का गलियारा जरूरी नहीं| सांसदों के संसद में व्यवहार को आज लूट में हिस्सेदारी की रस्साकशी के रूप ले देखा जा रहा है| यदि यह सब सत्य है तो देश और जनता दोनों का दुर्भाग्य है| परन्तु लगता है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण परन्तु सत्य है; देश में विधायिकाएं विधि-कार्य के अतिरिक्त सभी कुछ कर रही हैं| कई महत्वपूर्ण विधेयक संसद में भूखी गरीब बाल विधवा की तरह मुँह लटकाए खड़े है और सरकार से लेकर उप-सरकार (विपक्ष बोलना गलत होगा) तक कोई उनकी सुध-बुध नहीं ले रहा है|

लोकनायक जय प्रकाश नारायण, नवनिर्माण आंदोलन, गुजरात, १९७४

क्या कारण हैं कि देश की विधायिका आज देश की कानूनी आवश्यकता को समझ में नाकाम सिद्ध हों रही है? संस्थान दर संस्थान, भ्रष्टाचार की मार से नष्ट हों रहे है, तकनीकि परिवर्तन जीवन में नए विकास लाकर नए संवर्धित कानूनों की मांग खड़ी कर रहे हैं, समय नयी चुनौती पैदा कर रहा है| परन्तु; हाँ, परन्तु; विधायिका खोखली राजनीति के घिनोने नग्न नृत्य का प्रतिपादन, निर्देशन और संपादन में अतिव्यस्त है| अब यह दूरदर्शिता की कमी मात्र रह गयी है या इच्छा-शक्ति का नितांत आभाव है| इस समय जनतांत्रिक विचारधारा के बड़े बड़े स्तंभ यह विचार करने पर मजबूर है कि क्या वह संसद और संसदीय प्रणाली में आस्था रखते है? हमारी आस्था संसद में भले ही बनी रही हों परन्तु निश्चित रूप से हमारे सांसदों में तो नहीं बची रह गयी है|

कंपनी विधेयक पिछले कई वर्षों से उठ गिर रहा है| पेंशन विधेयक अभी सोच विचार में डूबा है| भ्रष्टाचार उन्मूल्यन पर कोई उचित विचार नहीं है| गलत आचारण को उजागर करने वाले लोगो को सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हों रही है| आम नागरिक रिश्वत देने पर मजबूर है और शिकायत करने पर शोषित और दण्डित हों रहा है| न्यायपालिका पर अत्याधिक दबाब है और आवश्यक कानूनी व्यवस्था नहीं बन पा रही है| दूसरी ओर यही सांसद दमनकारी क़ानून बिना किसे हील-हुज्जत बहस आदि के पारित कर देते हैं|

सड़क पर जनता, मुंबई, २१ अगस्त २०११ (The Hindu)

क्या हमारा देश सदन में की गयी नारेबाजी, कुछ-एक स्थगन प्रस्ताव, विधायिक कार्यों में रोजमर्रा की बाधा आदि के सहारे ही चलेगा?? क्या हम चुनाव के दौरान दिए गए कुछ गलत वोट के कारण चुने गए ऐसे सांसद पांच वर्ष तक झेलने के लिए अभिशप्त है?? क्या हम अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को यह नहीं कह सकते कि वह फालतू के हल्ले-गुल्ले में न पड़े और कुछ काम-धाम कर ले? क्या हम अपने प्रतिनिधि से नहीं कह सकते कि वह आवश्यक क़ानून बनाएँ?

क्या संसदीय व्यवस्था निर्वाचित तानाशाही है? क्या संसदीय जनतंत्र दम तोड़ रहा है?? क्या प्रतिनिधिक जन तंत्र को भागीदारी जनतंत्र से बदलने पर यह संसद हमें मजबूर करने जा रही है???

 

 

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|

 

क्या कहा जाए? जो कहना है ज़रा जल्दी कहना है, जल्दी जल्दी कहना है| बाद में क्या बोलेंगे जब होगा बंद मुँह, कटी जुबान|

पहले *** जनसंघी लोग लठ्ठ लेकर खड़े थे, उनकी सी न बोलो तो बोलने नहीं देते थे और खुद बहुत खूबी के साथ खूब बोलते थे| अब ये *** कांग्रेसी भी आ गए है मैदान में| नहीं नहीं दिशा-मैदान के लिए मैदान में नहीं आये मगर कर वही सब रहे है| *** टोपी वाले भी आधे भारत में रायफल लिए खड़े है| माफ कीजियेगा! इससे ज्यादा हम बोलेंगे नहीं वरना वो हमारे लिए बोल देंगे|

इन सब ** ** लोंगो की क्या कहे; पहले ये अपने निचले ** से ही *** फैलाते थे, मगर अब तो इनका मुखारविंद भी ** फैलाता है| कुछ *** लोंगो को महारत ही हासिल है उनके नाम *** **** **** **** *** अदि है| इन *** को अपने ** में कन्नौज की इत्र की गंध आती है और हमारे गुलाब जल में इन्हें अपने ** से भी अधिक बदबू आती है|

ये *** लोग खुद तो बहुत लिखते-बोलते है और इनता लिखते-बोलते है कि बस रामचरित वाले गोसाईं जी क्या और टीवी वाले गोसाईं जी भी क्या? मगर कुल मिला कर इन *** को कोई भी काम कि बात नहीं बोलनी| बाबासाहेब आंबेडकर इन ** को बोलने चालने के लिए संसद की पूरा आलिशान इमारत दे गए है मगर ये ** वहाँ पर अपनी ***** चिल्ल-पों करते है और कोई बात नहीं करते| वहाँ पर ये बस एक दूसरे की तरफ ऊँगली करते है और एक दूसरे * *** करते है| ये दोनों तीनों *** का अप्राकृतिक *** है जो खुले आम मेल मिलाप के साथ चल रहा है| अगर संसद चलेगी तो कुछ तो बोला जाएगा, बोलेंगे तो कुछ तो सच उगलेगा, सच उगलेगा तो बबाल मच जायेगा और इनके ** ** हो जायेगी| देश इनकी * *** एक कर देगा|

पहले तो जनता के हाथ बंधे थे और वो बूढी हो चली बाल विधवा की तरह सब कुछ सह रही थी| इन् ****** ने आजादी से लेकर आज तक जनता के साथ इनता ****** किया कि भारतीय दंड संहिता कि धारा 376  में इनके दी जा सकने वाली सजा का प्रावधान ही नहीं मिल सका| आज जब जनता कुछ बोलने की स्तिथि में आई तो ये बिलबिला गए है| पहले एक दो अखबारों में जनता की चिठ्ठी पत्री छप जाती थी और अगले दिन रद्दी हो जाती थी| अब कुछ लोग पढ़ लिख गए है और कुछ नए हथियार आ गए है| ट्विट्टर, फ़ेसबुक, ब्लॉग, एस एम् एस, पता नहीं क्या क्या| लोग हर तरह से अपना गुस्सा उतार है| अब लोगों को पता है कि हमारी बन्दूक इनकी तोप से कमजोर है, और लोग इन ** का ** ** नहीं ** सकते|

सीमान्त प्रदेश में कुछ बोला आये तो आतंकवादी; काले क़ानून उनके * *** करने के लिए|
आदि वासी कुछ बोलते है तो माओवादी; मार दो ** को|
जब शहरी युवा कुछ बोलें तो जेल दो *** और उनपर विदेशी हाथो में खेलने का इल्जाम लगा दो|
ये देश को लूट लें तो देश भक्त; आवाज उठाने वाले युवा पाकिस्तानी ***|
अन्ना को जेल और राजा को महल – दुमहले|

अब कलम की ताकत का नया पर्याय है इन्टरनेट| देखन में छोटो लगे, घाव करे गंभीर| हालात ये है कि घाव भी सीधे इन *** के **** पर हो रहा है और इनकी *** ** है| अब बिलबिलाई जनता ने नए साधनों का इस्तेमाल कर कर हल्ला मचाना शुरू किया तो इनको वहाँ पर सारी गंद दिखाई दे गयी| असलियत में इनकी **** गई है|मानते है कि कई बार लोग गुस्सा में इन *** की थोड़ा ज्यादा ही *** देते है मगर गुस्सा में किसको होश| मैं मानता हूँ कि लोंगो को गुस्सा शांत रखना चिहिये, मगर क्या करें पिछले पचास सालो में इन ** ने कुछ ढंग का पढ़ने लिखने ही नहीं दिया तो तमीज कहा से आती|

पहले इन *** के पाकिस्तानी भैया लोगो ने एक लंबी फेहरिश्त निकाल दी काफी शब्दों की| अगर मोबाइल पर उनमे से कुछ भी लिखा तो बस गए आप काम से| आपके चरित्र का पूरा चित्रण कर दिया जायेगा| हिंदी – उर्दू वाले *** *** * आप जानकारी बढ़ने की लिए पढ़े और पढाए http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-URDU-tsk-tsk-PTA-why-oh-why.-courtesy-of-shobz.pdf और अंग्रेज के *** पढ़े: http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-ENGLISH-made-me-LOL-courtesy-of-shobz.pdf | अगर आपको न अर्थ समझ आये http://www.urbandictionary.com/ पर सबके मायने दिए है, समझे और गलती न दुहरायें| हमें तो लगता है कि इन शब्दों पर सभी दक्षिण एशियाई सरकार लोग सहमत है इसलिए किसी भी जन मोर्चा पर इन शब्दों का प्रयोग कतई न करें|

हाँ! अब हमारे *** साहब को लगा कुछ तो बड़ा किया जाय, आखिर उनका *** किसी **** से छोटा थोड़े ही है| अब देखिये, ये विलायत के पढ़े लिखे *** लोग, अपने दफ्तर में विलायती बाबू लोग को बुला लिया और घर कि औरत का फोटो दिखा कर स्यापा कर डाला, बोला मेरे लोग आपकी वेबसाइट और फोरम पर हमारी *** की *** *** कर रहे है और उसका ***, उनका ***, उसकी *** कर रहे है| देखो मेरी तो *** कर कर रख दी है| इन *** सड़क छाप **** की जीभ काट दो, इनकी *** कर दो| इन ***** की पहचान मिटा दो अपने प्लेटफोर्म, फोरम, वेबसाइट पर से|

पहले ही आम जनता परेशान है, अपनी परशानी और भड़ास कैसे निकाले| बन्दूक उठाए या इस दुनिया से अपना संदूक उठाये| अब कलम पर भी जनता का जोर नहीं रहा| अगर कोई गलत बात हो रही है तो उस गलत बात करने वाले को पकड़ो न  सरकार, सबकी ***** क्यों करते हो; ****| अगर आपकी आदरणीय ***** की मानहानि होती है तो अदालत का दरवाजा देखो न, मेरे पीछे ******* कर क्यों पड़े हो| मानते है कि मुक़दमे में “मान हानि” से पहले “मान” को साबित करना पड़ेगा, तो करो न| अब आप विलायत में अपनी ****** *** क़ानून की उपाधि हासिल की है (अगर खरीदी हो तो माफ करें, मुझे हो सकता है की सही जानकारी न हो), आप कोई ***** थोड़े है|

वैसे भी आप क़ानून के *** है, जो चाहे वो क़ानून पैदा कर दें| आप अपने सुचना तकनीकी क़ानून को देख लीजिए| नियम उपनियम बनाए है, उन्हें देख लीजिए| मगर साहब-ए- आलम! आप इस मुल्क के सारे फोन टेप करते है, तो क्या आपको आतंकवादी, तस्कर और अपने और किसी भाई बंधू की कोई खास खबर मिल पाई? आप अपनी सरकार ठीक से चला पा रहे है, जो इस इंटरनेट को ठीक से चला लेंगे? क्या आप इस देश में रोज रोज जहर खा कर मर रहे किसान की कोई सुध बुध ले पा रहे है, जो इस देश के सभी इन्टरनेट उपयोग की निगरानी कर पायेंगे? आपकी सीमा को पार कर आतंकवादी इसे आ रहे है जैसे गली का कोई खुला सांड, क्या आप उन्हें रोक पा रहे है?

तो भैया! अभी तो हाथ जोड़ कर समझा रहे है कि ढंग से देश चला तो, फसबूक, ट्विट्टर को पढकर अपने काम के बारे में हो रहे असंतोष को समझो और उसे सुधारो| मैया की आरती से वोट नहीं मिलेगा, न ही भैया की पाँय लागी करने से|

भगवान की लाठी और जनता के वोट में आवाज नहीं होती मगर चोट बहुत लगती है| अपने सीधे और उलटे भाई लोग को भी बता देना|

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|

 

 

भारतीय लोकतंत्र में परिवर्तन का आसार

 

राष्ट्र एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है| इस समय हम प्रतिनिधिक लोकतंत्र में कमियों को इंगित करने लगे है और अधिक सीढ़ी भागीदारी की बात करने लगे हैं| एक साथ कई धाराएं बह रहीं हैं| एक तो हमारा सामंतवादी दृष्टिकोण है, जो खून में बार बार जोर मार रहा है| सामंतवाद वर्षों तक चलने के बाद इसलिए नकार देना पड़ा क्योकि सामंतो ने अपने को प्रजा का न्यासी न मानकर स्वामी मानना प्रारंभ कर दिया| सामंतवादी व्यवस्था में एक साथ व्यवस्थागत एवं व्यक्तिगत कमियां थीं| दूसरी ओर हमारी निर्वाचित लोकतान्त्रिक संस्थान हैं, जहाँ एक साथ दलगत राजनीति और विकास की बातचीत हो रही है. हमारे पास संसद से ले कर ग्राम पंचायत तक त्रिस्तरीय व्यवस्था है जो अपने अनेको लाभकारी गुणों के साथ कुछेक व्यवस्थागत कमियों का शिकार है| भारत जैसे बड़े देश में इस तरह कि पूर्णतः स्वीकार्य रहीं है, परन्तु आज उन पर व्यक्तिगत कमियां हावी हो गई है| निजी स्वार्थ, सामंतवादी दृष्टिकोण, भाई – भतीजावाद, निरंकुशता, भ्रष्टाचार, काला – धन, व्यक्तिवादी राजनीति आदि इसकी प्रमुख कमियां है जो इस प्रतिनिधिक लोकतंत्र को अस्वीकार्य बना रहीं हैं|

साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद, आतंकवाद और माओवाद ने देश को कितनी भी हानि पहुंचाई हो, पर हमारी प्रतिनिधिक लोकतंत्र व्यवस्था को सर्वाधिक हानि व्यक्तिवाद और भ्रष्टाचार ने ही पहुंचाई है| प्रतिनिधियों ने जनता की आवाज उठाना बंद कर दिया और वहाँ पर, व्यक्तियों, व्यक्तिगत हितों, निजी संस्थानों, पेशेवर हितसाधाकों, और उनके चापलूसों की ही आवाज सुनाई देने लगी थी| यही कारण है कि आज लोग भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध अपनी बात सीधे कहने के लिए सड़क पर उतर आये है| ऐसा नहीं है, कि जनता लोकतंत्र में भरोसा नहीं करती, वरन वह आज के प्रतिनिधियों पर विश्वास नहीं कर पा रही और सीधे अपनी बात कहना और मनवाना चाहती है| इसलिए ही अचानक ही भागीदारी लोकतंत्र की बात हो रही है, जनमत संग्रह की बात हो रही है| भारत जैसे देश के लिए जनमत संग्रह बेहद कठिन मार्ग है, परन्तु हर साल दो साल बार होने वाले चुनावों और अकर्मण्य प्रतिनिधियों के चलते यही रास्ता इस दिखलाई पड़ रहा है| जो देश हर पांच वर्ष में तीन से अधिक चुनाव करा सकता है, वह दो जनमत संग्रह भी करा सकता है|

अभी हमें विचार करना होगा कि हम किस मार्ग पर जाना कहते है:

१.      क्या प्रतिनिधिक लोकतंत्र में सुधार किये जा सकते है?

२.      क्या हमें भागीदारी लोकतंत्र चाहिए?

३.      क्या हम हर पांच वर्ष में तीन चुनाव और लगभग दो जनमत संग्रह के लिए तैयार है?