पूरी तरह बंद हों पटाखे


2021 10 25 Business Standard Hindi

पटाखे ने केवल वायु प्रदूषण बल्कि ध्वनि प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण और अंत में जल प्रदूषण का कारक हैं| प्रकाश प्रदूषण को हमने अनुभव तो किया होता है पर नुकसान भी झेले होते हैं पर समझ नहीं पाते| यह मानवेतर जीव जगत को अधिक प्रभावित करता हैं| जैसा कि अक्सर होता है सभी प्रदूषक साफ सफाई कि प्रक्रिया में जल को प्रदूषित करते हैं|

हमारे समाज कि विडम्बना है कि दीपक आदि चक्षुप्रिय प्रकाश को हमने चुपचाप छोड़ दिया, पहले मोमबत्ती पर आए अब बिजली कि झालरों आदि का प्रयोग हो रहा है| जबकि दिवाली के मूल स्वरूप के हर वर्णन में दीपकों का महत्वपूर्ण विवरण है| दीपक दिवाली का मूल हैं| परंतु दीपकों के लिए कोई संघर्ष नहीं कर रहा| हमने बिना हो हल्ला किए दीपक जलाना छोड़ दिया है|

दूसरी ओर हम हानिकारक पटाखों के लिए जज्बाती हो रहे हैं| पटाखे चीन से आए और मुग़ल ‘आक्रांताओं’ के साथ भारत आए पर हमने अपना लिए| बुराई – खासकर विदेशी बुराई अपना लेना हमारा स्वभाव रहा है| पटाखे हम सब के लिए हानिकारक हैं| न तो यह दिवाली का मूल आधार हैं, न मूल परंपरा, न कोई आध्यात्मिक अनुभव| पटाखों से होने वाली हानि हम सब की मिलीजुली हानि है|

दुर्भाग्य से पटाखा व्यवसाय और धार्मिक अतिवाद का पूरा तंत्र दिवाली के आध्यात्मिक, धार्मिक और सामाजिक सरोकारों से इतर केवल दिखावा और उपभोकतवाद का प्रचार करने में लगा है| यह व्यवसायी पटाखों को दिवाली का कर्म कांड बनाने में काफी हद तक सफल रहे हैं|

दुर्भाग्य से पटाखा नीतियाँ भी इस प्रकार बन रहीं हैं कि आम जन को यह महसूस होता है कि यह नीतियाँ मात्र दिवाली पर ही पटाखे चलाने से रोकती हैं| यह भी प्रचारतंत्र का हिस्सा है कि गलत नीतियों के विरोध के नाम पर ही लोग अधिक पटाखे चलाने कि कसमें खा रहे हैं| जबकि यह गलत हैं| पटाखे पूरी तरह बंद होने चाहिए – सरकारी नीतियाँ बने या न बने|

दिवाली पर पटाखा एक धार्मिक और सामाजिक प्रदूषण हैं और समाज को इस प्रकार के प्रदूषण को बंद करना चाहिए|

दिवाली अब भी मनती है


वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

दिवाली, चीन, और वो!!


[२८ सितम्बर २०१६ को ही यह पोस्ट लिखना चाह रहा था मगर अभी रवीश कुमार जी की पोस्ट “इस दिवाली चीन का माल ज़रूर ख़रीदें” पढ़कर तुरंत लिख डाला]

हर बार होता है, हर दिवाली पर| गरीब कुम्हार का घर, बिजली के चीनी लट्टू, पटाखों और सामान का फ़ोटो, और बहिष्कार की मांग| फेसबुक पर लाइक और व्हात्सप्प पर शेयर होता रहता है| इस बहाने प्रचार हो जाता है – सस्ता चीनी सामान उपलब्ध है, पोस्ट को लाइक करने के बाद अपनी जेब टटोलिये और देशभक्ति और हमदर्दी घर छोड़ दीजिये|

भरे बाजार के फूटपाथ पर, दस रुपये का पटाखा ले लो बाबा जैसी मुद्रा में बहुत लोग बैठे होते हैं उसी चीनी सामान को बेचते| न वो इस चीनी सामान के निर्माता हैं, न आयातक, न वितरक, न कालाबाजारिये| इन चीनी सामान के आयातक, वितरक, कालाबाजारिये कोई देशभक्त जी होते हैं, जो नाम, धाम, जाति, धर्म, कर्म, राजनीति, मन, कर्म, वचन से देशभक्त होते हैं|

मैं जो लिखने जा रहा हूँ, उसका कारण मूल कारण एक प्रेस विज्ञप्ति है जो २८ सितम्बर २०१६ को जारी हुई और मैंने उसे शेयर भी किया था|

यह मूल प्रेस विज्ञप्ति प्रेस सूचना ब्यूरो की साईट पर उपलब्ध है| यह उस तथ्य के बारे में है जिसे हम सब जानते और उसका फेसबुकिया विरोध भी करते हैं| दिवाली के समय विदेशी विशेषकर चीन के पटाखों की बिक्री धूम धड़ाके से होती है| सब लोग आसानी से खरीदते भीं हैं| मगर चिंताजनक रूप से यह विज्ञप्ति कहती है – सरकार को विदेशी मूल के पटाखों की बड़ी मात्रा में आयात की सूचना/शिकायत मिलती हैं| शायद यह सूचना और शिकायत प्राप्त करना सरकार के लिए रोजमर्रा का काम है|

आगे यह विज्ञप्ति कहती है – इन पटाखों का आयात रिस्ट्रिक्टेड है और भारत सरकार ने आज तक पटाखों के आयात का कोई लाइसेंस किसी को भी नहीं दिया है| कम से कम २००८ में नियम बनने के बाद से तो किसी को यह लाइसेंस नहीं मिला है|

आश्चर्यजनक रूप से यह विज्ञप्ति विदेशी मूल के पटाखों की बिक्री की सूचना निकट के पुलिस थाने को देने की कहकर समाप्त हो जाती है|

अगर किसी को पटाखा आयात की अनुमति नहीं तो उनका आयात कैसे होता है? इसके उत्तर में विज्ञप्ति कहती है कि झूठे डिक्लेरेशन देकर आयात किया जाता है| किस तरह के यह झूठ होते होंगे? क्या उन झूठों को पकड़ने की कोई कार्यवाही हुई होगी? क्या उन झूठों पर विश्वास करने के लिए सीमा शुल्क अधिकारीयों को साम – दाम से राजी किया जाता है या वो भी देश के जनता की तरह भोले भाले हैं?

जब झूठे डिक्लेरेशन देकर पटाखे आयात हो जाते हैं तो राम जाने क्या क्या आयात हो जाता होगा|

आगे बहुत से प्रश्न है मगर मेरी अपनी सीमायें है… कम लिखा ज्यादा समझना की तर्ज पर लिखना बंद करना चाहता हूँ|