बाबरी दिवाली


राम और बाबर का पांच सौ साल पुराना रिश्ता लगभग अटूट है| किसी भी अदालत का कोई फैसला इस रिश्ते को नहीं तोड़ सकता| यह रिश्ता मंदिर मस्जिद का मोहताज नहीं है| यह रिश्ता दिवाली का है|

दिवाली उद्गम भले ही भगवान राम के अयोध्या वापिस आने से जुड़ा हो परन्तु किसी न किसी दिन भारतीय दिवाली को आधुनिक बनाने का श्रेय ज़हीर-उड़-दीन बाबर को जरूर दिया जायेगा| वैसे तो दिवाली को अति-आधुनिक प्रकाश-प्रदूषित बनाने का जिम्मा भी चंगेज़ी इलाकों के बाशिंदों को दिया जाना चाहिए|

जब राम अयोध्या वापिस लौटे – लगभग सभी ग्रन्थ – गाथाएं – गवैये सहमत हैं – नागरिकों ने दीवले जलाकर उन का स्वागत किया| दिवाली से जुड़े सारे शब्द दीवलों से जाकर जुड़ते हैं| चाहे किसी का दीवाला निकलना हो या किसी की दिवाली होनी हो; दीवले चुपचाप अपनी उपस्तिथि का अहसास करा देते हैं| यह अलग बात है कि बाबरी और चीनी दिवाली में दीवलों की सदेह उपस्तिथि कम होती जा रही है|

बाबर समरकंद से जब भारत आया तो अपने साथ हिंदुस्तान के लिए वो नायब तोहफ़ा लाया जिसके खिलाफ कोई शब्द सुनना किसी कट्टर हिंदूवादी या इस्लामवादी को शायद ही गवारा हो| यह बेशकीमती तोहफा है – बारूद और उसकी औलाद आतिशबाजी| बाबर या उसके दिखावापसंद वंशजों ने दिवाली के दीयों की रौशनी से मुकाबला करने के लिए आतिशबाजी के जौहर दिखाने शुरू किये| धीरे धीरे आज यह आतिशबाजी दिवाली का सबसे दुखद पर्याय बन गई है| अदालती फरमानों के बाद भी दिवाली पर आतिशबाजी होती है| राम से सहज सच्चे सुन्दर दीवलों का मजाक बाबर की आतिशबाजी आजतक उड़ाती है|

बाबर के खानदानी मंगोलों की कृपा से आजकल उनके मूल देश चीन से आने वाली प्रकाशलड़ियाँ भी तो कुछ कम नहीं| झूठीं चमक-दमक प्रकाश प्रदूषण – लाभ कोई नहीं|

पढेलिखे कहे जाने वाले लोग आतिशबाजी कर कर मलेरिया और डेंगू तो रोकने का दावा करने में नहीं चूकते| बेचारे भूल जाते हैं हमारे सीधे सादे राम जी की कृपा से मिट्टी का सस्ता सा दिया भी मच्छर मार लेता हैं और आबोहवा भी ख़राब नहीं करता|

मगर माटी के दिया कोई क्यों ले – उससे दिखावा कहाँ हो पाता है? उसकी धमक कहाँ पड़ोसी के कान में जाती है, उसकी रौशनी से कौन नातेदार चौंधियाता है? चुपचाप पड़ा रहता है – तेल की धार देखते देखते सो जाता है|

जाने कब राम जी की दिवाली वापिस आएगी|

दिवाली पर पहले लिखे गए आलेख:

रंगीन दीवले 

अहोई कथा – दीवाली व्यथा

दिवाली अब भी मानती है

रंगीन दीवले


दीप, दीपक, दिया, दीवले!!

मेरे बचपन के सबसे पुराने शौक में शुमार है, दिवाली के दीवले इकट्ठे करना| रात की रौनक दीवले, दिन में रंग रूप बदल लेते थे| उस समय हमारे यहाँ बिजली की लड़ियों का उस तरह चलन नहीं था जैसा आज है| मोमबत्तियां जरूर जलाई जाती थीं मगर दीवले बहुत जरूरी थे, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से ही नहीं हम बच्चों का मन रखने के लिए भी|

दीवाली की रात सब दीवलों में बराबर मात्रा में तेल भरना और फिर इस तरह घर और घर के  बाहर सजाना कि प्रकाश भी दे और कोई एक तिलिस्म पैदा करें कि मन को मोह लें| फिर थोड़े पटाखे फोड़ें| उन दिनों आज की तरह दीवाली की रात मच्छर घर में नहीं भरा करते थे, दीवलों के चारों तरफ मंडरा कर मर जाया करते थे|

दिवाली के अगले दिन मोहल्ले के सारे बच्चे जल्दी जगते, सबको न केवल अपने बल्कि आज पड़ोस के घरों से भी दीवले इकट्ठे करने होते थे|

अब आता असली मजा| आप साबित दीवलों को नाव बना कर बाल्टी में तैरा सकते थे तो दो दीवलों में तीन छेद कर कर तराजू बना सकते थे| एक दीवले के टुकड़े आपके लिए बाट बन सकते थे| दीवलों का टेलीफोन उन दिनों उतना ही पसंद आता था जितना आज स्मार्टफोन| दीवलों से आप नाप जोख कर कर अनाज की ढेरियाँ बना सकते थे और गणित के नाप तौल वाले सवाल कब आपके दिल दिमाग में उतर जाते, पता भी नहीं लगता|

अगर जाड़ों या गर्मियों की छुट्टियों तक दीवले बच जाए तो एक नया खेल खेला जाता| दीवलों पर रंग रोगन किया जाता, कुछ न कुछ फूल पत्त्तियाँ बनाई जातीं| ये बेल बूटे कुछ कुछ लोक कला जैसी दिखाई देते| जो दीवले अच्छे सज जाते उनका माँ मोमबत्तीदान बना लेतीं, वो घर की बैठक में रख दिया जाता| बाकी बेल बूटे वाले दीवले घर और मोहल्ले के बच्चों में बंट जाते|

वो रंग – बिरंगे दीवले अब नहीं होते, दीवाली का दिवाला निकल चुका है, और वो शानदार रंगीन शौक बड़ी बड़ी रंगीनियों में उदास हैं|