छाया की अमूर्त अभिव्यक्ति


डॉ. छाया दुबे प्रकृति से अपना सम्बन्ध देखती है और प्रकृति उनकी अमूर्त रूप में उनके कैनवास पर उतरती है| उनसे बात करते हुए लगता है कि कैनवास उनके अकथ्य को रंग के रूप में उतारता है और उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है|

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प्रकाश उनकी अभिव्यक्ति को तेज प्रदान करता है और चटख रंगों के रूप में निखर कर आता है| सूर्य और जल उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण साधन और साध्य है जिन्हें वो भिन्न रंगों के माध्यम से व्यक्ति करती हैं| इस कारण उनकी रचना प्रक्रिया में चिंता के रंग और लकीरें दिखतीं हैं मगर अवसाद नहीं दिखाई देता|

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वो प्रकृति बचाने और पृथ्वी बचाने की बात आशावादिता के साथ करतीं है| उनसे बातचीत में लगता है कि भोपाल जैसे शहरों में जीवन और प्रकृति को लेकर अवसाद व्याप्त नहीं हुआ है सकारात्मक चिंताएं जरूर हैं| यह भाव उनकी कला को विशेषता देता है|

आश्चर्यजनक रूप से वो प्रकृति की चिंताओं के बीच उसके दोहन और शोषण की चमक – दमक को भी देख पातीं हैं| या कहिये, तमाम चिंताओं के बीच, प्रकृति के प्रति उनका सौन्दर्य बोध पूरे रोमानी अंदाज में मौजूद है|

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नारी शोषण शोषण और प्रताड़ना जैसे विषय ही उनके यहाँ अवसाद नहीं भरते वरन वो उसे पूरी आशा और प्रकाश के साथ देखती है|

ईश्वर और दर्शन भी, उनके अंतर्मुखी स्वभाव को बहिर्मुखी बनाते हैं|

छाया दुबे के शब्दों में:

“ मेरे चित्रों का मध्यम मिश्रित रहा है| एक्रेलिक ऑइल, ड्राई पेस्टल, सभी का प्रयोग करती हूँ| मेरे काम में नुकीले फोर्सफुल स्ट्रोक, परिश्रम एवं प्रयास को दर्शाते हैं| और सॉफ्ट स्पॉट स्ट्रोक स्थिरता और संतोष का सूचक हैं| मेरे चित्रों में पीले रंग का विशेष महत्त्व है, जैसे पृथ्वी और जीवन के लिए सूर्य की ऊर्जा का महत्त्व है| सभी रंगों के तालमेल में सृष्टि का सौन्दर्य निहित है, इन रंगों के साथ मेरी इस यात्रा में संगीत का साथ अनिवार्य सा है; मानो संगीत के लय एवं भाव मानो मेरे स्ट्रोक को और लयात्मक एवं भावयुक्त एवं अर्थपूर्ण बनाते हैं|”

डॉ. छाया दुबे के चित्रों की प्रदर्शनी, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम, २०५, तानसेन मार्ग, निकट मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन, पर दिनांक 28 अप्रैल से 8 मई 2016 तक चल रही है|

सहजीवन आनंद


वास्तविक दुनिया में लोग मोबाइल एप्लीकेशन के जरिये संकेत भाषा में बात नहीं करते; उनकी एक विकसित भाषा होती है| वास्तविक लोग हँसते, गाते, मुस्कराते, रोते और लड़ते – झगड़ते हैं| मगर यह बातें आज हमें अपने को याद दिलानी पड़तीं हैं|

राष्ट्रीय राजधानी से कुछ दूर एक सुप्त सा गांव है, जिसका कुछ भी नाम रख लीजिये – किसानपुर!! कहने के लिए तो मात्र दो सौ किलोमीटर दूर है, मगर पहुँचने के लिए आज भी दिल्ली से दो बस और एक तांगा या ऑटो पकड़कर जा सकते हैं| विकास के नाम पर एक मोबाइल टावर हैं, गाँव के हर घर में बिजली के लट्टू हैं, हर हाथ में स्मार्ट फ़ोन हैं और उन्हें चलाने के लिए हर घर में जनरेटर का कनेक्शन है जो मौसम के हिसाब से दिन में दो बार बिजली देता है| सरकारी बिजली भी कभी कभी आ जाती है, जिसका बिल खेती में नाम और उसका न आना सब्सिडी के नाम पर माफ़ है|

निकट के कस्बे से फट फट फट फट की आवाज करते ऑटों में लड़कर पहुंचे थे वहां| मगर मुख्य सड़क से गाँव अभी भी एक किलोमीटर दूर था| साथ में गए बच्चों को गड्ढों के बीच कहीं कहीं किसी ऐतिहासिक सड़क के अवशेष प्राप्त हो रहे थे| सड़क के किनारे तरह तरह के पेड़ और उनके पीछे लहराते खेत मानों लोदी गार्डन का अव्यवस्थित रूप हो| बच्चे किताबों और टेलीविजन से ली गई जानकारी का उत्साह पूर्वक प्रयोग कर रहे थे| कुछ देर पहले तक की परेशानी अब उनके लिए बीती बात थी|

गाँव में पहुँचते ही जब मेजबान का पता पूछा गया, तो बच्चों के लिए हैरत की बात थी| स्मार्ट फोन के मैप पर रास्ता देखने के जगह अब हम बताये गए पहचान चिन्हों के सहारे अपने मेजबान के घर तक पहुँच गए| बच्चे उस बात को खेल की तरह ले रहे थे जो आज भी एक सामान्य बात है|

शाम को घुमने निकले तो बाग़ में कई तरह के फल के पेड़ और खेतों में अलग अलग तरकारी के पौधे और बेलें थीं| ताजा सब्जी का अपना आनंद था| मेजबान के घर के बाहरी हिस्से में मिर्च, टमाटर, हरा धनिया, और कुछ एक और सब्जियों का तरोताजा इंतजाम है| बच्चों के लिए ताजा सलाद और सब्जियां तोडना, काटना और पकाना आज खेल थे| प्रकृति आपके पास थी और उसका आनंद ले सकते थे| दिन में जब भी चाय बनानी हो तो बकरी ताजा दूध दे देती थी| फ्रिज का प्रयोग नगण्य था|

रात को ढेर सारे तारे आसमान में दिखाई दे रहे थे| और शीतल हवा में बच्चे अपनी मर्जी के खेल खेल रहे थे| दिल्ली में जितना बड़ा कालोनी का पार्क था उस से कहीं लम्बी चौड़ी छत यहाँ उनका मैदान थी| समय का कोई बंधन नहीं था|

जिन बच्चों को मैं सुविधाओं की कमी के बारे में बता कर और कोई शिकायत न करने के लिए मना कर ले कर गया था वो पूरी तरह मस्त थे|

शिकायतें कम थी, आनंद बहुत| परिवार और पास पड़ोस के बच्चे कई दिन तक प्रसन्न रहे| मैं सोचता रहा, शहरी विकास का मतलब क्या प्रकृति से दूर चले जाना है?

आनंद को खोजते हुए मानव में विज्ञान और विकास के नए पायदान छू लिए हैं| मगर आज भी जरूरतें वह ही हैं जो आदम काल में थीं – भोजन, सहजीवन, और आश्रय| तकनीकि आपको भटकाती है और प्रकृति आपको वो सब देती है जो हजारों सालों से हम सब की जरूरत है|