माँ!!


क्या चित्र आता है आपके मन में? माँ, जिसके मुखमंडल पर ममता गंगाजल की तरह बह रही हो? क्या मुखमंडल पर प्रगट होती ममता ही मातृत्व का प्रतीक है? आपका प्रश्न यही होगा कि बिना ममत्व के कैसी माँ? मैं पूर्णतः सहमत हूँ| परन्तु माँ ममता होने की प्रथम आवश्यकता नहीं है, यह एक लक्षण है माँ हो जाने का| यह कहना भी उचित नहीं है कि जन्म देने के उपरांत ममता का प्रादुर्भाव होता है, लक्षण के रूप में ममता अत्यल्प बालिकाओं में भी प्रत्यक्ष होती है| 

प्रकृति ममता की अवधारणा के आधार पर मातृत्व की पुष्टि करने से सर्वदा इंकार करती हैं| स्वभावतः कोई भी स्त्री यशोदा होने को देवकी हो जाने के मुक़ाबले कम पसंद करती हैं| यही कारण है कि हजारों अनाथ बच्चों के इस संसार में उर्वरता चिकित्सा बहुत बड़ा व्यवसाय है|
प्रकृति में माँ होने की प्रथम और प्राकृतिक अवधारणा गर्भधारण ही है| प्रकृति में प्रसव का होना न होना, सामाजिक और चिकित्सकीय आधार पर चुनौती पा रहा है| संभव है कि गर्भधारण के लिए अपने गर्भाशय के प्रयोग को भी पूर्ण चुनौती दे दी जाये| परन्तु यह भी स्पष्ट है माँ होने के लिए गर्भधारण और प्रसव के विकल्प तो संभव हैं परन्तु विकल्प उन्हें अप्रासंगिक नहीं बनाते| 

माँ होने के लिए गर्भधारण और प्रसव को सर्व-स्वीकृति अवश्य है, परंतु है गर्भधारण की प्रक्रिया को मातृत्व के समान आदर से नहीं देखा जाता| उसे कोई गर्भधारण संस्कार नहीं कहता – इसे यौन क्रिया ही कहा जाता है| परंतु यह सिक्के के दो पहलू की तरह है| आपके किस ओर खड़े होकर सिक्के को देखना चाहते हैं| आप के मतिभ्रम से जननांग और यौनांग की वास्तविकता पर अंतर नहीं पड़ता है, लेकिन यह शब्द प्रयोग मात्र यह दिखा सकते हैं कि आप सिक्के के किस तरफ होना पसंद करते हैं|

मेरे हिन्दी शिक्षक ने एक किस्सा सुनाया कि एक नवधनाड्य ने प्याऊ पर बैठी स्त्री से ज़ोर से कहा अरी औरत पानी पिला दे| उस स्त्री ने अनसुना कर दिया और किसी विचार में मग्न रही| थोड़ी ही देर में कोई प्राध्यापक उधर और बोले माताजी यदि समय हो तो क्या आप थोड़ा पानी पिला देंगी| स्त्री ने तुरंत मटके से पानी निकाल कर पानी पिलाना शुरू कर दिया| माँ होना स्त्री होने से अलग नहीं हो सकता, परंतु आप का आचरण आपकी दृष्टि का द्योतक होता है| यह आचरण बड़े बड़े प्रतीकों से अधिक महत्वपूर्ण है| (उस समय पूंजीवाद का ज़ोर न था और पुराने पैसे वाले नए गुर्गों को खास इज्जत नहीं देते थे)

माँ के व्यापक रूप से आराध्य एक चित्र को देख रहा था जिसमें स्तन व चूषक दिखाई देते थे| तो प्रकार की टिप्पणियाँ दर्ज थीं, पहली जय माँ,  जय माता जी वाली और दूसरी, हमें माँ को इस तरह नहीं देखना चाहिए कम से पुष्पमाल से तो स्तन ढक दिये जाने चाहिए थे| यदि आप पवित्र मन बालक हैं तो यही अनावृत स्तन और चूषक आपको दुग्ध प्रदान करेंगे, आपको मूल जीवनी शक्ति प्रदान करेंगे| मुख्य बात भावना ही है| यह दर्शक का दृष्टि दोष है, जिसे आप मूर्तिकार, चित्रकार और शृंगार पर मढ़ते हैं| क्या माँ के अनावृत्त दर्शन उन्हें माँ नहीं रहने देंगे| ऐसा नहीं है| कहा जाता है कि प्रस्तुत चित्र आपकी भावना को बनाएगा या बिगड़ेगा, परंतु यदि आपकी भावना इतनी कमजोर है तो आप ध्यान क्या लगाएंगे| मेरा मानना है कि यौन भाव और मातृ भाव से बने चित्रों को उनके मूल भाव के अनुसार ही देखा जा सकता है| यदि ऐसा नहीं होता तो यह दर्शक की प्राकृतिक भावना की विकृति है| दोनों भाव आवश्यक और प्राकृतिक हैं| प्रश्न किसी एक भाव के गलत होने का नहीं है अपितु उस भाव के उचित समय पर उत्पन्न होने का है| 
* चूषक शब्द से याद आया की संस्कृत के एक गुरु जी चषकः को चषकः कहने से कतराते थे| क्यों? उसे न पूछिए|

अर्धमातेश्वर


हम बच्चे छोटे तो नहीं थे मगर नाज नखरों से पले थे, इसलिए हम उतने बड़े भी नहीं हुए थे| पढाई लिखाई खेल कूद और घुमने फिरने के अलावा हमें लगभग कुछ नहीं आता था| चौके चूल्हे के बारे में तो ज्यादा पूछिए भी मत| मुझे बाजार हाट. भारी कपड़े धोना, झाड़ू पौंछे हल्के फुल्के नाश्ते  बनाने का कुछ अनुभव था| बड़ी बहन यूं तो सिलाई कढ़ाई गाने बजाने में काफी अच्छी थी मगर खाना ठीक ठाक ही बना सकती थी| जब माँ बीमार हुई तो अचानक तीनों बच्चों को घर के काम काज बाँट दिए गए| बिस्तर पर से माँ सबको बताती सिखातीं रहतीं, हम करते रहते| मगर हमने कभी इन कामों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया और उतना ठीक से नहीं सीखा|

माँ की मृत्यु और उसके बाद बड़ी बहन की शादी के बाद समस्याएं बढ़ गई| अब घर में मेरे पिता, मैं और मेरी छोटी बहन थे और हम तीनों को खाना बनाना तो आता था मगर उस खाने को खाना कहा जाना खासकर तब बहुत मुश्किल होता था जब हम दोनों बच्चों में से कोई खाना बनाता था| मेरे पिता ने अपना लगभग सारा बचपन बिना माँ के और ज्यादातर पिता से दूर ढाबों और होटलों पर खाना खा कर ही काटा था और वह दोबारा “सड़क पर खाने के लिए” नहीं भटकना चाहते थे|

खाना बनाना सीखना बहुत जरूरी था| तो अब पाकशास्त्र की कुछ पुस्तकों और  वेवसाइटों (सन २००३ में उन दिनों वेबसाइट ज्यादा नहीं थी और विडियो तो शायद नहीं थे) और पिताजी के अंदाजे के हिसाब से खाना बनाने का पूरा सत्र घर में चलने लगा| एक नहीं रेसिपी हफ्ते में तीन बार बनती, पहले पापा और बाद में हम दोनों एक ही विधि पर खाना बनाते| हम तीनों थोड़े बहुत प्रयोग करते रहते| हमने देशी विदेशी बहुत सारे शाकाहारी व्यंजन बनाने सीखे और उनका सत्विकीकरण भी किया| सत्विकीकरण मतलब बेहद कम मसाला, प्याज लहसुन नदारद जैसे भिन्डी दो प्याज़ा के स्थान पर असफल रही भिन्डी दो टमाटर| मेरे पिता आज उत्तर भारतीय खाने के अलावा भी बहुत कुछ बना लेते है|

ऐसा नहीं है कि मेरे पिता केवल खाना बनाना और सिखाना जानते हैं| बाकी घरों में जितने भी काम एक माँ करती है हमारे घर में मेरे पिता करते हैं|

टिप्पणी: यह पोस्ट इंडीब्लॉगर द्वारा गोदरेज एक्सपर्ट के लिए किये गए आयोजन के लिए लिखी गयी है|

भोली भाली माँ


हर माँ की तरह, मेरी माँ को खाना बनाने का बहुत शौक था| वो साधारण दाल रोटी सब्जी को भी ऐसे बनाती थीं, जैसे कोई अनुष्ठान कर रही हों| नहा धोकर ही रसोई में जाना, खाना बनाने में काम आने वाली हर चीज को किसी पवित्र पूजा सामिग्री की तरह आदर देना, किसी भी प्रकार का सकरा या झूठा रसोई में न आने देना, और कम से कम सब्जी छौंकते और दाल या रायते में तड़का लगाते समय वह कुछ नहीं बोलती थीं| शाकाहारी होकर भी, किसी भी खाद्य सामिग्री के लिए आदर का यह हाल था कि बाज़ार में बिकते मांस मछली को देखकर उन्हें अच्छा न लगने के बावजूद मजाल क्या कि उनके चेहरे पर कोई शिकन भी आ जाये| माँ हमेशा कहतीं किसी का खाना देखकर मन में मैल नहीं लाना चाहिए| एक बार हमारी छत पर बिल्ली कहीं से चूहा मार कर ले आई और खा रही थी| घिन के कारण मैंने बिल्ली को चप्पल फैंक कर मार दी| किसी के खाने के अपमान की सजा के तौर पर मुझे उस बिल्ली को दूध पिला कर माफ़ी मांगने की सजा मिली|

माँ खाना खाते समय भी नहीं बोलती थीं| उनके लिए शांत चित्त और पवित्र भाव से भोजन करना और करने देना सबसे बड़ी पूजा थी| जब भी कोई मेहमान आते तो माँ उन्हें पहले खिलाती और साथ बैठकर खाने के प्रस्ताव को प्रायः शालीनता से मना कर देतीं थीं|

हम तीनों बच्चों के संगी साथी हमारे घर खाना खाने की ईच्छा से आते रहते थे| मगर जब छोटी बहन का अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला हुआ तब होस्टल में रहने वाले उसके सहपाठियों पर माँ को बहुत लाड़ – दुलार आता था| उन दिनों हमारे घर हर हफ़्ते “माँ के हाथ का घर का खाना” नामक दावतें हुआ करतीं थीं| मगर इसमें उन्हें कुछ दिक्कतें भी पेश आतीं थीं| माँ हमेशा शुद्ध शाकाहारी शास्त्रीय भोजन बनाया करतीं थीं, मगर मेहमान छात्रों में बिहार से लेकर मणिपुर तक से छात्र मौजूद थे| बहुतों को खाने से ज्यादा माँ के हाथ के खाने के भाव के कारण तृप्ति मिलती थी|

भारत की सांस्कृतिक विविधता के ऐसे विरले दुष्कर संगम के समय में माँ की बतकही बहुत काम आती थी| माँ अपने सामान्य ज्ञान, सामान्य विवेक और असामान्य परिकल्पना से बातों का एक स्वप्न बुनतीं थीं और प्रायः मेहमान उस स्वप्न में खुद को अपनी माँ की गोद में बैठा पाता था| इस क्रम में माँ हिंदी अंगेजी उर्दू संस्कृत और ब्रजभाषा में एक तिलिस्म रचतीं और मेहमान को अपनी माँ की कमी या तो बहुत महसूस होती या कुछ देर के लिए माँ को भूल जाता|

उस दिन एक मणिपुरी छात्रा घर पर आई| माँ को मणिपुरी संस्कृति का बहुत ज्ञान नहीं था और मेहमान का हिंदीपट्टी ज्ञान बॉलीवुड से अधिक नहीं था| माँ के लाड़ दुलार और मेहमानवाजी के चलते उसे खाना बहुत पसंद आया| मगर बार बार उत्पन्न होने वाली संवादहीनता के बीच माँ को ग़लतफ़हमी हो गयी की लड़की हिंदी नहीं समझती| ऐसे में उन दोनों ने सफ़लतापूर्वक संवादहीन संवाद कायम कर लिया| जैसे ही हम सब लोग खाने से निवृत्त हुए; माँ की प्रसन्नता चरम पर जा पहुँची| वो चहक कर मुझ से बोली, मेहमान के साथ अच्छा सम्बन्ध बन गया है और मैंने मुझे इतना अपना बना लिया है कि वो अब अलीगढ़ में अपने आप को अकेला नहीं समझेगी और जब भी उसे अपनी माँ की याद  आयेगी तो वो मेरे पास आ पायेगी|

अचानक माँ की वो मणिपुरी मेहमान आँखों में आँसू लेकर हंस पड़ी| उसने हिंदी में जबाब दिया, “हाँ माँ!! आप मेरी माँ की तरह अच्छी हो| मगर भोलेपन में तो आप बहुत ज्यादा एक्सपर्ट हो|”

टिप्पणी: यह पोस्ट इंडीब्लॉगर द्वारा गोदरेज एक्सपर्ट के लिए किये गए आयोजन के लिए लिखी गयी है|