वह मर चुका है, पर बोलता है

पुरानी इमारतें अगर खंडहर न हो रहीं हों तो आबादी को पुकारतीं हैं| उनके आसपास आबादी जमा हो जाती है और साथ में अपनी गंदगी और प्रदूषण भी लाती है| जहाँ कहीं भी ईसाईयों की आबादी कम है, वहां चर्च आम तौर पर शांत हैं| इस चर्च का नाम तो है ही “जंगल में संत जॉन”| अपनी स्थापना के डेढ़ सौ साल पूरे होने के बाद यह चर्च आज भी जंगल में ही कहा जा सकता है| यह पुराना चर्च देश के सबसे बड़े भूकम्पों में से एक देख चुका है| पास पड़ोस में बीस हजार इंसानी मौत और भारी माली नुक्सान| चर्च नष्ट होने से बचा रहा मगर नुक्सान झेलना पड़ा|

नीचे एक तरफ देवदार का घना जंगल है तो दूसरी तरफ़ पहाड़ी और फोर्बिसगंज की हल्की फुल्की आबादी| पर्यटकों की गाड़ियाँ आ जा रहीं है| जिन्हें जल्दी है वो पैदल निकल जाते हैं| एकांतर एकल मार्ग का नियम लागू है|

भीड़ तो है सड़क पर मगर उसे चर्च से लेना देना नहीं| चर्च के दरवाजे की ओर शायद ही कोई देखता है| जो देखते हैं उन्हें चर्च से ज्यादा इसके अहाते में बनीं पुरानी कब्रें दिखाई देतीं हैं| मुझे चर्च की पुरानी इमारत पुकारती है| समय की मार दिखाई देती है| देखने से मालूम होता है, अभी देश का सबसे ताकतवर इंसान यहाँ आता रहा होगा| मैं चर्च की ओर उतर जाता हूँ| पुराने पेड़ बातें करते हैं, कब्रें मुस्कुरातीं हैं|

हमारें मुल्क में ज्यादातर बड़े बाग़ बगीचे कब्रों, मकबरों और छतरियों के साथ बने हैं| चर्च का यह अहाता कोई बगीचा या बाग़ जैसा नहीं कहा जा सकता| बेतरतीब का छोटा जंगल है| लगता नहीं कोई ज्यादा ख्याल रखा जाता है| मैं कब्रों के पत्थरों पर लिखी इबारतें पढ़ता जाता हूँ| कब्रों में लेटे लोग लगता है अक्सर आपस में बातचीत करते हैं| जैसा अक्सर होता है, माहौल उदास सा है| मैं चर्च के अन्दर जाता हूँ, अजब शांति का कुछ समय बिता कर बाहर आ जाता हूँ| चर्च के अहाते में बायीं ओर

एल्गिन के आठवें और किन्कार्दीन के बारहवें अर्ल जेम्स ब्रूस की कब्र है| जेम्स ब्रूस साहब सन १८६२ से १८६३ के बीच बीस महीने तक भारत के वाइसराय रहे|

अंगेजों से हम भारतियों का माई-बाप गुलामी का नाता है| अक्सर हम उन की इज्ज़त करते हैं| हम उन्हें आज भी अपने से ऊपर रखते हैं| शायद ही कभी उन्हें उस तरह गालियाँ देते हैं, जिस तरह किसी और शासक को दे लेते हैं| हर शासक में कुछ न कुछ अच्छाई बुराई होती है| पर अंग्रेज पहले शासक थे, जिनका मकसद देश को गुलाम बनाना था और लूटकर यहाँ का पैसा अपने मुल्क ले जाना था| वो न लूटकर लौटने का इरादा रखते थे न यहाँ रहकर यहीं का होकर शासन करने का|

एक शानदार शांत भव्यता के साथ खड़ा जेम्स ब्रूस का यह स्मारक मुझसे कहता है – हमने सब कुछ सही गलत किया तुम्हारे साथ| मंदिर और मस्जिद नहीं तोड़े| यही कूटनीति तुम्हे आज भी हमारा गुलाम रखती है|

उसने मुझसे कहा, आते रहना| कभी कभी मिलकर बातें करेंगे| मैंने कहा, आधी दुनिया पर राज करने वाले तुम, आज इस नीरवता में अकेले हो| वह मुस्कुराया, मैं अक्सर यहाँ हिमालय से गले मिलता हूँ| अगर कोई इसरायली सिपाही इधर से निकलता है, तो उसके साथ कॉफ़ी पीता हूँ|

स्मारक पर लिखा गया है – “वह मर चुका है, पर बोलता है”|

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पानी की पहली लड़ाई

धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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