विश्व-बंदी १३ मई


उपशीर्षक – गाँव की ओर

भले ही इस वक़्त की हर सरकार बार बार करोना को मानव इतिहास की सबसे ख़तरनाक बीमारी कहे, मगर प्लेग और स्पेनिश फ्लू एक बड़ा कहर ढा चुके हैं| इन बीमारियों के समय में एक आम विचार पनपा था – गाँव की ओर पलायन| प्लेग के समय लोग बड़े गाँवों से निकल कर खेतों में रहने चले गए थे|

कारण: सामान्य बुद्धि कहती है, कम जनसँख्या घनत्व के इलाकों में बीमारी का फैलाव धीरे होगा – या शायद बीमारी वहाँ तक देरी से पहुँचे| दूसरा, शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में रहने का खर्च बहुत कम होता है| अपेक्षागत सुरक्षित पर्यावरण आपके स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता के लिए उचित है| सबसे महत्वपूर्ण कितनी भी ख़राब स्तिथि हो – कुछ न कुछ आप अपनी क्यारी या खेत में उगा लेंगे – जबकि बड़े शहरों को गांवों से आने वाले खाने पर ही निर्भर रहना है| कुल जमा, कठिन समय में शहरी जीवन के मुकाबले ग्रामीण जीवन सरल रहता है| हालाँकि आजकल के दिनों में गांवों और शहरों के विकास की जो खाई पैदा हुई है उसके चलते ग्रामीण जीवन उतना भी सरल नहीं है|

पिछले एक माह में में प्रवासी मजदूरों का अपने जन्मस्थानों की तरफ़ लौटने की बातें सामने आई हैं| न सड़कों पर पैदल जाने वालों की भीड़ कम हुई हैं न रेल गाड़ियों का इन्तजार करने वालों की| अब जब गाड़ियाँ चलने लगीं हैं – रेलवे स्टेशन के बाहर बहुत भीड़ है| परन्तु विशेष बात यह है कि पैसे वाले जो लोग अपने ग्रीष्मकालीन घरों और फार्म हाउस में पैसा लगा रहे थे वह भी खेती और अन्य कृषिपरक कार्यकलापों के बारे में बात कर रहे हैं| शहरों में घटते वेतन, कम न होते खर्च, तंगहाल अर्थव्यवस्था कुछ कारक हैं ही| साथ ही अगर गाँव और पुराने शहर वापिस साल दो साल के लिए भी आबाद होते हैं तो वहां का आर्थिक पर्यावरण सुधर सकता है और जन प्रदत्त विकास हो सकता है| पढ़े लिखे लोगों का वापिस पहुंचना और विकास की चाह स्थानीय प्रशासन पर भी विकास के लिए दबाब बनाएगी| किसी भी सरकार के लिए घटती जनसँख्या और अर्थव्यवस्था वाले इलाके के मुकाबले बढ़ते इलाके में धन लगाना सरल ही नहीं बल्कि परिणाम देने वाला है| मोर अगर जंगल में नाचेगा तो कौन देखेगा?

इस सब कारणों से बहुत से मध्यवर्गीय लोग भी गाँवों और छोटे शहरों की ओर लौटने पर विचार कर रहे हैं|

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