दिवाली अब भी मनती है

वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

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दिल्ली का प्रदूषण पर्व

दिल्ली में साल भर प्रदूषण का स्तर ख़तरे की सभी सीमाओं से कई गुना ऊपर रहता है| लेकिन दिल्ली वाले ठहरे आँख के अंधे कान के कच्चे| न कोई सही चीज आसानी से दीखे, न कोई सही बात आसानी से सुनाई दे| जब तक प्रदूषण से सूरज दिखना बंद न हो जाए तब तक दिल्ली वालों को प्रदूषण समझ नहीं आता| यह उच्चतम प्रदूषण भी दिल्ली वालों के लिए एक पर्व हो गया गया है| बच्चों की स्कूल से छुट्टी, अमीरी में कहीं बाहर घुमने निकल जाना, या एयरप्योरिफायर लगाकर घर में मस्त फ़िल्में देखना| अब तो यह सालाना जलसा हो गया है कि होगा ही होगा| दिल्ली सरकार और भारत सरकार इस पर्व पर कुछ मनोरंजक समाधान पेश करेंगे| यही सब है, और क्या?

वैसे तो प्रदूषण दिल्ली वालों की दीखता नहीं और दिख भी जाए तो हमारे पास बहुत सारे हास्यास्पद समाधान है| जैसे – पंजाब हरियाणा वाले पिराली जला रहे हैं हैं; दिल्ली के गरीब लोग कचरा जला रहे हैं; भवन निर्माण मजदूर धूल उड़ा रहे हैं| हद होती हैं दिल्लीपन की|

प्रदूषण का यह प्रदूषण उच्चस्तर दिल्ली से सामान्य स्तर प्रदूषण से २० से ३०% अधिक ही होता है| सामान्यतः दिल्ली का प्रदूषण स्तर ३०० होता है और दिल्लीवालों का प्रदूषण सहनशीलता स्तर ४०० होता है, जो वैज्ञानिक रूप से पर्यावरण की मृत्यु का परिचायक है| यह प्रदूषणस्तर दिल्लीपन को हास्यास्पद बनाता है| इस स्तर पर दिल्ली की जनता, राज्य सरकार और कभी कभी दिल्ली की भारत सरकार भी जग जाती है| यह जगना इस तरह का है कि कोई नशेड़ी नींद से जागकर नशे में बक बक कर रहा हो|

दिल्ली प्रदूषण के सामान्य प्रमुख कारक भी कम हास्यास्पद नहीं है:

  1. दिल्ली का स्थलमध्य होना: भारत के अधिकतर बड़े शहर समुद्र के काफ़ी निकट हैं, इसलिए प्रदूषण दिल्ली में फंस जाता हैं|
  2. जनसंख्या: प्रति वर्ग किलोमीटर में रहने वाला जनसंख्या घनत्व दिल्ली में इतना अधिक है कि दिल्ली शहर वर्ग प्रतिकिलोमीटर अधिक कार्बन डाई ओक्साइड छोड़ता है| दिल्ली में घरेलू प्रदूषण करक गैस स्टोव, फ्रिज, कूड़ा, हीटर, वातानुकूलन, आदि का घनत्व भी काफ़ी अधिक है|
  3. कूड़ादान: दिल्ली कूड़े का प्रबंधन आजतक ठीक से नहीं कर पाती| यहाँ स्वच्छता का मतलब है किसी मैदान में पेड़ के सूखे पत्तों पर झाड़ू लगाते हुए फ़ोटो खींचना|
  4. जनयातायात साधन: दिल्ली वाले सरकार से यह नहीं पूछते कि बसें इतनी कम क्यों हैं? कॉलोनियों के अन्दर रिक्शे क्यों बंद हैं? मेट्रो का अंतराल कम क्यों हैं? दिल्लीपन में शरीफ़ दिल्ली वालों को मजबूर करता है कि दस हज़ार माहना से भी अधिक खर्चा अपने सर पर डालो और कार ले आओ, भले ही द्वार पर खड़ी रहे| सुरक्षा की संवैधानिक और सार्वभौमिक जिम्मेदारी भी सरकार का उत्तरदायित्व कम से कम दिल्ली में नहीं खड़ा करती|
  5. आस पड़ोस का प्रदूषण: दिल्ली को विकास चाहिए, दिल्ली को सुविधाएँ चाहिए मगर इस विकास की कीमत अदा करने की जिम्मेदारी झारखण्ड, छत्तीसगढ़, या कोई और पिछड़ा राज्य उठाये| मगर भाई प्रदूषण तो हवा के साथ आएगा ही| और विकास की मार झेलता हुया ग़रीब रोजगार की तलाश में दिल्ली ही तो भागेगा ही|

मगर कोई नहीं पूछता की वास्तविक क्या हैं, इनका क्या निदान है और उसमें खुद उसका क्या योगदान होगा और सरकार की अब तब और आगे की उत्तरदायिता क्या है?

खैर छोड़िये, प्रदूषण पर राजनीति करते हैं जब तक दिल्ली वाले खुद प्रदूषण से न मर जाएँ|

बापू की दिल्ली बिल्ली

गबरू नौजवान अपनी शाहना अकड़-धकड़ के साथ चला आ रहा है| उसकी चाल में गजब की मस्ती है मगर चहरे पर लगता है कि बदलते वक़्त ने थोड़ी पस्ती ला दी है| दूर सामने मैदान में दो तीन बूढ़े किसी बात पर संजीदगी से गुफ्तगू कर रहे है| बाद पेचीदा लगती है; नौजवान ने मन ही मन सोचा| वो दूर से ही मामला समझना चाहता है मगर काला कुहासा कुछ देखने नहीं देता| गौर से देखने पर महसूस होता है, बूढ़े मिलकर खों खों खांस रहे है| खांसना भी दिल्ली शहर में गुफ्तगू करने के सलीकों में शुमार होने लगा है|

“क्या इसी कालिख भरे मुल्क के लिए जिए मरे थे?” नौजवान बूढों की तरफ़ बढ़ते हुए सर झटकता है|

उसे अपनी तरफ आता देख बूढ़े शांत होने लगे| पीढ़ियों में सोच का फ़र्क यूँहीं तो नहीं जाता|

“क्या बापू! आज क्या कोई हड़ताल है?” नौजवान ने कुछ परेशानी और कुछ हमदर्दी से पूछा|

मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा खों खों कर हंसने लगा|

“अब न वोट क्लब है न जंतर मंतर। हड़ताल करने पर पड़ते हैं हंटर।“ जैकिट वाले बूढ़े ने उदास लहजे में कहा|

“मामला क्या है, कुछ नहीं तो बापू अपनी समाधि पर ही जाकर बैठ जाइएगा|” नौजवान ने मजाकिया मगर इज्जतदार लहजे में कहा|

“आप क्यों नहीं कोई धमाका कर लेते, बरखुरदार?” मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा बोला|

“ब्राउन ब्रिटिश से क्या लड़ें? साँस लेना दूभर हो चुका है| अब तो फ़िजाओं में स्वदेशी गर्द और गंदगी है|” नौजवान मायूस लहज़े से कहने लगा| दिल के दर्द से कहिये कि फैफड़े के दर्द से, नौजवान के गले से खों खों के दबी आवाज़ धमाके होने लगे| तीनों बूढों की खाँसी और बढ़ गई|

बापू धरने पर बैठने की जगह ढूंढ रहे थे कि बिना साँस फुलाएं बैठ सके। जगह न मिली दिल्ली में| बिल्ली बने और मास्क पहन लिया ज़नाब।

Delhi pollution (c) vikram nayak

ले साँस भी आहिस्ता

आज पर्यावरण की बात सबके दिल-ओ-दिमाग़ में कहीं न कहीं घर किये रहती है| दूर तक सोचने वाले बहुत पहले से इन बातों पर सोच-विचार करते रहे| ख़ुदा-इ-सुखन मीर तकी मीर अठाहरवीं सदी में कहे अपने एक शेर में कहते हैं:

ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम,
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का |

सांस भी सोच समझ कर लीजिये, यह दुनिया कांच का कारखाना है| कांच के कारखाने में उड़ता हुआ बुरादा, शायद उस वक़्त प्रदुषण को समझने का सबसे बढ़िया जरिया रहा हो| आज कांच का बुरादा अकेला नहीं है, तमाम ख़राब चीज़े हैं, जो हमारे पर्यावरण को और दुनिया को गन्दा करती हैं और सांस लेना दूभर हो चला है| आज प्रदुषण आज सड़क पर या नदियों में नहीं रहता, यह घर में भी है|

यहाँ तक कि जो एयर फ्रेशनर हम घर को तरोताजा करने के लिए दिन भर उड़ाते रहते हैं, वह खतरनाक प्रदूषण है| इस तरह की बहुत सी चीज़ों से हमारा रिश्ता आज ऐसा हो गया है कि पहचान नहीं आता कि ये आस्तीन के सांप हैं, इनसे बचना चाहिए|

प्रदूषण घटाने के लिए प्रयोग होने वाला हमारा गैस का चूल्हा जहरीली कार्बन मोनोआक्साइड से रसोई भर देता है| एक अदद छोटे से मच्छर से बचने के लिए हम मच्छरदानी की जगह न दिखाई देने वाले जहरीले धुंए का इस्तेमाल तो हम ख़ुशी से करते ही हैं| वक़्त-बेवक़्त कीड़ेमकोड़े मारने के लिए जहर तो पूरे होश हवास में छिड़का ही जाता है|

आज प्रदूषण घर के दर-ओ-दीवार में छिपा बैठा है| घर के दीवारों और छतों में लेड और एस्बेस्टस छिपे रहते हैं, जो पेंट, टाइल्स, और कई अन्य उत्पाद में प्रयोग होते हैं| इसी तरह से स्टोव, हीटर, चिमनी, एयरकंडीशनर, फ्रिज भी घरेलू प्रदूषण अपना योगदान देते हैं| सिगरेट पीने वाले मेहमान आ जाएँ तो बात ही क्या हैं?

खाने में जो प्रदूषण हम प्रयोग करते हैं उसका कुछ कहना बेकार है| बिना जहर का खाना हमें रास नहीं आता| क्या कभी मैंने या आपने यह कहकर कोई सब्ज़ी खरीदी है जिसमें कीड़े मारने का ज़हर न लगा हो? बिना ज़हर की सब्ज़ी अक्सर कीड़े पकड़ लेती है, थोड़ा भी बासी होने पर जल्द ख़राब हो जाती है|

आज बाहर के मुकाबले घर पाँच गुना तक अधिक प्रदूषित है| भारत में यह आंकड़ा ख़तरनाक हो जाता है जब देखते हैं की दुनिया के बीस में से तेरह सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर भारत में हैं|

संत कबीर कहते है:

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप| 
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अगर हम अपने घर में होने वाले अतिरक्त उपभोग को कम कर दें तो प्रदुषण कम कर दें| जैसे ऐसे उपाय की रसोई गैस, हीटर, स्टोव आदि का प्रयोग कम हो| इससे इनसे निकलने वाली गैस को कम किया जा सकता है| मच्छर मक्खी कीड़ेमकोड़े मारने के जहरों का प्रयोग कम करें और मच्छरदानी का प्रयोग हो| बढ़िया पेंट, टाइल्स, आदि का प्रयोग हो| प्राकृतिक हवा की घर में आवाजाही हो तो घरेलू प्रदूषण को घर से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा| घर में लगाये जाने वाले कई पौधे भी प्रदूषण से लड़ सकते हैं| कुछ विशेष प्रकार के पेंट घरेलू प्रदुषण न सिर्फ कम फैलाते हैं बल्कि कुछ प्रदूषक तत्वों को सोख भी लेते हैं|