शरणार्थी और भारत


भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|

आहत भावनाओं का देश


भावना प्रधान देश है हमारा| जान जाए पर भावना न जाए| भावनायें बचाते बचाते हमारी जिन्दगी गुजर जाती है| सदियों से हम भावनाएं बचा रहे है| दुनिया के आधे देश ज्ञान विज्ञान में तरक्की कर कर आगे निकल गए| हम अपनी “विश्व-गुरु रहे थे पुरखे” – गान गाने और उसकी भावना बचाने में लगे हैं| हमारी भावनाएं – कोई भी आहत कर देता है| किस किस की बात से जल्दी आहत होना है, किस किस तरह की बात से जल्दी आहत होना है, यह भी हमारी भावना पर निर्भर करता है| हुसैन के चित्रों से जो भावना आहत हुईं[1]  वो सिन्धु घाटी की मूर्ति को देवी पार्वती बताने पर ही प्रसन्न हुई| [2]

बाबर-अकबर – ओरंगजेब का का नाम लेने से आजकल हिन्दुओं की भावनाएं आहत हो जातीं हैं, तो सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन के नाम से मुसलमानों की| देश में किसी भी किताब, फिल्म, कलाकृति, चुटकुले, यहाँ तक कि भजन से भी भावनाएं आहत हो जातीं हैं| किसी और से तो छोड़ दीजिये, एक बार इस देश की भावनाएं गोस्वामी तुलसीदास जी ने आहत कर दीं थीं|

हुआ यूँ कि बेचारे गोस्वामी अवधी और व्रज में रामकथा लिखने लगे| काशी पण्डित लगे घबराने| आहट भावना से कश्मीर से कन्याकुमारी- कच्छ से कामरूप लगे कांपने| एक तो विधर्मी का राज ऊपर से अधर्मी भाषा में रामकथा| संस्कृतनिष्ट भावनाएं बुरी तरह आहत| गंवार-देहाती सब राम-राम छोड़ राम कथा करने लगेंगे| लगा पुस्तक पर प्रतिबन्ध| लगा इहलोक से निकले गोस्वामी, परलोक से भी निकले| गोस्वामी त्राहिमाम त्राहिमाम भागे, हनुमान जी ने तीन लोक नापे| हुआ चमत्कार और ईश्वर ने तुलसीदास की रामचरितमानस के पक्ष में निर्णय दे दिया|

तुलसीदास से पहले मीराबाई में शूरवीर मेवाड़ की भावना आहत की थीं| खुद ईश्वर को आकर उनके प्राण-प्रण बचाने पड़े| मगर हम न सुधरे| हमारी भावना न सुधरीं| भावनाएं आहत होना न रुका|

ईश्वर भी आहत हो गया, गवाही देते देते|

 

[1] https://en.wikipedia.org/wiki/M._F._Husain

[2] http://www.financialexpress.com/india-news/hindu-roots-goddess-parvati-report-hints-indus-valley-civilisation-used-to-worship-lord-shiva-in-2500-bc/486475/

काले धन के सफ़ेदपोश स्रोत


सुनकर हँसी आती है, मगर काले धन के अधिकतर स्रोत सफ़ेदपोश हैं और समाज में अपनी इज्जत रखते हैं| काले धन की सरकारी और लोकप्रिय परिभाषा में जमीन आसमान का अंतर है| जनसामान्य में काले धन का अर्थ है भ्रष्टाचार यानि रिश्वत का पैसा| जनसामान्य की अवधारणा में सरकारी घोटाले का अर्थ भी सिर्फ रिश्वत होता है| काले धन की सरकारी परिभाषा बहुत व्यापक है इसमें वह सभी धन आता है जिसका हिसाब किताब सरकार के पास न हो| भले ही सरकारें मानें या नहीं; ऐसा धन जिसका हिसाब किताब सरकार के बस में न हो, वो भी काला धन मान लिया जाता है|

इस पोस्ट में इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे|

काला धन

सरकार जिस धन को अघोषित धन कहती है उसका सामान्य अनुवाद काला धन किया जाता है|

काला धन वास्तव में वह धन है जिसका हिसाब किताब सरकार को न दिया गया हो और हिसाब किताब देने की कानूनी जरूरत न होने पर जिसका हिसाब किताब सरकार ने न लगाया हो| इसमें शामिल धन इस प्रकार होता है (पढ़ते समय सफ़ेदपोश स्रोतों की पहचान आप खुद कर पाएंगे| कृपया धनात्मक और ऋणात्मक चिन्ह पर भी ध्यान देते रहें|) –

+ भ्रष्टाचार/रिश्वत, जिसे हम सब जानते हैं| परन्तु रिश्वत या उपहार लेने के ऐसे तरीके भी विकसित हुए हैं, जिसमें रिश्वत का धन सफ़ेद रहता है| जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी की पत्नी/बेटी को सलाहकार के रूप में वेतन या कीमत दे| भ्रष्टाचार के बड़े हिस्से में सरकारी क्षेत्र शामिल नहीं होता मगर यह छोटा सरकारी हिस्सा आम जनता को बेहद परेशान करता है| निजी क्षेत्र में खरीदफरोख्त के लाभ में हिस्सेदारी का व्यापक चलन है, मगर… भगवान मूंह न खुलवाए| निजी स्कूल, निजी चिकित्सालय, बिजली कम्पनियां, आदि समय समय पर जनता के साथ कालेधन वाला लेनदेन करने ले लिए चर्चा में आते हैं|

– घोटाला, बोफोर्स घोटाले में कथित रूप से खाया गया कमीशन भ्रष्टाचार की श्रेणी में है| टूजी घोटाले में अधिक दाम की चीज स्पेक्ट्रम को कम दाम पर बेचने का आरोप है, ऐसा करना गलत परन्तु कालाधन नहीं पैदा करता| हाँ, ऐसा करने के लिए रिश्वत दिए जाने में भ्रष्टाचारजन्य कालाधन पैदा होगा|

+ गोलगप्पा, जी हाँ स्ट्रीट फ़ूड या ढ़ाबे कालेधन का सबसे बड़ा स्रोत है| यहाँ होने वाली आय आयकर के लिए रिपोर्ट नहीं होती| अगर कोई स्टाल केवल हर दिन १०० प्लेट मात्र बीस रुपये प्लेट की दर से मात्र गोलगप्पे बेचती है तो भी आयकर की सीमा में आने लायक धन प्राप्त कर लेती है| परन्तु यह धन काले धन में बदल जाता है|

– बड़े भोजनालय जिनमें आपको बिल मिलता है वहां पर दिया गया नगद धन बहुत बार कालाधन होता है, मगर यहाँ खर्च होने के बाद यह कालाधन सफ़ेद हो सकता है, बशर्ते यह भोजनालय सरकार को ठीक से सभी कर दे| इस क्षेत्र में अगर मगर बहुत है|

+ किराना आदि दुकान, कोई भी दुकान जहाँ आप बिल नहीं लेते देते काला धन पैदा करती है| भले ही दुकानदार कुछ भी कहे, कर चोरी के कारण यह कालाधन पैदा करती हैं| मजे की बात है, यह व्यापारी वर्ग भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाला प्रमुख तबका है| यह लोग अपनी कर चोरी को कठिन प्रक्रियाओं के हवाले से जायज बताते रहे हैं| बिक्रीकर से जीएसटी का वर्तमान सफ़र इन सभी लोगों द्वारा पैदा किये जाने वाले कालेधन को ख़त्म करने का कठिन प्रयास है| प्रक्रिया का सरलीकरण कहीं अधिक सुरक्षित समाधान हो सकता था और जीएसटी की प्रस्तावित कठिन प्रणाली अभी रोड़ा बनी रहेगी| अगर आपने बिल नहीं लिया है, बैंक भुगतान नहीं किया है, तो काला धन यहाँ पैदा होता है|

+ दहेज़, जी हाँ, दहेज़ भारत में काले धन के प्रमुख सोत में से एक है| जब भी दहेज़ में नगद धनराशि स्वीकार की जाती है तब काले धन का उत्पादन होता है| सामान्य घरों में बहुत सारा नगद धन भ्रष्टाचार से नहीं दहेज़ से आता है| दहेज़ में बेटी के नाम की पासबुक, फिक्स्ड डिपाजिट आदि कालेधन को भी रोकते हैं और बेटी का भविष्य भी बचाते हैं|

+ घरेलू बचत, यह सोचना हास्यास्पद लगता है परन्तु नगद बचतें अल्प मात्रा में ही सही मगर काले धन को जन्म देती हैं| जब हम इन बचतों को बैंक में नहीं जमा करते तो दो खतरे रहते हैं – पहला, मुद्रास्फीति इस नगद धन को क्रयशक्ति कम कर देती है| दूसरा, लम्बी अवधि के बाद आज इस प्रकार की बचत को आयकर विभाग को समझा पाना मुश्किल और महंगा कार्य है|

+ मकान किराया, जब इस वर्ष सरकार ने आयकर सम्बंधित आंकड़े प्रकाशित किये थे| उन्हें देखकर प्रहले दृष्टि में प्रतीत होता था कि यह देश में किराये से आय की संख्या न होकर देश भर में किराये पर उठाये गए मकानों की संख्या है| जी हाँ, अगर किराया आयकर रिटर्न में न दिखाया जाए तो काला धन है| आप हाउस रेंट अलाउंस और किराये से आय के आंकड़े देखकर हँसी नहीं रोक पाएंगे|

+रियल एस्टेट, जब भी आप मकान खरीदें तब अधिकतर विक्रेता आयकर और क्रेता स्टाम्प ड्यूटी बचने के लिए कम कर कर मूल्य लिखाते हैं और काले धन पैदा होता है| कई मामलों में क्रेता बैंक लोन लेने के लिए पूरा मूल्य चुकाना चाहें तो विक्रेता कर-राशि की अतिरिक्त मांग करते हैं| रियल एस्टेट काला धन खपाने का सबसे प्रचलित तरीका है| रियल एस्टेट में काले धन का दुष्प्रभाव दिल्ली के आसपास खाली पड़े आवासीय इकाइयों के रूप में दिखता है जिसे कोई अब नहीं खरीद पा रहा है|

– सोना – चांदी, काले धन का अधिकतम निवेश कालाधन माना जाता है| सोने ने दाउद इब्राहीम से लेकर सर्राफ़ा सरताजों की जिन्दगी चमकदार काली करने में मदद की है| इनमें से आज कोई देशद्रोही और कोई देशप्रेमी कहलाता है, मगर बड़ी मात्रा में धन काला है| काली सम्पत्ति की खरीद फरोख्त काला धन पैदा करती है|

+ अवैध धंधे, वैश्यावृत्ति, ड्रग; जब धंधा अवैध है तब कमाई कानून को कैसे दिखाई जाए? कुछ लोग एक हिस्सा बैंक में डालते हैं मगर बड़ा हिस्सा काला रहता है|

– शराब; कुछ भी कहिये, कितनी घृणा करें| शराब काले को सफ़ेद करती है| अधिकतर इसकी खरीद काले धन से होती है| मेहनत की कमाई स्वाद के दीवाने ही बरबाद करते हैं, बाकि लोग काला पैसा दुकान पर देते हैं| जो बिक्री के बाद अकाउंट में जाने के कारण सफ़ेद हो जाता है|

+ विदेशों से तस्करी; इस प्रकार के तस्करों से भारत घृणा करता है| सीमाशुल्क की चोरी से लाया गया माल बिक्रीकर और आयकर वालों को कौन बताएगा? पैसे के लेनदेन में अन्तराष्ट्रीय हवाला का प्रयोग होता है|

+ करखानों से तस्करी (कच्चे का काम); यह सफ़ेदपोश तस्करी है| इज्जत का नाम है – कच्चा काम| इसमें उत्पादशुल्क, बिक्रीकर, आयकर सब बच जाते हैं| लेनदेन में सफेदपोश हवाला की सेवाएं ली जातीं है|

  • उपरोक्त दोनों तस्करियों में अन्तराष्ट्रीय हवाला और सफेदपोश हवाला में वही अंतर है जो पाकिस्तान सरकार अफगानी तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान में बताती है|

+ सरकारी शिक्षकों की निजी कोचिंग; हम शिक्षकों का सम्मान करते हैं इसलिए इस मुद्दे को रहने देते हैं|

+ सरकारी डॉक्टर, सरकारी वकील की निजी सेवाएं; यह लोग परे पेशेवर भाई हैं इसलिए यहाँ भी माफ़ किया जाये|

+ कृषि आय; यह से सरकारी सफ़ेद गाय| क्या कहें, बालीवुड वाले लम्बू मोटू सब तो किसान भाई हैं| वैसे मामला यह है कि कृषि अर्थव्यवस्था नगद आधारित है, इस कारण गांव – देहात के अन्य कार्य भी नगद आधारित होते हैं| नगद की इस कृषि अर्थव्यवस्था को नगद की काली अर्थव्यवस्था से जुड़ने में जरा सहूलियत होती है| अगर यह सरकारी आयकर व्यवस्था से जुड़ने के प्रयास करे तो किसान भाई का गैर – कृषि आयकर दोगुना या तीन गुना हो जाता है|

क्या कुछ छूट गया? हो सकता है| भारतीय शादी – ब्याह, चुनाव, और होली – दिवाली – ईद काले धन के सबसे बड़े उत्सव हैं| ईमानदार लोग यहाँ सोच समझ कर तंग हाथ पैसा खर्च करते हैं, कई बार होश में बिक्रीकर बचा जाते हैं|

 

नगद नालायक


प्रचलित पांच सौ और एक हजार  रूपये के नोट की कानूनी मान्यता रद्द करने का स्वागत योग्य वर्तमान सरकारी फैसला काले धन को समाप्त करने के पुराने और असफल तरीकों में से एक है| इस से पहले जनवरी १९४६, १९५४, १९७८ में बड़े नोटों की कानूनी मान्यता रद्द की गई थी| दिक्कत यह रही कि विभिन्न कारणों से यह बड़े नोट, जैसा कि इस बार भी किया जा रहा है, दोबारा प्रचलन में लाये गए| परन्तु इस बार प्रक्रिया में अंतर भी दिखाई देता है|

इस प्रकार की प्रक्रिया में काले धन का वह मामूली हिस्सा जो नगद के रूप में रखा गया हो, लगभग नष्ट हो जाता है| इस प्रक्रिया में जो काला धन बाहर आने की आशा होती है, वह अपने आप में बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है| परन्तु यह काले धन को समाप्त नहीं करता, काले धन का अधिकतम हिस्सा रियल एस्टेट, सोना, और विदेशी बैंकों में होता है| इस बड़े हिस्से को नियंत्रित करने का प्रभावी उपाय सरकारों के लिए उठाना असंभव नहीं, परन्तु कठिन है| वर्तमान में काले धन की अर्थव्यवस्था सामान्य अर्थव्यवस्था के पच्चीस फ़ीसदी के बराबर है| वर्तमान प्रक्रिया भविष्य में काले धन के उत्पादन पर भी कोई समुचित रोक नहीं लगाती|

मोदी सरकार के फैसले में एक नई बात है, यह बेहद स्फूर्त प्रक्रिया के तौर पर और सीमित समय अवधि में हो रहा है| नगद में काला धन रखने वालों को अपने पुराने नोट नए नोटों से बदलने का मौका नहीं दिया गया है| सरकारी अधिसूचना के अनुसार वर्तमान प्रक्रिया नकली नोट, काला धन, आदि का मुकाबला करेगी|

परन्तु, इस प्रक्रिया का नुकसान निम्न आय वर्ग को होगा, जिनके पास अधिकतर धन नगद में होता है| असंगठित क्षेत्र के मजदूर, छोटे दूकानदार, फेरीवाले, आदि जब अपनी कल (८ नवम्बर २०१६) की आय घर ले कर जा चुके थे तब यह घोषणा हुई| उनकी अधिकतम आय/सम्पत्ति रद्दी बन गई और यह देखने की बात है कि वो आज (९ नवम्बर २०१६) किस प्रकार अपनी खरीददारी कर पाते हैं| उनके लिए बैंक की सुविधा, अगर है तो, एक दिन बाद होगी| परन्तु इनमें से अधिकतर के पास जन धन योजना के बाद भी बैंक अकाउंट नहीं है या दूर दराज इलाकों में है| यह सही है कि १० नवम्बर के बाद बैंक उनके अकाउंट खोल कर उसमें पैसा जमा कर सकती हैं, परन्तु यह वित्तीय भागीदारी प्रक्रिया का दुर्दांत रूप होगा| कारण, इनमें से अधिकतर के पास अपने पते के समुचित प्रमाण नहीं होते|

भारत में दूरदराज के ग्रामीण और जंगल इलाकों में बैंक और डाकघर की सुविधा न होने से वहां मौजूद लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा| उनको अपनी छोटी छोटी बचत शहर ले जाकर बदलनी होगी या इस प्रक्रिया में बिचालियों को मोटा धन देना पड़ेगा|

अन्य भारतियों के लिए समस्या थोड़ी हास्यास्पद है, अधिकतर समझदार लोग अब नगद कम रखते हैं और बैंक मशीनें, अगर देती हैं तो, एक बार में पाँच से अधिक एक सौ के नोट नहीं देतीं| उनके पास खर्च सब्जी भाजी लेने के लिए उधार का विकल्प बचता है वह भी अगर उनका सब्जी वाला अगर कल सब्जी ला पाया तब| ऑनलाइन खरीदने वालों के लिए थोड़ा राहत रहेगी|

वर्तमान अधिसूचना

  • दिनांक ८ नवम्बर २०१६ को बैंक ग्राहकों की सेवा नहीं कर पाएंगे| अपना हिसाब किताब बनाकर रिज़र्व बैंक को देंगे|
  • दिनांक ८ और ९ नवम्बर को एटीएम काम नहीं करेंगी| उनमें से नगद धन राशि बैंक निकल लेंगी|
  • दिनांक ३० दिसंबर २०१६ तक केवल चार हजार रुपये की धनराशि तक के नोट प्रति व्यक्ति बदले जा सकते हैं|
  • चार हजार रुपये से लेकर पचास हजार रूपये की धनराशि बिना किसी पहचान प्रक्रिया के भी बैंक खाते में जमा कराई जा सकती है|
  • पचास हजार रूपये से अधिक की धन राशि जमा करने के लिए सामान्य नियम अनुसार पहचान प्रक्रिया पूरी करनी होगी|
  • जमाकर्ता किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भी इस धन को जमा कर सकते हैं, परन्तु इसके लिए खाताधारक की सहमति और जमाकर्ता की पहचान प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए|
  • १० नवम्बर से २४ नवम्बर २०१६ तक एक दिन में बैंक शाखा में जाकर केवल १०,००० रुपये निकाले जा सकेंगे, जबकि एक हफ्ते में केवल २०,००० रूपए|
  • १० नवम्बर से १८ नवम्बर तक एटीएम से प्रतिदिन प्रतिकार्ड २,००० रुपये निकाले जा सकेंगे और उसके बाद प्रतिदिन प्रतिकार्ड ४,००० रुपये निकलेंगे|
  • किसी भी प्रकार ने गैर नगद अंतरण – चैक, डिमांड ड्राफ्ट, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, मोबाइल बेलेट, इलेक्ट्रोनिक निधि अंतरण, पेमेंट बैंक आदि इस अवधि में मान्य रहेंगे|
  • अगर कोई व्यक्ति ३० दिसंबर तक नगद धनराशि नहीं बदल पता तो वह रिज़र्व बैंक में पहचान प्रक्रिया पूरी कर कर बदल सकेगा|

पहचान प्रक्रिया

पहचान प्रक्रिया के लिए पेन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आदि प्रयोग किये जा सकते हैं|

आयकर व्यवस्था

वर्तमान में अगर कोई व्यक्ति दो लाख से अधिक नगद धनराशि बैंक में जमा करता है तो इसकी सूचना बैंक आयकर विभाग को देती है| आयकर विभाग जांच का निर्णय के सकता है|

अनिवासी और प्रवासी

अगर आप भारत से बाहर हैं तो आप किसी अन्य व्यक्ति को भारत में रखे नगद खाते में जमा करने के लिए अधिकृत कर सकते हैं|

परिमाण आधारित विश्लेषण

काले धन की अर्थव्यवस्था अधिकतर निवेश नगद धनराशि में नहीं होता| किसी भी व्यक्ति के पास काले धन के एक करोड़ से अधिक रुपये होने की सम्भावना बहुत कम है| अधिकतर धन संपत्तियों, बेनामी संपत्तियों, कंपनियों, सोना – चांदी, और विदेशी बैंकों में होता है| बेनामी संपत्तियों के अलावा उनमें से किसी से निपटने की कोई सटीक योजना सरकार के पास नहीं है| संपत्तियों में काले धन के निवेश के कारण बहुत सारी निवास योग्य संपत्तियों पर मालिकों के ताले लटक रहे हैं| बाजार में सम्पतियों के अनावश्यक दाम इस सब के कारण बढ़े हुए हैं|

दूर दराज के क्षेत्रों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों किसानों, मझोले दुकानदारों के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है| पेट्रोल पंप आदि की तरह बिक्रीकर में पंजीकृत दुकानदारों को भी दो दिन तक अमान्य धनराशि स्वीकार करने की अनुमति मिलनी चाहिए थी|

सरकार ने नगद आधारित व्यवस्था को बैंक आधारित व्यवस्था में बदलने का अवसर हाथ से जाने दिया है| नए नोटों का प्रचलन सही निर्णय नहीं है|

हर प्रक्रिया में लाभ हानि होते है| वास्तविक परिणाम अगले पचास दिन में दिखाई देंगे| हमें सरकार का सहयोग करने का प्रयास करना चाहिए|

 

शाकाहारी – हाहाकारी


हमारे देश की शाकाहारी – हाहाकारी परंपरा में शाकाहार कम हाहाकार ज्यादा है| देश में अगर खाने को लेकर वर्गीकरण कर दिया जाए तो शायद लम्बी सूची तैयार हो जाएगी|

पूर्ण जैन, अर्ध जैन, शुद्ध शाकाहारी, लहसुन – प्याज शाकाहारी, लहसुन – प्याज अंडा आहारी, मांसाहारी, गौ-मांसाहारी, शूकर – मांसाहारी और न जाने क्या क्या| कुछ विद्वान कीटाहारी, मूषकाहारी, विशिष्टाहारी  आदि की बातें भी करते हैं|

इन सभी वर्गों में दोगले लोगों का भी अपना अलग वर्ग भी है| कुछ लोग घर पर शाकाहारी और बाहर मांसाहारी होते हैं| कुछ हफ्ते में तीन दिन सर्वभक्षी होते हैं मगर अन्य दिन शुद्ध वाले सात्विक शाकाहारी| कुछ केवल ईद वाले दिन प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेते हैं| आजकल फेसबुकिया जात वाले  कुछ लोग केवल बकर ईद वाले दिन शाकाहारी रहते हैं मगर अगले दिन…|

अब यह मत पूछिए कि मेरा आहार पुराण क्यों चल रहा है|

अभी एक यात्रा के दौरान मित्र मिले| उन्हें बताया गया था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ और अंडा – दूध का सेवन नहीं करता| सौभाग्य से हम एक लम्बी दूरी की बस में सहयात्री थे, जिस निर्जन स्थान पर बस रोकी गई वहां अंडा और चाय के अलावा कुछ खाने के लिए नहीं था| मेरी पत्नी जी ने मेरे लिए भी आमलेट बोल दिया, मगर बेचारे हमारे (हाहाकार – ग्रस्त) मांसाहारी मित्र अपनी शुद्ध शाकाहारी पत्नी के हाहाकार में विदेशी ब्राण्ड का वरक (चिप्स) चबा कर काम चला रहे थे| मुझ “शाकाहारी” के सहारे उन्होंने अपनी पत्नी को समझा बुझा कर आमलेट की अनुमति प्राप्त की| मगर मुझसे बार बार हकीकत में आने का आग्रह करते रहे| मैंने उन्हें बताया कि दूध चिकित्सक ने बंद किया है और अंडा स्वभाव बस नहीं खाता| मेरी पत्नी द्वारा आमलेट खाने के बाद भी उन्हें लगता रहा कि या तो मैं पत्नी के दबाब में शाकाहारी हूँ या हम दोनों ही डरपोक हैं|

मजे की बात यह रही की उस शाम जब हम कई लोग मिलकर साथ खा रहे थे तो अपनी मांसाहारी थाली लेकर आ पहुंचे| उनकी पत्नी बिफर गयीं, सब “अच्छे लोगों” के बीच “जंगली खाना” खाना लेकर क्यों आ गए| उन्होंने हम सबकी थालियों की ओर कसकर निगाह डाली, और बात बढ़ने से पहले वो सरक लिए| अगले शाम चुपके से मेरे पास आये और साथ टहलने चलने का आग्रह हुआ| जैसे ही अंडे का ठेला दिखा बोले चलो, एक एक आमलेट हो जाए; मेरी हालत हँस हँस कर ख़राब हो गई|

मैंने बोला, भाई आप खाइए, स्वाद से खाइए, मन से खाइए, मन में अपराधबोध मत पालिए, दूसरे का बहाना मत देखिये, सुखी रहेंगे|

बोले आप वाकई नहीं खाते| मैंने कहा; वाकई खाने न खाने का पता नहीं, मगर जीभ पर स्वाद नहीं चढ़ा है|

बोले मेरी पत्नी को मत बताना, कि मैं आमलेट खा रहा हूँ| मैं मुस्करा कर रह गया|

समाज में संस्कृत


प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत को लेकर भारतीय विशेषकर उच्चवर्ग मानसिक रूप से लगाव रखता है| जिन लोगों को किसी भी भारतीय भाषा में बात करने में शर्म आती हैं वो भी संस्कृत का जिक्र आते ही अपने ह्रदय में राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, और संस्कार के झंडे बुलंद करने लगते हैं| मगर अगर भारतीय जनसंख्या के अनुपात में देखें तो जनसँख्या का नगण्य हिस्सा के लिए ही संस्कृत  मातृभाषा है| मुट्ठी भर भारतीय इसे समझ बोल सकते हैं| बहुसंख्य के लिए संस्कृत गायत्री मंत्र या किसी और गुरुमंत्र की भाषा मात्र है| अधिकांश “काले अक्षर भैस बराबर – यजमान” पंडितजी के सही गलत उच्चारण में बोली गई संस्कृत में वेद – पुराण मन्त्रों से अपना इहलोक और परलोक “सुधार” लेते हैं और ॐ जय जगदीश हरे या कोई फ़िल्मी आरती गाकर या सुनकर संतुष्टि प्राप्त करते हैं|

सरकारी हिंदी और धार्मिक संस्कृत की भारत में दशा इनके पोंगा प्रचारों, अनुष्ठानों और समारोहों के कारण जनता से कोसों दूर है| सरकारी हिंदी का बनावटीपन उसकी विनाशगाथा है| मगर संस्कृत का दुर्भाग्य है कि यह धर्म के ठेकेदारों के कब्जे में है और विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी इसके शिक्षक संस्कृत को धर्मग्रंथों से अलग कर कर नहीं देख पाते| उनके लिए संस्कृत वेद पुराण की भाषा से अधिक कुछ नहीं है| भर्तहरि बाणभट्ट, जयदेव, जैमनि, कालिदास, आदि उनके लिए संस्कृत का नहीं, सामान्य ज्ञान – अज्ञान का विषय है| आचार्यों के दीर्घबुद्धि में यह नहीं आता कि जब भाषा को साहित्य से अलग कर दिया जाय तो वह बूढी हो जाती है और जनता से कटकर मृत|

मगर संस्कृत की दुनिया में सब कुछ पंडिताऊ अंधकार ही नहीं है, जन साधारण का उजाला भी है:

देखिये सुनिए नीचे दिए गए चलचित्र –

 

 

 

 

नीमराणा फोर्ट पैलेस


नीमराना जाने के मामले में हुआ यूँ कि सब कुछ इत्तिफाक से होता चला गया| एक प्रतियोगिता के चलते एक ब्लॉग पोस्ट यहाँ लिखी गई| जिसमें मैंने पद – पर्यटन यानि घुमक्कड़ी पर अपने विचार रखे थे:

पद – पर्यटन का अर्थ यह नहीं है कि हम घर से लेकर अपने गंतव्य की यात्रा पैदल करें| इसके कई पहलू है| अधिक पैदल यात्रा, बेहद कम सामान, पर्यटन स्थान से अधिक जुड़ाव|

उसके बाद एक प्रसिद्ध पर्यटन पत्रिका के रेस्पोंसिबल टूरिज्म सम्मलेन के लिए बुलावा आया और वहाँ जो कुछ पढ़ा सीखा उस पर भी ब्लॉग पोस्ट यहाँ लिखी गई| अब उन दोनों पोस्ट पर पुरुस्कार स्वरुप नीमराणा जाने का वाउचर मिल गया| मजे की बात यह कि हमारे लिए तारीख तय करना बहुत मुश्किल हुआ, आखिरकार एक पुराने वादे के चलते एक जरूरी मीटिंग में न जाने का फैसला किया गया| खान मार्किट पर नीमराना शॉप में गर्मजोश सवाल के बदले हमें जो महल (कमरा) लेने की उदास सलाह दी गई, वही हमने चुन लिया| वैसे यह चुनाव सही रहा|

मार्च के पहले सप्ताहांत हम बस पकड़ कर नीमराणा जा पहुंचे| राष्ट्रीय राजमार्ग से होटल तक एक पुराने मित्र ने टैक्सी का प्रबंध करवाया था| भारी भरकम विकास के बीच मौजूद छोटी से कस्बाई आबादी से होकर हम एक पुराने किले में प्राचीन शानदार किले में मौजूद अधुनातन शानदार रिजोर्ट पहुंचे|

पुखराज महल

जी हाँ, यही नाम था – पुखराज महल –  जहाँ हम रुके थे| पंद्रहवीं शताब्दी में बने भाग का सबसे ऊपरी और महत्वपूर्ण महल| तीन कमरों (जिनमें से एक को स्नानागार में बदला गया है), एक बालकोनी, एक टेरेस के साथ नीमराणा फोर्ट, शहर और आसपास का शानदार नजारा| प्राचीन आभा देता हुआ फर्नीचर, सजावट और आधुनिक स्नानागार|

पुखराज महल: आधिकारिक फ़ोटो
पुखराज महल: आधिकारिक फ़ोटो

नीमराणा फोर्ट पैलेस का हर कमरा अपने आप में अलग है| उस से दिखाई देने वाला नजारा भी कुछ हद तक बदल जाता है| पुखराज महल से आप स्विमिंग पूल ही नहीं, लगभग पूरा रिसोर्ट ही देख सकते हैं| यहाँ से स्विमिंग पूल, डाइनिंग हॉल, ओपन एयर थिएटर और अन्य सुविधाएँ आदि सब पास ही हैं| कमरों की साज सज्जा आपको एक दिन के महाराजा होने का पूरा अनुभव देने के लिए काफी है|

नीमराणा फोर्ट के नए हिस्से और आधुनिक निर्माण अपने पुरानेपन को आधुनिकता के साथ संजोने का प्रयास है|

हम भी दिनभर पूरे किले में घूमते रहे| सामान्य किलों के विपरीत यहाँ हमें अपनी मर्जी से कहीं भी घूमने, बैठने और खड़े होने की आजादी थी| बहुत से लोग तो लगा कि इसी रिसोर्ट में रुक कर भारतीय वास्तुशास्त्र, इतिहास, भूगोल, कला और संस्कृति की जानकारी ले लेना चाहते हैं| दो तीन लड़के लड़कियां तो शायद फोटोग्राफी में अपना कैरियर यहीं बना लेना चाहते हैं| यह आसन फोटोग्राफी के लिए बढ़िया स्थान है|

हर शनिवार को कुछ न कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है| उस दिन तेज आंधी और बारिश के कारण कार्यक्रम खुले में न होकर बंद कमरे में हुआ| उसके बाद भोजन, गाला डिनर, का साप्ताहिक आयोजन था| यह भी आज सामान्य भोजन कक्ष में हो रहा है|

अगले दिन विंटेज कार से नीमराणा कस्बे का चक्कर लगाया और दिल्ली आ गए| विंटेज कार के ड्राईवर के अलावा हर कोई यहाँ बहुत अधिक औपचारिक था| यह बड़े होटलों में होता है|

यह औसत भारतीय के लिए महंगा मगर एक सुखद अनुभव था|

लैटर – बॉक्स


बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में लैटर बॉक्स इतनी महत्वपूर्ण “सामाजिक इमारत” थी कि आसपास की बड़ी बड़ी इमारतों का पता इस बात पर भी निर्भर करता था कि वह इमारत लैटर बॉक्स से कितनी दूर है| लैटर बॉक्स का निकटतम प्रतिद्वंदी था बिजली का ट्रांसफार्मर, जो आज भी हर गाँव में नहीं पहुंचा| आज भी छोटे शहरों और गांवों में लैटर बॉक्स महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जबकि महानगरों में इसका प्रभाव कम होता जा रहा है|

बचपन में नगरपालिका, प्रधानी और विधायकी के चुनावों लैटर बॉक्स लगवाना एक बड़ा मुद्दा था| पोस्ट कार्ड का चलन समस(SMS) और अन्य सन्देश सेवाओं के कारण कम हुआ है| दिल का हाल सुनाने के लिए अब पाती नहीं लिखी जाती वरन टेलीफोन आ जाता है|

लम्बे पत्रों का स्थान कुछ हद तक ईमेल आदि के चलते कम लिखा जाता है तो अत्यंत आवश्यकता पड़ने पर लिखे जाने वाले पत्र कूरियर सेवाओं और डाकघर की स्पीड पोस्ट और रजिस्ट्री सेवाओं से भेजे जाने लगे हैं| अधिकांश लोगों के पास पैसा है और पहले के तरह तीन अन्तेर्देशीय पत्र लिखने की जगह एक पत्र को रजिस्ट्री, स्पीड पोस्ट या कोरियर से भेजना लोगों को उचित लगता है|

ऐसे में लैटर बॉक्स मात्र एक ऐतिहासिक निशान बनकर रह गए हैं| जिन स्थानों पर पहले लैटर बॉक्स थे आज उनके निशान भी नहीं मिलते और लोगों को याद भी नहीं है कि यहाँ कभी लैटर बॉक्स भी था| अलीगढ़ में एक दुकान के पास लैटर बॉक्स है, दुकानदार ने बताया कि अब पहले की तरह दिन में दो बार डाक नहीं निकाली जाती बल्कि कई बार तो हफ्ता हो जाता है|

लैटर बॉक्स तो त्यौहार हो गए हाँ, होली दिवाली ग्रीटिंग कार्ड भेजने का चलन आज भी है तो बहुत से लोग खर्च को देखते हुए, लैटर बॉक्स का प्रयोग करते हैं|

पता नहीं कब यह लैटर बॉक्स इतिहास हो जाए| इसलिए मैंने भी अपने बेटे का लैटर बॉक्स के साथ छायाचित्र लिया है –  ताकि सनद रहे|

लैटर बॉक्स - ताकि सनद रहे
लैटर बॉक्स – ताकि सनद रहे

स्थान लोदी रोड पोस्ट ऑफिस, नई दिल्ली ११०००३, दिनांक १५.०१.२०१६, समय सुबह १०.१७  |  छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

 

जयहिंद बनाम…


उन दिनों राम जन्मभूमि आन्दोलन जोरों पर था| जगह जगह कार्यक्रम जयश्रीराम से शुरू होते और जय भारत पर समाप्त होते थे| जयहिन्द सरकारी विद्यालयों का नारा था और नये निजी विद्यालय जयभारत की ओर सरक रहे थे| जयहिंद राष्ट्रभक्त और जयभारत हिन्दूराष्ट्रभक्त होने से जुड़ रहा था; मगर खुल कर कोई सामने नहीं आता था|

प्रायः, जयहिन्द के साथ उद्घोषित किया जाने वाला जयभारत; जयहिंद घोष के प्रति ब्राहमणवादी संस्कृतनिष्ठ पूर्वाग्रह का प्राकट्य है| इसके अतिरिक्त उसकी कोई आवश्यकता नहीं है| कई बार जयहिंद को चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस जैसे समाजवादी विचारधारा वाले क्रांतिकारियों से जुड़ा होने के कारण भी पूंजीपति हिन्दुत्वादी पसंद नहीं करते| वैसे आजकल इतिहास का पुनर्लेखन करते हुए इस क्रांतिकारियों को हिन्दुत्वादियों ने अपना लिया है, परन्तु उनके शिविर में जयभारत जयहिंद के समकक्ष रखने की विवशता हास्यास्पद है|

उन दिनों राष्ट्रवादी लोग क्रिकेट के मैच, राष्ट्रीय उत्सवों और सभाओं में भारत माता की जय का नारा बुलंद करते थे| भारतमाता जनमानस में निराकार, निर्गुण, मातृभूमि का नाममात्र और भावनामात्र थीं और आज भी हैं| जिसका सावरकर के निराकार निर्गुण पितृभूमि से सिद्धांत रूप से विभेद तो है, परन्तु अधिक अंतर नहीं है|

दूसरा तबका हिन्दूराष्ट्रवादी था जो तब तक भारतमाता की जय नहीं बोलता था जब तक अनंतउत्तर के समक्ष सिंहसवारपताकाधारी माता का चित्र सामने न हो| कई बार भ्रम होता कि आजाद हिन्द फ़ौज की भारत माता और हिन्दुराष्ट्रवादी की भारत माता में उतना ही भीषण अंतर है जितना वेदांत की निर्गुण और सगुन शाखा का|

सगुण के श्रृद्धालू प्रतीकों में इतने बंध जाते हैं कि उन्हें निराकार निर्गुण विश्वास प्रायः नास्तिकता या अधर्म के तुल्य लगते हैं; जबकि वह खुद अपने विश्वास की सीमायें जानते हैं|

 आज भारत में “वन्देमातरम कहना होगा” और “भारत माता की जय” करना होगा का वाद विवाद उसी राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रद्रोह के सगुण अंधविश्वास में फंस गया है|

कन्हैया कुमार के बहाने


सत्ता को दी जाने वाली सशक्त चुनौती सबसे पहले अशक्त प्रभावहीन विपक्ष को पदच्युत करती है|

विपक्ष का अप्रासंगिक होना ही सत्ता के लिए नवीन चुनौती को बीज देता है| जब निरंकुश सत्ता जन साधारण के आखेट पर निकलती है, चुनौती का जन्म होता है|

दिल्ली में अन्ना आन्दोलन ने विपक्ष के शून्य को भरते हुए ही सत्ता की और कदम बढ़ाये थे| मोदी लहर ने भी केन्द्रीय विपक्ष के शून्य को भरा था| सत्ता की नवीन चुनौती के प्रति उदासीनता, चुनौती को नष्ट कर देती है|

आज जिन्हें कन्हैया कुमार में नया नेतृत्व दिख रहा है; उन्हें कन्हैया को परिपक्व होने का मौका देना चाहिए|

कन्हैया का भाषण उन्हें भारत के श्रेष्ठ वक्ताओं में खड़ा करता है, मगर हमने श्रेष्ठ वक्ताओं को वक़्त के साथ बैठते देखा है| उम्मीद बाकी है| प्रकृति का नियम है; संतुलन| हर सत्ता, ताकतवर सत्ता का समानांतर विपक्ष खड़ा होगा, होता रहेगा|

आइये; आजादी…
क्षमा कीजिये.. मुक्ति के गीत गायें….
और उन गीतों को लोरी समझ कर सो जाएँ| जब तक सत्ता हमें झंझोड़ कर पुनः जगाये|

जातिवादी शिक्षा व्यवस्था


बचपन में हम सवर्णों का वास्ता जाति और इसके अभिशाप से नहीं पड़ता| जब हम घर से निकलकर विद्यालय जाते हैं तो पहली बार इसका पता लगता है|

क्या घरों – मुहल्लों में जाति नहीं होती? दिल्ली मुम्बई महानगरों में जाति का प्रकोप मुहल्लों और कॉलोनियों में शायद कम ही दीखता हैं मगर अधिकांश नगरों – महानगरों में मोहल्ले ही जाति के आधार पर बने होते हैं| सवर्ण इलाकों में दलित और अन्य धर्म का रहना मुश्किल है| इसलिए बच्चों को जाति का सीधा भान नहीं होता| भारतीय शहरों में इलाकों के जाति और धर्म के नाम पर होते रहें हैं| हमारे शहरों में ब्राह्मणपुरी, बनियापाड़ा, तमोलीपाड़ा आदि जाति आरक्षित इलाक़े हैं| आज भी नए इलाकों में जाति का प्रकोप बना हुआ है और सवर्ण – पिछड़ा – दलित – उच्चमुस्लिम – निम्नमुस्लिम का प्रकोप बना हुआ है और थोड़ा अंतर यह है कि उसमें सवर्णों में आपसी जाति भेदभाव का स्थान आर्थिक भेदभाव ने ले लिया है|

जिनका बचपन या जीवन बचपन जीवन सवर्ण इलाकों में ही बीता हैं, उन्हें दलित लोगों से कोई विशेष वास्ता नहीं पड़ता| पारस्परिक संवाद का कोई साधन या पारस्परिक व्यवसायिक सम्बन्ध विकास और सवर्णों के गौर सवर्ण व्यवसायों में आने के साथ लगभग समाप्त हो चुके हैं| बहुत से कामों में आज लोग, सभ्यता या मजबूरी के कारण जाति नहीं देखते जैसे ढ़ाबे पर खाना खाना|

विद्यालय और व्यवसाय, जीवन में परिवार और नाते रिश्तों के बाहर पारस्परिक सामाजिक संवाद का अवसर प्रदान करते हैं| सरकारी नौकरियों में सकारात्मक आरक्षण के कारण पारस्परिक संवाद बना है, परन्तु निजी क्षेत्र में नकारात्मक आरक्षण (भेदभाव भी पढ़ सकते हैं) के कारण सवर्ण संस्थाओं में सवर्ण और दलित संस्था में दलित बहुसंख्या[1] काम करती है| निजी क्षेत्र में मजदूरों की नियुक्ति में जरूर जाति भेद कम हैं, मगर मध्यवर्गीय दृष्टि क्षेत्र के बाहर मजदूरों में आपसी जातिवाद और जातिगत गुटबाजी होती है|

विद्यालयों में पारस्परिक सामाजिक संवाद उस कच्ची उम्र में होता है, जहाँ यह जाने अनजाने में हमारे अंतर्मन पर दुष्प्रभाव छोड़ता है| सवर्ण क्षेत्रों में रहने पलने के बाद मेरे लिए भी इस भेदभाव का पाठ कक्षा 6 में मिला था| जहाँ अधिकतर हिन्दू – मुस्लिम सवर्ण और पिछड़े पहले सेक्शन में थे और हिन्दू मुस्लिम दलित तीसरे में| दूसरा सेक्शन सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ों के लिए था| अधिकतर शिक्षक सवर्ण थे और पहले सेक्शन के अलावा कहीं और पढ़ाना उनके लिए महापाप था| अंतरजातीय वार्तालाप गुरुजन के क्रोध को भड़का सकता था| मुझे कई बार यह बताया गया कि जाटवों या कुरैशियों से बात करने से जुबां ख़राब हो जाती है, आप संस्कृतनिष्ठ हिंदी या गाढ़ी उर्दू की जगह अबे – तबे बोलना शुरू कर सकते हैं| मजे की बात है की अबे तबे की भाषा में हमारे गुरुजन जाटवों या कुरैशियों से कहीं अधिक माहिर थे| भेदभाव का पहला पाठ यही था| आज भी स्तिथि नहीं बदली है, केवल बहाने बदल गए हैं| आज अछूत के स्थान पर साफ़ – सफाई, भाषा, गाली – गलौज, या कोई और बहाना लगाया जाता है|

पापा के स्थानांतरण के बाद जब नए स्कूल पहुँचे तो वहाँ हर सेक्शन में लगभग बराबर अनुपात में सभी सामाजिक वर्ग थे मगर…| उसका एक राजनीतिक कारण था, स्थानीय पूर्व सांसद दलित वर्ग से थे और केंद्र में मंत्री रहे थे| मगर सवर्ण और दलित प्रायः आपस में बात नहीं करते थे| कक्षा में सबसे आगे शहरी सवर्ण, उसके बाद ग्रामीण सवर्ण, फिर पिछड़े, फिर शहरी और ग्रामीण दलित थे| इसमें कुछेक अपवाद थे जैसे पूर्व सांसद महोदय का भतीजा अपने एक दो मित्रों से साथ अपनी पसंद की जगह पर बैठता था, वह प्रायः शहरी सवर्णों से पंगा नहीं लेता था और बाकी लोग उससे| मेरे और उसके जैसे दो – तीन लोग ही कक्षा में उन छात्रों में से थे जो जाति सीमा के बाहर हर किसी से बात करते थे| अन्य लोगों से संवाद प्रायः फब्तियों, गालियों, नारेबाजी और “जातिसूचक शब्दों” में होते थे|

जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं; सवर्णों को दलित वर्ग तो निशाना बनाने का एक और हथियार मिल गया| जिसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया तीव्र थी मगर जल्दी ही आर्थिक सुधारों में उसे थाम लिया| अब आर्थिक विकास के कारण होशियार छात्र प्रायः जातिगत आरक्षण को लेकर चिंता नहीं करते| आजकल कम पढ़ने वाले सवर्ण छात्र ही प्रायः दलितों और अन्य आरक्षित वर्गों से कटुता रखते हैं| भले ही अभी यह अपेक्षा से कम है, परन्तु दलित छात्रों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और पढाई – लिखाई का स्टार भी| परन्तु, विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सबसे अधिक भेदभाव आज भी शिक्षक वर्ग की तरफ से आता है|

हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारण उठे सवालों के तात्कालिक कारणों से हटकर अगर हम भारतीय शिक्षा व्यवस्था में झांके तो हमारे विश्वविद्यालय सामंती परंपरा के संवाहक हैं| हमारे गुरुजन (और दुर्भाग्य से नवगुरुजन भी) यथा – योग्य चरणवंदना के आधार पर अपने गुरूर की सत्ता को गर्वानुभूति से संचालित कर रहे हैं| शोधार्थी तो वैसे ही बंधुआ हो जाता है, जिसके आगे गुरु घंटाल अपनी गौण – गुरुता सिद्ध करने में लगे रहते हैं| अगर छात्र सामाजिक या आर्थिक तौर पर नीचे पायदान है तो यह बंधुआ – शोधार्थी उनके लिए जन्म- जन्मान्तर का दास हो जाता है| एक शोधार्थी का सामाजिक आन्दोलन में सक्रिय होना विरोधी संगठन के लिए मात्र विरोध होता है परन्तु गुरु – सत्ता के लिए अपने इन्द्रासन पर आघात के समान होता हैं| डोलता हुआ इन्द्रासन शील, शालीनता, साधना और समाधि के नष्ट होने से ही ठिकता है|

[1] भारत के सकल उत्पाद का अधिकांश छोटे और मझौले उद्यमियों से आता हैं जिनका सञ्चालन अधिकतर पिछड़े और दलितों के हाथ में है|

अल्प–सफल पठानकोट बचाव


किसी भी हमले या आतंकवादी हमले की स्तिथि में सुरक्षा बलों को, गुप्तचरों और उनके मार्फ़त सरकार बहादुरों को ही यह पता होता है कि इस हमले की आक्रमकता को देखते हुए सफलता का मापदंड क्या होना चाहिए|

पठानकोट बचाव में सबसे बड़ी असफलता यह है कि न सिर्फ “सफल लक्ष्य” को पहले से ही जान –पहचान लिया गया बल्कि उसके पूरा होते ही “पीठ ठोंको – शाबासी दो” अभियान भी शुरू हो गया| लेकिन यही पठानकोट बचाव की असफलता है क्योंकि सरकार बहादुरों के बधाई संदेशों के बाद हमला जारी था और दुनिया में सरकार बहादुरों और भारत का मखौल बन रहा था|

कारण बहुत सीधा सरल है; हमने सरकार बहादुर ने अपने सामने पूर्ण आत्म- विश्वास के साथ बेहद सुस्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया और उसमें किसी प्रकार के परिस्तिथि जन्य बदलाव की कल्पना या आशंका भी नहीं की| सरकार बहादुर ने यह माना कि सबकुछ किसी लोकप्रिय विडियो गेम की तरह से चलेगा और काम ख़त्म| सरकार बहादुरों ने इस पूर्वनिर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद यह समय लगाने की भी जरूरत नहीं समझी कि जमीनी हकीकत को एक बार जाँच लिया जाये| यदि यह किया गया होता तो कम से कम अति-उत्साह से बचा जाता और आलोचना से भी|

सबसे पहले यह बात सुस्पष्ट होनी चाहिए कि गुप्तचर सूचना का बहुत पुख्ता होना, जैसा कुछ नहीं होता और आप वास्तविक घटनाक्रम की कोई पटकथा पूर्णतः पूर्व निर्धारित नहीं कर सकते| दूसरा आपको पटकथा के अनुसार सब कुछ या बहुत कुछ चलने पर भी, दो – तीन बार जमीनी हकीकत मालूम करनी चाहिए|

जनसामान्य और सामान्य सैनिक को हमेशा सरल गणित आता है, हमलावरों के मुकाबले बचावदल में जान की हानि कम होनी चाहिए| यह सरल गणित सैन्य और जन मनोविज्ञान का मूल है| कम से कम नुकसान के साथ लक्ष्य प्राप्त करने का और उसके लिए योजना बनाने काम सैन्य – असैन्य नेतृत्व का है, सैनिक का नहीं| अगर इसमें सफलता नहीं मिलती तो यह एक असफलता है|

इस बात को सफलता के तौर पर प्रस्तुत करने क प्रयास हो रहा है कि वहां पठानकोट एयरबेस में मौजूद परिवारों या जहाजों को नुक्सान नहीं हुआ| इस पैमाने पर सफलता और असफलता नहीं आकीं जा सकती| यदि इस प्रकार का नुकसान किसी पूर्व चेतावनी या सूचना के बिना होता है तो उसे असफलता नहीं कहा जा सकता और साथ ही यदि यह नुकसान पूर्व सूचना के बाद भी होता है तो यह असफलता नहीं होती, शर्मनाक होता| क्योंकि पठानकोट हमले की पूर्व सूचना थी, तो इस बात को सफलता के और पर नहीं, संतोष के तौर पर देखा जा सकता है|

यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि किसी भी आत्मघाती आतंकवादी हमले में आतंकवादियों की असफलता नगण्य नहीं होती| उनका लक्ष्य मात्र अपने शिकार को अपने में उलझाना, उसका जितना हो सके नुक्सान करना और मर जाना होता है| अगर हम, आतकवादियों, उनके सहयोगियों और परिवारों के विचारों को समझे तो आत्मघाती आतंकवादी हमलावर की असफलता मात्र उसका जिन्दा पकड़ा जाना और अंतिम असफलता उसका हृदय परिवर्तन होना ही है|

आयें, भविष्य के लिए कुछ सीखें और कुछ पुख्ता योजनायें बनायें|

विचारों की भीड़–ताल और न्याय का समूह-साधन


बीतते हुए वर्ष के बारे में बात करते हुए हम उन घटनाओं का जिक्र करते हैं, जो हमारे मन में कहीं  न कहीं रीत जातीं हैं; एक कसक सी छोड़ जातीं हैं|

बीतता हुआ वर्ष अपने सन्दर्भों और प्रसंगों के साथ समय के एक वर्ष से अक्सर बड़ा होता है| इन अर्थों में इस वर्ष की शुरुआत कई महीनों पहले हुई थी| इस वर्ष में हमें एक शब्द बहुत सुना, क्राउड – सोर्सिंग (crowd – sourcing); जिसका अर्थ मैं समूह–साधन चाहूँगा|

इस वर्ष बहुत बातें समूह–साधन के माध्यम से इस वर्ष में विकसित हुईं; सामाजिक माध्यम (social media), समाचार, सरकार, शासन, लोकतंत्र, विचार, विमर्श, वेदना, वित्त, विधि और न्याय|

समूह–साधन का सर्वाधिक स्वीकृत प्रयोग वित्त यानि पैसे की व्यवस्था करने के लिए हो रहा है| साधारण रूप से इसके लिए हम सामाजिक माध्यम का प्रयोग कर कर परचित – अर्ध्परिचित – अपरचित लोगों से धन की मदद मांगते हैं| यह धन किसी अच्छे कार्य या विचार आदि के लिए हो सकता है| कुछ वेबसाइटों पर इसके लिए समुचित जानकारी, वयवस्था और विचार उपलब्ध हैं| मगर इस वर्ष वित्त से कहीं अधिक समूह–साधन का प्रयोग विचार के लिए हो रहा है|

विचार के सन्दर्भ में समूह–साधन हमेशा से समाज का हिस्सा रहा है| चौपालें, पान की दुकानें, दावतें, चंदा, और सत्संग समूह–साधन का सीमित मगर स्वीकृत माध्यम रहे हैं| मगर इस वर्ष में समूह–साधन को व्यापक तकनीकि विस्तार मिला| सूचना प्रद्योगिकी द्वारा प्रदत्त सामाजिक माध्यम निश्चित ही इस का सबसे बड़ा कारक रहे हैं|

पिछले कुछ समय से सामाजिक मध्यम जन चेतना का प्रसार प्रचार करने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं| बहुत से विचार विमर्श सामाजिक माध्यमों के माध्यमों से सेमिनार हॉल, जनसभाओं, नुक्कड़ सभाओं, नुक्कड़ से आगे बढ़ कर तेजी से अधिक लोगों तक पहुँच पा रहे थे| इस से द्विपक्षीय संवाद की प्रबल संभावनाएं बनीं| विद्वानों को जनसाधारण तक सीधे विचार रखने का मौका मिला तो अल्पज्ञानियों को विद्वानों के समक्ष अपनी अज्ञानता का विष्फोट करने का समान अवसर दिया गया|

पिछले आम चुनावों में सामाजिक माध्यमों ने जन – समूह को एक साथ जोड़कर देश में एक राजनीतिक तौर पर वैचारिक माहौल पैदा करने में सफलता प्राप्त की थी| उसके बाद दिल्ली और बिहार चुनावों में सामाजिक माध्यमों का प्रयोग अन्य राजनीतिक दलों ने कुशलता पूर्वक किया और इसकी व्यापक चर्चा भी हुई| इस से देश में निश्चित ही सामाजिक माध्यम के प्रति जानकारी, जागरूकता, रूचि और प्रयोग में वृद्धि हुई| राजनीतिक रूप से माना जा सकता है कि अगले आम चुनाव तक सामाजिक माध्यमों में वही वैचारिक साम्य आ जायेगा जो धरातल (grass –root) पर पहले ही बन चुका था| प्रचार का बहुमुखी, बहिर्मुखी और आक्रमक होना सामाजिक मध्यम में सफलता की कुंजी के रूप में देखा जा सकता है|  चुनावों में जब विचार द्विपक्षीय सामाजिक संवाद के रूप में सामाजिक माध्यमों को प्रचारित और प्रसारित किया गया तो शायद यह सोचा भी नहीं गया था कि यह दिपक्षीय संवाद सामाजिक बेतालों (social media trolls) से आगे बढ़ कर एक भीड़–ताल (crowd – cry) बन जायेगा|

इस वर्ष, सामाजिक माध्यमों ने वैचारिक समूह-साधन के रूप में अपना विकास करने में व्यापक सफलता प्राप्त की है| हाल के भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना – आन्दोलन और दिल्ली बलात्कार काण्ड के समय टेलीविजन ने प्रचार प्रसार में व्यापक भूमिका निभाते हुए प्रिंट और रेडियो को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया था| इस वर्ष के अंतिम क्षणों में हम देख रहे हैं कि समूह-साधन देश में वैचारिक क्रांति या वैचारिक अव्यवस्था ला रहा है| हाल में हमने बहुत से मामलों में विचारों, कुविचारों, प्रचार, दुष्प्रचार, तर्कों और कुतर्कों को रणनीतिक रूप से समूह- साधित किया गया|

इस वर्ष के बिहार चुनावों में सामाजिक मीडिया में वह दल छाया रहा जिसका धरातल पर कोई आधार नहीं था| गाय हत्या के विरोध में तर्कों और कुतर्कों का ऐसा समां बंधा कि किसी को भी गाय का हत्यारा बना कर पेश करना और उसकी भीड़ द्वारा हत्या करा देना आसन हो गया| हम सब जानते हैं कि देश में बहुसंख्यजन शाकाहारी नहीं हैं और शाकाहार की सबकी अपनी परिभाषाएं है, परन्तु समूह – साधन के माध्यम से सामजिक माध्यमों में देश की छवि “शुद्ध सात्विक जैन शाकाहारी राष्ट्र” की बनाई गई|

देश की न्याय प्रणाली के ऊपर सामाजिक माध्यमों ने इस वर्ष मजबूत हमले किये| कई आरोपियों को सामूहिक पसन्द – नापसंद के आधार पर दोषी और निर्दोष साबित किया गया| संजय दत्त दोषी साबित होने के बाद भी पैरोल का आनंद आसानी से उठाते रहे| आमिर खान और शाहरुख़ खान अपने विचार रखने के लिए उस भीड़ द्वारा दोषी करार दिए गए, जिसे न विचार समझने की क्षमता थी, न विमर्श का माद्दा था, न न्याय प्रणाली में विश्वास था, सारा विचार – विमर्श – न्याय और दंड प्रक्रिया सामाजिक माध्यम के भीड़–ताल के हवाले कर दी गयी| पुलिस, अधिवक्ताओं और अभियोक्ताओं से प्रश्न पूछने के स्थान पर सलमान खान को दोषी घोषित न करने के लिए उच्च न्यायालय को भीड़- ताल के कठघरे में खड़ा कर दिया गया|

इस वर्ष में भीड़ ने यह तय किया कि कौन ज्ञानवान, बुद्धिमान, तार्किक, दार्शिनिक, विचारक, कलाकार, लेखक, कवि, संगीतकार, अभिनेता आदि कितना मूर्ख और मंदबुद्धि है| भीड़-तंत्र ने किसी पक्ष को सुने समझे जांचे-परखे बिना निर्णय दिए और न्याय को निर्दयता से समूह-साधन के हवाले कर दिया गया| अवार्ड वापसी के मसले पर देश में सर्वोत्तम विद्वानों को, मात्र मतभेद के आधार पर, शत्रु देश भेजने की व्यवस्था की गई|

वर्ष के अंत समय में हमने देश की सरकार, संसद, लोकतंत्र और राजनीति को भीड़ –ताल के समक्ष घुटने टेकते देखा| अपनी सजा काट चुके एक बाल अपराधी को सिर्फ़ भीड़ – ताल के दबाब में जबरन जेल में बंद रखने के प्रयासों से विश्व में भारत की उस छवि को हानि पहुंची| भीड़ – ताल से समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए सरकार और संसद ने बाल न्याय संबंधी कानून में आनन् फानन में ऐसे बदलाव किये जिस से देश की न्याय प्रणाली और विश्व में भारत की न्यायप्रिय छवि को धक्का लगा|

दुर्भाग्य से यह वर्ष, सामाजिक माध्यमों के भीड़ – तंत्र द्वारा न्याय का समूह – साधन करने के लिए जाना जायेगा| इस वर्ष भारत, प्राचीन शास्त्रार्थ व्यवस्था और विचार – विमर्श के विपरीत कट्टरता और विचारशून्यता की ओर कदम बढ़ाता रहा| बीतता हुआ यह वर्ष सुकरात को भीड़ से सहमत न होने के कारण जहर दिए जाने की पुनरावृत्ति का वर्ष है|

I’m sharing my #TalesOf2015 with BlogAdda.

पर्यटन जमीन पर


हमारे पर्यटक भगवान नहीं होते, उनसे बढ़कर होते हैं| पर्यटक अपने घर पर भले ही जमीन पर सोता हो, जब भी हम पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करते हैं तो बेहद आलीशान कमरा, मखमली गद्देदार पलंग, वातानुकूलन, शानदार देशी – विदेशी खाना आदि हमारे जेहन में होते हैं| हम पर्यटन के नाम पर खान – पान, नाच – गाने के रंग में केवल मौज – मस्ती परोस रहे हैं| क्या मौज – मस्ती के बाहर पर्यटन की दुनिया नहीं है? भले ही इस बारे में कोई सीधी बात नहीं हुई, मगर हाल में आउटलुक ट्रैवलर रेस्पोंसिबल टूरिज्म समिट के दौरान यह बात मेरे दिमाग में घूमती रही| इस सम्मलेन में मेरे प्रश्न के सभी उत्तर थे|

पर्यटन जमीन से भी जुड़ सकता है| लोग वास्तव में संस्कृति और सभ्यता से जुड़ने आते हैं; प्रकृति से प्रेम करते हैं; बेहद सादा जीवन जीना चाहते हैं; बनावट से दूर भी उन्हें दुनिया दिखती है; और पर्यटन विलासिता के बिना भी समृद्ध हो सकता है| यह वो विचार हैं, जो मेरे मन में सम्मलेन के दौरान उमड़ने लगे थे|

किसी भी साधारण सा जीवन यापन भी बिना किसी हो – हल्ले के न केवल नेक पर्यटन हो सकता है वरन एक सुन्दर व्यवसाय भी हो सकता है|

अगर मैं अपनी बात करूं तो शादी के बाद घूमने के लिए हमने गोवा के समुद्रतट के स्थान पोंडिचेरी जाना पसंद किया था| भीड़, गंदगी, हो – हल्ला और शाही स्वागत, यह सब हर किसी के लिए नहीं है| इनसे हमेशा मन को संतुष्टि और शान्ति नहीं मिलती| हम एक भागदौड़ की जिन्दगी जी रहे हैं, हमें शान्ति और संतुष्टि की जरूरत है, जो हमें पर्यटन के माध्यम के मिलते है| एक उचित पर्यटन हमें पर्यावरण, प्रकृति, संस्कृति, समृद्धि, सम्वेदना, और समन्वय से जोड़ता हैं| यह सम्मलेन कहीं न कहीं इन बातों की पुष्टि कर रहा था|

इस सम्मलेन में आईटीसी होटल्स  – रेस्पोंसिबल लक्ज़री, सीजीएच अर्थ – एक्सपीरियंस होटल, नीमराना होटल्स – नॉन-होटल होटल्स, जैसे बड़े होटल थे तो  विलेज वे, चम्बल सफारी, कबानी बम्बू विलेज जैसे अनुभव भी थे| इन सब अनुभवों के अपने अनुभव थे जो हमें एक साथ पर्यटन की फंतासी, उसकी उपलब्धियों और उसकी जमीन और जमीनी हक़ीकत से एक साथ जोड़ते हैं| सरकारें अपनी तरफ से एक साथ पर्यटन को बढ़ावा देने से लेकर उसके समुचित और नियंत्रित विकास के सारे प्रयास कर रहीं हैं| पर्यटकों का अधिक आवागमन किसी भी पर्यटक स्थल के विशिष्ट सौन्दर्य को हानि पहुंचा सकता हैं, इस लिए व्यापक मगर नियंत्रित पर्यटन हमारे समय की आवश्यकता है|

इस सम्मलेन में सरकारों और अफसरानों के विचार और अपने अनुभव सुनने का अवसर भी रहा| इस सम्मलेन में भारत सरकार के पर्यटन विभाग के साथ केरल पर्यटन, मध्य प्रदेश पर्यटन, उत्तराखण्ड पर्यटन, छत्तीसगढ़ पर्यटन, गुजरात पर्यटन, और उत्तर प्रदेश पर्यटन मौजूद थे| इसके अलावा  पर्यटन से जुड़ी अन्य संस्थाओं, और विद्वानों के विचार भी सुनने का  अवसर मिला|

विलेज वे और चम्बल सफारी भले ही सुनने में नए प्रयास और अनुभव मालूम पड़ते हों मगर वो एक उचित रूप से अच्छा व्यवसाय कर रहे हैं|

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चलें पर्यटन को


भारत घुमंतुओं का देश है| साल में एक दो शादी – ब्याह, एक – आध गंगा या गोदावरी स्नान, एक –  आध देवी – देवता, दो  – एक मेले, एक – आध किला – मक़बरा, और हुआ तो एक बार तफ़रीह के लिए जाना हम में से ज्यादातर का सालाना शगल है| कुछ नहीं तो इस जगह के कपड़े और उस जगह की मिठाई| गाँव का आदमी १००, शहर का ५०० और महानगर का १००० किलोमीटर तो साल में घूम ही लेता है| यह अलग बात है कि हम उसे पर्यटन कम ही मानते है| जब पर्यटन नहीं मानते तो जिम्मेदार पर्यटन की बात मुश्किल से हो पाती है|

पहले पर्यटन के प्रमुख स्थान, तीर्थस्थान, आदि नदी – नाले – पहाड़  – झरने पार करने के बाद किसी दूर जंगल में होते थे| प्रकृति की गोद, प्रकृति की शान्ति, जिन्दगी के कोलाहल से दूर| आप अपने खाने – पीने का साधारण सामान साथ ले जाते थे| पर्यटन की कठिनियों के कारण, जिनकी भावना पवित्र, जिम्मेदारी पूरी और धन लोभ कम होता था, उनका ही घूमना फिरना या कहें पर्यटन होता था|

आज सुविधाएँ ज्यादा हैं; चौड़ी सड़क, कार, बस, ट्रेन, हेलिकॉप्टर, कैमरे, मोबाइल, होटल, रेस्तराँ, ढाबे, भण्डारे, धर्मशाला| आज भीड़ की भीड़ तीर्थों, राष्ट्रीय उद्यानों, मेलों, आदि के लिए उमड़ पड़ती है| भीड़ गंदगी, प्रदुषण, पैसा और दुर्भावना छोड़ती हुई आगे गंतव्य तक जाती और लौट आती है|

धार्मिक और पर्यटक स्थान अपनी स्वाभाविक पवित्रता और सुन्दरता खोते जा रहे हैं| पर्यटन को सिर्फ एक लाभप्रद व्यवसाय समझकर व्यवसायी से लेकर सरकार तक पर्यटकों को लुभाने और मुनाफा कमाने के प्रयासों में लगी हैं| बनाबटी झरने और खुबसूरत इमारतें स्वाभाविक सब कुल मिला कर पर्यटन को कंक्रीट जंगल की यात्रा बना दे रहे हैं|

उत्तराखंड की त्रासदी को अभी दो चार साल ही बीते हैं, मगर उस वक़्त की गयीं बड़ी बड़ी बातें न सरकार को याद हैं न व्यवसाईयों को| सरकार को मुख्यतः अर्थ – व्यवस्था और कर संकलन से मतलब है और व्यवसाईयों को अपने तात्कालिक लाभ से| लेकिन क्या इस से पर्यटकों की एक पर्यटक के तौर पर जिम्मेदारी ख़त्म या कम हो जाती है?

एक पर्यटक के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है| पवित्रता और सुन्दरता को बचाए रखना उन लोगों की जरूरत और जिम्मेदारी है जो पवित्रता और सुन्दरता के पुजारी हैं; जो सच्चे पर्यटक हैं|

पद – पर्यटन

पद – पर्यटन का अर्थ यह नहीं है कि हम घर से लेकर अपने गंतव्य की यात्रा पैदल करें| इसके कई पहलू है| अधिक पैदल यात्रा, बेहद कम सामान, पर्यटन स्थान से अधिक जुड़ाव|

हम तकनीकि साधनों जैसे प्रदुषण फ़ैलाने वाले ईधन से चलने वाली कारों और अन्य यात्रा साधनों का प्रयोग कम से कम करें| पैदल चलना न सिर्फ आपको स्थानीय प्रकृति और संस्कृति से जोड़ता है वरन आपको स्वस्थ भी बनाता है|

उतना ही सामान ले जाएँ, खरीदें और प्रयोग करें, जितना हम अकेले अपने कन्धों पर उठा सकें| जितना कम सामान होगा, न सिर्फ यात्रा उतनी सफल होगी वरन हम गंदगी भी उतनी कम फैलाएंगे| हर स्थान के खाने का अपना एक स्वाद और संस्कृति होती है| खाने के डिब्बे और बोतलें खरीदने के स्थान पर स्थानीय संस्कृति और स्वाद का आनंद लें| प्रायः होटल और ढाबे पर्यटकों की बहुतायत के पसंद का और ज्यादा मसाले का खाना बनाते हैं| मगर आजकल घर के स्थानीय खाने का विकल्प आसानी से उपलब्ध है|

सबसे जरूरी बात, किसी भी पर्यटन स्थान पर इतनी ही गंदगी फैलाएं जितनी हम समेट कर वापिस ला सकें; इतनी कम कि पैदल लौटने पर भी समेट कर वापिस ला सकें| पानी की प्लास्टिक बोतलें, पेय पदार्थों के कैन, और नमकीन आदि के पैकेट गंदगी और अपवित्रता फ़ैलाने के सबसे बड़े कारक हैं| अगर आपको इनमें आनंद आता है तो घर पर इनका आनंद लें; कहीं जाकर इनका आनंद लेने का कोई मतलब नहीं है| साथ ही बोतलबंद पानी के भी प्रदूषित और नकली होने की सम्भावना भी बनी रहती है| ज्यादातर पर्यटक स्थलों पर साफ़ पानी उपलब्ध रहता है| अगर साफ़ खाना  – पानी नहीं है तो घर या होटल से खाना – पानी लेकर जा सकते हैं|

मैं प्रायः भीड़ वाले धार्मिक और पर्यटक स्थलों से बचना पसंद करता हूँ| कम भीड़ वाली जगह हमें अधिक शान्ति, आराम, प्रेम, सत्कार और सुरक्षा देतीं है|

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अन्नकूट २०१५


जिस तरह उत्तर भारत में दिवाली का त्यौहार बेहद खास होता है, उसी तरह से अलीगढ़ में हमारे घर में भी होता है| मगर दिवाली के अगले दिन का कार्यक्रम इतना अधिक तय है कि पिछले सोलह सत्रह साल से इसमें किसी भी गम – ख़ुशी के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया है|

सुबह साढ़े सात बजे चाय पीकर मैं सुदामापुरी जाता हूँ, अन्नकूट के लिए सभी सब्जियाँ लेने| उस से पहले चाय पीते समय घर में मौजूद सब्जियों के बारे में मुझे बताया जाता है| दरअसल अन्नकूट बहुत सारी सब्जियों से मिलकर बनती है और उस दिन अधिक से अधिक सब्जियाँ इकट्ठी करना हमारा शौक है| हमेशा १०८ को लक्ष्य मानकर चला जाता है जो कम ही पूरा होता है| पिछले साल केवल ७५ सब्जियाँ हुई थी| अभी तक इस लक्ष्य के लिए फ्रोजन फ़ूड का प्रयोग नहीं किया गया है, न शायद आगे किया जायेगा| आखिर त्यौहार पर स्वाद का मामला है|

सुदामापुरी में इस बार सौ रुपये किलो का भाव था| मेरी पसंदीदा दुकान पर हर ग्राहक को टोकरियाँ और छुरियाँ दी गयीं थीं| मेरा लक्ष्य है कम से कम वजन और अधिक से अधिक सब्जी| इस बार भी दुकान पर लगभग ७० सब्जियाँ है| बहुत छोटे छोटे टुकड़े करने के बाद भी १.६ किलोग्राम का वजन हुआ| मैं इतनी कम गिनती के साथ घर नहीं जाना चाहता| मेरे बेटे का पहला अन्नकूट है जब वो १०० तक गिन सकता है| मुझे गिनती पूरी करनी है| मैं और दुकानों में जाता हूँ और एक दुकान पर मुझे दो दर्जन भर नई सब्जियाँ नजर आतीं है| आधा किलो सब्जियाँ और खरीदी गयीं|

हमेशा की तरह साढ़े नों बजे घर पहुंचा हूँ| अब साफ़ चादर पर सब्जियाँ सजाई जाएँगी, गिनी जाएँगी| और उनका चित्र उतरा जायेगा| उनकी सूची बनेगी| मैं बहुत सारे नाम भूल जाता हूँ| सारी सब्जियों के नाम दुकानदार भी नहीं जानते, या भूल जाते हैं| यह पूरा एक घंटे का कार्यक्रम है| जिस में महिलाऐं रूचि और अरुचि दोनों रखतीं हैं| उन्हें जल्दी से सब्जी साफ़ करनी और काटनी है| वर्ना कुछ सब्जियाँ ख़राब हो सकतीं हैं|

सफ़ेद चादर पर पापा और बेटे ने मिलकर सब्जियाँ सजा दी हैं| बाबा और नाती ने गिनती पूरी कर ली है| अभी ९८ सब्जियाँ ही हुईं है| चलो पहले लिस्ट बनाते हैं| कायस्थ परिवार प्रायः दिवाली पूजन के बाद दौज पूजन तक कलम नहीं चलाते, मैं कंप्यूटर भी प्रायः नहीं लिखता| मगर… यह हमारा अपवाद हैं| लिस्ट पूरी होने तक घर में कुछ और विकल्प तलाशे जायेंगे|

  1. ग्वारपाठा (अलोएवेरा)
  2. प्याज
  3. आलू
  4. अरबी किस्म १
  5. अरबी किस्म २
  6. अमरुद
  7. सेब
  8. ब्रोकली
  9. गोबी
  10. पत्तागोबी
  11. बैगनी पत्ता गोबी
  12. मूली
  13. टमाटर
  14. आंवला
  15. करीपत्ता
  16. बथुआ
  17. राजमा फली
  18. रमास फली
  19. अमेरिकन कद्दू
  20. सीताफल
  21. काशीफल
  22. हरसिंगार पत्ता
  23. हरसिंगार फूल
  24. कचालू
  25. *पत्ता*
  26. कटहल
  27. हरी प्याज
  28. नीबू
  29. हरा धनिया
  30. हरी मिर्च
  31. अदरक
  32. लहसुन
  33. कुल्फा
  34. पटसन फूल
  35. लाल मूली
  36. लाल मूली पत्ता
  37. शलगम
  38. शलगम पत्ता
  39. *जंगली करेला*
  40. बैगनी सेंगरी
  41. *बीन्स*
  42. सेंध
  43. जिमीकंद
  44. रतालू
  45. अनन्नास
  46. मैथी पत्ता
  47. सोया पत्ता
  48. पोदीना
  49. *फल*
  50. *फल*
  51. हरा नारियल
  52. चना साग
  53. सहजन फली
  54. लाल चौलाई
  55. गूलर फल
  56. बेबी कॉर्न
  57. स्वीट कॉर्न
  58. गाजर
  59. करेला
  60. *कंद*
  61. *छोटा टिंडा*
  62. हरी हल्दी
  63. अनारदाना
  64. कच्ची इमली
  65. कमरख
  66. कच्चा केला गूदा
  67. कच्चा केला छिलका
  68. कच्चा आम
  69. गोल गहरा बैगनी बैगन
  70. गोल हल्का बैगनी बैगन
  71. लम्बा बैगनी बैगन
  72. लम्बा हरा बैगन
  73. छोटा बैगन
  74. *पीला बैगन* (सफ़ेद बैगन नहीं मिला)
  75. पालक
  76. गांठ गोबी
  77. गांठ गोबी पत्ता
  78. लेट्तुस
  79. तरबूज
  80. हरी मटर
  81. चपटी सेम
  82. मोटी सेमविदेशी सेम
  83. कुकुरमुत्ता (मशरूम)
  84. सिंगाड़ा
  85. लाल शिमला मिर्च
  86. हरी शिमला मिर्च
  87. तोरई
  88. कच्चा पपीता
  89. मौसमी
  90. कुंदुरू
  91. झरबेरी
  92. *हरी सब्जी/ फल*
  93. कमल ककड़ी
  94. अरबी बोड़ा
  95. चुकंदर
  96. परवल
  97. भिन्डी
  98. खीरा
  99. लौकी
  100. पार्सले
  101. पालक
  102. मूली पत्ता
  103. सरसों पत्ता
  104. सरसों फूल
  105. तुलसी पत्ता
  106. सहजन पत्ता
  107. सहजन फूल
  108. मेवे (काजू बादाम पिस्ता)

यह नोट किया गया कि इस मौसम के कुछ सामान जैसे शकरकंद, हरी सौंफ रह गए, जिन्हें लाया जा सकता था| सब्जी सजाते और लिस्ट बनाते में ११ बज गए हैं|

अगले डेढ़ घंटे तक दो लोग सब्जी काटेंगे| कोई भी सब्जी १० ग्राम से अधिक नहीं जाये और पत्तेदार सब्जियाँ कुल मिला कर दो तिहाई से कम हों| मसाले वाली सब्जी जैसे हरी हल्दी सही अनुपात में ही रहें| हम जानते है कि अगर सब्जियाँ सत्तर से अधिक हैं तो विशेष स्वाद आयगा वर्ना तो खाना सिर्फ खाने लायक ही बनेगा|

करीब एक बज चुका है| साधारण हींग जीरे के बेहद सादा मसाले में सब्जियों को छोंका जा रहा है| सूखा धनिया और हल्दी भी डाली जा सकती है| सभी कटी सब्जियाँ प्रेशर कूकर में डाल दी गयीं है| मध्यम आंच| तीन या चार सीटी| कुल मिला कर १० मिनिट आंच पर|

हल्का खाने का मन है तो रोटी वर्ना पूड़ी बनेंगी| इस बार रोटी बनाई जा रही है|

अगले साल का इन्तजार है| हम साल में कई बार मिक्स वेजिटेबल बनायेंगे मगर वो कबी अन्नकूट की जगह नहीं ले पायेगा|

पापा कह रहे हैं, अगर अलीगढ़ में १०८ सब्जियाँ मिल सकतीं हैं तो पूरे भारत में १००८ से अधिक तो हर हाल में होंगी| पापा शायद एक महान समारोह की परिकल्पना कर रहे है|

tangytuesday Tangy Tuesday Picks – December 1, 2015

राजीव गाँधी और नरेंद्र मोदी


नरेंद्र मोदी के समर्थक, जिन्हें प्रायः मोदी भक्त या सिर्फ भक्त कहा जाता है अक्सर कांग्रेस के नेहरू – गाँधी परिवार के कट्टर आलोचक के रूप में उभर कर सामने आते हैं| राजीव गाँधी और उनके पुत्र राहुल गाँधी अक्सर उनके निशाने पर बने रहते हैं| नरेन्द्र मोदी के आलोचक मोदीकाल की तुलना आपातकाल या इन्दिराकाल से करते हैं| उधर एक समालोचकों के एक वर्ग को लगता है कि मोदी अपनी तुलना भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल या भारत में आर्थिक सुधारों के प्रणेता पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के करना पसंद करेंगे| परन्तु नरेन्द्र मोदी की बहुत सी बात्तें राजीव गाँधी से मेल खातीं हैं|

भविष्य स्वप्न

राजीव गाँधी को अपने युवा अवस्था में राजनीति से दूर अपना करियर बनांते देखा गया था और वह एक पायलट थे| नरेन्द्र मोदी अपनी युवा अवस्था में एक ऐसे संगठन में काम करते थे जिसका कम से कम घोषित उद्देश्य समाजसेवा और धर्म का उत्थान है| भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीति में हस्तक्षेप करते देखा जाता है मगर उसके लिए कार्य करना कम से कम नरेंद्र मोदी की युवा अवस्था में राजनीति में आने का सुरक्षित मार्ग नहीं था| दोनों व्यक्तित्व अपने आप से नहीं वरन अपने आदरणीयों के निर्णय या राय के कारण राजनीति में आयें हैं| राजीव गाँधी के मामले में निजी परिवार और नरेंद्र मोदी के मामले में संघ परिवार ने मुख्य निर्णय या राय व्यक्त की|

मुख्य अनुभव

दोनों ने राजनीति कि वास्तविक शिक्षा सक्रिय राजनीति में आने के बाद ली और प्रधानमंत्री बनते समय दोनों के सहयोगी केन्द्रीय राजनीति के लिए उनको योग्य नहीं मानते थे परन्तु उनकी बढ़ती लोकप्रियता के आगे नतमस्तक थे| दोनों के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ उनके चयन से अन्दर ही अन्दर संतुष्ट नहीं माने जाते थे|

दंगे और नरसंहार

दंगे और नरसंहार से निपटने में दोनों अपने अपने शासन काल में असफल माने जाते हैं| यहाँ तक कि दोनों के ऊपर उन नरसंहारों में खुद से शामिल होने या उसका नेतृत्व करने का आरोप लगते रहते हैं| दोनों के समर्थक दुसरे के काल में हुए नरसंहार को अपने अपने नेता के राजनितिक बचाव में प्रयोग करते हुए सहअस्तित्व का परिचय देते हैं|

लोकप्रियता

दोनों नेता अपने समय के युवा वर्ग में बहुत लोकप्रिय हैं| उम्र के तमाम अंतर के बावजूद उन्हें अपने समय में युवावर्ग में लोकप्रियता हासिल हैं| दोनों नेता अपने अपने समय में संचार माध्यम में छाये रहे हैं| बुजुर्ग वर्ग दोनों के शंका से देखता था और असहाय था|

विश्व नेता

दोनों नेताओं में अपने आप को विश्व नेता के रूप में स्थापित करने की ललक देखी गयी| जहाँ राजीव गाँधी को बहुत से अन्तराष्ट्रीय महत्व के निजी सम्बन्ध विरासत में मिली, वहां नरेंद्र मोदी को ख़राब अन्तराष्ट्रीय छवि के साथ मैदान में उतरना पड़ा| मगर नरेंद्र मोदी को अपने प्रचार तंत्र और विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से समर्थन मिल रहा है| परन्तु दोनों की विदेश नीति हमेशा प्रश्नचिन्ह के साथ देखी जाएगी| जहाँ राजीव गाँधी श्रीलंका के साथ सम्बन्ध बिगड़ने के दोषी माने जाते हैं वहीँ नरेंद्र मोदी नेपाल के साथ भारत के पुराने संबंधों को कम से कम फोरी तौर पर बिगाड़ बैठे हैं|

नई सदी

राजीव गाँधी जहां अपनी सदी के अंत के डेढ़ दशक पहले २१वीं सदी की बात करते नहीं थकते थे, वहीँ मोदी अपनी सदी के प्रारंभ के डेढ़ दशक बाद २१वीं सदी की बात करते दिखाई दे जाते हैं| दोनों के भविष्य स्वप्न दूर तक जाते हैं, जिन पर जमीनी अमल के बारे में संदेह दोनों स्थिति में बना रहता है|

सूचना प्रद्योगिकी

राजीव गाँधी का कंप्यूटर प्रेम उनके काल में चर्चा का विषय था| उन्हें देश में सूचना क्रांति का मसीहा कहा जा सकता है| उनके समय में उनके विरोधी कंप्यूटर पर सरकार और देश के बहुत अधिक आश्रित हो जाने का खतरा देखते थे| इधर नरेंद्र मोदी को भी सामाजिक सूचना क्रांति के मसीहा के रूप में देखा जाता है| निर्वावाद रूप से वो सामाजिक सूचना क्रांति का अपना चेहरा हैं| भले ही सामाजिक सूचना पटल पर उनके समर्थकों से समाज परेशान होने की बात करता है|

कैमरा

राजीव गाँधी के समय में मोबाइल फ़ोन का प्रचार नहीं था न ही डिजिटल कैमरा था| मगर राजीव देश – विदेश में पर्याप्त घूमे और उनके चित्र मीडिया में आते रहे| दोनों नेताओं को फ़ोटो खींचने का भी बहुत शौक माना जाना है| क्योंकि उस समय सेल्फी नहीं थे, राजीव अक्सर फ़ोटो खींचते भी नजर आते थे| वर्तमान में मोदी को सेल्फी खींचने का शौक है| मोदी का कैमरा प्रेम अगर आज मुहावरा है तो राजीव ने भी कैमरे के लिए कम काम नहीं किया|

राजीव गाँधी और नरेंद्र मोदी के समर्थकों को समझना होगा कि दुनिया छोटी है और एक ही धुरी पर घुमती है|

कृण्वन्तो भारत शूद्रं!


भारतीय प्रधानमंत्री महोदय में अभी हाल में ही “मेक इन इण्डिया” यानि “भारत में निर्माण” का आह्वान किया| किसी को भी इस बात से आपत्ति नहीं हो सकती कि जब निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं होते तो विकास करने और गरीबी हटाने के लक्ष्य मात्र बातें ही रह जाने वाली हैं|

पुरातन काल से निर्माण और सेवा क्षेत्र भारत में महत्वपूर्ण समझे गए हैं इस बात का सीधा प्रमाण है भारत जाति व्यवस्था का जन – सांख्यिक अनुपात| भारत में सेवा और निर्माण के सभी कार्य उन लोगों जिन लोगों ने अपनाये उन्हें बाद जाति व्यवस्था के प्रारंभ में शूद्र कहा गया| जाति व्यवस्था के तीन वर्ग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य देश भले ही सत्ता और सुख का लाभ उठाते रहे हों मगर जनसंख्या अनुपात में उनका कुल जोड़ शूद्रों के मुकाबले सदा ही कम रहा है| हम जाति व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा किये बिना भी इस बात को समझ सकते हैं कि सदा ही इस बात का महत्त्व समझा गया है कि जनशक्ति की बहुसंख्या उत्पादक कार्यों में लगे| यह भी विडम्बना हैं कि उत्पादक और सेवा क्षेत्र के लोग प्रायः सत्ता और सुख से वंचित रहते हैं और उनमें खुद को और  अपनीं अगली पीढ़ियों को अपने वर्तमान स्तिथि से से ऊपर या हो सके सत्ता केंद्र में देखने की प्रवृत्ति होती है| हो सकता है कि विकास की इसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए जाति व्यवस्था में कट्टरता का समावेश किया गया हो जो बाद में और अधिक अनुचित शोषण का रूप लेता गया| दुर्भाग्य से इस सबका एक परिणाम यह हुआ कि भारत में बहुत से उत्पादक और सेवा कार्यों को निम्न स्तर का माना जाने लगा|

अभी बड़े उद्योगों पर जोर दिया जा रहा है, मगर किसी भी बड़े उद्योग की सफलता के पीछे बहुत से छोटे और मझोले उत्पादक और सेवा प्रदाता होते हैं| भारत में निर्माण कार्यों को तभी प्राथमिकता मिल सकती है जब उत्पादन और सेवा कार्यों विशेषकर छोटे और मझौले उत्पादकों और सेवा प्रदाताओं को उचित सम्मान मिले और शूद्र हो जाना लज्जा की बात न समझी जाये| साथ ही जातिगत और पैतृक रूप से निर्माण, उत्पादन और सेवा कार्यों में लगे  लोगों को आधुनिक प्रशिक्षण के साथ अपने परंपरागत काम को सम्मान से करने का और उनके कार्य में यदि कोई अमानवीय तकनीकि प्रयोग हो रही है तो उसके स्थान पर आधुनिक मानवीय  तकनीकि का प्रशिक्षण दिया जाये|

पढ़ी लिखी अयोग्यता


पिछले एक  आलेख में मैंने कंपनी सेक्रेटरी के बहाने देश के रोजगार परिदृश्य की विवेचना की थी| आज कंपनी सेक्रेटरी के बहाने देश में शिक्षा के स्तर की चर्चा करेंगे|

दिल्ली रेडिमेड कंपनी सेक्रेटरी का उत्पाद केंद्र है| यहाँ के उच्च स्तरीय कोचिंग सेंटर परीक्षा की बहुत श्रेष्ठ तैयारी कराते हैं| साथ ही बहुत से श्रेष्ठ कंपनी सेक्रेटरी बिना पैसे लिए संस्थान की ओर से छात्रों के ज्ञान बाँटते हैं|

परन्तु, पिछले वर्ष एक कंपनी के डायरेक्टर ने मुझे कहा था कि एक बार में कंपनी सेक्रेटरी परीक्षा पास कर कर आने वाले दस प्रत्याशी उसे पब्लिक कंपनी और पब्लिक सेक्टर कंपनी का अंतर नहीं बता सके| इसके लिए प्रायः भारतीय कंपनी सेक्रेटरी संस्थान को दोष दिया जाता हैं| मगर इसके कहीं अधिक दोषी हमारा समाज और शिक्षा के प्रति सामाजिक धारणा है| 

यह सब हुआ कैसे?

कहा जा रहा है कि कंपनी सेक्रेटरी मिनटबुक में दो लाइन भी बिना नक़ल के नहीं लिख सकते| कहीं यह भारतीय शिक्षा तंत्र का सामान्य परिदृश्य तो नहीं?

पहला तो छात्र ज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं वरन परीक्षा पास करने के लिए पढने लगे हैं| परीक्षा पास करने के लिए उन गूढ़ प्रश्नों के उत्तर याद कर लिए जाते हैं जिन्हें प्रायः परीक्षा में पूछा जाता है या पूछा जा सकता है| याद करने की यह प्रक्रिया इतनी मशीनी है कि उसमें कानूनी गहराई समझने के लिए गुंजाईश ही नहीं बची है|

जब यह छात्र किसी भी कोचिंग सेंटर में जाते हैं तो कोचिंग सेंटर का लक्ष्य होता है, पास हुए छात्रों की संख्या और प्रतिशत बनाये रखना| उनके यहाँ किसी भी सवाल जबाब का कोई स्थान नहीं रहता| केवल बचकाने प्रश्न छात्रों के सामने रखे जाते है जो उन्हें जबाब याद करने की ओर ले जायें, न कि समझने दें| हाँ, अगर कोई छात्र प्रश्न पूछता है तो उसे उत्तर दिया जाता है मगर इस भगदड़ में प्रायः छात्र प्रश्न पूछने की जगह उत्तर याद करने में लगे रहते है|

संस्थान अपने पुराने ढर्रे पर चल रहा है| प्रायः कोचिंग सेंटर और छात्र पूछे जाने वाले सवालों का पहले से जो अंदाजा लगाते हैं उस से मिलते जुलते सवाल आते है| परीक्षा में बहुत सटीक उत्तर के कमी रहती है| अभी हाल ही में एक सम्म्मेलन में बात उठी थी की अगर कोई परीक्षक जरा भी सख्ती से नंबर देता है तो उसके पास संस्थान की ओर से चेतावनी सन्देश आ जाता है|

जब यह छात्र उत्तीर्ण होकर नौकरी के लिए जाते हैं तो कंपनियां उनको अनुकूल नहीं पातीं| बहुत सी बातें जो छात्र जीवन में डट कर पढ़ी गयीं है वो कई बार कंपनी में नहीं होनी होतीं; जैसे मर्जर| जो कार्य कंपनी में रोज होते हैं उनपर छात्र जीवन में कभी ध्यान नहीं दिया गया होता जैसे; कानूनी विवेचना, रेजोलुसन, बोर्ड मीटिंग, समझौते| यह केवल छात्र की ही गलती है नहीं है वरन उस सिस्टम की भी है जो कोर्स को तैयार करता है| रोजमर्रा के काम पढाई में हल्के लिए जाते हैं जबकि उनमें अगर एक्सपर्ट हों  तो समय भी बचेगा और बोर्ड की निगाह में जगह भी बनेगी| मगर कहा जा रहा है कि आज कंपनी सेक्रेटरी मिनटबुक में दो लाइन भी बिना नक़ल के नहीं लिख सकते|

मगर क्या यह देश का परिदृश्य नहीं हो गया है| इसी कारण अंडर एम्प्लॉयमेंट भारत का एक स्वीकार्य सच बन गया है|

प्रदूषित दिल्ली!!


देश की राजधानी दिल्ली को देश की जनता राजनीति के पवित्र धर्मस्थल की तरह सम्मान देती है| उसे दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा दिया जा रहा है| दिल्ली में सारे ऑटो टैक्सी सबको तो गैस पर चलवा रहे है| प्रदूषण फ़ैलाने वाले हर मिल और कारखाने को दिल्ली के बाहर निकलवा दिया गया है| बाहर से आने वाले हर ट्रक, टैक्सी पर टोल लगा दिया गया है|

मगर कहते हैं न, जब दुनिया में सब गन्दा दिखाई देने लगे तो अपने अन्दर झाँक लेना चाहिए| दिल्ली का भी यही हाल है| दिल्ली से दुनिया गन्दी, पिछड़ी, गरीब, नजर आती हैं| अगर दिल्ली अपने अन्दर झांके तो दिल्ली की हवा इतनी गन्दी कि साँस न ले पायें, दिल्ली इतनी पिछड़ी कि खुद को साफ़ न कर पाए और इतनी गरीब की साफ़ हवा भी न खरीद पाए|

दिल्ली में आदमी के पास घर हो या न हो गाड़ी होनी चाहिए| एक गाड़ी भले ही वो रोज मेट्रो पर पार्क हो जाए मगर दिखावे का गुरूर हो पूरा हो| दिल्ली के लोग टहलने भी गाड़ी से जाते है| हर घर में दो चार गाड़ियाँ मिल जाएँगी| अगर शादी ब्याह दावत या कोई भी सामाजिक काम हो तो घर का हर सदस्य जाये या न जाये गाड़ी जरूर भेजी जाती है|

अगर दिल्ली के प्रदूषण की बात की जाये तो अगर फालतू कारें हटा ली जाएँ तो ट्रैफिक भी कम हो और प्रदूषण भी| सबसे पहली बात दिल्ली में हर जगह पार्किंग का दाम बेहद कम हैं या अवैध पार्किंग के ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होती| दिल्ली के हर कॉलोनी में सड़कें शाम ढलते ही पार्किंग में तब्दील हो जातीं हैं| इस जबरन और अवैध पार्किंग व्यस्था पर उसी प्रकार नाक मूंह सकोड़ने की जरूरत है जिस प्रकार अवैध बस्तियों और झुग्गी – बस्तियों के बारे में किया जाता है|

जब तक कोई खरीददार अपने घर में में निजी क्षेत्र में पार्किंग की व्यस्था न दिखा दे तब तक उसे कर खरीदने की अनुमति नहीं होनी चाहिए और हर कार के लिए अलग अलग पार्किंग की व्यवस्था न होने पर भी कार लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए| कंपनी आदि के नाम पर खरीदीं गयीं कारों के लिए भी सामान व्यवस्था होनी चाहिए| पार्किंग क्षेत्र का वेरिफिकेशन करने के लिए उसी प्रकार से कंपनी सेक्रेटरी या अन्य प्रोफेशनल्स को जिम्मेदारी दी जा सकती है जिस प्रकार से कंपनी के रजिस्टर्ड ऑफिस के वेरिफिकेशन के लिए दी गयी है| सड़क पर पार्क की जाने वाली गैर व्यवसायिक गाड़ियों से बाजार दर पर कम से कम महीने भर का किराया वसूला जाना चाहिए|

व्यावसायिक वाहनों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्हीकल को कुछ छूट दे जा सकती है क्योकि वो न सिर्फ देश के सकल उत्पाद में योगदान देते है बल्कि यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाते हैं|

पुनःश्च –भारत में अधिकतर कार या तो दहेज़ में आती है या कर्जे में| अतः निजी कारों को हेयदृष्टि से देखे जाने की महती आवश्यकता है|

साम्राज्यवादी हिंदी


हिंदी भाषा को बहुत से लोग एक कृत्रिम भाषा मानते हैं जिसे उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दवी – उर्दू – रेखता से उधार लिए गए व्याकरण के साथ रचा गया| यदि हम व्याकरण की बात करें तो हिंदी का व्याकरण उर्दू से बेहद नजदीक है और बहुमत के अंधविश्वास के विरुद्ध संस्कृत व्याकरण से मेल नहीं खाता जैसे संस्कृत में तीन वचन होते हैं जबकि हिंदी – उर्दू में दो|

हिंदी कृत्रिमता का दूसरा आधार है, हिंदी का कोई अपना आधार क्षेत्र नहीं होना और इसका विकास बृज, खड़ी बोली, अवधी, भोजपुरी, मागधी, मगही, मैथली, मारवाड़ी, और तथाकथित हिंदी – परिवार की भाषाओँ के ऊपर अपने साम्राज्यवादी विस्तार से हिंदी ने लोकप्रियता पाई है| इनमें से एक समय में साहित्य – संस्कृति की भाषा रहीं ब्रजभाषा और अवधी का लगभग विलो हो रहा है और हिंदी परिवार की अन्य भाषाएँ अपने बचाव में प्रयासरत हैं| इस साम्राज्यवाद का सबसे पहला शिकार उत्तर – प्रदेश रहा है जहाँ की तीन प्रमुख भाषाएँ हिंदी विकास की भेट चढ़ चुकीं हैं – ब्रज, अवधी और उर्दू|

हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओँ का विकास हम भारत में सांस्कृतिक आदान – प्रदान और उससे उत्पन्न प्रतिक्रियाओं में देख सकते हैं| हिन्दवी – उर्दू को अपने समय की विभिन्न भाषाओँ से अपने शब्द मिले जिनमें संस्कृत अरबी फारसी अंग्रेजी पुर्तगाली और तमाम भारतीय भाषाएँ शामिल हैं| दुखद रूप से यह एक सरकारी और दरबारी भाषा रही और इसका आधार क्षेत्र सरकारी क्षेत्र और तत्कालीन राजधानियां रहीं| मगर इसे शीघ्र ही मुसलमानों से जोड़ दिया गया| उसका आम रूप जल्दी ही आर्यसमाज और कांग्रेसी आंदोलनों के साथ हिंदी के रूप में विकसित किया जाने लगा| यह उन भारतीय राष्ट्रवादी सामंतों की भाषा बनने लगी जिनका झुकाव हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति था| पहले आर्यसमाजी स्वामी दयानंद सरस्वती और बाद में वैष्णव विचारधारा के धनी गाँधी जी इसके नेता थे|

इस बात के प्रमाण हैं कि प्रारंभिक हिंदी कैथी लिपि में लिखी जाती थी| मगर भारत का संविधान बनते समय हिंदी के लिए ब्राह्मणवादी देवनागरी का चयन किया गया| हिंदी शायद विश्व की एकमात्र आधिकारिक भाषा है जिसके लिए किसी राष्ट्र का संविधान लिपि (script) का भी निर्धारण करता है| अर्थात कैथी, रोमन, ब्राह्मी आदि लिपि में लिखी गयीं हिंदी भारत की आधिकारिक भाषा नहीं है| आम तौर पर भाषाएँ अपनी लिपि स्वयं चयन करतीं हैं|

हिंदी ने पहले उर्दू को मुसलमाओं की भाषा और बाद में पाकिस्तान की भाषा कहकर देश से निकालने का प्रयास किया| उसके साथ ब्रज और अवधी को गाँव – गंवार की भाषा कहकर तिरस्कृत किया जाता रहा है| आज जब हिंदी समूचे भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने में लगी है और अंग्रेजी को चुनौती दे रही है| अंग्रेजी और हिंदी का यह विकास भारत में छोटी और मझोली भाषाओँ के लिए खतरा बन कर उभर रहा है|

बैल उन्ही का बाप है..


हम सब गाय को माँ मानते थे और कम से कम परीक्षा के दिनों में गाय की चरणवंदना जरूर करते| उधर वो लोग कभी गाय को दूध के लिए लट्ठ बजाते, तो कभी कभी दिन रात के लिए घर के बाहर भिक्षाटन के लिए छोड़ देते| भिक्षा के अभाव में हमारी गाय माता हमारे सामने ही कूड़ा खाने के लिए मजबूर रहती| हम क्यों देते खाना| रोज शाम को गाय जिनके घर जाकर दूध देती है, उनके घर खाए न| मगर गाय माता भोली होती हैं|

वो लोग गाय के बिकने से भी ख़ुश होते, बला टली| खरीदी जाने वाली गाय दुधारी होतीं और बेच दी जातीं ज्यादातर बुढ़िया गाय| अगर गाय मर जाती या मरने वाली होती, तो भी मोल – भाव होता| रिक्शे में डालकर गाय ले जाई जाती| कोई नहीं पूछता चमड़ी कहाँ गयी और शरीर कहाँ? खादी की दुकान पर मिलने वाली गौरक्षा जूतियाँ कभी फैशन में नहीं आयीं, न मुख्यधारा के न शाखा के| काफ लेदर का जूता ही बाजार में चमकता है, भले ही सिंथेटिक हो|

आज तक नहीं पता लगा, बछड़े पैदा होने के महीने भर में क्यों मर जाते हैं और बछिया क्यों लम्बी उम्र लिखा कर लाती है|

बड़े बुजुर्ग बताते हैं; गाय का दूध जिसे हम लोग हारी – बीमारी में ही खरीदते; दूध नहीं, अमृत होता है – उसे दूध की तरह नहीं पीना चाहिए| कलियुग में अब अमृत से अधिक, नशे की जरूरत है| अगर अमृत की जरूरत होती, तो हर घर के आगे स्कूटर – कार नहीं, गाय खड़ी होती|

मगर, उन्हें बैल पसंद था| उनके लिए हम कोल्हू का बैल थे और हमारे लिए वो बछिया के ताऊ| वो अक्सर चिढ़ाते – गाय जिनकी माता है, बैल उन्हीं का बाप है|

बाद में बड़े होने पर पता लगा, गाय अगर माता है, तो सांड जबर बाप है|

हिटलर हिट – इस्रायल फिट


भारत में बहुमत का हिटलर प्रेम बहुत से लोगों को आश्चर्यचकित करता है| इस हिटलर प्रेम  के पीछे क्या मानसिकता काम करती है, यह अपने आप में शोध का विषय है|

लोकतान्त्रिक भारत में तानाशाह की तलाश भारतीय मतदाता, विशेषकर सवर्ण हिन्दू मतदाता का प्रिय शगल है| हर चुनाव में यह किसी तानाशाह की तलाश करते नज़र आते हैं और तानाशाह माने जाने वाले नेताओं को मतदान भी करते है| बहुत सी भारतीय लोकतान्त्रिक पार्टियों के कर्णाधार अपने तानाशाही रवैये के लिए प्रसिद्ध भी हैं| ऐसे में तानाशाह हिटलर अपने ऊँचे तानाशाही कद के लिए तानाशाहों में सर्वोपरि स्थान रखते हैं, और भारत में पूजनीय हैं|

कभी आर्य और कभी यहूदी पिता के संतान बताये जाने वाले हिटलर ने जिस प्रकार अपने को आर्य बताते हुए आर्य उच्चता की बात की, वह भारत में उन्हें लोकप्रिय बनाती है| सवर्ण भारतीय बिना किसी डीएनए टेस्ट के, अपने आप को आर्य बताते हैं और इसलिए बाकी सभी जन समूह उनके लिए तुच्छ हैं| आर्य उच्चता का हिटलरी सिद्धांत भारतीय आर्य विश्वासियों के लिए अपनी सदियों पुरानी दासता की यादों पर मरहम लगाने के काम करता है| उनके लिए हिटलर आर्यकुल शिरोमणि है|

हिटलर ने जिस प्रकार का बर्ताब यहूदियों के साथ जर्मनी में किया वही व्यव्हार भारतीय सवर्ण अपने शत्रुओं के साथ करना चाहते है| यद्यपि शत्रु की तलाश अभी जारी है और शत्रु मिलने तक अन्य भारतियों को शत्रु मानकर तैयारी जारी हैं|

कुछ लोगों का विचार में यहूदी हिटलर समर्थक भारतियों के स्वाभाविक शत्रु होने चाहिए परन्तु अपने आदर्शों के साथ खिलवाड़ करना एक शगल है| यहूदियों के भारत में उसी प्रकार मित्र माना जाता है जिस प्रकार से हिटलर को आदर्श| यहूदियों और भारतियों का यह स्नेह शायद एक तात्कालिक शत्रु के कारण है|

क्या इस्रायल भारत में हिटलर प्रेम को नज़रअन्दाज करते हुए भारत का मित्र है? क्या भारतीय हिटलर के प्रति घृणा करने वाले इस्रायल के मित्र हैं?

आरक्षण का उत्तर


अभी हाल में जब मैंने आरक्षण के पक्ष में अपने विचार रखे तो उसके विरोध में मिलने वाले विचारों में पिछले साठ साल से चल रहे आरक्षण पर इस प्रकार टिप्पणियाँ की गईं मानों यह आरक्षण मनु महाराज के ब्राहमण आरक्षण से अधिक लम्बा चल रहा हो|

जिस प्रकार भारत में आरक्षण पर हाँ और न चल रही है मुझे लगता है कि अगली एक सहस्त्राब्दि आरक्षण को चलना चाहिए| क्या आरक्षण का असली कारण सामाजिक पिछड़ापन मात्र है?

नहीं, देश में शिक्षा और नौकरियों के अवसर बहुत कम हैं| इन सीमित अवसरों में यदि आरक्षण न मिले तो पिछड़े वर्ग को अवसर कदापि न मिल पायें|

हमें आरक्षण को ख़त्म करते से पहले राष्ट्र के विकास पर ध्यान देना होगा, जिससे हर किसी के लिए शिक्षा और रोजगार के पर्याप्त अवसर हों| आरक्षण समग्र विकास में अपनी भूमिका निभा रहा है| दो उदहारण हैं:

पहला: मौर्य काल से मुग़ल काल तक, अर्थात अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति था| परन्तु, समृद्धि का सारा लाभ सवर्णों (मुस्लिम सवर्ण भी) के पास था| जबकि देश के सारे उद्योग आदि बुनकर, बढई, लोहार, चर्मकार, जैसे तमाम पिछड़े और शुद्र वर्ग के हाथ में था| अंग्रेजों में भारतीय विकास और समृद्धि की इस कमज़ोरी को समझा और मर्म पर प्रहार किया| वर्तमान आरक्षण इस गलती को ठीक करने का प्रयास कर रहा है| दुर्भाग्य से भारत का सवर्ण और आरक्षित वर्ग का क्रीमीलेयर आरक्षण के लाभ को सबसे निचले तबके तक नहीं पहुँचने देना चाहता|

दूसरा: जब हम ट्रेन में जाते है तो अपना अपना आरक्षण कराते हैं| अगर आपको लगता है इस ट्रेन आरक्षण की आवश्यकता इसलिए है कि आप आराम से यात्रा कर सकें तो आप गलत हैं| ट्रेन में आरक्षण करने के क्रम में बहुत से लोग यात्रा से वंचित रह जाते हैं| उनके लिए यात्रा की कोई सुनिश्चितता नहीं होती| कारण: कम ट्रेनें, कम सीटें, अर्थात संसाधन की कमी| जबकि यदि संसाधन पर्याप्त हों तो सभी लोग यात्रा कर सकते हैं और आरक्षण की आवश्यकता केवल सीट की सुनिश्चितता के लिए होगी न कि यात्रा की|

आरक्षण के सही उत्तर संसाधन का विकास है|

तानाशाह का इन्तजार


उस वक्त में कानपूर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर बैठा हुआ था कि किसी ने ठेठ कनपुरिया लहजे में कहा, फिर इमरजेंसी लग गयी क्या देश में? दरअसल, एक एक बाद एक कई गाड़ियाँ अपने ठीक समय पर आकर चली गईं थी| देश आपातकाल को ट्रेन के समय पर चलने और अनुशासन के लिए याद करता है| मुझे लगता है कि आपातकाल के बाद जनता सरकार इसीलिए चली गयी कि उसके नेता देश में क्या अपने आप में भी अनुशासन नहीं ला पाए| यहाँ तक कि आपातकाल के अपराधियों को भी जनता परिवार आजतक दंड नहीं दिला पाया|

Captureआपातकाल अगर देश में अनुशासन पर्व रहा तो संजय गाँधी वो सुकुमार तानाशाह, जो देश को मिलते मिलते रह गया|

देश के सपनों का तानाशाह जो ईमानदार होता है, रोबिन हुड होता है, निर्णय लेता है, उसका व्यक्तित्व इतना तगड़ा होता है कि लोग उसके निर्णय को बिना सोचे समझे अमल में लाते हैं| भरोसा होता है, उसका निर्णय देश हित में ही होगा|

आखिर हमारा देश मंदिर – मस्जिद में “सच्चा” विश्वास, “सच्ची” आस्था और आदरणीयों से प्रश्न न करने के शिष्टाचार के साथ ही तो बड़ा होता है|

हम इस आस्था को इंदिरा गाँधी के रूप देख चुके है और नरेन्द्र मोदी के रूप में देख रहे है| भले ही यह नेता, प्रश्नों का उत्तर देने में संकोच न करें, मगर इनके आस्थावान आपको प्रश्न नहीं करने देंगे| जब राष्ट्र सत्ता को अवतार और नारायण के रूप में देखने लगें, तो प्रश्न की सम्भावना नहीं बचती|

क्या हमारा राष्ट्र वाकई चाबुक चाहता है? सर्वेक्षण कहते है कि पचास प्रतिशत पढ़े – लिखे होनहार युवा देश में तानाशाही या सेन्य शासन देखना चाहते है| यह पढ़ी – लिखी होनहार युवा पीढ़ी देश की सबसे अनुशासनहीन पीढ़ी बताई जाती है| वह पीढ़ी जो अपने माता – पिता की बात को आदेश क्या, सलाह भी न मानती हो उसे अगर अपने ऊपर एक बाहरी आदमी का सरकारी चाबुक चाहिए तो यह उसका अपने आप पर व्यंग है|

तानाशाह करेगा क्या? उत्तर घूमफिर कर समान ही होते है: देश का अंधाधुंध विकास, आरक्षण का खात्मा, पाकिस्तान को औकात बताना, आबादी (मुसलमानों और दलितों की) काबू करना| इसमें प्राचीन गौरव की पुनर्स्थापना और काले धन की वापसी भी कभी कभी जुड़ जाते है|

मजे की बात यह कि तानाशाही समर्थक लगभग सभी मानते हैं कि इस हिंदुस्तान का कुछ नहीं हो सकता, और इसलिए सबको अमेरिका और कनाडा का ग्रीनकार्ड सबसे पहले चाहिए|

इंस्टेंट कॉफ़ी, इंस्टेंट मेसेंजर, इंस्टेंट गूगल, इंस्टेंट आरती और इंस्टेंट सेक्स की पीढ़ी को समय कहाँ है? तानाशाही तो कडुवी अंग्रेजी दवा है जिससे भले ही कितना साइड इफ्फेक्ट हो या जड़ से बीमारी न जाये मगर ठीक होने का भ्रम तो पैदा हो ही जाता है| भ्रम बनाये रखना हमारी नियति नहीं इंस्टेंट मजबूरी है|

मैला आँचल


प्रकाशन के साठ वर्ष बाद पहली बार किसी क्षेत्रीय उपन्यास को पढ़कर आज की वास्तविकता से पूरी तरह जोड़ पाना पता नहीं मेरा सौभाग्य है या दुर्भाग्य| कुछेक मामूली अंतर हैं, “जमींदारी प्रथा” नहीं है मगर जमींदार और जमींदारी मौजूद है| कपड़े का राशन नहीं है मगर बहुसंख्य जनता के लिए क़िल्लत बनी हुई है| जिस काली टोपी और आधुनिक कांग्रेस के बीज इस उपन्यास में है वो आज अपने अपने चरम पर हैं, और सत्ता के गलियारे में बार बारी बारी से ऊल रहे हैं| साम्राज्यवादी, सामंतवादी और पूंजीवादी बाजार के निशाने पर ग्रामीण समाजवादी मूर्खता का परचम लहराते कम्युनिस्ट उसी तरह से हैं जिस तरह से आज हाशिये पर आज भी करांति कर रहे हैं| विशेष तत्व भगवा पहन कर आज भी मठों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और सत्ता उनका चरणामृत पाती है| गाँधी महात्मा उसी तरह से आज भी मरते रहते हैं…. हाँ कुछ तो बदल गया है, अब लोगों को ‘उसके’ मरते रहने की आदत जो पड़ गयी है|

पता नहीं किसने मुझे बताया कि ये क्षेत्रीय या आंचलिक उपन्यास है, शायद कोई महानगरीय राष्ट्रव्यापी महामना होगा| मैला आँचल भारत के गिने चुने शहरी अंचलों को बाहर छोड़कर बाकी भारत की महाकथा है; और अगर महिला उत्पीड़न के नजरिये से देखा जाये तो आदिकालीन हरित जंगल से लेकर उत्तर – आधुनिक कंक्रीट जंगल तक की कथा भी है| पढ़ते समय सबकुछ जाना पहचाना सा लगता है|

पूर्णिया बिहार की भूमि कथा का माध्यम बनी है| दूर दराज का यह समाज एक अदद सड़क, ट्रेन और ट्रांसिस्टर के माध्यम से अपने को आपको राजधानियों की मुख्यधारा से जोड़े मात्र हुए है| समाचार यहाँ मिथक की तरह से आते हैं| हैजा और मलेरिया, उसी तरह लोगों के डराए हुए है जिस तरह साठ साल बाद नई दिल्ली और नवी मुंबई के लोग चिकिनगुनिया और डेंगू जैसी सहमे रहते हैं|

कथानायक मेडिकल कॉलेज के पढ़कर गाँव आ जाता है; धीरे धीरे गाँव में विश्वास, युवाओं में प्यार, देश में नाम और सरकार में सतर्कता कमा लेता है| नहीं, मैं डाक्टर विनायक सेन को याद नहीं कर रहा हूँ| गाँव जातियों में बंटकर भी एक होने का अभिनय बखूबी करता है| अधिकतर लोग अनपढ़ है और जो स्कूल गए है वो सामान्य तरीके से अधपढ़ हैं| जलेबी पूरी की दावत के लिए लोग उतना ही उतावले रहते है जिस तरह से आज बर्गर पीज़ा के लिए; मगर हकीकत यह है कि जिस तरह से देश की अधिसंख्य आबादी ने आज बर्गर पीज़ा नहीं खाया उस वक़्त पूरी जलेबी नहीं खायी थी|

बीमारी से लड़ाई, भारत की आजादी, वर्ग संघर्ष, जाति द्वेष, जागरूकता और स्वार्थ सबके बाच से होकर उपन्यास आगे बढ़ता है| यह उपन्यास एक बड़े कैनवास पर उकेरा गया रेखाचित्र है जिसमे तमाम बारीकियां अपने पूरे नंगेपन के साथ सर उठाये खड़ी हैं| ये सब अपने आप में लघुकथाएं हैं और आसपास अपनी अनुभूति दर्ज करातीं हैं|

पुनःश्च – मेरे हाथ में जो संस्करण है, उसमें विक्रम नायक के रेखाचित्र हैं| मैं विक्रम नायक को रेखाकथाकार के रूप में देखता हूँ| उनके रेखाचित्रों में गंभीर सरलता झलकती है| इस संस्करण में उनके कई चित्र सरल शब्दों में पूरी कथा कहते हैं| बहुत से चित्र मुझे बहुत अच्छे लगे|

गुनाहों का दैत्य


पता नहीं क्या कारण रहा कि कई सालों से मैं धर्मवीर भारती का लोकप्रिय उपन्यास “गुनाहों का देवता” पूरा नहीं पढ़ पाया| एक कारण शायद रहा कि जब भी मैं इसे पढ़ना या पुनः पढ़ना शुरू करता, अपने को सुकोमल भावनाओं के भंवर में पाता| मगर इसका फायदा यह भी है कि अब जब गुनाहों का देवता पूरी तरह ख़त्म करने का दृढ निश्चय किया तो माहौल अलग था|

भारत सरकार ने पिछले दिनों पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन यौन सम्बन्ध बनाने के कृत्य  को अपराध की श्रेणी में लाने से मना कर दिया| राष्ट्र के सभी प्रबुद्ध जन इसे अपराध की श्रेणी में लाने की मांग कर रहे है मगर देश में पुरुषवाद उसी तरह हावी है जिस प्रकार महिला आंदोलनों पर महिलावाद| क़ानून के दुरूपयोग, व्यावहारिक कठिनाइयाँ, एकतरफ़ा अपराध, और परंपरा के नाम पर घिनौने अपराध को प्रश्रय देने का जो प्रयास हाल में हुआ उतना तो शायद भारत में कभी नहीं हुआ हो|

ऐसे समय में गुनाहों के देवता का पाठ मुझे उस पड़ाव पर ले गया जहाँ शायद में अन्यथा नहीं पहुँच पाता| यह कालजई उपन्यास सालों पहले लिखी गई मध्यवर्गीय जीवन की एक पवित्र प्रेम कथा है| इसमें आदर्श का दामन थामने वाले पात्र घुटन का जीवन जीने हुए अपने जमीर को मारते और खुद मरने लगते है| प्रेम वास्तविकता की वेदी पर बलि हो जाता है| मगर यह उपन्यास वैवाहिक बलात्कार को हाशिये से उठाकर कथानक के मध्य में लेकर आता है|

“हाथों में चूड़े अब भी थे, पाँव में बिछिया और माँग में सिन्दूर – चेहरा बहुत पीला पड़ गया था सुधा का; चेहरे की हड्डियाँ निकल आयीं थीं और आँखों की रौशनी भी मैली पड़ गयी थी| वह जाने क्यों कमजोर भी हो गयी थी|”

यह तो वर्णन की शुरुवात है| भारती जी उपन्यास को लिखते समय वैवाहिक बलात्कार पर नहीं लिख रहे है इसलिए बहुत साधारण और तटस्थ वर्णन मिलता है मगर स्तिथि कि गंभीरता को समझा जा सकता है| यह उपन्यास उस लेखक ने लिखा है जो गहराई और गंभीरता से लिखता है मगर ग्राफ़िक डिटेल्स में नहीं जाता|

“हाँ सब यही समझते हैं, लेकिन जो तकलीफ है व मैं जानतीं हूँ या बिनती जानती है|” सुधा ने गहरी साँस लेकर कहा – “वहाँ आदमी भी बने रहने का अधिकार नहीं|”

एक भारतीय लड़की और कितना कह सकती है| शायद उसे दब कर बोलना ही सिखाया गया है| अगर वो बोलती भी है तो उसे क्या जबाब मिलता है वह और भी निंदनीय है|

“और जहाँ तक मेरा ख्याल है वैवाहिक जीवन के प्रथम चरण में ही यह नशा रहता है फिर किसको यह सूझता है| आओ, चलो चाय पीयें|”

मुझे इस बात की प्रसन्नता हो रही है कि इस बात में “मेरा ख्याल है” जोड़ा गया है| आज कल के सामाजिक धीर-वीर तो सीधे फ़तवा ही दे देते हैं| मगर ख्याल हक़ीकत नहीं होते| हक़ीकत कुछ और होती है| स्तिथि की भयाभयता का बयान करना कई बार बहुत कठिन होता है|

“मैं क्या करूँ, मेरा अंग – अंग मुझी पर व्यंग कर रहा है, आँखों की नींद ख़तम है| पाँवों में इतना तीखा दर्द है कि कुछ कह नहीं सकती| उठते बैठते चक्कर आने लगा है| कभी – कभी बदन काँपने लगता है| आज वह बरेली गए हैं तो लगता है मैं आदमी हूँ|”

वैसे तो उपरोक्त वर्णन पढ़ने में बहुत कुछ कहता है मगर हमारा पुरुषवाद “मार लेने”, “फाड़ देने” और “ऐसी – तैसी करने” की मर्दवादी परंपरा से बंधा होने के कारण इस वर्णन में मात्र पुरुष की मर्दानगी का गौरव ही देख सकता है| लेकिन एक बहुत महत्वपूर्ण टिपण्णी इस उपन्यास में सुधा करती है| यह टिपण्णी हिन्दू धर्म की आड़ लेकर देश भर में इस कृत्य को बढ़ावा देने वालों के मूंह पर तमाचा है|

“हिन्दू – गृह तो एक ऐसा जेल होता है जहाँ कैदी को उपवास करके प्राण त्यागने की भी इजाजत नहीं रहती, अगर धर्म का बहाना न हो|”

हमारे सामाजिक धीर – वीर कह सकते है कि अलां और फलां के बारे में कुछ क्यों नहीं कहा| उत्तर सिर्फ इतना है कि पात्र हिन्दू है और अपने धर्म के बारे में ही तो बोल सकते हैं| अगर किसी को इस से संतोष नहीं होता तो उनसे विनती है कि सरकार ने हिन्दू धर्म की आड़ लेकर ही तो इस कृत्य को अपराध घोषित करने से मना किया है| क्या हम सरकार से कहेंगे कि हिन्दू धर्म की आड़ लेकर ग़लत कार्यों को बढ़ावा न दें?

उपन्यास में इस बात की भी बानगी मिलती है कि इंसान जब इंसानियत से गिरना शुरू करता है तो कितना गिरता चला जाता है| सुधा का गर्भपात हो गया है| बचने की उम्मीद नहीं है| बार बार बेहोशी आ रही है| इसी क्रम में उसके मूंह से निकलता है|

“अब क्या चाहिए? इतना कहा, तुमसे हाथ जोड़ा, मेरी क्या हालत है? लेकिन तुम्हे क्या? जाओ यहाँ से वरना मैं अभी सर पटक दूँगी…”

पता नहीं वैवाहिक बलात्कार इस उपन्यास के केंद्र में क्यूँ नहीं दिखाई पड़ता| मुझे एक बार लगा कि भारती जी एक बहुत ही बड़ी टिपण्णी इस उपन्यास के माध्यम से वैवाहिक बलात्कार पर करना चाहते होंगे मगर उस समय उन्हें यह बात सामाजिक और राजनितिक रूप से समय से सदियों पहले की बात लगी होगी| अगर “गुनाहों का देवता” “गुनाहों के दैत्य” को केंद्र में रख कर लिखा गया होता तो शायद प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची में कहीं पड़ा होता| उन्हें मंटो और चुगताई की तरह कोसा जाता| मगर यह उपन्यास बताता है कि वैवाहिक बलात्कार की बात भारत में कोई आयातित बात नहीं है| बार बार उठती रही है और तब तक उठेगी, उठती रहेगी  जब तक यह अपने अंजाम तक नहीं पहुँचती|

 

भोली भाली माँ


हर माँ की तरह, मेरी माँ को खाना बनाने का बहुत शौक था| वो साधारण दाल रोटी सब्जी को भी ऐसे बनाती थीं, जैसे कोई अनुष्ठान कर रही हों| नहा धोकर ही रसोई में जाना, खाना बनाने में काम आने वाली हर चीज को किसी पवित्र पूजा सामिग्री की तरह आदर देना, किसी भी प्रकार का सकरा या झूठा रसोई में न आने देना, और कम से कम सब्जी छौंकते और दाल या रायते में तड़का लगाते समय वह कुछ नहीं बोलती थीं| शाकाहारी होकर भी, किसी भी खाद्य सामिग्री के लिए आदर का यह हाल था कि बाज़ार में बिकते मांस मछली को देखकर उन्हें अच्छा न लगने के बावजूद मजाल क्या कि उनके चेहरे पर कोई शिकन भी आ जाये| माँ हमेशा कहतीं किसी का खाना देखकर मन में मैल नहीं लाना चाहिए| एक बार हमारी छत पर बिल्ली कहीं से चूहा मार कर ले आई और खा रही थी| घिन के कारण मैंने बिल्ली को चप्पल फैंक कर मार दी| किसी के खाने के अपमान की सजा के तौर पर मुझे उस बिल्ली को दूध पिला कर माफ़ी मांगने की सजा मिली|

माँ खाना खाते समय भी नहीं बोलती थीं| उनके लिए शांत चित्त और पवित्र भाव से भोजन करना और करने देना सबसे बड़ी पूजा थी| जब भी कोई मेहमान आते तो माँ उन्हें पहले खिलाती और साथ बैठकर खाने के प्रस्ताव को प्रायः शालीनता से मना कर देतीं थीं|

हम तीनों बच्चों के संगी साथी हमारे घर खाना खाने की ईच्छा से आते रहते थे| मगर जब छोटी बहन का अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला हुआ तब होस्टल में रहने वाले उसके सहपाठियों पर माँ को बहुत लाड़ – दुलार आता था| उन दिनों हमारे घर हर हफ़्ते “माँ के हाथ का घर का खाना” नामक दावतें हुआ करतीं थीं| मगर इसमें उन्हें कुछ दिक्कतें भी पेश आतीं थीं| माँ हमेशा शुद्ध शाकाहारी शास्त्रीय भोजन बनाया करतीं थीं, मगर मेहमान छात्रों में बिहार से लेकर मणिपुर तक से छात्र मौजूद थे| बहुतों को खाने से ज्यादा माँ के हाथ के खाने के भाव के कारण तृप्ति मिलती थी|

भारत की सांस्कृतिक विविधता के ऐसे विरले दुष्कर संगम के समय में माँ की बतकही बहुत काम आती थी| माँ अपने सामान्य ज्ञान, सामान्य विवेक और असामान्य परिकल्पना से बातों का एक स्वप्न बुनतीं थीं और प्रायः मेहमान उस स्वप्न में खुद को अपनी माँ की गोद में बैठा पाता था| इस क्रम में माँ हिंदी अंगेजी उर्दू संस्कृत और ब्रजभाषा में एक तिलिस्म रचतीं और मेहमान को अपनी माँ की कमी या तो बहुत महसूस होती या कुछ देर के लिए माँ को भूल जाता|

उस दिन एक मणिपुरी छात्रा घर पर आई| माँ को मणिपुरी संस्कृति का बहुत ज्ञान नहीं था और मेहमान का हिंदीपट्टी ज्ञान बॉलीवुड से अधिक नहीं था| माँ के लाड़ दुलार और मेहमानवाजी के चलते उसे खाना बहुत पसंद आया| मगर बार बार उत्पन्न होने वाली संवादहीनता के बीच माँ को ग़लतफ़हमी हो गयी की लड़की हिंदी नहीं समझती| ऐसे में उन दोनों ने सफ़लतापूर्वक संवादहीन संवाद कायम कर लिया| जैसे ही हम सब लोग खाने से निवृत्त हुए; माँ की प्रसन्नता चरम पर जा पहुँची| वो चहक कर मुझ से बोली, मेहमान के साथ अच्छा सम्बन्ध बन गया है और मैंने मुझे इतना अपना बना लिया है कि वो अब अलीगढ़ में अपने आप को अकेला नहीं समझेगी और जब भी उसे अपनी माँ की याद  आयेगी तो वो मेरे पास आ पायेगी|

अचानक माँ की वो मणिपुरी मेहमान आँखों में आँसू लेकर हंस पड़ी| उसने हिंदी में जबाब दिया, “हाँ माँ!! आप मेरी माँ की तरह अच्छी हो| मगर भोलेपन में तो आप बहुत ज्यादा एक्सपर्ट हो|”

टिप्पणी: यह पोस्ट इंडीब्लॉगर द्वारा गोदरेज एक्सपर्ट के लिए किये गए आयोजन के लिए लिखी गयी है|

कई चाँद थे सरे – आसमां


शम्सुर्हमान फ़ारुक़ी का यह उपन्यास पढ़ने में बहुत रोचक लगा और समय लगाकर पढ़ा| इसमें हिंदुस्तान के इतिहास के उन रोचक स्याह – सफ़ेद पन्नों को उकेरा गया है जिनका जिक्र आजकल कम ही किया जाता है| उपन्यास में इतिहास, इमारत, झगड़े, जंग, षड्यंत्र, सियासत, कल्पना, कहानी, साहित्य, शेरोशायरी ख़ास और आम जिन्दगी अपने आप आती गाती सुनाती सुनती चली गयी है|

उपन्सास एक ऐसी औरत की जिन्दगी की अजब दास्ताँ है जिसे बेहद आम औरत होने से अपने जीवन की शुरुआत की और किस्मत की कहानी उसे देश के सबसे खास औरतों में से एक बनाते हुए धूल में मिलाने के लिए ले गई| ये दास्ताँ उस औरत की है जिसने और जिसकी किस्मत ने कभी हार नहीं और वो और उसकी किस्मत कभी जीत भी नहीं पाए| ये कहानी उस औरत की है जिसके पाकीज़ा होने पर सबको उतना ही यकीं था जितना उसके घटिया – बाजारू होने का| ये कहानी उस मुल्क की है जिसे ज़न्नत समझ कर कारवां आते गए और अपने घर बनाते गए| ये कहानी उस मुल्क की है जिसको लूटने उजाड़ने का सपना बहुत सी आँखों ने देखा| ये कहानी उस बर्बादी की है जो सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि बर्बाद होने वालों को अपने हजारों साल के वजूद पर कुछ ज्यादा भरोसा था|

उपन्यास बहुत लम्बे बारीक़ विवरणों से भरा पड़ा है जो शायद चाह कर भी उतने ऊबाऊ नहीं बन पाए हैं जितने बनाने चाहे गए हैं| आपको अपनी कल्पना शक्ति को प्रयोग करने की जरूरत नहीं पड़ती|

उपन्यास कई बार पाठ्य पुस्तक की भूमिका भी निभाता है तो बार बार आगाह भी करता है कि यह मूलतः कहानीकार की वो कल्पना है जिसे वो इतिहास के दो मोती साथ पिरोने के लिए करता जाता है|

उपन्यास की सबसे बड़ी खूबसूरती इस बात में है कि ये लिखा आज की हिंदी – उर्दू – रेख्ता में है मगर उस ज़माने की हिंदी – उर्दू – रेख्ता में अपने को बयां करता जाता है|

वह भी कोई देस है महराज


जब मैंने इस पुस्तक के बारे में पहली सुना था तो शीर्षक से लगा था कि हिंदी पट्टी का कोई आंचलिक यात्रा – वृतांत है| यह भारत के छोटे से अंचल मुख्यभूमि की निगाह से उस उत्तर पूर्व का शोध – विवेचन है, जिसे भारतीय देशप्रेम चीन समझने की हठ करता रहता है| पुस्तक खुद को बिना विराम और लघु विराम के पढ़ाती है| आपको “चिकेन नेक कॉरिडोर” (जलपाईगुड़ी) से आगे ले जाने के बाद सरल बारीक़ विस्तृत रोचक विवरण के साथ यह पुस्तक आपकी गर्दन पकड़ कर रखती है और बार बार पढ़े जाने के आग्रह रखती है| यह मेरे जैसे अधजल गगरी मुख्यभूमि वालों के लिए सन्दर्भ ग्रन्थ का काम कर सकती है मगर लेखक कहीं भी इस प्रकार का कोई आग्रह करता हुआ प्रतीत नहीं होता| पुस्तक के पीछे छपे ज्ञानरंजन के शब्द मुझसे यह आग्रह जरूर करते प्रतीत होते हैं मगर दुर्भाग्य से आधुनिक भारत तो ज्ञानरंजन को भी नहीं जानता|

आप कब दिल्ली से चलते चलते उत्तरपूर्व के दूरदराज में पहुँचते जाते है पता ही नहीं लगता| पुस्तक का प्रताप है कि जब अभी नागालैंड में एक आरोपी को जेल से बाहर कर क़त्ल कर दिया गया तो मैं मीडिया में दिए गए सारे दृष्टिकोण आसानी से समझ पाया|

“लघु राज्यों के राजा अपने लोगों को समझा रहे थे की १५ जनवरी १९४७ को असं के राज्यपाल अकबर हैदरी और खासी राज्यों के बीच जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक रक्षा, मुद्रा और विदेश मसलों को छोड़कर बाकी सारे मामले उनके अधीन होने चाहिए| बाद में धोखे से इन राज्यों को संविधान की छठी अनुसूची में डालकर पारंपरिक ढंग से प्रशासन चलाने के लिए खासी, गारो और जयंतिया जिलों में स्वायत्तशासी परिषदों की स्थापना की गई| इस कारण सीयेम नाम के राजा रह गए हैं| अब परिषदें उन्हें मोहरों की तरह हटाती और बिठाती रहती हैं|”

यह सुचना पुस्तक में बहुत साधारण तरीके से दी गई है| परन्तु जब मैं इसे जोधपुर समेत कई रियासतों के विरोध के भारत में विलय के सेकड़ों समझौतों, और बाद में इंदिरा गाँधी द्वारा संविधान संशोधन के साथ भूतपूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स ख़त्म करने के लोकप्रिय और अदूरदर्शी निर्णय के साथ पढ़ता हूँ तो चिंता होने लगती है| शुक्र है कि वह मामला अभी क़ानूनी विश्लेषणों में ही फंसा हुआ है|

“ज्यादातर असमिया हिन्दू गाँव किसी न किसी मठ से सम्बद्ध हैं और वहाँ के सामाजिक जीवन में नामघर की केन्द्रीय भूमिका होती है|… … इधर हिन्दू कट्टरपंथ के प्रभाव में कुछ इलाकों में महिलाओं के महीने में पाँच दिन नामघर आने पर रोक लगा दी गई है, जिसका विरोध शहरों के नारीवादी संगठन कर रहे है|”

“ये फुल बिरले ही खिलते हैं लेकिन जब आते हैं तो प्रकृति नया असंतुलन पैदा करती है|… … इन्हीं फूलों ने मिजोरम में उग्रवाद की नींव रखी थी और पूर्वोत्तर का इतिहास, भूगोल दोनों बदल दिया था| तब मिजोरम असम का एक जिला हुआ करता था जिसे लुसाई हिल्स कहा जाता था|”

“सब्जी मंडी का हर्बल देखकर समझ आ गया कि दीमापुर से यहाँ के रास्ते में इतना सन्नाटा क्यों था| जानवर और पक्षी पीढ़ियों के अनुभव से जानते हैं, वन्यजीवप्रेमियों और पर्यावरणविदों के चिकने काग़ज वाले दस्तावेज़ों से पुकार कितनी ही काव्यात्मक क्यों न हो, इक बार छेमोकेडिमा का इनरलाइन बैरियर पार करने के बाद वे जिन्दा वापस नहीं लौट पाएँगे|”

इसी तरह की कुछ साधारण सी सूचनाएं इस पुस्तक में लगभग हर पृष्ठ पर अंकित है जिन्हें समझने के लिए समय, सुविधा, संस्कार और समृद्धि की आवश्यकता नहीं है| बहुत कुछ है जिसे पढ़ा जाना चाहिए| सब कुछ यहाँ बता देना पुस्तक की रोचकता को समाप्त कर देगा| पुस्तक किसी पुस्तकालय में बैठ कर नहीं लिखी गई है, सामान्य जन जीवन की वह कहानी है जिसे हम अक्सर नहीं देख पाते| हर दिन को आँख कान नाक खोल कर जिया गया है, बंदूकों और मौत के साये में| जहाँ सेना और ढेर सारे उग्रवादी दिन के हिसाब से लड़ रहे है, आकड़ों के हिसाब से मर रहे है, बयानों के हिसाब से नकारे जा रहे है, राजनीति के हिसाब से प्रयोग हो रहे है और वक्त के हिसाब से काटे जा रहे है| इस किताब को पढ़ने से पहले और बाद, मैं अक्सर पूछता रहा हूँ, चम्बल के डकैत और भारत भर के उग्रवादियों में कितना अंतर हैं, जबाब आसन तो नहीं है, मगर मैंने उसे इस पुस्तक में भी ढूंडा है|

जीवन और भारतीयता के बहुत सारे जबाब प्रश्न बनकर यहाँ खड़े हुए हैं| अनिल यादव पढ़े जाने योग्य नहीं लिखकर लाये हैं वरन वो खुद को पढ़ा लिए जाने का माद्दा रखते हैं| अमृतलाल बेगड़ जिस श्रृद्धा से नर्मदा यात्रा करते हैं शायद अनिल यादव ने उस तरह का ही कोई विचार रख कर उस देस की यात्रा की है|

पुस्तक: वह भी कोई देस है महराज

लेखक: अनिल यादव

प्रकाशन: अंतिका प्रकाशन

वर्ष: २०१२

श्रेणी: यात्रा – वृतांत,

मूल्य: रुपये १५०

आम आदमी पार्टी की वापिसी


दिल्ली में आम आदमी की सरकार वापिस आ गई है|

दिल्ली विधानसभा में हुए दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम के बाद दिल्ली की जनता में यह भाव तो था कि केजरीवाल को अंतिम समय तक जनलोकपाल के लिए संघर्ष करना चाहिए था, मगर केजरीवाल के प्रति कोई दुर्भावना नहीं थी| इस बात का सीधा प्रमाण यह है कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के मत प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई थी|

लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के कई बड़े नेताओं का दिल्ली से बाहर जाकर चुनाव लड़ना, दिल्ली की जनता को अखरा जरूर और भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें भगौड़ा कह कर इस बात का राजनीतिक प्रयोग भी किया| मगर, “भगौड़ा” अलंकार का प्रयोग लम्बे समय तक कर कर भाजपा ने न सिर्फ उसे चालू राजनीतिक शब्द बना दिया बल्कि अपने शीर्ष नेता के भगौड़ेपन को भी प्रश्न के रूप में प्रस्तुत कर दिया|

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दिल्ली चुनाव में मोदी लहर पर भरोसा कर कर भाजपा ने सबसे बड़ा नुक्सान यह किया कि अनजाने में  ही दिल्ली की जनता को मोदी सरकार का आकलन करने को विवश कर दिया| दिल्ली में मोदी की स्तिथि अनजाने में ही एक ऐसे प्रधानमंत्री की हो गयी जो पिछले दरवाजे से दिल्ली का मुख्यमंत्री भी था| जिस समय मोदी सरकार अपने लोकसभा जीत के जश्न में मशगूल थी, दिल्ली के हर दरवाजे पर आम आदमी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता क्षमायाचना कर रहे थे| यह पहली बार था कि कोई भूतपूर्व मुख्यमंत्री बिना किसी दवाब और राजनितिक लफ्फाजी के माफ़ी मांग रहा था| सबसे महत्वपूर्ण बात, इस समय दिल्ली की जनता के दिल में जनलोकपाल बिल का संघर्ष और विधानसभा में हुआ हंगामा बुरे वक़्त की तरह बसा हुआ था| इस संघर्ष का एकमात्र नेता केजरीवाल ही हो सकता था|

भाजपा समर्थक केजरीवाल पर निजी हमलों में लगे थे| आप समर्थकों की विनम्रता का अर्थ भाजपाई उनके आत्मसमर्पण के तौर पर ले रहे थे| मगर इस तरह भाजपा दिल्ली के मुद्दों से भटक रही थी| उधर दिल्ली राज्य की मोदी सरकार लगातार गलतियाँ कर रही थी| दुर्भाग्य से केंद्र सरकार के दावे भी अपना इम्तहान दे रहे थे|

मोदी सरकार १०० दिन के भीतर काले धन की वापिसी के वादे से पीछे हट गयी| मोदी सरकार ने जिस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के गठन का दावा किया, उसकी सच्चाई दिल्ली में सबको पता थी और लोग उच्चतम न्यायलय के निर्देशों से भली भांति परिचित थे| भले ही सरकार काला धन न ला पाती, मगर यह झूठा दावा उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न बन गया|

भाजपा नेतृत्व ने इसी समय दिल्ली प्रदेश सरकार की तुलना नगर निगम से कर दी| दिल्ली राज्य में कई नगर निगम मौजूद होने के कारण यह तुलना मतदाता को गले नहीं उतरी और इसे अपमान की तरह लिया गया| इस तुलना ने यह अंदेशा भी जगा दिया कि दिल्ली को मोदी सरकार के रहते पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलने वाला| यह बात खुद दिल्ली भाजपा में डर पैदा कर गई|

इसके बाद दिल्ली में भाजपा मोदी के अलावा कोई नेता नहीं दे पाई| एक दिन अचानक उसे बाहर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार लेकर आना पड़ा| इसने प्रदेश भाजपा की नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न लगा दिए|

उधर केजरीवाल कछुआ चाल से दिल्ली के गली कूचों में आगे बढ़ रहा था, मोदी सरकार अपने भाषण में व्यस्त थी| भारत और दिल्ली के जो बजट केन्द्रीय वित्तमंत्री ने भारतीय संसद में रखे उनका भले ही अंतरिम बजट कहकर भाजपा ने प्रचार किया हो, मगर यह मोदी सरकार के उस चमत्कारिक व्यक्तित्व के विपरीत था जिसका दावा लोकसभा चुनाव में किया गया था|

मोदी सरकार का अगला कदम एक बार फिर गलत पड़ा, दिल्ली की आधी से अधिक आबादी उन गांवों के उन परिवारों से आती है जिनमें महात्मागाँधी राष्ट्रिय ग्रामीण रोजगार योजना में काम मिल रहा था| उस योजना का रुकना, दिल्ली में हाड़ मांस लगा कर काम कर रहे लोगों पर बोझ बढ़ा गया| हालत यह थी कि मोदी सरकार अपने पहले ६ महीनों की एक मात्र सफलता जन – धन को चर्चा में नहीं ला पाई| इसका कारण शायद यह था कि इस योजना में सरकार को जनता का धन प्राप्त हुआ था और अभी तक सरकार ने कोई भी सब्सिडी इन खातों में जमा नहीं कराई थी|

उधर खाने पीने की चीजों के दाम कम नहीं हुए. मगर मोदी सरकार मौसमी सब्जियों के दाम बता बता कर महंगाई कम होने का दावा कर रही थी| लोग उसे अनदेखा नहीं कर रहे थे, बारीकी से परख रहे थे| जब शाहजी सस्ते पेट्रोल और डीजल का रायता फैला रहे थे, जनता अन्तराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमत पर आह भर रही थी| सबके सामने हर रोज पेट्रोल पर कगाये जा रहे टैक्स मुँह चिड़ा रहे थे|

रेडियो पर मन की बात, स्वागत योग्य बात थी मगर इसने कम से कम मोदी जी की छवि “अपने मुँह मियां मिट्ठू” की बना दी| भले ही मोदी जी गाँव में जनता से सीधे जुड़े हों, मगर मन से नहीं जुड़ पाए| उनकी छवि काम कम, बातें ज्यादा की बन रही थी| रेडियो, टीवी और अखबार में हो रहा व्यापक कवरेज

अनजाने में ही उन्हें “बनता हुआ तानाशाह” बना रहा था|

अभी दुनियां में कहीं भी गुजरात के दंगे भुलाये नहीं गए उधर दिल्ली के दंगे, टूटते लुटते चर्च ख़बरों में आ रहे थे| उधर केन्द्रीय गृह मंत्रालय के आधीन रहने वाली पुलिस ने दावा कर दिया कि सन २०१४ में दिल्ली में सैकड़ों मंदिर भी लुटे या जलाये गए| यह सरकार द्वारा अपनी असफलता का लज्जास्पद ऐलान था| लोग अब यह नहीं पूछ रहे थे कि लुटे या जलाये गए मंदिर कौन कौन से थे? लोग इन मंदिरों के खजानों ने गड़बड़ी की आशंका जता रहे थे|

प्रधानमंत्री ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के नेताओं को बुला कर शानदार विदेश नीति का जो प्रस्तुतीकरण किया, उस पर प्रश्न तब उठे जब वो अपनी दूसरी नेपाल यात्रा में नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाने की सलाह दे आये| यह भारत में उनके कान खड़ा कर देने वाली बात थी| जब तक लोग इस बात पर कुछ शोर मचाते, अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा की भारत यात्रा की घोषणा हो गई| सब कुछ शानदार चल रहा था कि प्रधानमंत्री जी १० लाख का नामपट्टी सूट पहन कर अपनी सादगी का मजाक उड़ा बैठे| साथ ही दिल्ली का मूड देखकर ओबामा ने भारत में साम्प्रदायिक स्तिथि पर टिपण्णी कर डाली| यह न सिर्फ देश के अंदरूनी मामलों में अमरीकी हस्तक्षेप है, बल्कि देश की विदेश नीति की असफलता भी है| मजे की बात यह रही कि सरकार ने ओबामा को रवाना करते ही विदेश सचिव सुजाता सिंह को सिर्फ इसलिए त्यागपत्र देने के लिए विवश कर दिया था| सरकार उन्हें जिन गलत सलाहों को देने का आरोप लगा रही थी, वह सही हफ्ते भर में ही सही साबित हो चुकी थी|

सरकारी अधिकारियों की बर्खास्तिगी मोदी सरकार का शगल बन चुका है| देश के सबसे बड़े रक्षा अनुसन्धान संस्थान के प्रमुख को अज्ञात कारणों से बर्खास्त कर दिया गया| अग्निमैन नाम से विख्यात अविनाश चंदर देश के सबसे बड़े रक्षा वैद्यानिक है और पूर्व राष्ट्रपति कलाम की पंक्ति से माने जाते है| कई बार कहा जाता रहा है कि अमरीका को भारत के अग्नि कार्यक्रम से हमेशा दिक्कत रही है| अभी इन दोनों बर्खास्तगी का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि चुनाव के ठीक पहले गृहसचिव भी त्यागपत्र दे गए| इन सभी त्यागपत्रों के पीछे मामला जो भी रहा हो, मगर सरकार कठघरे में थी|

मोदी सरकार ने चुनावों से ठीक पहले दिल्ली में अनियमित बस्तियों के नियमितीकरण की घोषणा कर दी| मगर किसी भी प्रकार का क़ानून नहीं बनाया गया| न ही किसी प्रकार की प्रक्रिया का पालन किया गया| दिल्ली भर में हुई चुनावी रैलियों में भाजपाई किसी भी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता से ही इंकार करते नजर आये| उधर सुरक्षा एजेंसीज की आपत्ति के बाद भी दिल्ली के सारे फुटपाथ केसरिया और हरे रंग में रंग दिए गए|

भाजपा दिल्ली में केजरीवाल के अपमान और उसकी खांसी के मजाक में लगी रह गयी और केजरीवाल जीत गया| जब भाजपा के लोग आप पर शराब बांटने का आरोप लगा रहे थे उनके एक उम्मीदवार चुनाव के पहले वाली रात शराब बांटते पकड़े गए

केजरीवाल के ४९ दिनों के काम के आगे मोदी सरकार के २४९ दिन के भाषण काम नहीं आये|

च्यवनप्राश


भारतीय घरों में आलू, प्याज, मिर्च और चाय – चीनी – दूध के बाद च्यवनप्राश शायद सबसे ज्यादा जरूरी खाद्य है| अगर जाड़े का मौसम है और घर में बच्चे हैं तो हो नहीं सकता कि आप इसे न पायें| च्यवनप्राश का घर में होना ठीक ऐसे ही है जैसे घर में किसी अनुभवी बुजुर्ग का होना| यह दादी नानी का अजमाया हुआ नुस्खा है और वैद्यों की पसंदीदा अनुभूत औषधि, भारतीय घरों में घर का वैद्य|

इसमें क्या क्या औषधीय गुण हैं यह सब बाद की बात है, हमारे उत्तर भारतीय घरों में दो साल का बच्चा भी भरोसा करता है कि च्यवनप्राश खा लिया तो उसको दादी नानी का दुलार मिल गया; बीमारी से लड़ने की ताकत मिल गयी, कडकडाती ठण्ड से बचाव हो गया; और ठण्ड भरी शाम में भी घर से बाहर खेलने की अनुमति लगभग मिल ही गई|

कई बार तो शायद च्यवनप्राश से भरा चम्मच देखना ही बच्चे को हल्के सर्दी – जुखाम से मानसिक रहत दे देता है| एक चम्मच च्यवनप्राश खाकर सौठ वाले गुड से गुनगुना दूध – बचपन का पुराना नुस्खा|

मैंने कभी नहीं जाना कि च्यवनप्राश में क्या क्या पड़ता है मगर सदियों के इस भारतीय आयुर्वेदिक नुस्खे पर शायद किसी भी अत्याधुनिक औषधि से अधिक भरोसा रखता हूँ|

च्यवनपप्राश का स्वाद कम पसंद करने वाले बच्चे भी इसे चुपचाप खा लेते हैं| वैसे आजकल तो इसमें भी कई तरह के फ्लेवर्ड च्यवनप्राश बाजार में उपलब्ध हैं| मगर चयवनप्राश का अपना सदियों पुराना स्वाद हमेशा ही मुझे आकर्षित करता है| मेरे बचपन में, जब कभी मुझे फ्लेवर्ड मिल्क का मन करता था तो दूध में च्यवनप्राश भी एक विकल्प हुआ करता था जिसका स्वाद तो शायद मुझे बहुत पसंद नहीं था मगर मुझे यह आश्वस्ति रहती थे कि अब यह मेरे लिए फायदे का सौदा है|

मेरी माँ अक्सर पास पड़ौस की गर्भवती स्त्रियों और नई माताओं को भी जाड़े के दिनों में दिन में दो बार च्यवनप्राश खाने की सलाह देतीं थीं| उनका विचार था कि यह च्यवनप्राश हर हाल में गर्भस्थ और नवजात शिशु के खून में जरूर पहुंचेगा और लाभ पहुंचाएगा| च्यवनप्राश से जुड़े कई नुस्खे आपको देश भर के गाँव देहात में मिल जायेंगे| जैसे गुनगुने पानी से च्यवनप्राश ले लेने से सर्दी के दिनों का चढ़ता बुखार चढ़ना रुक जाता हैं| इसके साथ कई किद्वंती जुड़ी मिल जायेंगीं| कभी कभी आप पाएँगे कि कैसे मौसम से जुड़ी कई बीमारियों में मरीज च्यवनप्राश के खास विधि से सेवन करने पर ठीक हो जाता है| इनमें से बहुत सी सकारत्मक सोच और विश्वास के चलते आये मानसिक परिवर्तन से जुड़ी हो सकतीं है|

एक बाटी जरूर बताना चाहूँगा| कई बार जाड़ों में ठण्ड के कारण हम बच्चे खाना खाने से पहले और बाद में हाथ धोने से बचते थे| हमारा तर्क होता था, च्यवनप्राश खा लिया, अब बीमारी नहीं होगी| मेरे पिता हमेशा कहते, च्यवनप्राश अन्दर से रक्षा करेगा और हाथ धोना बाहर से|

च्यवनप्राश सिखाता है कि आप अगर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देते रहेंगे तो आप अपने जीवन के सबसे जरूरी व्यक्ति अपने आप और अपने परिवार को न सिर्फ बिमारियों से मुक्त रख पाएंगे, वरन चिंता मुक्त होकर और जरूरी कामों में ध्यान दे सकेंगे| हमारी संस्कृति बीमार होकर ठीक होने में विश्वास नहीं रखती वरन अपने शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को लगातार बढ़ा कर बीमारियों से मुक्त रहने के विचार में निवेश करती है| च्यवनप्राश भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है जो हमें हमेशा से सिखाती है, इलाज से बचाव में समझदारी है और स्वास्थ्य में निवेश जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है|

टिपण्णी: यह पोस्ट डाबर च्यवनप्राश के सहयोग से इंडीब्लॉगर द्वारा आयोजित कार्यक्रम ले लिए लिखी गई है|

विस्थापित कंपनी सेक्रेटरी


 

रोजगार की तलाश हमें विस्थापित कर देती है| अगर कंपनी सेक्रेटरी जैसे मान्य प्रोफेशन को एक केस स्टडी की तरह देखता हूँ तो देश और युवा पीढ़ी को लेकर दिल में कहीं कुछ टूट सा जाता है|

ICSI Logoदेश के एक चौथाई कंपनी सेक्रेटरी आज दिल्ली एनसीआर में रोजगार में हैं, परन्तु आधे से अधिक अंडर एम्प्लॉयमेंट में हैं या योग्यता के मुकाबले आधे वेतन पर काम करते हैं|

देश में बहुसंख्या कंपनी सेक्रेटरी की बहुसंख्या देश के पूर्वी भाग, बिहार और उड़ीसा से आती है| पहली  बात की वो लोग इस पढाई को क्यों पसंद करते हैं? मित्र बताते हैं कि पूर्व क्षेत्र में उन्हें विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए उच्च मानदंड वाले संस्थानों की कमी है| दूसरा, औद्योगिक विकास इतना कम है कि यह क्षेत्र इस तादाद में कंपनी सेक्रेटरी को रोजगार के अवसर नहीं दे पाता| अधिक पड़ताल करने पर पता लगता है कि पूर्वी भारत में स्थानीय मूल के लोगों के मुकाबले आप्रवासी मारवाड़ी समुदाय का इस प्रकार के रोजगार पर पूरा कब्ज़ा है| आप दिल्ली और मुंबई में पूर्वी भारत से आये आप्रवासी कंपनी सेक्रेटरी की बहुतायत देख सकते है| हिंदी भाषा की बोल सकने सुविधा उन्हें दिल्ली की और अधिक आकर्षित करती है|

दक्षिणी भारत में कंपनी सेक्रेटरी के मध्य आप्रवासन की बड़ी समस्या नहीं है| इसका श्रेय बंगलौर, हैदराबाद और अन्य क्षेत्रों के हालिया विकास को दिया जा सकता है| परन्तु आप पाएंगे, इस भूभाग में आज भी छोटे शहर से बड़े शहर की और विस्थापन जारी है| कुछ साधारण उपायों के साथ छोटे शहर में भी कंपनी सेक्रेटरी के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जा सकते हैं|

पश्चिम भारत की स्तिथि विचित्र प्रतीत होती है| गुजरात में संख्या के तौर पर बहुत बड़ी तादाद में कंपनी सेक्रेटरी नहीं आते और उन्हें राज्य के अन्दर प्रायः रोजगार उपलब्ध है मगर वहां भी छोटे शहर के हालत भिन्न नहीं हैं| मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में शिक्षा का माध्यम हिंदी हैं और कंपनी सेक्रेटरी के रोजगार का अंग्रेजी| विकास में अभी गति पकड़ना अभी बाकी है और निकट भविष्य में सम्भावना हो सकतीं है परन्तु अभी आश्वस्ति से दूर है| महाराष्ट्र का पूर्वी भाग शिक्षा और रोजगार दोनों मामलों में चिंता का विषय है, तो पश्चिमी महाराष्ट्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, सारे देश से आने वाले विस्थापित कंपनी सेक्रेटरी यहाँ पर उचित रोजगार पा लेते हैं|

उत्तर भारत में कंपनी सेक्रेटरी के सबसे अधिक छात्र हैं जिनमें पूर्वी भारत से दिल्ली आकर पढ़ने वाले छात्र भी बहुतायत में हैं| यहाँ के बड़े शहर में बड़ी संख्या में कंपनी सेक्रेटरी उपलब्ध है और रोजगार के अवसर कम हैं| अंडर एम्प्लॉयमेंट एक बड़ा दुखद परिदृश्य है| विकास के केंद्र केवल दिल्ली रह गया है| जहाँ समूचे उत्तरी और पूर्वी भारत से बहुसंख्य कंपनी सेक्रेटरी विस्थापित होकर आते हैं| यह विस्थापन कंपनी सेक्रेटरी की शुरुवाती पढाई के दौरान ही शुरू हो जाता है| अधिकांश लोग पढाई का दूसरा आधा भाग दिल्ली में आकर पूरा करते है| देश के एक चौथाई कंपनी सेक्रेटरी आज दिल्ली एनसीआर में रोजगार में हैं, परन्तु आधे से अधिक अंडर एम्प्लॉयमेंट में हैं या योग्यता के मुकाबले आधे वेतन पर काम करते हैं| मुकाबला इतना कड़ा है कि बहुत से कंपनी सेक्रेटरी अपने ट्रेनी को भी क्लाइंट की छाया से भी दूर रखते हैं| कंपनी में काम करने वाले कंपनी सेक्रेटरी, अपने किसी प्रक्टिसिंग साथी को अपने ऑफिस में नहीं आने देते| इस सबके बाद भी आपसी सम्बन्ध इतना गहरा है कि रोजगार आपसी रिफरेन्स से ही मिलते है|

ढांचा पढ़िए!!


 

अलीगढ़ शहर का विष्णुपुरी और सुरेन्द्र नगर इलाका; जून १९८२ या जून १९८३; शाम के चार या पांच बजे हैं|

बिजली अगर आती भी तो रेडियो और पंखे चलते हैं; कूलर, एयर कंडीशनर, फ्रिज, टेलीविजन, नहीं| बिजली का पंखा ज्यादातर चलता नहीं और हाथ का पंखा जब तक है जान कि तर्ज पर झला जाता है, वरना गर्मी झेल ही ली जाती है| ज्यादा गर्मी होने पर सरकार को नहीं कोसा जाता, बल्कि भगवान् से दया मांगी जाती है; खुद को कोसा जाता है, पाप शांत कराये जाते हैं| सुबह सत्यनारायण की कथा, उसके बाद मोहल्ले का स्त्री –  सम्मलेन, और बाद में मोहल्ले का एक ही समय पर सामूहिक शयन| जागने के लिए किसी घड़ी की जरूरत नहीं है, न ही किसी अलार्म की| प्राग ऑइल मिल का सायरन समय बताता है| भले ही इस इलाके में कोई मिल में काम नहीं करता मगर इस इलाके पर प्राग ऑइल मिल का नहीं तो उसके सायरन की हुकूमत चलती है| गर्मी के इस हुकूमत की ताकत बहुत बढ़ जाती है| क्योंकि इस मिल में एक बर्फखाना भी तो है, जहाँ बर्फ की बड़ी बड़ी सिल्लियाँ बनती है और पैसे वाले लोग खरीदने के लिए इंतजार करते हैं|

दोपहर के साढ़े तीन बजे सायरन बजता है, आलस दम तोड़ता है, गर्मी में सुस्ताये घर जगने लगते हैं| लगता है दिन दोबारा निकल आया है| बच्चे बहुत जल्दी में हैं, माएं उनको काबू में रखने की मशक्कत में परेशान हैं| उसके बाद स्वर्ग का आनंद; सत्तू, फालसे, खरबूज, तरबूज, कुल्फी या सॉफ्टी, जलजीरा, लस्सी, मट्ठा, छाछ, और कई तरह के शर्बत| शर्बत; बेल, बादाम, सौफ, फालसे, और बाजार का रसना| विविध भारती पर गाने सुनते हुए, मजा दोगुना हो जाता है| स्वाद ले लेकर पिया जा रहा है, जन्नत को जिया जा रहा है| वक़्त की कमी नहीं है; मगर जीभ बहुत छोटी है, जितना देर इस पर स्वाद बना रहे, यह खुश रहेगी; वर्ना आने वाले कल तक लपलपाती रहेगी|

और सड़क पर आवाज गूंजती है:

मतलब अब धूप अपने उतार पर है| खेलने का समय है| बच्चे बाहर सड़क पर दौड़ पड़ते हैं| कुछ बड़ी उम्र के बच्चे अखबार वाले की तरफ हाथ बढ़ा देते है और उन्हें एक अखबार मिल जाता है| न पैसा माँगा गया, न दिया गया| एक मुस्कराहट से कीमत वसूल हो गयी है| दिल खुश हो गए हैं| रास्ते में जो भी बच्चा, बूढ़ा, जवान, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, हाथ बढ़ा देता है, उसे अखबार मिल जाता है| आखें टकरातीं हैं, मुस्कराहट फ़ैल जाती है| मांगने वाला अपनी हैसियत के हिसाब से मांगता है, देने वाला उम्मीद से देता है| अगर कोई भी लगातार तीसरे दिन अखबार मांगता है तो अखबार वाला साईकिल से उतर जाता है, और घर का पता पूछता है| बिना और कुछ कहे सौदा तय, कल से सुबह घर पर अखबार आएगा| हाँ, वही, अमर उजाला|

एक शाम मैं हाथ बढ़ा देता हूँ, छोटा बच्चा अख़बार मांग रहा है| अखबार वाला साइकिल से उतर जाता है|

अखबार पढ़ोगे| पढ़ना आता है|

हाँ|

पढ़ कर दिखाओ|

मैं धीरे धीरे पढ़ता हूँ| सिर पर हाथ फेरा जाता है| अखबार मिल जाता है| बहुत सारे आशीर्वाद भी|

मैं अगले दिन फिर खड़ा हूँ| अखबार वाला साइकिल से उतर जाता है| कल का अखबार पूरा पढ़ा|

नहीं|

क्या किया|

फोटो देखे और रख दिया|

मेरे हाथ में अखबार का मुखपृष्ठ और सम्पादकीय है| केवल दो कागज| पूरा अखबार क्यूँ नहीं| मैं सोचता हूँ| मगर जितना मिला है, वो भी हाथ से न चला जाये|

कल ये पूरा पढ़ लेना तभी और अखबार मिलेगा| मैं अगले दिन, पूरा पढ़कर फिर खड़ा हूँ| अखबार सुनना पड़ रहा है|

अखबार वाला खुश है| अब हर हफ्ते अखबार मिलेगा| रोज नहीं| किसी भी एक व्यक्ति को लगातार तीन दिन मुफ्त में अखबार दिया जाता|

मुझे पढ़ने की लत लग रही है| गर्मी ख़त्म हो गयीं हैं| मुझे हर हफ्ते अखबार मिलता है| नियम बंध गया है| हफ्ते भर एक अखबार पढ़ो| सुनाओ और नया अखबार पाओ| मगर क्रम ज्यादा दिन नहीं चलता|

पंजाब में किसी को मार दिया गया है| पापा उसका अखबार रोज खरीदना चाहते हैं| वही अखबार वाला| वाही समय| पापा ने अखबार वाले को रोका| रोज का अख़बार तय हो गया| और मेरा हर हफ्ते अखबार मांगना भी|

मगर मुझे हर रोज आवाज सुनाई देती है| एक उम्मीद आवाज दे रही है| शायद कोई नया ग्राहक मिलेगा| कोई नया बंदा चाय पानी पिलाएगा| या नया बच्चा अख़बार मांगेगा| कई साल मैं उस आवाज को सुनता रहा| वो गुमनाम आवाज| आज भी याद है| उस आवाज का चेहरा नहीं है|  कई साल गुजर गए| पता नहीं चला, कब वो आवाज आना बंद हो गया| मगर मेरे कान आज भी पहचान सकते हैं, सुन सकते हैं|

अमर उजाला… ढांचा पढ़िए….||

 

आम अति उत्साह आदमी पार्टी


सफलता उत्साह दिलाती है और अति उत्साह आपकी अच्छी भली योजना को सफलता से कई योजन दूर भेज देता है|

आम आदमी पार्टी की दिल्ली विजय ऐसी ही थी कि लगा दिल्ली अब दूर नहीं| अचानक जोश खरोश में चर्चा हुई, अब देश की हर सीट पर लड़ाई लड़ी जायेगी| न संगठन, न कार्यकर्ता, न धन, न धान्य; सभी जोश से लड़ने चल पड़े|

उस समय देश भर में लोकसभा सदस्यता प्रत्याशी के फॉर्म इस तरह भरे गए जैसे आईआईटी या आईएएस के फॉर्म भरे जाते हैं| संसद सदस्य बने या न बनें, तीसरे स्थान पर रहने का पक्का ही था| मगर एक पार्टी के सबसे ज्यादा जमानत जब्त करने का रिकॉर्ड बना लिया गया|

कारण क्या रहे होंगे?

परन्तु मेरे मन में कई प्रश्न उठ रहे हैं|

१.       क्या पार्टी देश में हर जगह मौजूद थी? क्या भ्रष्ट्राचार जो आज मध्यवर्गीय मुद्दा है, क्या वो राष्ट्रव्यापी मुद्दा भी है? देश में आज भी मानसिकता है जिसमें आज भी सामंतवाद का उपनिवेश है, जहाँ सत्ता को चढ़ावा चढ़ाना धर्म है|

२.       क्या पार्टी ने दिल्ली में यह नहीं सुना कि राज्य में केजरीवाल और देश में मोदी? कारण सीधा था केजरीवाल को जनता कुछ दिन प्रशिक्षु रखना चाहती थी|

३.       क्या पार्टी कुछ महत्वपूर्ण चुनिन्दा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकती थी? शायद धन और संसाधन को पचास सीटों पर केन्द्रित किया जा सकता था| उस स्तिथि में पार्टी संसद में महत्वपूर्ण स्वर बन सकती थी और शायद तीसरा सबसे बड़ा दल बन सकती थी|

४.       क्या आगे की रणनीति को ध्यान में रख कर मनीष सिसोदिया या किसी अन्य को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता था? क्या पार्टी में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत नहीं होना चाहिए?

५.       क्यों पार्टी बार बार जनता के पास जाने की बात करती है और भाजपा या कांग्रेस कार्यकर्ताओं से सलाह वोट लेती हैं? क्या पार्टी के पास जो विचारशील, विवेकशील, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं हैं, उनकी सुनवाई या मत प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए?

६.       क्या दिल्ली पुलिस के मामले में धरना देने के समय पार्टी यह नहीं कह रही थी कि देश के हर मुद्दे पर हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री धरना देंगे और वही भ्रष्ट बाबु राज करेंगे जिनसे हम लड़ रहे हैं?

७.       दिल्ली में हम अगर तीन दिन विधानसभा में बैठे रहते और सदन को दस दिन बिठा कर रखते तो जनता खुद देखती कि दोषी कौन हैं? सरकार बनाते समय पार्टी दस दिन जनता से पूछती रही, त्यागपत्र देते समय जनता कहाँ गयी, कार्यकर्ता कहाँ गए? दिल्ली को और दिल्ली में पार्टी कार्यकर्ताओं को क्यों नेतृत्व विहीन छोड़ दिया गया?

८.       क्या सोनी सूरी, मेधा पाटकर, और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक सेनानियों को चुनावों में हरवा कर पार्टी ने उनके दीर्घकालिक संघर्ष कमजोर नहीं कर दिए?

९.       आज अगर दिल्ली विधानसभा भंग होती है तो चुनाव शायद जल्दी होंगे? क्या पार्टी हर घर में जाकर हर हफ्ते बता सकती है कि उसने कब क्या क्यों कैसे किया? पार्टी के पास एक एक बात के जबाब में सोशल मीडिया पर, कार्यकर्ताओं के मोबाइल पर और मोबाइल मैसेजिंग सर्विसेस पर इन सब बातों के जबाब हैं?

आज आम आदमी पार्टी को आवश्यकता है कि उन मतदाताओं को चिन्हित करे जिन्होंने उसे दिल्ली विधान सभा या संसदीय चुनावों में मत दिया है| सभी मतदाताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए जाने चाहिए| एक साथ, विधानसभा क्षेत्र और दिल्ली राज्य के बारे में बात होनी चाहिए| बात होनी चाहिए वर्तमान संसद सदस्यों पर पार्टी के नियंत्रण और उनके अपने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय कार्यक्रमों की| बात होनी चाहिए, उन सभी महत्वपूर्ण प्रत्याशियों की जिनका चुनाव में खड़ा होना, अपने आप में एक कार्यक्रम था, एक मुद्दे की बात थी, एक सिंद्धांत की उपस्तिथि थी|

 

उलूक उत्सव


 

इस बार का उलूक उत्सव बहुत लम्बा चलेगा| पृथ्वी पर इस तरह के सबसे बड़े समारोह की घोषणा हाल ही में हो गयी| अनोपचारिक रूप से यह उत्सव पिछले दो साल से चल रहा है|

जनता को उल्लू बनाने का यह उत्सव पूरे जोर पर आ गया है| इस उत्सव को, कहते हैं प्राचीन भारत में भी कई स्थानों पर मनाया जाता था| परन्तु हाल में इस उत्सव की शुरुआत समस्त विश्व को उल्लू बना चुके बरतानिया में हुई| उसके बाद इस उत्सव को मनाने का प्रचलन चल पड़ा है| इस उत्सव को न मनाने वालों को असभ्य गंवार जंगली माना जाता है और उन के ऊपर अक्ल के बम्ब गिराए हा सकते हैं| ये बात अलग है कि दुनिया में ऐसे ऐसे मूर्ख भरे पड़े हैं कि अक्ल के आधुनिक बम्ब से भी वो मर जाते हैं पर अक्ल आती नहीं| अफगानिस्तान, लीबिया, मिस्र, इराक़ ऐसे ही भोंदू बक्से हैं|

खैर, हमारे पुरखे उतने बड़े वाले ढक्कन नहीं थे, इसलिए उन्होंने बाकायदा अपनी वसीयत लिख छोड़ी है; हमें कम से कम हर पांच साल बाद ये उत्सव, जश्न जलसा जलूस मनाना होता है| इस तरह से छोटे मोटे उत्सव हमारे देश में कहीं न कहीं चलते रहते हैं|

इस उत्सव में दो कुछ समझदार लोग बाकी बचे लोगों को उल्लू बनाते हैं| बाकायदा उल्लू पत्र छापे जाते हैं; जगह जगह उल्लू सभाएं होती हैं| इस सभाओं को समय अनुसार रंगा सियार सभा, गीदड़ भबकी सभा, मगरमछी आंसू सभा, लोमड़ी चाल सभा, कुत्ता पूँछ सभा भी कहा जाता हैं| कई बार लोगों लो इन सभाओं में आने, बुलाने और बहलाने के लिए पैसे, खाना, शराब, कबाब और शबाब का इंतजाम किया जाता है| कई बार इन लोगों इस मनोरंजन में आने ले लिए टिकट भी खरीदना पड़ता है जिसका पैसा बड़ा मालिक पहले से बाँट दिया करता है|

कुछ लोग तो पैदायशी उल्लू होते है, उन्हें कार्यकर्ता कहा जाता है| जो लोग अपनी मर्जी से उल्लू बनते है उन्हें वालेंटियर कहा जाता है| इन लोगों के ऊपर सबसे ज्यादा लफड़ा रहता है| इन्हें लाठी, कुर्सी, चाकू, छुरा चलाने का भी काम रहता है| जब यह अस्पताल जाते है तो इनके घर वाले दिवाली मानते है और मर जाते है तो दीवाला| शहीदों में इनका नाम विश्वयुद्ध में मरने खपने वालों से भी ऊपर लिखा जाता है और बाद में मिटा दिया जाता है|

जो सबसे ज्यादा लोगों को उल्लू बनता है, उसको इस बात का हक़ मिलता है कि अपने इलाके के हर जाहिल गंवार जंगली के ऊपर राज करे| इन लोगों की मेहनत ऐसे ही खत्म नहीं होती बल्कि पांच साल तक देश का बेड़ा गर्क करने में इनका जूता भी दर्द कर जाता है|

आप उनके जूते की चिंता न करें| वर्ना वो आपकी चमड़ी उधार मांग ले जायेंगे|

 

वैश्या का बलात्कार


 

किसी भी पीडिता स्त्री को वैश्या साबित किया जाना, भारतीय न्यायालयों में बलात्कार के आरोप के बचाव के रूप में देखा जाता है| प्रायः स्त्री को चिकित्सकीय जाँच में यह बताया जाता है कि “यह आदतन” है| परन्तु, विवाहिता स्त्री अथवा लम्बे समय से शोषण का शिकार रही स्त्री को यह जाँच क्या बताती है? मैं दो प्रश्नों पर विचार का आग्रह करूँगा|

लेकिन क्या किसी वैश्या से “जबरन यौन सम्बन्ध” बनाना अपराध नहीं हैं? किसी भी वैश्या की सहमति लेना शायद समाज में सबसे आसान होता होगा; परन्तु जो पुरुष यह आसान सी सहमति भी नहीं ले सकते…|

मेरे विचार से यदि किसी भी स्त्री को वैश्या साबित किया जाता है तो आरोपी पर बलात्कार के साथ साथ धन वसूली का मुकदमा भी चलना| उसे साबित करना चाहिए कि उसने धन दिया था और पैसे लेने के बाद भी यह वैश्या पूर्व सहमति से मुकर गई|

मेरी पूरी सहानुभूति उस समाज के साथ है जो उस पुरुष को हेय दृष्टि से नहीं देखता जिसका पुरुषार्थ इतना भी नहीं है कि वह एक वैश्या की सहमति भी हासिल कर सके|

जिस समाज में वैश्या भी अपने को असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस करतीं हैं उस समाज में एक घरेलू स्त्री का तो घर से बाहर निकलना ही बहुत असुरक्षित है| क्योंकि वैश्याएँ जितने अच्छे से पुरुष वासना को समझती है उतना और कौन समझता होगा|

समाज को सुरक्षित बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अंग्रेजों द्वारा लादे गए धर्म और क़ानून को छोड़ें और उस पुराने भारतीय समाज की और लौटें जहाँ वेश्याओं का भी सम्मान और सुरक्षा थी| निश्चित रूप से यौनकर्म का सुरक्षित, नियंत्रित, और नियमित होना सुरक्षित होना, सारे समाज में सुरक्षा का मानदंड है|

 

 

 

बहुमत


 

हम संविधान के वैधानिक परिभाषाओं से हटकर किस प्रकार से “बहुमत” शब्द को देखते हैं?

  • क्या सदन में अधिकांश सदस्यों का समर्थन प्राप्त होना?
  • क्या पाँच वर्ष तक सत्ता में बनाये रखने वाला पूर्ण बहुमत?
  • क्या पाँच वर्ष के लिए पूर्ण वैधानिक निरंकुशता देने वाला दो तिहाई बहुमत?
  • क्या सिर्फ सत्ता देने का बहुमत या सरकार के मन मुताबिक हर काम को होने देने का बहुमत?

पिछले कुछ दशक से भारतीय सदनों में विधायी कामकाज नहीं के बराबर हो रहा है| जो हो भी रहा है उसमें विचार विमर्श लगभग समाप्त हो गया है और राजनितिक आकाओं के मन मुताबिक कागज पढ़ कर काम चलाया जा रहा है| बहुत सारे लोग भारतीय राजनितिक प्रणाली को दो या तीन दलीय व्यवस्था में बदलना चाहते है| भले ही संसद में ऐसा नहीं हो पा रहा हो, परन्तु दो तथाकथित प्रमुख दलों के लोग जनसाधारण के बीच इसी प्रकार का प्रचार या दिखावा कर रहे है| उनमें सहमति है कि जो मेरा विरोध करता है उसे तेरा आदमी बताया जायेगा और तेरे विरोधी को मेरा| किसी भी तीसरे चौथे दसवें पचासवें विचार को जबरन नाकारा जा रहा है|

इस प्रकरण में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिन राज्यों में यह तथाकथित प्रमुख दल कोई अस्तित्व नहीं रखते उन राज्यों के बारे में या तो बात ही नहीं की जाती या उन्हें राष्ट्रीय राजनैतिक मुख्यधारा से बाहर खड़ा कर दिया जाता है| जैसे कश्मीर, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु| कश्मीर को किसी ज़माने में रहे आतकवाद के नाम पर किनारे कर दिया जाता है तो उत्तर प्रदेश पिछड़ा मूर्ख गंवार बता कर और तमिल नाडू सांस्कृतिक भिन्नता की भेंट चढ़ जाता है||

परन्तु क्या सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से बहुआयामी भारत में यह विचार उचित हैं? क्या हमारे प्रमुख दल अपने देश के बहुत बड़े हिस्से से कट तो नहीं गए हैं? क्या बहुमत के नाम पर “अनेकता की एकता” को जाने अनजाने छिन्न भिन्न तो नहीं कर दिया जा रहा है?

देश की सांस्कृतिक, वैचारिक और राजनितिक भिन्नता को परखने समंझने और उसके बारे में जागरूक होने में कोई कमी तो नहीं रह गयी है?

आप की शीतलहर


 

“दिल्ली की सर्दी” अगर अपने आप में एक मुहावरा है तो “दिल्ली का मौसम” और “मौसम का मिज़ाज” भी कहीं से भी पीछे नहीं हैं| इस समय दिल्ली में शीतलहर का मौसम है और इस बार “आप की शीतलहर” की मार है|

 

दिल्ली के चुनाव परिणामों से पहले दिल्ली के पिछले दो दशकों को अगर देखें तो हमें मानना होगा कि दिल्ली में विकास हुआ है| बिजली, पानी, सड़क, आदि की भी कोई बड़ी समस्या नहीं दिखाई देती है| दिल्ली मेट्रो दिल्ली के विकास का अग्रदूत बनकर खड़ीं दिखाई देती है| फिर क्या हुआ कि दिल्ली में कांग्रेस की शीला सरकार को हार देखनी पड़ी?

 

English: Jantar Mantar, New Delhi with Park Ho...
English: Jantar Mantar, New Delhi with Park Hotel हिन्दी: जंतर मंतर, दिल्ली (Photo credit: Wikipedia)

 

१.      जनता ने विकास में भ्रष्टाचार को गहराई से महसूस किया;

 

२.      विकास की मौद्रिक लागत की अधिकता जनता को समझ नहीं आई;

 

३.      जब दिल्ली मेट्रो लाभ में गयी तो डीटीसी के घाटे पर सवाल उठे;

 

४.      बिजली पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के निजीकरण में, जनता को जिम्मेदारी से भागती सरकार और विपक्ष दिखाई देता है;

 

५.      बिजली कंपनी के खातों में धांधली की खबर से जनता में आक्रोश है; और

 

६.      हाल की नकली महंगाई ने भी जनता के कान खड़े कर दिए हैं|

 

यदि हम साधारण कहे जाने वाले लोगों से बात करते हैं तो पाते हैं कि सभी तबकों में संसद में काम ठप्प रहना; कानूनों का लम्बे समय तक पारित न होना; ताकतवर लोगों के मुकदमों का टलते रहना सब आक्रोश पैदा करता है| लोग जन – लुभावने वादों पर अब अधिक मतदान नहीं करते| सभी को नागनाथ – साँपनाथ की राजनीति से मुक्ति चाहिए|

 

हाल के चुनावों से यह तो स्पष्ट है कि देश में अब कांग्रेस के विरुद्ध माहौल है| परन्तु भाजपा के लिए आसान राह नहीं है| उसके पास मोदी समर्थक वोट से अधिक कांग्रेस विरोधी वोट का बल है| सबसे बड़ी कठनाई यह है कि “भाई – भाई, मिलकर खाई, दूध मलाई” का भाव जनता में मौजूद है जिसे नारा बनना ही बाकि रह गया है|

 

क्या आप ये नारा बुलंद कर पाएगी?

 

“भाई – भाई, मिलकर खाई, दूध मलाई”

 

आम आदमी पार्टी संसदीय दल के लिए चुनौती


Arvind Kejriwal and friends
Arvind Kejriwal and friends (Photo credit: vm2827)

नवोदित आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनाव के रोचक परिणामों से उत्पन्न चुनौती का सामना कर पाने के लिए मेरी शुभकामनायें|

चुनाव परिणामों को देखने के बाद मेरी यह धारणा प्रबल हुई कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अहंकार का शिकार हुई|

साथ ही भाजपा सही समय के तुरंत बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के विरुद्ध उत्पन्न जन आक्रोश को समझने में सफल हुई| साथ ही भाजपा ने उचित समय पर न केवल चुनावी रणनीति में बदलाव किये वरन समय पूर्व ही चुनाव उपरांत की संभवनाओं पर भी मंथन किया|

भाजपा ने सही छवि के व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी बनाया| भाजपा ने अपने प्रमुख प्रतिद्वंदी के रूप में आआपा की पहचान की और उसकी छवि बिगाड़ने के सारे प्रयास किये अथवा उनमें भाग लिया| भाजपा के पास क्षेत्र वार समीकरणों, मतदान परिणामों और उनके दूरगामी प्रभावों का पूरा आंकलन था|

आप देख सकते है कि रामकृष्णपुरम से आआपा प्रत्याशी शाज़िया इल्मी को बेहद प्रभावी तरीके से चिह्नित किया गया| उन पर लगाये गए आरोप भले ही कहीं से भी आये हों, परन्तु भाजपा में उन्हें प्रभावी तरीके से प्रचारित किया| भाजपा ने इल्मी को आआपा के तथाकथित असल चहरे के रूप में पेश करने का प्रयास किया जिसे सोशल मीडिया पर बार बार शेयर किया गया|

इल्मी का उस क्षेत्र से चुना जाना संघ परिवार के लिए आत्महत्या करने जैसा होता क्योंकि उस क्षेत्र में विश्व हिन्दू परिषद् का मुख्यालय है और मुस्लिम आबादी का कोई बड़ा प्रभाव नहीं है| भाजपा हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से “पढ़ी लिखी मुस्लिम महिला” को जीतने देकर, देश भर के कट्टरपंथी हिन्दू समाज को नया सन्देश नहीं जाने दे सकती थी| हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से “पढ़ी लिखी मुस्लिम महिला” का जीतना कई नए सन्देश देता –

अ)    सुशासन के बढ़ा हुआ महत्त्व,

आ)  हिन्दू मुस्लिम खाई को भरना,

इ)      हिन्दू समाज में मुस्लिम समाज की सकारात्मक छवि

ई)      मुस्लिम महिला और समाज को विकास और खुली सोच का आदर्श

उ)     सांप्रदायिक राजनीति का अंत

मतदान के दिन उसके पोलिंग एजेंट पूरी तन्मयता से हर मतदाता को चिन्हित कर रहे थे और उसके मूड को भांपने का प्रयास कर रहे थे| उन्हें तीसरे पहर तक यह सही जानकारी थी कि किस पोलिंग बूथ पर किसको कितना मतदान हुआ है| भाजपा के बंधे हुए समर्थकों को शाम से ही बुला बुला कर मतदान कराया गया|

आप देख सकते हैं कि बहुत से चुनाव क्षेत्रों में अंतिम समय में हुए मतदान से ही भाजपा ने जीत हासिल की है| देर शाम के इस मतदान ने अन्य चुनावी रणनीतिकारों को सकते में डाल दिया था|

मतगणना के दिन जब यह तय हुआ कि समस्त परिश्रम के बाद भाजपा पूर्ण बहुमत के पास नहीं पहुँच रही है तो उन्होंने बहुत शीघ्र उन्हें अपनी आगे की रणनीति के पासे चलने प्रारंभ कर दिए हैं| मुझे भाजपा की प्रशंसा करने चाहिए कि उसने दिल्ली में दंभ का प्रदर्शन नहीं किया और मंझे हुए राजनीतिक दल की तरह अपने कदम उठाने का निर्णय किया है|

 इस समय भाजपा ने सबसे बड़ा दल होने के बाद भी सरकार बनाने की पहल करने से मन कर दिया है| हम इस समय बाजपेयी जी की तेरह दिन की सरकार से इसकी तुलना नहीं कर सकते| उस समय भाजपा अपनी सरकार को शहीद कर कर हिन्दू जनता को यह सन्देश दे रही थी कि अन्य सारे दल उसके विरुद्ध साजिश कर रहे हैं| आज अगर भाजपा सरकार बना कर सत्ता लोलुप होने की छवि नहीं बनाना चाहती| दूसरा सरकार बनाने के लिए होने वाली जोड़तोड़ उसे आआपा के मुकाबले में बेहद कमजोर नैतिक पायदान पर ले आएगी| अगर जल्द ही चुनाव होते हैं तो उसे अपने सारे राजनैतिक दाँव पेच चलाने का पूरा समय मिल जायेगा| यदि यह चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ होते हैं तो उस समय दिल्ली के स्थानीय मुद्दों और आआपा के सत्तर स्थानीय घोषणापत्रों पर राष्ट्रीय मुद्दे छाये रहेंगे| उस समय भाजपा दिल्ली में मोदी – केजरीवाल मुकाबले में मोदी की शक्ति को बढ़ा कर देखती है|

यह भी देखना है की भाजपा किस प्रकार सरकार बनाने की जिम्मेदारी से भागने का दोष संभालती है|

 आआपा के किये यह अभी नयी शुरुवात है और अभी उसका राजनैतिक अन्नप्राशन होना है| उसके लिए सौभाग्य की बात है कि वह दूसरा बड़ा दल है| अगर वह सरकार बनाती है तो सत्ता लोलुपता के स्तर पर उसमें और अन्य दलों में कोई अंतर नहीं रह जायेगा| सरकार बनाने के बाद उसके उसके ऊपर अपने घोषणापत्र लागू करने का दबाब होगा जिसे बिना पूर्ण बहुमत लागू करना कठिन है| लेकिन उसे यह भी नहीं दिखाना है कि वह विरोध की राजनीति में इतनी रम गयी है कि आज सत्ता से भी भाग रही है|

आआपा पर यह चुनौती है कि वह किस तरह भाजपा को सरकार बनाने के लिए प्रेरित करे| उस से भी बड़ी चुनौती यह है कि किस तरह से आआपा इस विधानसभा के भंग होने की स्तिथि में जनता को यह सन्देश देती है कि गलत प्रकार की राजनीति ने दिल्ली में दोबारा चुनावों की स्तिथि पैदा कर दी है|

 यदि आआपा किसी अन्य दल की सरकार को चलने देकर बेहद सकारात्मक विपक्ष की भूमिका अपना सकती है| आआपा भाजपा के घोषणापत्र से वह मुद्दे जनता को बता सकती है जिनसे उसकी सहमति है| खुले मंच से यह घोषणा की जा सकती है कि यदि भाजपा अपने घोषणा पत्र में से चिह्नित घोषणाओं पर पहले तीन महीने के भीतर अमल का भरोसा दे तो आआपा उसकी सरकार को अन्य मामलों पर मुद्दों के आधार पर समर्थन दे सकती है|

 

 

अलविदा सचिन!!!


 

 

 

English: Sachin Tendulkar's Signature.
सचिन तेंदुलकर के हस्ताक्षर (Photo credit: Wikipedia)

 

पिछले पंद्रह वर्ष से मैंने क्रिकेट का खेल लगभग नहीं देखा है| इसका मुख्य कारण सचिन रमेश तेंदुलकर हैं, ऐसा मुझे लगता है| सचिन के खेल शुरू करने के पहले कई वर्ष तक मैं उनके खेल का कायल था परन्तु धीरे धीरे मुझे लगने लगा कि अब यह खेल बहुत पेशेवर बन रहा है और भद्रपुरुषों के स्थान पर या तो ईश्वर खेल रहा है या मशीन| मुझे जल्दी ही लगने लगा कि लगभग हर तीसरे मैच में सचिन बहुत बढ़िया खेलेंगे|

 

 

 

English: Sachin Ramesh Tendulkar Wax Statue in...
सचिन रमेश तेंतुलकर – मोम मूर्ति – मैडम तुसाद लन्दन (Photo credit: Wikipedia)

 

 

 

 

क्रिकेट से मेरा मन पहली बार तब टूटा जब १९९२ में मेरे बोर्ड परीक्षा थीं और घर – परिवार – पास  – पड़ोस के लोग मुझे इस महान खेल के विश्व कप मुकाबलों को देखना छोड़कर पढाई करने के लिए टोक – टाक रहे थे| हमेशा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाला मैं मुश्किल से दुसरे दर्जे को बचा पाया| मेरा आत्मविश्वास पाताल से भी नीचे जा चुका था| मेरा जेबखर्च बंद कर दिया गया| मेरे माथे पर बेवकूफ, नाकारा और मूर्ख होने का कलंक इस तरह लगा की मुझे उसे धोने में कई वर्ष लग गए|

 

 

 

Sachin Tendulkar, Indian cricketer. 4 Test ser...
(Photo credit: Wikipedia)

 

परन्तु जब १९९६ जब इस खेल के विश्व कप मुकाबले चल रहे थे तब मेरा पहली बार अपने पिता से जबरदस्त झगड़ा हुआ| मेरे पिता और मुहल्ले के लोग दिन रात क्रिकेट की लत से त्रस्त थे और मेरी छोटी बहन अपनी बोर्ड परीक्षा की पढाई ठीक से नहीं कर पा रही थी| टेलिविज़न बंद करने या उसकी आवाज कम करने की हर गुजारिश बेकार चली गई| मुझे हार माननी पड़ी और मेरी बहन भी तमाम कोशिश के बाद दुसरे दर्जे में उत्तीर्ण कर पायी| यह अच्छा रहा कि साल भर के भीतर वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश पा गयी|

 

 

 

मुझे क्रिकेट में मैच फिक्सिंग की ख़बरें पढ़कर बहुत धक्का लगा था| मुझे नहीं लगता की इस तरह की बातें किसी भी खिलाड़ी से छिपी रह सकतीं हैं| खेल पर नजर रखने से कई बार यह समझ आ जाता है कि खिलाड़ी या पूरी टीम ही ठीक से नहीं खेल रही थी| कई बार आप देखते हैं, एक मैच में पूरी तरह थका हुआ खिलाडी अगले मैच में मैदान पर आराम करता है मगर टीम में चिपका रहता है|

 

 

 

उन्ही दिनों मुझे यह देख कर दुःख हुआ कि अस्पतालों में मैच वाले दिन न तो डॉक्टर ऑपरेशन करने को तैयार हैं और न ही मरीज के तीमारदार कराने को| सरकारी तो सरकारी, निजी क्षेत्र के कर्मचारी अपनी हाजिरी बनाने के लिए ही कार्यालय में आये हुए हैं मगर काम करने की जगह क्रिकेट पर दिल – दिमाग लगाये बैठे हैं| क्रिकेट ने देश में बहुत सारे कार्यदिवस नष्ट किये हैं, उत्पादन की जबरदस्त हानि की है|

 

English: Sachin Tendulkar at Adelaide Oval
(Photo credit: Wikipedia)

 

मुझे हँसी आती रहती है जब बहुत से लोग क्रिकेट के मैदान पर भारत – पाकिस्तान के सारे मसले सुलझा लेने की बात करते हैं|

 

 

 

जब मैं अपनी नौकरी में आया तो मुझे यह देख कर दुःख हुआ कि मेरे कर्मचारी क्रिकेट मैच को काम समय पर न कर पाने का उचित कारण समझते हैं| मेरे एक कर्मचारी में तो मेरी शिकायत करते हुए लिखा भी कि मैं क्रिकेट मैच वाले दिन भी सामान्य दिनों जितना ही काम करवाना चाहता हूँ| न चाहते हुए भी मुझे कुछ कर्मचारियों को उन क्रिकेट मैचों में जबरन अवकाश पर भेजना पड़ा, जिनमें भारतीय टीम खेल रही हो|

 

 

 

अपने जीवन में मैंने कभी यह उम्मीद नहीं की और शायद आगे भी नहीं कर पाउँगा कि भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मैच के दौरान कोई माँ भी अपने बच्चे को मन लगा कर दूध भी पिला सकती है|

 

 

 

मुझे क्रिकेट के नए स्वरुप बीस – बीस ( जिसे बहुत से लोग बकवास – बीस मानते हैं) से कुछ उम्मीद है कि जल्दी ही यह दिन भर लम्बे एक दिवसीय क्रिकेट को समाप्त कर देगा| इस से करोड़ों कार्यदिवसों की बचत होगी और विश्व की पच्चीस फीसदी कार्मिक कार्यालयों में अपना काम करती रहेगी|

 

 

 

इसके बाद अब सचिन तेंदुलकर की सेवा निवृति से भी देश को राहत मिलेगी और बहुत से लोगों को क्रिकेट देखने का नशा शायद कुछ कम हो सकेगा| सबसे बड़ी बात शायद क्रिकेट एक बार फिर मशीन और भगवान के स्थान पर भद्रपुरुष इस खेल को खेलेंगे|

 

 

 

अलविदा सचिन!!!

 

 

 

 

 

कुलनाम


अभी हाल में “ओऍमजी – ओह माय गॉड” फिल्म देखते हुए अचानक एक संवाद पर ध्यान रुक गया| ईश्वर का किरदार अपना नाम बताता है “कृष्णा वासुदेव यादव”| इस संवाद में तो तथ्यात्मक गलतियाँ है;

 

१.      उत्तर भारत में जहाँ कृष्ण का जन्म हुआ था वहां पर मध्य नाम में पिता का नाम नहीं लगता| वास्तव में मध्य नाम की परंपरा ही नहीं है, मध्य नाम के रूप में प्रयोग होने वाला शब्द वास्तव में प्रथम नाम का ही दूसरा भाग हैं, जैसे मेरे नाम में मोहन|

 

२.      उस काल में कुलनाम लगाने का प्रचलन नहीं था|

 

'Vamana Avatar' (incarnation as 'Vamana') of V...
‘Vamana Avatar’ (incarnation as ‘Vamana’) of Vishnu and King ‘Bali’. (Photo credit: Wikipedia)

 

 

 

जाति सूचक शब्द में नाम का प्रयोग शायद असुर नामों में मिलता है, जैसे महिषासुर, भौमासुर| यह भी बहुत बाद के समय में| प्रारंभिक असुर नामों में भी इस तरह का प्रयोग नहीं है, जैसे – हिरन्यकश्यप, प्रह्लाद, बालि, आदि|

 

ऐतिहासिक नामों में मुझे चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम में ही कुल नाम का प्रयोग मिलता है, स्वयं मौर्य वंश में भी किसी और शासक ने कुलनाम का प्रयोग नहीं किया है| विश्वास किया जाता है कि वर्धनकाल तक भारत में जाति जन्म आधारित न होकर कर्म आधारित थी| यदि उस समय जाति या कर्म सूचक कुलनाम लगाये होते तो हो सकता कि शर्मा जी का बेटा वर्मा जी हो| सामान्यतः, मध्ययुग तक कुलनाम का प्रयोग नहीं मिलता| हमें पृथ्वीराज चौहान का नाम पहली बार कुलनाम के साथ मिलता है|

 

 

स्त्रियों में कुलनाम लगाने की परंपरा बीसवीं सदी तक नहीं थी| स्त्रिओं में कुमारी, देवी, रानी आदि लगा कर ही नाम समाप्त हो जाता था| बाद में जब स्त्रिओं में कुलनाम लगाने की परंपरा आयत हुई तो बुरा हाल हो गया है| प्रायः सभी स्त्रिओं को विवाह के बाद अपना कुलनाम बदलकर अपनी पहचान बदलनी पड़ती है अथवा अपनी पुरानी पहचान में पति की पहचान का पुछल्ला जोड़ना पड़ता है|

 

पाठकों के विचारों और टिप्पणियों का स्वागत है|

 

दो ऑटोरिक्शा चालक


अभी गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में अपना पर्चा प्रस्तुत करने के लिए जाना हुआ| जाते समय अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से विश्वविद्यालय तक और लौटते समय दिल्ली कैंट से लोदी रोड तक ऑटो रिक्शा की सवारी का लुफ्त उठाया और सामायिक विषयों पर चर्चा हुई| दोनों रिक्शा चालकों की समाज और देश के प्रति जागरूकता और उस पर चर्चा करने की उत्कंठा ने मुझे प्रभावित किया|

गुजरात:

मुझे नियत समय पर पहुंचना कठिन लग रहा था और रास्ता भी लम्बा था| बहुत थोड़े से मोलभाव के बाद, मैं अपनी दाढ़ी और पहनावे से मुस्लिम प्रतीत होने वाले चालक के साथ चल दिया| मैंने सामान्य शिष्टाचार के बाद सीधे ही प्रश्न दाग दिया. अगले चुनावों में वोट किसे दोगे| बिना किसी लाग लपेट के उत्तर था, मोदी| मैंने दोबारा पूछा, भाजपा या मोदी? मोदी सर| मैंने कहा, वो तो कसाई है, उसे वोट दोगे| चालक ने शीशे में मेरी शक्ल देखी, आप कहाँ से आये है? मैंने कहा दिल्ली से, अलीगढ़ का रहने वाला हूँ| उसने लम्बी सांस ली और शीशे में दोबारा देखा| मैंने उचित समझा कि बता दूँ कि हिन्दू हूँ|

“हिन्दुओं से डर नहीं लगता सर, सब इंसान हैं|” थोड़ी देर रुका, सर ये गुजरात है, “जिन हिन्दुओं ने बहुत सारे मुसलामानों की जान बचाई थी वो भी सबके सामने मोदी ही बोलते है| बोलना पड़ता है सर| वोट का पता नहीं, अगर दिया तो मोदी को नहीं देंगे और कांग्रेस या और कोई हैं ही नहीं तो देंगे किसे?” अब मेरे चुप रहने की बारी थी|

काफी देर हम लोग चुप रहे, फिर उसने शुरू किया, “सरकार बड़े लोगों की होती है और हम तो बस वोट देते हैं| अगर वोट भी न दें तो ये लोग तो हमें कभी याद न करें| इस देश में वोट बैंक और नोट बैंक दो ही कुछ पकड़ रखते हैं| हम कोशिश कर रहे हैं, वोट बैंक बने रहें| इसलिए वोट देंगे|”

Drive thru
Drive thru (Photo credit: Nataraj Metz)

दिल्ली:

दिल्ली कैंट स्टेशन पर उतरने ऑटो रिक्शा दलाल से मीटर किराये से ऊपर पचास रुपया तय हुआ| ऑटो चालक सिख था| उसने बताया कि ज्यादातर जगहों पर अवैध पार्किंग ठेके है और ये लोग पचास रुपया लेते है| पुलिस इन ठेके वालों से हफ्ता वसूलती है और ये बिना रोकटोक ऑटो खड़ा करने की जगह देते हैं| दिल्ली एअरपोर्ट पर ऑटो के लिए कोई वैध – अवैध पार्किंग नहीं है क्योंकि ऑटो रिक्शा देश की शान के खिलाफ हैं| ऑटो पर विज्ञापन से लेकर पुलिस भ्रष्टाचार तक लम्बी चर्चा हुई| उसने भाजपा और कांग्रेस को सगा भाई बताया| “हिस्सा तय है जी सारे देश में इनका ७० – ३० का|” “कॉमनवेल्थ की समिति में दोनों के लोग थे साहब|” “क्रिकेट का रंडीखाना तो दाउद चलाता है साहब और भाजपा – कांग्रेस के लोग उसमें नोट बटोरने जाते हैं|” उसके मन और जुबान की कडुवाहट बढती रही और मेरे लिए सुनना कठिन हो गया|

अंत में उसने कहा, “साहब हमें नहीं पता कि केजरीवाल कैसा करेगा, क्या करेगा और उसके पास मंत्री बनाने लायक अच्छे समझदार लोग हैं या नहीं; मगर हम उसे वोट देकर जरूर देखेंगे|”

मैं सोचता हूँ, अगर देश की आम जनता के मन में लोकतंत्र की भावना मजबूत हैं, यही अच्छी बात दिखती है| वरना तो लोग हथियार उठाने के लिए भी तैयार ही जाएँ| कहीं पढ़ा था न इन्ही दो चार साल में “शहरी नक्सलाईट”| 

घर मजदूरी


अभी पिछले दिनों खबर पढ़ी कि एक चाय की दूकान पर काम करने वाले ग्यारह साल के बाल मजदूर को चाय पीने आये दो ग्राहकों ने ठीक से आर्डर न ले पाने करण गोली मार दी|

मुझे अपने बचपन की कुछ बातें याद आ गयीं| उन दिनों हम सिकंदराराऊ के नौरंगाबाद पश्चिमी मोहल्ले में रहते थे| पड़ोस में एक परिवार उन्हीं दिनों रहने आया जिसमे चार पांच छोटी छोटी लड़कियां और साल भर का एक लड़का था| जाड़ों के दिन थे| बच्चों की माताजी सुबह धूप निकलते ही छत पर आ जातीं थीं और दिन ढलने तक वही रहती थीं|

पुरे मोहल्ले में उस जल्लाद माँ का जिक्र होने लगा| दस और बारह साल की दोनों बड़ी लड़कियां बारी से खाना बनती थी| तीसरी आठ लड़की अपने छोटी बहन और भाई को नहलाती धुलाती थी| उसकी छोटी बहन रोज जब भी उसकी माँ का मन होता, पिटती रहती थी| साल भर का राजकुंवर दिन भर माँ की गोद से चिपका रहता था| हमें लगता की ये उन लड़कियों की सौतेली माँ है|

एक दिन, माँ ने उनके घर जाने का निर्णय लिया| उस औरत के पिता जिलाधिकारी कार्यालय में काम करते थे| उसे हाई स्कूल के बाद पढाई बंद करनी पड़ी थी और उसे घर के काम में लगा दिया गया था|

उसके अनुसार पंद्रह साल की उम्र से काम करते करते थक गयी थी और फिर ये “नाश-पीटियाँ” आ गयीं| सारा शरीर बिगाड़ कर रख दिया इन्होने| अब काम करना सीखेगी तो इनका ही तो भला होगा| मुझे क्या, दिनभर इनके बारे में सोच सोच कर ही परेशान रहती हूँ|

ऐसे कितने बच्चे हैं जो अपने घर में अपने ही माँ बाप के शोषण का शिकार होते हैं| लड़कियों को घर का काम करना होता है| लड़कों को ज्यादा लाड प्यार तो शायद मिलता है मगर वो भी अछूते नहीं है अपने घर में काम काज से| बाजार हाट, उठा-धराई|

मगर कब तक?

प्रधानमंत्री!!


 

भारतीय हिंदी समाचार चेनल पर प्रसारित किया जा रहीं नायब वृत्तचित्र श्रंखला| विश्व के श्रेष्ठ निर्देशक श्री शेखर कपूर इसके प्रस्तुतकर्ता हैं|

२३ किस्तों में प्रसारित होने वाली इस श्रृंखला की छह क़िस्त हम देख चुके हैं|

किस तरह आजादी के समय देश में ५६५ स्वशासित रजवाड़ों को भारत या पकिस्तान में मिला कर ५६६ राजनैतिक इकाइयों को जोड़ कर दो इकाइयों में तब्दील किया गया| किस तरह धर्म नहीं वरन राजनीति देश का बंटवारा करा रही थी या कहें कि धर्म द्वारा बांटे जा रहे देश को राजनीति मिला रही थी| अलग ही कथा है| सयुंक्त भारत उस दिन से पहले एक विचार था जिसको अब तक का सबसे बड़ा अमली जमा पहनाया गया था| हमने इस कथानक में देखा| हिन्दू जोधपुर पाकिस्तान में जा सकता था, क्या विचित्र राजनीति थी| बहुत सी सच्चाइयाँ आज कोई दुहराना नहीं चाहता| जोधपुर, जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर केवल कथा नहीं है देश का वो बंटा हुआ चरित्र है, जो आज भी भारत को अपने मानसिक पटल पर, बिहारी, मराठी या फिर हिन्दू मुस्लिम या ब्राह्मण- वैश्य के बाद रखता है|

एक ओर देश को जोड़ा जा रहा था| दूसरी तरफ अलग अलग राज्यों की मांग उठ रही थी| निश्चित ही भारतीय संस्कृति, बहुत सारी संस्कृतियों का संगम है और हर संस्कृति को अपनी अलग पहचान मिलनी चाहिए| मगर यह भी सच है कि हर घर परिवार की अपनी अलग संस्कृति, सांस्कृतिक पहचान होती है| कितने राज्य, किस पैमाने पर|

प्रश्न अनेक थे और हैं| हिन्दू कोड बिल!! उस समय उसका हिन्दू समाज में बड़ा विरोध हुआ, आज देश में हिन्दू समाज उन बातों पर गर्व करता है जिनका उस समय विरोध हुआ था| उदहारण के लिए, एकल विवाह.. आज हिन्दू मुस्लिम कानून में चार विवाहों की मान्यता मात्र का विरोध करते है और मजाक उड़ाते हैं| मेरे मन में कई बार प्रश्न उठता है, क्या सब के लिए समान संहिता न लाकर देश में मुस्लिम और अन्य तबकों को विकास के क्रम में पीछे नहीं छोड़ दिया गया है?

भारत चीन युद्ध भी ऐसी ही एक कथा है| भारतीय राजनीति, कूटनीति और युद्ध नीति की पहली बड़ी परीक्षा| नवविकसित देश गलती से ही सीखता है; हमने सीखा जरूर मगर क्या आज हम अपने बड़े हो जाने के गरूर में कुछ भुला तो नहीं रहे है|

कस कर बुनी हुई कहानी, संजीदगी से किया गया प्रस्तुतीकरण, आवश्वकता के अनुरूप नाट्य रूपांतरण प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी सफलता है| शेखर कपूर अपने हर शब्द से न्याय करते दिखाई देते हैं|

 

यह केवल भारत के सामाजिक इतिहास की गाथा नहीं है, देश के आगे बढ़ने की उधेड़बुन है|

तिरंगा, पतंगे, और आजादी का जिन्न|


 

इस समय जब मैं यह आलेख लिख रहा हूँ, हम सभी स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं|

कल शाम नई दिल्ली के खन्ना मार्किट में टहलते हुए और उसके बाद मुझे कई बार सोचना पड़ा कि हम अपना स्वतंत्रता दिवस किस तरह से मानते हैं?

पहले थोडा परिचय दे दिया जाये| ७० – ८० दुकानों वाले खन्ना मार्किट; लोदी कॉलोनी, जोरबाग और बटुकेश्वर दत्त कॉलोनी का मोहल्ला बाजार ही है| यहाँ पर किसी भी समय आपको चार पांच सौ से अधिक लोग कभी नहीं दिखाई देते हैं| शाम होने से पहले घर गृहस्थी का सामान अधिक बिकता है और शाम होने के बाद अधिकतर भीड़, खाने पीने के लिए ही होती है| मेरे विचार से दसेक तो रेस्तरां और हलवाई ही होंगे और ठेले तो सभी खाने पीने के है ही| अधिकतर रिवाज फोन पर आर्डर लिखवा कर घर पर ही खाना मंगवाने का है|

कल नजारा अलग ही था| जब भी हम कोई त्यौहार मानते है, बाजार में वो हमेशा ही एक दिन पहले हंसी ख़ुशी और पसीने के साथ मनाया जाता है| कल दोपहर से ही स्वतंत्रता दिवस शुरू हो गया| तिरंगे, पतंगों और खाने पीने की धूम थी| छोटे बच्चे तिरंगे के हर रूप पर फ़िदा थे.. झंडे, पर्चे, कागज, विज्ञापन, केक, फीते, कुछ भी| शायद कल उन्हें देश के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा था| तिरंगी पतंगे तो गजब ढाती हैं, हमेशा| हर रंग रूप की पतंगें थी| पतंग की हर दुकान पर हर रंग की पतंगें और हर रंग – रंगत के लोग थे| पतंग खरीदते, मांझा खरीदते, चरखी सँभालते, कन्ने बांधते; सब तरह के लोग| पतंग न उड़ा पाने के कारण मुझे हमेशा शर्मिंदगी महसूस होती है| कल तो लगा कि शायद जो लोग पतंग नहीं उड़ा पाते होंगे उनके भारतीय होने पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है| “वो काटा” तो हमारा राष्ट्रीय मूल मंत्र है| “वो काटा गाँधी को.. वो काटा नेहरू को..; है न मजेदार|

फिर खाने पीने की बारी आ गयी| ठेले पर चाट पकोड़ी जल्दी ख़त्म हो गयी| गोलगप्पे जरूर देर तक टिके, मगर उनकी आपूर्ति आसान थी और बार बार हो रही थी| मगर, असल जश्न तो दो खास दुकानों पर चल रहा था| केवल दो खास दुकानें.. दोनों पर पचास पचास लोग.. दो पुलिस बाइक.. चार पुलिस वाले..| थके मारे लोग, जश्न से खुश होते लोग, यार-बास लोग, मस्त लोग, मस्ती से पस्त लोग| विद्यार्थी भी है… और कब्र का इन्तजार करने वाले बुढ्ढे भी| न भीड़ ख़त्म होती है न जोश| एक जाता चार आते| चखना भी लेना था, और बर्फ के टुकड़े भी| कोई अनुशासन नहीं.. कोई धक्कम धक्का भी नहीं.. सब्र ऐसा जो शायद कभी रेलवे स्टेशन पर देखने को न मिले| पैसा बह रहा है, उड़ रहा है, कूद रहा है.. गरीबी की ऐसी तैसी..| क्या रखा है ३२ रुपल्ली की गरीबी में| बोतल और कैन.., यस, वी कैन…|

रात ढलते ढलते जब बाकि का सारा बाजार बंद होने लगा, मगर यहाँ तो जश्न की रात थी| लोग आजादी के नशे में चूर थे, उनकी हर बोतल में आजादी बंद थी, उनकी हर कैन में आजादी के बुलबुले उठ रहे थे|

मैं थक गया था; घर चला आया| घडी ने साढ़े दस बजा दिए थे|

सुबह आसमां में बादल थे, चीलें थी और हमारी रंग बिरंगी पतंगें थीं| सड़क पर तिरंगे लहराते बच्चे थे| जन सुविधाएँ के बोर्ड के ठीक नीचे, आजाद देश का आजाद सपूत नशे में चूर चित्त पड़ा था| एक साथी ने कहा, आज ड्राई-डे है न, कल डबल पीना पड़ा होगा न||

कामवाली बाई ने कहा, आज ड्राई डे है तो क्या कल फ्लड डे था न भैया|

तिरंगा, पतंगे, और बोतल से निकला आजादी का जिन्न| 

भारत की अबला नारी


 

भारत का समाज और क़ानून मात्र दो प्रकार की अबला नारियों की परिकल्पना करता है:

१.      नवविवाहिता स्त्री, विवाह के पहले ३-४ वर्ष से लेकर सात वर्ष तक (नवविवाहित अबला); और

२.      भारतीय परिधान पहनने और अपने पिता या भाई की ऊँगली पकड़ कर चलने वाली २४ वर्ष की आयु अविवाहिता स्त्री (अविवाहित अबला)|

जो भी स्त्री इस दोनों निमयों से बाहर है वह प्रायः समाज और कानून द्वारा कुलटा स्त्री मानीं जाती है| (ध्यान दें, भारत में सबला स्त्री का कोई प्रावधान नहीं है|)

और जब तक किसी भी स्त्री को कुलटा घोषित नहीं किया जाता उसे भाभीजी और माताजी जैसे शब्दों से पुकारा जा सकता है|
(पुनः ध्यान दें, बहनजी शब्द का प्रयोग उचित नहीं माना जाता है, अविवाहित स्त्रियों के लिए भी भाभीजी शब्द का धड़ल्ले प्रयोग किया जा सकता है|)

आईये; विस्तृत अध्ययन करते हैं:

नवविवाहित अबला:

नवविवाहिता अबला, सामाजिक समर्थन प्राप्त कानूनी अबला है, जिसे होने वाले किसी भी कष्ट के भारतीय समाज में आराजकता की उत्पत्ति होती है| इस श्रेणी में आने के लिए किसी भी स्त्री को नवविवाहित होना ही एक मात्र शर्त नहीं है| प्रेम- विवाह के नवविवाहित हुईं स्त्रियाँ, सामान्य नियम के अनुसार इस श्रेणी से बाहर ही रखीं जातीं हैं| गरीब और निम्न जाति की स्त्रियाँ भी, राजनितिक दबाब  का अभाव होने पर इस श्रेणी से बाहर मानीं जा सकतीं हैं| जिन स्त्रियों का विवाह, ३५ वर्ष की आयु के बाद हुआ हो, उन्हें इस श्रेणी में काफी संशय के साथ रखा जाता हैं|

सामाजिक नियम के अनुसार इस श्रेणी में स्त्री विवाह के बाद के पहले दो – चार वर्ष ही रहती है, परन्तु कानून के आधार पर यह अवधि विवाह के बाद के पहले सात वर्ष रहती है| उस समय सीमा के बाद कोई भी स्त्री अबला नहीं रह जाती|

अपवाद स्वरुप, अश्रुवती स्त्रियाँ अपने अबला काल को अधिक समय तक बना कर रख सकतीं हैं| सुन्दर, आकर्षक, समझदार, मिलनसार (अति – मिलनसार नहीं), होना उन अश्रुवती स्त्रियों के लिए अतिरिक्त लाभदायक हो सकता हैं|

हमारे भारतीय समाज और कानून में नन्द, सास, जेठानी, पड़ोसन और किसी भी अन्य स्त्री जिसका किसी भी प्रकार का सम्बन्ध ससुराल या पति से हो, नवविवाहिता अबला के लिए प्राण-घातक मानी जाती है|

दहेज़, सती, आत्महत्या, गर्भपात और घरेलू हिंसा आदि के लिए पति को दोषी माना जाए या न माना जाए, इन में से किसी न किसी स्त्री को ढूंढ कर अवश्य ही दोषी मान लिया जाता है|

इस प्रकार की अबला को पति नाम की चिड़िया और ससुराल नाम के चिड़ियाघर से सुरक्षा की विशेष आवश्कयता हमारे कानून में हमेशा से महसूस की है और आज भी कर रहा है| नए तलाक कानून इस  श्रंखला में एक और कड़ी हैं और हम ऐसी ही अनेकाने क्रांतिकारी कड़ियों की सम्भावना से रोमांचित हो उठते हैं| नव विवाहिता अबला की सुरक्षा के लिए कई प्रकार के कानून बनाये गए हैं, उनके उदहारण इस प्रकार से हैं[i]:

  1. The Dowry Prohibition Act, 1961 (28 of 1961) (Amended in 1986)
  2. The Commission of Sati (Prevention) Act, 1987 (3 of 1988)
  3. Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
    1. The Indian Christian Marriage Act, 1872 (15 of 1872)
    2. The Married Women’s Property Act, 1874 (3 of 1874)
    3. The Guardians and Wards Act,1890
    4. The Child Marriage Restraint Act, 1929 (19 of 1929)
    5. The Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937
    6. The Special Marriage Act, 1954
    7. The Protection of Civil Rights Act 1955 
    8. The Hindu Marriage Act, 1955 (28 of 1989)
    9. The Hindu Adoptions & Maintenance Act, 1956
    10. The Hindu Minority & Guardianship Act, 1956
    11. The Hindu Succession Act, 1956
    12. The Foreign Marriage Act, 1969 (33 of 1969)
    13. The Indian Divorce Act, 1969 (4 of 1969)
    14. The Muslim women Protection of Rights on Dowry Act 1986
    15. National Commission for Women Act, 1990 (20 of 1990)

यदि इन कानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा बाद में कभी करेंगे|

अभी पहले अविवाहित अबला के बारे में बात करते हैं|

 

अविवाहित अबला:

यह प्रायः सामाजिक किस्म की अबला है, जिसके अबला होने के बारे में माना जाता है कि कानूनी विद्वानों में केवल किताबी सहमति है| अविवाहित अबला, वह अविवाहित स्त्री है जो गैर – भारतीय परिधान न पहनती हो, अपने पारिवारिक स्व – पुरुष जन ( और कभी कभी माता बहनों) के अतिरक्त किसी अन्य प्राणी के साथ न पाई जाती हो, शरीर से सर्वांग – स्वस्थ होने के बाद भी गूंगी, बहरी और अंधी हो और किसी भी पुरुष के द्वारा उसके अबला होने से अधिकारिक रूप से इनकार न किया गया हो|

सामान्यतः स्थानीय नियमों के अनुसार २० से २४ वर्ष की आयु पार करने के बाद किसी भी स्त्री को इस श्रेणी से निकला हुआ मान लिया जाता है|

इस श्रेणी में बने रहना हर स्त्री के लिए एक चुनौती है और विवाह की प्रथम शर्त है| अबलाओं के हितों की रक्षा के लिए एक रोजगार परक राष्ट्रीय आयोग भी है जिसका नाम आपको पता है|

 

अन्य विचार बिन्दु:

हर स्त्री को अबला श्रेणी के निकाले जाने का भय हमेशा बना रहता है| पहले किसी समय में हर स्त्री को अबला माना जाता था परन्तु अब ऐसा नहीं है| आज इस बाबत, कई वैधानिक सिद्धांत हैं|

पहला वैधानिक सिद्धांत है; “गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई|” इस सिद्धांत में गरीब का अर्थ किसी भी रूप में निम्न स्तरीय परिवार के होना है और लुगाई का अर्थ गरीब घर की किसी भी स्त्री से लिया जाता है| निम्नता को धर्म, जाति, क्षेत्र, आय, सम्पन्नता, राजनितिक अलोकप्रियता और भीड़ इक्कठा न कर पाने की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है|

दूसरा वैधानिक सिद्धांत है, “भले घर की लड़कियां मूँह नहीं खोलतीं”| यदि कोई स्त्री अपने साथ हुई किसी भी छेड़छाड़, या यौन शोषण की शिकायत करती है तो उसे समाज अबला के दर्जे से बाहर कर देता है| यदि वह फिर भी कोई कोशिश करती है तो हमारा न्यायतंत्र ( न्यायलय और समाचार माध्यम दोनों ही) उसके साथ इतना विचार – विमर्श करता है कि उसे अपने सही श्रेणी का ज्ञान हो जाता है, भले ही यह ज्ञान मरणोपरांत ही क्यों न हो| इस सिद्धांत का एक विपरीत सिद्धांत भी है, “अति भले और बलशाली घरों की लडकियां जब भी मूँह खोलती है, सत्य और उचित ही बोलतीं हैं” परंतु इस सिद्धांत का प्रयोग अपवाद स्वरूप ही हो सकता है|

अंतिम निष्कर्ष:

एक स्त्री के अबला श्रेणी से बाहर कर दिए जाने से उसके लिए हर प्रकार की सामाजिक, वैधानिक और न्यायायिक सुरक्षा का अंत हो जाता है| परन्तु, अबला के साथ हल्की की भी ऊँच – नीच करने वाले का सात पुश्त, माँ – बहन, हड्डी – पसली और कुत्ते की जिन्दगी और मौत वाला हाल किया जा सकता है|

कुल मिला कर मौत के कूएँ में सांप – छछूंदर का खेल है और मदारी गोल महल में बीन बजा रहे हैं|

लिए कटोरा हाथ … स्कूल चले हम…|


स्कूल चले हम
लिए कटोरा हाथ
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
हाड़ तोड़ते बाप
कमर तोड़ती मैया 
स्कूल चले हम|
 
बाप के हाथ लकीरें 
माँ की आँख आंसू
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..
लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..
पेट बाँध कर सोये 
पेट पकड़ कर जागे 
स्कूल चले हम|
 
दाल भात का सपना 
थाली में हो अपना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब जी का नोट 
नेता जी का वोट 
स्कूल चले हम|
 
भूख हमारी जात
नंग हमारी पात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
कखगघ से क्या लेना 
जोड़ घटाव लेकर भागे 
स्कूल चले हम|
 
मास्टर पूछें जात 
बड़के मारें लात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
देश दरिद्दर क्या जानें 
ईश्वर अल्लाह क्या मानें 
स्कूल चले हम|
 
पोखर पतली दाल 
कंकड़ चुभता भात
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब बाबू डटकर खाते 
जिम जाकर कमर घटाते 
स्कूल चले हम|
 
माँ बोलीं डटकर खाना 
भूखे लौट न आना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 

बेटा मिग उड़ाता था!


 

बेटा मिग उड़ाता था![i]

 

हँसती थी माँ,
गाती थी माँ,
बचपन में जब,
बेटा जहाज उड़ाता था|

 

गाती थी माँ,
गोदी में लेकर,
सपनों की लोरी,
बेटा सोने जाता था|

 

रचती थी माँ,
चौके में जाकर,
भोजन थाली,
बेटा पढ़ने जाता था|

 

डरती थी माँ,
अनहोनी बातों से,
नन्हे हाथों में जब,
बेटा बन्दूक उठता था|

 

उठाती थी माँ,
मिठाई के दौनों से,
आसमां सर पर,
बेटा अव्वल आता था|

 

रोती थी माँ,
भूली बिसरी यादों से,
अनहोनी आहों से,
बेटा चुप करता था|[ii]

 

सुख सांझे थे,
दुःख सांझे थे,
माँ के सपनों के गुल्ले,
बेटा बुनकर लाता था|

 

शिखर कुलश्रेष्ठ  चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html
शिखर कुलश्रेष्ठ
चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

मुस्काती थी माँ,
संतोष में पल में,
दिनभर मेहनत की,
बेटा खबर सुनाता था|

 

उड़ती थी माँ,
गाती थी माँ,
बच्ची थी माँ,
बेटा मिग उड़ाता था|

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!


[i] फ्लाइट लेफ्टिनेंट शिखर कुलश्रेष्ठ को समर्पित, जिन्हें सोमवार १५ जुलाई २०१३ को मिग दुर्घटना ने हमसे छीन लिया|

[ii] शिखर में काफी समय पहले अपने पिता को खो दिया था|